लेखक परिचय

अरविन्‍द विद्रोही

अरविन्‍द विद्रोही

एक सामाजिक कार्यकर्ता--अरविंद विद्रोही गोरखपुर में जन्म, वर्तमान में बाराबंकी, उत्तर प्रदेश में निवास है। छात्र जीवन में छात्र नेता रहे हैं। वर्तमान में सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक हैं। डेलीन्यूज एक्टिविस्ट समेत इंटरनेट पर लेखन कार्य किया है तथा भूमि अधिग्रहण के खिलाफ मोर्चा लगाया है। अतीत की स्मृति से वर्तमान का भविष्य 1, अतीत की स्मृति से वर्तमान का भविष्य 2 तथा आह शहीदों के नाम से तीन पुस्तकें प्रकाशित। ये तीनों पुस्तकें बाराबंकी के सभी विद्यालयों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को मुफ्त वितरित की गई हैं।

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-अरविन्द विद्रोही- leader

उच्च शिक्षा का ही व्यक्ति के व्यक्तित्व के ,चरित्र के निर्माण में योगदान नहीं होता है। व्यक्ति के संस्कार, निजी आचरण, उसके मुखारविंद से निकले शब्द उसके चरित्र-व्यक्तित्व के परिचायक होते हैं। एक छोटी सी घटना और उस घटना के पश्चात् उपजे जनसंवाद ने इस पहलू पर मेरा ध्यान पुनः आकृष्ट कराया। हुआ यूं कि बाराबंकी बस स्टेशन परिसर में एक दिन अपनी अनजाने लोगों की भीड़ में यूं ही खड़े होने, उनकी बातों को सुनने की अपनी पुरानी प्रवृत्ति के चलते मौज़ूद था। परिसर में भारी भीड़ मौज़ूद थी, उसी वक़्त निकटवर्ती शिक्षण संस्थान के विद्यार्थियों का एक समूह आपस में मस्ती में गाली-गलौज भरी बात करता हुआ गुजरा। विद्यार्थियों के निकल जाने के पश्चात् वहां उपस्थित एक अधेड़ व्यक्ति ने अपने बगल में बैठे अपने साथी से कहा कि देखा ,कितने बदतमीज व अशिक्षित लड़के हैं ,आपस में भी गाली बकते जा रहे हैं ,यह भी परवाह नहीं कि यहाँ कितने बड़े एवं महिलाएं-बच्चे-लड़कियां बैठे-खड़े हैं। पता नहीं क्या सीखा -पढ़ा है इन सभी लड़कों ने ? मैं आश्चर्यचकित रह गया तब जब दूसरे भद्र पुरुष ने कहा, अमां यार, ये लड़के तो आपस में बिना बुरा माने मस्ती में बतिया और एक दूजे को गरिया रहे थे और अभी पढ़ ही रहे हैं और खूब पढ़ाई का अभद्र भाषा से क्या लेना-देना ? यह तो खूब पढ़े-लिखे लोग भी सार्वजनिक तौर पर देते हैं। अपने कांग्रेसी मंत्री सलमान खुर्शीद को ही ले लो। ऑक्सफोर्ड से शिक्षित हैं, बड़े वकील भी हैं पर आदमी दो कौड़ी के हैं, इनके बोल ऐसे हैं कि जैसे बेहूदगी की उच्च शिक्षा ग्रहण किये हों। ये तो बच्चे थे, अभी इनको तो पीठ पीछे तुमने भला-बुरा कह दिया पर उच्च शिक्षा प्राप्त सलमान खुर्शीद नरेंद्र मोदी को नपुंसक बोल देते हैं, क्या यह बेहूदगी नहीं है ? विद्यार्थियों की गाली गलौज भरी आपसी वार्ता को नज़रअंदाज करने वाले तमाम लोगों का ध्यान पूरी तरह से इन दोनों लोगों के आपसी संवाद पर आ टिका था, खुद मेरा भी। धीरे-धीरे कई लोग इस चर्चा के अंग बने और राजनेताओं के बेतुके अभद्र बयानों का पिटारा ही खुल पड़ा।

स्थापित सामाजिक मान्यतायें बुरी तरह से खंडित हुई हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद के नपुंसक वाले बयान पर राहुल गाँधी के सख्त ऐतराज के पश्चात् बगले झांकते हुए सलमान खुर्शीद ने भूसे पर लीपने सरीखे अपने बचाव का असफल प्रयास किया परन्तु तब तक तो इनकी उच्च शिक्षा की गुणवत्ता की कलई समाज में खुल ही चुकी थी। उत्तर-प्रदेश सरकार के एक मंत्री महिला अधिकारी के सौंदर्य की इस कदर सार्वजानिक तारीफ कर देते हैं कि वो अश्लीलता -अभद्रता की श्रेणी में आ जाता है। सरेआम महिला अधिकारी शर्मिंदा होती हैं और साइड इफेक्ट के रूप में मंत्री महोदय का मंत्री पद भी चला जाता है ,खैर अब तो ये रहे भी नहीं। उत्तर-प्रदेश के एक दूसरे मंत्री उत्तर-प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री को बदसूरत बताते हुए बदजुबानी करते हैं। राजनेताओं की एक श्रृंखला है जो अपने बेतुके -बेवज़ह बयानों से खुद की छवि को धूमिल कर लेते हैं। देश के श्रेष्ठ सांसदों में शुमार मणिशंकर अय्यर ( राज्यसभा सांसद ) ने गुजरात के मुख्यमंत्री को रावण व लहूपुरुष की संज्ञा देकर अपनी ही छवि को दागदार किया। कांग्रेसी बदजुबानी के शीर्ष पुरुष के रूप में स्थापित दिग्विजय सिंह के बयानों का कहना ही क्या ? किसी को रावण तो किसी को आयटम गर्ल कहना उनके ही जेहनियत को दर्शाता है। डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ,अरविन्द केजरीवाल ,नरेश अग्रवाल ,अर्जुन मोडवाडिया ,रेणुका चौधरी ,मनीष तिवारी ,ऑस्कर फर्नांडीज ,राहुल गांधी ,नरेंद्र मोदी ,रमन सिंह ,राम जेठमलानी ,नितिन गड़करी ,यशवंत सिन्हा ,मुलायम सिंह यादव ,अखिलेश यादव ,आज़म खान ,बेनी प्रसाद वर्मा, नीतीश कुमार आदि तमाम बड़े नाम वाले नेताओं के कई  बयान अमर्यादित रहे ।

राजनेताओं के बेवज़ह-बेतुके बोल का ताज़ा-तरीन उदाहरण सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव का कानपुर प्रकरण ( सपा विधायक इरफ़ान सोलंकी – चिकित्सक प्रकरण ) के सन्दर्भ में पत्रकारों के सवाल के जवाब में यह कह देना जुड़ गया है कि क्या तुम्हारे घर का कोई मर गया है ? महिला आरक्षण विषय पर मुलायम सिंह का सीटी वाला बयान भी खासा चर्चित था । उत्तर-प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी मुज़फ्फरनगर दंगे – सैफई महोत्सव से जुड़े सवालों से तनावग्रस्त व आजिज होकर प्रेस वार्ता में अमर्यादित आचरण कर चुके हैं जो कि उनकी छवि के तनिक भी अनुकूल नहीं था ।भारत में अब गरीबी कम होने के दावे करते समय नौकरशाह योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कह दिया- अब गांव में २७ रूपये २० पैसे और शहर में ३३ रूपये ३३ पैसे प्रतिदिन खर्च करने वाला गरीब नहीं रहा । देश में गरीबी कम हो रही है । इस भद्दे बयान की श्रृंखला में कदम ताल करते हुए केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला भी बोले कि अगर आप चाहें तो एक रूपये में भी खाना खा सकते हैं । राशिद मसूद और राजबब्बर ने भी अपना अनोखा ज्ञान उड़ेला । राजबब्बर बोले कि “आज भी मुम्बई में पूरा भोजन १२ रूपये में करना सम्भव है। मुम्बई शहर में मैं १२ रूपये में पूरा भोजन कर सकता हूँ । नहीं,नहीं ,बड़ा पाव नहीं । ढेर सारा चावल ,दाल ,सांभर और सब्जियां भी” तो राशिद मसूद ने दिल्ली के रेट बताये ,बोले, “मैं मुम्बई का तो नहीं जानता लेकिन दिल्ली में तो पांच रुपये में भरपेट खाना मिलता है। कोई भी व्यक्ति दिल्ली के जामा मस्ज़िद इलाके में जाकर पांच रूपये में खाना खा सकता है । मैं खुद कई बार ऐसा कर चुका हूं। “इन नौकरशाहों-राजनेताओं के इन अपच बयानों की तीव्र भर्त्सना गांव-गली-चौराहों के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी जमकर हुई। सोशल मीडिया पर जमकर लताड़े गए इन बेतुके बयान वीरों की सेहत पर ऊपरी तौर पर तनिक भी असर नहीं पड़ा।

यही नहीं राज्यसभा में ए के एंटोनी -रक्षा मंत्री भारत सरकार ने पुंछ हमले मामले में कह दिया कि “हमला करीब २० आतंकियों ने किया। उनके साथ पाक सेना की वर्दी पहने कुछ लोग भी थे। “जबकि सेना ने साफ़ कहा था कि “हमले को पाक सेना की बार्डर एक्शन टीम ने अंजाम दिया है। “एंटोनी के बयान ने पाक को पुंछ हमले मामले में बचने का बहाना दिया। विवाद के तूल पकड़ने पर उसी दिन शाम को सेना ने अपने रुख-बयान को पलटा और एंटोनी की बात दोहरा दी। लेकिन रक्षा मंत्री के इस लचर-बेतुके बयान की राज्यसभा में जमकर मुखालफत हुई। सदन में विपक्ष के नेता अरुण जेटली ने कहा कि “जब रक्षा मंत्री यह बयान दे रहे हैं कि पाकिस्तानी सेना की वर्दी में हमलावर आये थे तो इससे पड़ोसी देश को क्लीन चिट देने के साथ झूठ को दोहराने का मौका दिया गया। “सपा के रामगोपाल यादव ने भी कहा कि “रक्षा मंत्री ने पाक को बच निकलने का रास्ता दे दिया है। केंद्र को यह कैसे पता चला कि हमलावर आतंकवादी थे। “वामपंथी नेता सीताराम येचुरी ने रक्षामंत्री के इस बयान को गैरजिम्मेदार कहा और सवाल किया कि “पाकिस्तानी वर्दी में आने वाले हमलावर सेना के थे या फिर बाहर से आये थे ,इसकी जाँच क्या सरकार ने की है।”

बेतुके बोल बोलने वालों की श्रेणी में देश के गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे भला कैसे ना शुमार होते ? कुख्यात आतंकी लश्कर प्रमुख हाफिज सईद को श्री कहकर सम्बोधित करने वाले शिंदे महाराज ने कोयला घोटाले पर कहा, “रहने दो ,कल परसों की ही बात है बोफोर्स था, याद है ना ,भूल गये हम ,वैसे ही कोयले को भी भूल जायेंगे। “कोयले घोटाले की कालिख केंद्र सरकार के मुँह पर पुते होने के बावज़ूद भी बेफिक्र रहने वाले गृह मंत्री शिंदे की जुबान सदन में भंडारा बलात्कार मामले की चर्चा के दौरान भी फिसली। राज्यसभा में महाराष्ट्र के भंडारा जिले में बलात्कार व हत्या की शिकार तीन नाबालिग बहनों का नाम अपने बयान में गृहमंत्री शिंदे ने पढ़ डाला। राज्यसभा में ही मणिशंकर अय्यर और नरेश अग्रवाल में अमर्यादित जूतम पैजार देखने को मिला। नरेश अग्रवाल तो ऐसे बयान वीर हैं कि उन्होंने सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी पर ही अपने बेतुके बयानों के तीर छोड़ दिये थे।

उत्तर-प्रदेश विधानसभा चुनाव २०१२ के दौरान राहुल गांधी का भिखारी और अखिलेश यादव का शाम की दवा वाला बयान काफी बचकाना था और इन बयानों की भर्त्सना भी खूब हुई । कुछ नेता जानबूझकर ,कुछ अनजाने में ,कुछ अपने बड़बोलेपन की आदत के कारण व कई बार हताशा के कारण इस तरह के अटपटे,गैर जरुरी बयान दे देते हैं। लोकसभा चुनावों का सफ़र शुरू हो चुका है। मीडिया का ध्यान अपनी तरफ आकृष्ट करके सुर्ख़ियों में बने रहने के लिए राजनेता अब और वाचाल हो जायेंगे। दरअसल, राजनेता हर वो काम करने में तनिक भी परहेज नहीं करते जिससे उनका विरोधी परेशान हो, समर्थक उत्साहित हो और ख़बरों में छाये रहें। राजनैतिक बयानों का स्तरहीन होना जातीय-दलीय जकड़न में बुरी तरह जकड़े मतदाताओं के लिए तनिक भी चिंता का ,परेशानी का सबब नहीं है ,इसीलिए राजनेता भी मस्त रहते हैं। विचारधारा से प्रभावित आम जन भी जिससे प्रभावित हो जाते हैं, उसके साथ उसके द्वारा गलती करने पर भी खड़े रहते हैं ,उसका समर्थन करते हैं। कहना अतिश्योक्ति ना होगा कि सैद्धांतिक राजनैतिक कार्यकर्ताओं की जगह अब राजनैतिक बंधुआ मजदूरों ने ले लिया है जो पद-प्रतिष्ठा की प्राप्ति हेतु अपने दल-नेता की हर सही-गलत बात का अंधानुकरण करते हैं।

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