लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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– जयप्रकाश मील-

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आजादी के 67 साल बाद भी लगता है किक ने सिर्फ बेड़ागर्क ही किया है। गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के मुद्दे को फुटबॉल की तरह खेलकर सत्ता में आई मोदी सरकार की ‘किक’ भी कमजोर नहीं है। मोदीजी की सरकार ने पूरे ठोक-बजाकर पूरे जोर से पहली किक रेलगाड़ी के रूप में मारी। इस किक की मार सीधे-सीधे फटेहाल लोगों पर पड़ी। फिर आई आम बजट की बारी, तो भी किक की रफ्तार ‘दनादन गोल’ वाली रही।

ना तो मैं अभिनेता सलमान खान वाली फिल्म किक वाली ‘किक’ की बात कर रहा हूं और ना ही किसी फुटबॉल वाली किक की चर्चा करके अपना टाइम खराब करना चाहता हूं। उस आम आदमी वाली ‘किक’ पर जोर दे रहा हूं। उस गरीब तबके के पांव वाली ‘किक’ की बात कर रहा हूं। साथ ही अच्छे-खासों और सेठों वाली ‘किक’ पर भी अपनी खूब भड़ास निकाल रहा हूं। आम तौर पर हम किक को कई नजरिए से देखते हैं। किसी वजह से नौकरी से हाथ धो बैठते हैं तो हम कहते हैं ‘किक पड़ गई।’ बार-बार प्रयास करने के बाद भी जब बाईक स्टार्ट नहीं होती है, तो हम बाइक खराब होने की बात सोचते हैं या फिर कहते हैं ‘यार किक नहीं लग रही।’ फुटबॉल में किक का सबसे अधिक महत्व है, क्यों यहां किक के बिना फुटबॉल भी किसी काम की नहीं। इस तरह से किक के भांति-भांति के रूप हैं।  फट्टे चक देने वाली भाषा पंजाबी में ‘ठुड्डा’ भी कह सकते हैं। अन्य राज्यों में भी इसी किक को अलग-अलग तरीके से कहा अथवा समझा जाता है। हम सिर्फ अंग्रेजी वाले ‘किक’ के साथ ही चलते हैं। ‘किक’ की मार से कुछ तडफ़ रहे हैं, तो ‘पहुंच वाले’ ठुड्डे-किक मार-मारकर खूब मजे लूट रहे हैं। यंू कहें कि किक ही मजा है और किक ही सजा है। अच्छे के लिए मारी गई किक में जितना मजा है, उतनी ही सजा बुरे काम के लिए मारी गई किक के बदले में मिलना भी तय है। वैसे किक और ठुड्डे की मार का दर्द सबसे अधिक गरीब को ही होता है। खादी के शौकीन और अपनी आदतों से मजबूर लोग तो मेरे और आपके जैसे जरूरतमंद को ठुड्डे पर ही रखते हैं। इन्हीं लोगों में पहले हमें ‘खुशी’ दिखाई देती थी। ऐसे लोगों ने हमारे जैसे लोगों के सपनों को फुटबॉल बनाया और किक पर किक मारकर सपनों को मैदान से ही बाहर कर दिया। यानि एक किक में ही सपने बाहर। जी हां, ऐसा ही हो रहा है हमारे ‘आजाद’ भारत में। अंग्रेजों के जुल्मों को सहते-सहते जब देश की जनता खड़ी हुई, तो उसने सबसे पहले अंग्रेजों को ही ‘किक’ मारी। गुलामी से आजाद हुए हम देशवासी फूल के कुप्पा हो गए। सोचा अब आजाद हुए हैं, तो मजे लूटेंगे। अच्छे नागरिकों की तरह रहेंगे। ऐसी सोच तब थी, जब हमें अंग्रेजों की किसी भी ‘किक’ का डर नहीं था। … लेकिन यह थोड़े ही सोचा था कि अंग्रेजों के बाद भी किक मारने के लिए नए लोग भी आ जाएंगे। अंग्रेजों के बाद भारत की ही भूमि से यौद्धा खड़े हुए। इनमें अक्ल धेले की ना हो, शरीर में जान के नाम पर सिर्फ सांसें चल रही हों, … और शिक्षा के नाम पर तो शुद्ध अंगूठा टेक हो। बस सिर्फ सब कुछ ‘ऊंचा’ ही हो। ऊंची सोच होने के साथ ऊंची पहुंच हो, ऊंचे पहुंच के साथ ही ऊंचा पद भी होना चाहिए। पद होगा तो कमाई भी ऊंची ही होगी। यानि सब कुछ ऊंचा ही होना चाहिए। ऊंची सोच के साथ मारी गई ‘किक’ का लाभ लाने के लिए ही पढ़े-लिखे यौद्धा जुटे रहे। खैर, किक मारने वाले शीशे के महलों में पहुंच गए और किक की मार खाने वाले तो घरों को ही सरस रहे हैं। जिस रफ्तार के साथ किक की मार देशवासियों ने दशकों तक हाथ का साथ देकर झेली, वही रफ्तार अब ‘फूल’ के राज में भी बनी हुई है। आजादी के 67 साल बाद भी लगता है किक ने सब कुछ बेड़ागर्क ही किया है। गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के मुद्दे को फुटबॉल की तरह खेलकर सत्ता में आई मोदी सरकार की ‘किक’ भी कमजोर नहीं है। मोदीजी की सरकार ने पूरे ठोक-बजाकर रफ्तार से पहली किक रेलगाड़ी के रूप में मारी। इस किक की मार सीधे-सीधे फटेहाल लोगों पर पड़ी। फिर आई आम बजट की बारी, तो भी किक की रफ्तार ‘दनादन गोल’ वाली रही। मोदीजी के बाद भला राजस्थान की राजे सरकार भी कहां पीछे रहने वाली थी। विधानसभा के सभी खिलाडिय़ों की मौजूदगी में राजे ने भी बिना पानी पीये अढ़ाई घंटे तक बजट पढ़ा, तो खबरनवीसों ने भी ऐसे कलम घसीटी, जैसे अढ़ाई घंटे तक तो कोई प्यासा रह ही नहीं सकता। जबकि आज भी बहुत से लोग पीने के लिए पानी को तरस रहे हैं। खैर, राजे ने भी कोई ऐसा तीर नहीं मारा, जिससे कि प्रदेश की जनता बाग-बाग हो जाए। … और मेरे जैसा उनकी प्रशंसा में कलम घसीटना चाहता भी नहीं।

वैसे आजादी के बाद से ही ‘किक’ ने किसी ना किसी रूप में गुल खिलाए ही हैं। महंगाई भी एक तरह से फुटबॉल बन गई। एक सरकार आई, उसने महंगाई रूपी फुटबॉल के किक मारी। फिर दूसरी सरकार आई, उसने भी कसकर महंगाई की फुटबॉल के किक मार दी। इस तरह से महंगाई भी फुटबॉल बनकर ही रह गई। महंगाई को रोकने के लिए ना तो कांग्रेस ने कोई धन-धन की और ना ही हमारे भाजपा वालों ने कोई कदम उठाया। दोनों ही पार्टियों को मौका देने के बाद भी सिर्फ मिल रही है तो महंगाई की किक। इस किक की मार सहते-सहते जवानी बुढ़ापे में बदल गई, लेकिन महंगाई रुकने का नाम तक नहीं ले रही। महंगाई के साथ-साथ भ्रष्टाचार भी फुटबॉल बन गई। भ्रष्टाचार की यह फुटबॉल घूमती-घूमती स्विस बैंकों तक पहुंच गई। काली कमाई स्विस बैंकों की शोपीस बन गई। विदेशों में जमा धन वापिस लाने की बातें कह-कहकर सत्ता में मोदी सरकार सत्ता में तो आ गई, लेकिन अभी तक ऐसा कोई प्रयास सामने नहीं आ रहा, जिससे कि हम कहें ‘अब धन भारत आएगा।’ सवाल आज भी यही है ‘काला धन भारत आएगा?’ इसी भ्रष्टाचार की फुटबॉल को रोकने के लिए ही तो मोदीजी को हमारे जैसों ने थोक के भाव वोट दिए थे। ना तो भ्रष्टाचार की फुटबॉल का दम टूटा और ना ही महंगाई की फुटबॉल की हवा निकली। दोनों की रफ्तार ऐसे चल रही है, जैसे दो व्यक्ति दौड़ में जीतने का प्रयास करते हैं। लेकिन इस दौड़ में ना तो महंगाई हार रही है और ना ही भ्रष्टाचार। दोनों तो सिर्फ आगे ही बढ़ रहे हैं।

वैसे फुटबॉल का मैच तो सबने देखा होगा। … क्योंकि ताजा-ताजा ही चढ़ा फुटबॉल विश्व कप का भूत कुछ दिन पहले ही तो उतरा है। आपने देखा होगा कि एक फुटबॉल के पीछे कितने खिलाड़ी होती है। सभी अपनी-एड़ी चोटी का जोर लगाकर इस फुटबॉल को अपने कब्जे में ही रखना चाहते हैंं। ठीक उसी तरह हमारे देश के नेता भी भ्रष्टाचार और महंगाई की फुटबॉल पर कब्जा जमाने के लिए आतूर रहते हैं। इसी फुटबॉल पर कब्जा करने के लिए हर साल कितनी ही चुनावी पार्टियां मैदान में उतरती हैं। इन पार्टियों के खिलाड़ी खूब भाग-दौड़ करते हैं। उम्मीदवारों को भतीरघात का भी सामना करना पड़ता है। जिन लोगों की शक्ल वे देखना नहीं चाहते, उनके आगे भी जी-हुजूरी करनी पड़ती है। बेशक आदत महंगी गाडिय़ों में मलाईदार सड़कों पर फर्राटेदार चलने की हो, लेकिन चुनाव के मौके पर ऐसे नेताओं के कदम कच्ची बस्तियों में जाने को भी मजबूर होते हैं। यानि तरह-तरह के पापड़ बेलने के बाद ही जीत के रूप में मिलता है भ्रष्टाचार और महंगाई की फुटबॉल पर कब्जा। वर्तमान में हमारे मोदीजी के पास यह फुटबॉल है, जिसके साथ उनके मंत्री खेल भी रहे हैं। राजस्थान में राजे सरकार इसी फुटबॉल पर राज कर रही है, तो पंजाब में बादल सरकार बल्ले-बल्ले कर रही है। यानि जहां-जहां जिस पार्टी की सरकार है, वहां-वहां उस पार्टी के नेताओं के पास यह फुटबॉल है। राजस्थानी गीत, पंजाब के भंगड़े और ऊपर से गुजरात का गरबा। यानि मोदीजी, वसुंधरा जी और बादल साहब एक साथ। … तो फिर धूम तो मचेगी ही। इस धूम में बेशक देश की जनता पर परेशानियां धड़ाम-धड़ाम करके गिर रहीं हों।

वैसे किकपुराण कथा सुनाने का मतलब यह नहीं कि हम कमजोर हैं। हम सिर्फ किक की मार खाने के ही काबिल नहीं है। हमारे पांव भी पांव है, जो हिलते-डुलते हैं। चाहे धूप हो या छांव, पांव में बेशक चप्पल भी ना हो, फिर भी यही पांव दौड़ते भी है। तो फिर हम क्यों नहीं किक मार सकते। रिश्वत की मांग करने वालों को भी हम ‘किक’ मार सकते हैं। अपने बच्चों को पढ़ाकर हम अशिक्षा को किक मार सकते हैं। खुद साफ-सुथरे रहने के साथ-साथ आस-पास के क्षेत्रों को स्वच्छ रखकर हम बीमारियों को भी ‘किक’ का स्वाद चखा सकते हैं। अफसरशाही भी किक तो मारे, लेकिन अच्छे के लिए। गलत काम के लिए सामने वाला नोटों से भरा बैग कदमों के पास रख भी दे, तो किक मार दी जानी चाहिए। ऐसी किक का ही फायदा सभी को मिलेगा। बाकी आपकी मर्जी…

जेल में एके-47!

‘जेल में मोबाइल मिला’, ‘कैदी के पास पहुंची अफीम’ , ‘जेल में फायरिंग, तीन की मौत’ जैसे शीर्षक वाली खबरें सुनने के बाद यदि आने वाले दिनों में ‘जेल में एके-47’ का सामाचार भी पढऩे को मिले, तो इसमें हैरान होने की जरूरत नहीं है। क्योंकि आजादी के 67 साल बाद भी हिन्दुस्तान की जेलों में आज भी ‘जंगल राज’ है। बीकानेर जेल में हुई एक  बड़ी घटना ने शासन-प्रशासन की कथित सक्रियता, निष्पक्षता की धज्जियां उड़ाकर रख दी है। किसी गुनाह की सजा काटने वाला व्यक्ति जेल में रहकर भी सुरक्षित नहीं है, क्योंकि जेल प्रशासन नोटों के नीचे दब गया है।

एक जेल और इसी जेल में सजा काटने वाले कैदियों के पास मोबाइल ही नहीं, बल्कि पिस्तौल भी है। दो गुटों में टकराव होता है और फायरिंग की घटना में कैदी की मौत हो जाती है। इस तरह के दृश्य अब तक आप फिल्मों में ही देखते आए थे, लेकिन अब सब कुछ सामने होने लगा है। जीता-जागता उदाहरण बीकानेर जेल है, जिसमें पिछले दिनों हुई एक शर्मनाक घटना हुई। एक ऐसी घटना, जिसकी कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। जेलों में मोबाइल मिलना आम बात है। आए दिन जेलों के निरीक्षण के दौरान मोबाइल, सिम, चार्जर या अन्य नशीली वस्तुएं मिलती रही हैं। … लेकिन बीकानेर की जेल में तो सारी हदें पार हो गई। इस जेल में खुंखार कैदियों के पास रिवॉल्वर तक पहुंच गया। इतना ही नहीं इसी रिवॉल्वर से फायरिंग की घटना हुई और एक कैदी की गोली लगने से मौत हो गई, जबकि दो की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। इस घटना के बाद जेल की सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान लग गए हैं। ‘जब एक जेल में रिवॉल्वर ही चली गई, तो बाकी रह क्या गया? ‘ इस तरह के तमाम सवाल खड़े हो गए हैं। ‘पहले मोबाइल, फिर रिवॉल्वर और अब आगे क्या एके-47।’ कम से कम बीकानेर जेल में हुई घटना के बाद तो यही कहा जा सकता है कि भविष्य में यदि किसी जेल में एके-47 भी मिल जाए, तो यह इसमें हैरान होने की जरूरत नहीं। जेलों में गैर कानूनी कार्य होने की शिकायतें तो आम हैं। नशीले पदार्थ भी जेलों में पहुंच जाते हैं। हालांकि बीकानेर जेल अधीक्षक सहित सुरक्षा प्रहरी को राज्य सरकार ने तुरंत प्रभाव से निलंबित कर दिया, लेकिन भविष्य में सुरक्षा व्यवस्था कैसी रहेगी, यह सवाल सिर्फ सवाल ही बनकर रह गया है। घटनाक्रम के विस्तार में जाने से पता चलता है कि जेल कितनी सुरक्षित है। 24 जुलाई को जेल में सामान्य दिनों की तरह ही काम हो रहा था। शाम 5.50 बजे अचानक जेल में खूनी संघर्ष शुरू हो गया। केन्द्रीय कारागृह में बंदियों के बीच झगड़ा हुआ और विचाराधीन बंदी बलबीर बानुडा पुत्र हीरालाल जाट पर गढ़वाल निवासी जयप्रकाश उर्फ जेपी पुत्र मूलाराम जाट ने रिवॉल्वर फायरिंग कर दी। इससे बलबीर की मौत हो गई। यह घटना सिर्फ एक बंदी की मौत तक ही सीमित नहीं रही। इसके बाद बलबीर के साथी बंदी आनंदपाल सिंह पुत्र हुकमसिंह राजपूत निवासी सांवराद, जिला नागौर, दंडित बंदी नेमीचंद उर्फ नेमला पुत्र आसाराम माली निवासी गोकुलपुरा, जिला सीकर, भवानी सिंह राजपूत, मनोज चौधरी, विक्रम सिंह राजपूत व अन्य कैदियों ने जयप्रकाश उर्फ जेपी और रामपाल पुत्र रेवंतराम जाट निवासी पटेल नगर की पीट-पीटकर हत्या कर दी। इस मामले में जेल अधीक्षक सुरेन्द्र सिंह शेखावत की रिपोर्ट के आधार पर बीछवाल थाना में भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 307, 323, 341, 147, 148, 149 और 24 आम्र्स एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज करके आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। इस घटना के बाद पहले जेल अधीक्षक को और बाद में सुरक्षा प्रहरी को निलंबित कर दिया। इस घटना के बाद पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों में हड़कंप मचना ही था, क्योंकि जेल में फायरिंग की घटना जो हुई थी। अगले दिन तीनों शवों के पोस्टमार्टम करवाकर शव परिजनों को सौंपे जाने लगे, तो परिजनों ने शव लेने से इनकार कर दिया। परिजनों का कहना था कि जेल में ही यदि कोई सुरक्षित नहीं है, तो सुरक्षा कहां है। अधिकारियों ने जांच एसओजी से करवाने का आश्वासन दिया, तो परिजन शव लेने के लिए राजी हो गए। एसओजी के एसपी सुरेन्द्र कुमार पूरी टीम के साथ जांच के लिए बीकानेर पहुंचे। उन्होंने घटना की विस्तार से जानकारी ली। इतना ही नहीं उन्हें एक खाली कारतूस भी मिल गया। रिवॉल्वर तो पहले ही पुलिस बरामद कर चुकी थी। इस घटना के बाद प्रदेशभर की अनेक जेलों की सघनता से जांच करवानी शुरू की गई। कई जेलों में मोबाइल व सिम तथा अन्य आपत्तिजनक वस्तुएं भी मिली। इस तरह से वस्तुएं मिलने से साफ है कि जेल में सब कुछ संभव है। इस मामले में विपक्ष ने सरकार को घेरने का प्रयास किया। … क्योंकि सरकार की जवाबदेही बनती है कि आखिर जेल में रिवॉल्वर कैसे चला गया। सरकार ने बीच-बचाव वाला रवैया अपनाया। इस मामले की विभागीय जांच डीआईजी जेल जोधपुर दिलीप कुमार जाखड़ भी कर रहे हैं। उधर पता चला है कि झगड़े में मारे गए तीनों कोई छोटे-मोटे अपराधी नहीं, बल्कि उन पर गंभीर आरोपों में मुकदमे भी दर्ज हैं। एक तरह से इन्हें खुंखार अपराधी माना जाता है।

प्रदेश की जेलों में गैर कानूनी काम होने की शिकायतें कई बार मिल चुकी हैं। यह संभवत: पहला मामला होगा, जब जेल में रिवॉल्वर पहुंचा और फायरिंग की घटना में कैदी मारे गए। देश की बड़ी-बड़ी जेलों में नशीले पदार्थ आसानी से पहुंच रहे हैं। जेलों में फैली अव्यवस्थाओं के बारे में ‘स्वर्ण आभा’ पहले ही विस्तार से बता चुकी है। बीड़ी-सिगरेट या अन्य नशीली वस्तुएं आसानी से जेलों में पहुंच रही है। सूत्रों ने बताया कि कैदी जब जेल में पहुंचता है, तो उसकी ‘तसल्ली’ से तलाशी ली जाती है। इसके बाद ही उसे आगे बैरक में भेजा जाता है। वो बात अलग है कि बाद में कैदी को उसकी जरूरत के अनुसार सामान बाद में मिल जाता है। चाहे वह बीड़ी-सिगरेट हो या कोई अन्य नशीली वस्तु। जेल प्रशासन की ही मिलीभगत से ये सारी वस्तुएं आसानी से अंदर पहुंच जाती हैं। जेलों में सीसी टीवी कैमरे भी लगे हुए हैं। इसके बावजूद मोबाइल, रिवॉल्वर या अन्य कोई वस्तु जेल प्रशासन की मिली भगत से ही अंदर पहुंच रही हैं। हालांकि सक्रियता के नाम पर जेलों में छापामारी भी की गई। यह सक्रियता भी सिर्फ दिखावे से अधिक नहीं लगी।

सूत्रों ने बताया कि प्रदेश की बहुत सी जेलों में गैर कानूनी काम हो रहे हैं। जेल में बैठा-बैठा व्यक्ति ही साजिश रचता है और उसकी साजिश सफल भी हो जाती है। कैदी अंदर रहते हुए भी ‘धंधा’ करता रहता है। जेलों में व्यवस्थाओं का बेड़ागर्क हो रहा है, तो इसके लिए जिम्मेदार शासन-प्रशासन है। इससे सबसे अधिक मजाक तो सरकार का उड़ा है। सरकार को घेरने के लिए विपक्ष ने भी पूरे प्रयास किए। विपक्ष ने तो विधानसभा में सरकार पर आरोप लगाने की झड़ी लगा दी। बीकानेर जेल के मुद्दे को खूब भुनाया गया। आरोप-प्रत्यारोप के बीच अब दिन सामान्य हो गए हैं। घटना की एसओजी से जांच हो रही है और नतीजे का इंतजार अभी किया जा रहा है। जांच के बाद आगे क्या कार्यवाही होगी, यह भविष्य के गर्भ में है। फिर भी चर्चाओं का दौर जारी है। लोग यही मान रहे हैं कि जब जेल में रिवॉल्वर पहुंच सकता है, तो वहां पर ‘सब कुछ’ हो सकता है। भविष्य में यदि आपको यह भी सुनना पड़े ‘फलां जेल में एके-47 मिली’ तो हैरान होने की जरूरत नहीं, क्योंकि हिन्दुस्तान की जेलें ‘सर्वअवगुण संपन्न’ है।

 

एक अधिकारी से सौ बीमारी

‘एक अधिकारी, सौ बीमारी’ लिखने का मतलब यह नहीं कि अधिकारी खुद एक बीमारी है अथवा किसी बीमारी का नाम ही अधिकारी है। अधिकारी और बीमारी दोनों अलग हैं। हां भ्रष्ट अधिकारी की वजह से पीडि़त व्यक्ति जरूर सौ तरह की बीमारियों का शिकार हो सकता है, इसमें कोई दोराय नहीं। शासन-प्रशासन के बीच बने गठजोड़ से नुकसान गरीब तबके का हो रहा है। शासन-प्रशासन की अनदेखी का दर्द बयां करती यह रिपोर्ट:-

यह एक अधिकारी वर्ग ही तो है, जिससे परेशान होकर लोग जनप्रतिनिधियों की तरफ रुख कर लेते हैं। जनप्रतिनिधि के आगे लगाई गई गुहार का असर होता है या नहीं, वो बाद की बात है। जनता की दु:ख-तकलीफों को समझने और तुरंत कार्यवाही करने के लिए अधिकारी वर्ग की बहुत बड़ी फौज है। हर अधिकारी-कर्मचारी का अलग-अलग काम है। हर तरह के निर्णय की क्षमता रखने के अधिकार भी संबंधित विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों के पास हैं। किसी भी गलत काम को रोकने के लिए पूरे साधन भी उपलब्ध हैं। इसके बावजूद लोगों के जायज काम समय पर नहीं हो पाते। राज्य सरकार की तरफ से एक वेबसाइट भी बनाई गई है, जिसमें रोजाना सैंकड़ों की शिकायतें दर्ज होती हैं। इन शिकायतों को बाद में संबंधित विभागों के उच्चाधिकारियों तक पहुंचा दिया जाता है। जगह-जगह शिकायत पेटिकाएं बनाई हुई हैं। इस तरह के प्रयासों से यही कहा जाना चाहिए कि सरकार तो अधिकारी वर्ग को ‘ठीक’ करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। फिर सवाल यह भी उठता है कि इतने प्रयास होने के बाद भी लोगों को जायज कामों के लिए धरने-प्रदर्शन या भूख हड़ताल क्यों करनी पड़ती है। क्यों स्टाफ के अभाव में स्कूलों के ताले लगाए जाते हैं। नतीजा साफ है कि शासन और प्रशासन के बीच हुए गठजोड़ की वजह से लोगों के काम नहीं हो रहे। अधिकारी सुनवाई नहीं करते और जनप्रतिनिधि अधिकारियों को खुली छूट देने में ही लगे रहते हैं। किसानों को सिंचाई विभाग से हमेशा शिकायत रहती है कि उन्हें पर्याप्त पानी नहीं मिलता। खाद के लिए भी भटकना पड़ता है। जिले के गजसिंहपुर क्षेत्र के काफी समय से दूषित पेयजल की सप्लाई हो रही है। इसकी वजह भी सुन लोगे तो हैरान रह जाओगे। वजह यह है कि जलदाय विभाग के पास फिटकरी ही नहीं है। यह तो बात पेयजल की थी, जिसकी समस्या वर्षों से चली आ रही है। इसमें सुधार के कोई प्रयास नहीं हुए। पिछले दिनों सरकार आपके द्वार कार्यक्रम के दौरान बहुत सी ऐसी शिकायतें भी हुई, जिसमें स्पष्ट रूप से अधिकारियों पर ही रिश्वत लेने के आरोप लगे। ‘काम के बदले दाम’ मांगने वाले ऐसे अधिकारियों की वजह से आज भी बहुत से लोग पात्र होते हुए भी योजनाओं का लाभ नहीं ले पा रहे। ऐसी ही एक शिकायत पिछले दिनों गंगानगर जिला रसद अधिकारी को की गई। घड़साना तहसील के अंतर्गत गांव 2 एमएलडीबी-ए  में रहने वाले विजय कुमार स्वामी पुत्र सीताराम स्वामी ने शिकायत की शुरूआत में ‘ग्राम पंचायत 2 एमएलडी-बी के नोडल अधिकारी  गुरबचन सिंह पर खाद्य सुरक्षा सूचि में नाम भिजवाने के नाम पर पांच सौ रुपए मांगने’ की बात लिखकर जता दिया कि किस तरह अधिकारी सौ-पांच सौ के लिए लोगों को चक्कर पर चक्कर काटने के लिए मजबूर कर रहे हैं। शिकायत के मुताबिक विजय कुमार के नाम से ग्राम पंचायत ने राशन कार्ड जारी किया हुआ है। परिवार में कुल सात सदस्य हैं। खाद्य सुरक्षा प्राप्त परिवार होने के बावजूद उसे लाभ नहीं दिया जा रहा। इसके लिए नोडल अधिकारी गुरबचन सिंह हैं। नोडल अधिकारी ने कार्ड में इस संबंध में मोहर लगाकर अपने हस्ताक्षर तो कर दिये हैं, लेकिन उसका नाम नहीं भिजवाया गया है। बार-बार चक्कर लगाने के बाद भी उसकी सुनवाई नहीं हुई। विजय कुमार का आरोप है कि इसके लिए नोडल अधिकारी ने पांच सौ रुपए रिश्वत देने की मांग की। आरोपों में कितनी सच्चाई है, यह तो जांच का विषय है। फिर भी विजय शिकायत में बताता है 27 अक्टूबर 2013 को करीब 11 बजे वह पंचायत समिति में गया था और वहां नोडल अधिकारी से मुलाकात की। उसने सूची में नाम भिजवाने के लिए कहा, तो नोडल अधिकारी ने उससे पांच सौ रुपए मांग लिए। रुपए मांगते हुए कुछ और जनों ने भी देखा। जिला रसद अधिकारी को की गई शिकायत में अभी विजय कुमार योजना का लाभ देने की मांग कर रहा है। साथ ही नोडल अधिकारी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की भी मांग कर रहा है। शिकायत में कितनी सच्चाई है, यह तो जांच के बाद में पता चल जाएगा। लेकिन इससे सवाल तो उठ खड़ा हुआ है कि आखिर एक जिम्मेदार अधिकारी पर पांच सौ रुपए की रिश्वत मांगने का आरोप लगा कैसे? कैसे एक व्यक्ति इस अधिकारी के खिलाफ उच्चाधिकारियों से शिकायतें कर रहा है? इसके लिए निष्पक्ष रूप से जांच करने की जरूरत है।

अधिकारियों द्वारा रिश्वत मांगने की शिकायतें आये दिन मिलती रहती हैं। झूंझूनू के बिजली विभाग के एक बाबू को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने पांच हजार रुपए की रिश्वत लेते हुए पकड़ा। इस बाबू के खिलाफ शिकायत एक किसान ने की थी। किसान कृषि कार्य के लिए विद्युत कनेक्शन लेने के बाद ट्रांसफार्मर लगाने की मांग कर रहा था। इसके लिए उसने सारी प्रक्रिया भी पूरी कर ली। इसके बावजूद बाबू ने उससेदस हजार रुपए की रिश्वत मांगी। किसान ने बीकानेर एसीबी में शिकायत की औरशिकायत सही पाई गई। एक रणनीति तैयार करके की गई कार्यवाही का नतीजा यह हुआ कि किसान ने पांच हजार रुपए बाबू को दिए और बाबू अधिकारियों के शिकंजे में फंस गया। अब इस बाबू की संपत्ति की जांच की जा रही है। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो द्वारा इस तरह की कार्यवाही समय-समय पर की जाती रही है। इसके बावजूद आज भी टेबल के नीचे से या ऊपर से रिश्वत ली जा रही है। अधिकारियों की मनमर्जी और हठधर्मिता की वजह से लोग भी रिश्वत देने को मजबूर हो रहे हैं। राजस्थान में रिश्वत लेने के ऐसे बहुत से मामले भी सामने आए, जिनकी चर्चा आज भी होती है। किस तरह से पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी रिश्वत वसूलते हैं? ऐसा समय-समय पर खबरों में सुनने को मिल ही जाएगा।

रुपए लेकर काम लगने की बीमारी जिसे भी लगी, उसका नतीजा उसे कभी ना कभी भुगतना ही पड़ा है। वैसे यह भी सही है कि पकड़े जाने वाला ही चोर साबित होता है, बाकी तो शुद्ध दूध के धुले साहूकार होते हैं। अधिकारियों की बढ़ती मनमर्जी का मतलब तो यही है कि अब प्रशासन सरकार के काबू में नहीं है। या फिर शासन ने ही प्रशासन को मनमर्जी की छूट दे रखी है। वजह चाहे जो भी हो, लेकिन इसका नुकसान तो गरीब जनता को भुगतना पड़ रहा है। गरीब आदमी आज भी पात्र होते हुए अपात्र की पंक्ति में खड़ा है। वैसे कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी भी देखने को मिल जाएंगे। ऐसे अधिकारी लोगों की दु:ख-तकलीफों को सुनने के साथ-साथ उन्हें दूर करने को भी प्राथमिकता देते हैं। लेकिन बिगड़ैल और मनमर्जी के मालिकों की संख्या सबसे अधिक है, जिनकी वजह से अधिकारीवर्ग पर भ्रष्टाचार का काला धब्बा लगा हुआ है। कम से कम अपने अधिकारों को जागीर समझने वाले ऐसे निकम्मे अधिकारियों-कर्मचारियों के खिलाफ तो सख्त से सख्त कार्यवाही होनी ही चाहिए। क्या कहते हैं आप..

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