लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

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बौद्ध कालीन नगरक निगम

बौद्ध कालीन नगरक निगम

डा.राधेश्याम द्विवेदी

परिचय एवं अवस्थिति:-

नगरक निगम,नगर बाजार,नगर खास, कपिल नगर एवं औरंगाबाद नगर आदि विविध नामों से पुकारा जाने वाला यह ग्राम पंचायत बस्ती जिले व मण्डल की दूसरी सबसे बड़ी ग्राम पंचायत है। जिले व मण्डल की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत इसी तहसील तथा पुराने राज्य क्षेत्र का अंश गनेशपुर है। नगर खास के नाम से राजस्व रिकार्डों में दर्ज इस स्थान को वर्तमान रूप में नगर बाजार के नाम से जानते हैं।यह जिला मुख्यालय से दक्षिण कलवारी टाण्डा राजमार्ग पर 8 किमी की दूरी पर स्थित है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की कुल 10470 आबादी है। लिंग अनुपात 934 है जो प्रदेश के 902 से अधिक है। पुरूष साक्षरता 75 प्रतिशत तथा महिला 58 प्रतिशत है। अभी प्रधान द्वारा ही स्थानीय प्रशासन चलाया जाता है। नगर राज्य के पुरोहित वंश के प्रतिनिधि एवं समाज सेवी डा. सत्य प्रकाश उपाध्याय ने इस गा्रम पंचायत के प्रधान के रूप में तीन कार्यकाल व्यतीत कर इसे एक समृद्ध एवं विकसित एवं आदर्शगा्रम पंचायत के रूप में प्रतिष्ठापित किया है। गांव के पश्चिम में एक प्रसिद्ध चन्दो ताल है जो कभी कोई ऐतिहासिक स्थल रहा था और किसी भूगर्भिक हलचलों के कारण एक झील के रूपमें परिवर्तित हो गया है। इस स्थान की बहुत ही अजीबो गरीब कहानी है। इसको रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। यहां एक विशाल तथा एक लघु किले के अवशेष पहचाने गये है। इसे शाक्यों के दस नष्ट हुए शहरों में एक के रूप मे पहचाना जाता है। जिसे कोशल के राजकुमार विडूदभ द्वारा नष्ट किया गया था।ं

 

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के प्रथम सर्वेक्षक तथा प्रथम महानिदेशक जनरल अलेक्जेण्डर कनिघम ने इसे गौतमबुद्ध के जन्म स्थान के रूप में भी एतिहासिक नगरी कपिलवस्तु के रूपमें पहचाना है       ( मजूमदार: कनिंघम्स जागर्फी आफ इण्डिया पृ. 475)। वे इसका नाम कपिला बताते है। कपिल मुनि द्वारा बयाया हुआ यह नगर कपिल नगर के रूप में विख्यात रहा है। बाद मंे कपिल शब्द का उच्चारण छूट गया ओैर केवल नगर शब्द ही उच्चारण में रह गया। चीन से भारत आये दोनों तीर्थ यात्री ह्वेनसांग और फाहियान ने यहां की यात्रा की थी। उनके अनुसार नगर खास ही कपिलवस्तु है। जो चदो ताल के किनारे बसा है। उनके अनुसार राप्ती नदी की एक लम्बी धारा कोहाना (वर्तमान नाम कुवानो) यहां से 6 किमी. पूर्व से गुजरती है। आगे जाकर घाघरा नदी में यह विलीन हो जाती है। एक दूुसरी धारा सिंध इसी चन्दो ताल में आकर मिलती है। यद्यपि सिंध के नाम का तालमेल बैठता दिखाई नहीं पड़ रहा है। कनिघम फाहयान के इस मत से भी सहमति व्यक्त करते हुए कहते हैं कि कपिला 5वीं शताब्दी का स्थल रहा है। यहां बाद में न कोई राज था और न प्रजा , बल्कि 10 या 20 मकान ही दिखाई दे रहे थे।

पौराणिक मान्यता के अनुसार त्रेता युग में गौतम ऋषि एक महान सन्त एवं सप्तर्षि रहे। गौतम जिन्हें ‘अक्षपाद गौतम’ के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त हैं, के नाम से भी इस स्थान का नाम जोड़ा जाता है। इन्हांेने न्याय दर्शन को सूत्रबद्ध , व्यवस्थित तथा रूप अक्षपाद के न्यायसूत्र में चरणबद्ध किया था। वह परम तपस्वी तथा संयमी थे। महाराज वृद्धाश्व की पुत्री अहिल्या इनकी पत्नी थी, जो महर्षि की शाप से पाशाण बन गई थी। गुरू विश्वामित्र की प्रेरणा से भगवान राम ने इनका उद्धार किया था। महर्षि गौतम के पुत्र शतानन्द निमि कुल के आचार्य थे। गौतम ने गंगा की आराधना करके पाप मुक्ति प्राप्त किया था। गौतम तथा मुनियों ने गंगा को पूर्ण पवित्र किया था। जिससे वह ‘गौतमी’ कहलायी। बाद में इसी गौतमी नदी के किनारे ‘त्रयम्बक शिवलिंग’ की स्थापना की गई थी।

बस्ती जिले का यह कपिल आश्रम तालाब के दूसरे विपरीत किनारे पर स्थित बताया जाता है। गौतम , शाक्य या ईक्ष्वाकु राजकुमार और राजकुमारियां मुनि की अनुमति से सर्वप्रथम यहीं अपना आवास बनाये। बादमें उनकी गायें व अन्य जानवर मुनि की पूजा में बाधा पहुचाने लगे तो गौतमों ने तालाब के पूर्वी छोर पर कपिल नगर बसाये। यहां यह भी ध्यान देने वाली बात है कि नगर और अमोढ़ा दोनों गौतम वंशियों के वंशज आज भी इस क्षेत्र में अनेक गांवों में फैलकर बस गये हैं। नगर के साथ ‘खास‘ शब्द अवध के अधिकारियों ने कहना शुरूकर दिया था। यहां गौतम वंश के मुखिया या राजाओं का मूल शासन और आवास हुआ करता था। बाद मंे यह राजस्व इकट्ठा करने का केन्द्र बन गया तथा सरकारी अभिलेखों में ‘नगर खास’ कहा जाने लगा।  इसे ‘औरंगाबाद नगर’ या ‘चन्दो नागरा’ भी कहा जाने लगा था। यद्यपि इन राजाओं का कोई प्रमाण संगत साक्ष्य तथा उनके आगमन का विस्तृत विवरण नहीं मिलता है, पर अनुश्रूतियां कहतंी हैं कि राजपूतों के आगमन के पूर्व यहां हिन्दू राजा शासक हुआ करते थे। कुछ आदिवासी जातियां जैसे- भर ,थार,डोम व  डोमकटारों द्वारा मूल हिन्दू राजा सत्ताच्युत हो गये थे। गौतमों ने भरो एवं डोमकठारों के लगभग 24 पीढियो को बाहर निकाला था। उन्होंने स्थानीय रौहिला राजाओं को मार डाला था। परगना महुली बहुत दिनों तक इनके क्षेत्र का भाग रहा। उनकी पकड़ इतनी कमजोर रही कि वे 16वीं शताव्दी में सूर्यवंशियों द्वारा भगा दिये गये।

कनिघम के कोल और शाक्य के बीच का रोहणी का समीकरण कुवानों नदी से करते हैं। नगर से 11 मील पूर्व तथा कुवानों नदी से 3 मील पश्चिम महसों के पास स्थित ‘‘अमकोहिल’’ को कोल व्याघ्रपुरा मानते है। वह नगर से 5-6 मील दक्षिण पश्चिम सरवनपुर को सारा कूप मानते है। कनिघम के सहायक ए सी एल कार्लाइल ने कनिंघम के नगर विषयक अवधारणा पर 1874-75 तथा 18775-76 में पुनः विचार किया। तदनुरूप इस क्षेत्र का विशद सर्वेक्षण भी किया। उन्होने इस क्षेत्र को कपिलवस्तु या कपिल नगर कहना गलत सिद्ध किया। (।ण्ैण्प्ण्त्मचवतज टवसण् ग्प्प् च्ंहम 83.84 ) नगर के आस पास के क्षेत्र को राजस्व अभिलेख में नगर खास कहा गया है परन्तु आम बोलचाल की भाशा में इसे नगर या नगर बाजार ही कहा जाता है।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अपर महानिदेशक ने अपने सर्वेक्षण (पुरातत्व वुलेटिन 21 पृ. 45 प्राग्धारा बुलेटिन नं. 8  1995-97 पृ. 110) अध्ययन में बौद्ध साहित्य के आख्यानों के आधार पर कोशल के प्राचीन नगरों व निगमों को पहचानते हुए बस्ती शहर के दक्षिण क क्षेत्र को नगरक निगम का भाग बताया है। उसके मुख्यालय को नगर में होना बताया है। बौद्ध साहित्य (मज्झिम निकाय तृतीय पृ. 104) में वर्णित इस घटना का उल्लेख किया है कि नगरक निगम में भगवान बुद्ध तथा कोशल के राजा प्रसेनजित  तथा दीर्घ कारायण ने विश्राम किया था। उस समय नगरक निगम हुआ करता था और यह कोसल के अधीन था।

इस नगर के पश्चिम स्थित 3 मील लम्बा तथा एक मील चैड़ा चन्दो ताल अपने ढंग का वेजोड़ है। यह कार्लाइल द्वारा व्यक्त भूइला ताल से भी बड़ा है। यह यह भी सोचने को विवश कर देता है कि कहीं यही तालाब तो कपलवस्तु तो नहीं है। एसा होने पर कोई प्राचीन नगर सभ्यता इस तालाब के अंचल में समाई हुई प्रतीत हो सकती है।

1.            प्रथम: शासकीय राजधानी: नगर खास:-

अपने गुरू एवं अधिष्ठाता कपिल मुनि के जप तप और की पूजा में व्यवधान से बचने के लिए यह नगर बसाया गया था। बाद में यहां से शासकीय कार्य भी किये जाने लगे। वर्तमान नगर बाजार के पश्चिम एक बड़ा एवं नीचा टीला जो वर्तमान में पूर्व से पश्चिम में 800 मी. तथा उत्तर से दक्षिण में 600 मी. भूभाग पर लगभग एक से दो मीटर ऊंचाई पर फैला हुआ है। यहां मृदभाण्डों , ईंटों के रोड़े, सर्वत्र दिखाई देते हैं। खेती की गहन जुताई से टीले का स्वरूप पूर्णतः विगड़ चुका है। इसे लोगे ने समतल बना रखा है। कार्लाइल महोदय ह्वेनसांग द्वारा बताये गये ( समुवल , बील: बुद्धिस्ट रिकार्ड आफ द वेस्टर्न वल्र्ड भाग 2 पृ. 14) दस ध्वस्त नगरों में इसे भी एक मानते हैं। ये अपने चरमोत्कर्ष पर पहंुचने के बाद ध्वस्त हुए थे। यह पूर्ण संभावना है कि शाक्य या कौशल का यह कोई केन्द्र रहा हो, परन्तु कोई साहित्यिक या पुरातात्विक अभिलेख या साक्ष्य इसकी कोई पुष्टि नहीं करते हैं। ब्रिटिशपुराविद् कार्लाइल ने अपने सर्वेक्षण में पाया कि यहां गौतमों से पूर्व ही में आबाद थे। ये गौतम ईक्ष्वाकु या शाक्य गौतम थे या बाद के थे ? इसमें भी संदेह है। लोंगों ने इन्हे बताया कि यहां थारूओं या भरों का कब्जा था। गौतमों ने उन्हे जीतकर कब्जा लिया है। यह टीला पहले से ही आबाद रहा है।

राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त इस क्षेत्र के महान साहित्यकार एवं इतिहासविद् डा. मुनिलाल उपाध्याय ‘‘सरस’’ ने अनुश्रुतियों के आधार पर लिखा है कि तेरहवीं शताव्दी के आरम्भ में अलाउद्दीन खिलजी के विजय अभियान के समय में अरगल राज्य के गौतम गोत्री नृपति घोलराव अपना पैतृक राज्य त्याग कर उत्तर कोशल के घाघरा एवं मनोरमा नदी के उत्तर कुवानों नदी पर्यन्त तक के इस भूभाग पर यहां आकर बसे थे। धीरे धीरे यहां एक लघुराज्य की स्थापना किये थे। जो नगर में अपनी राजधानी बनाये थे।

कुछ अन्य श्रोत( बस्ती ए डिस्टिक गजेटियर आफ दी यूनाइटेड प्राविंसेज आफ आगरा एण्उ अवध लेखक एच. आर. नेविल, 1907, पृ. 94.95) से पता चलता है कि इस वंश के संस्थापक जगदेव थे जो गौतमवंशी थे तथा फतेहपुर के अर्गल नामक स्थान से यहां आये हुए थे। इन्हे दहेज में 12 गांव मिले थे। इनकी पत्नी विसेन क्षत्रिय वंश की कन्या थी। उस समय नगर पर डोम कटार जाति के अधीन रहा था। इन्हंे रोहिला भी कहा जाता था। इनका नाम रइहलपारा नामक परगना के रूप में सुरक्षित है। ये लोग गौतमो द्वारा भगा दिये गये थे। गौतमों ने चन्दो तालाब के किनारे अपना किला बनवाया था। बाद में जगदेव के पौत्र राजा भगवन्त राव का एक अफगान गवर्नर ने हत्या कर दी। उनके पुत्र या पौत्र ने उस अपहरणकर्ता को भगाकर अपना राज्य वापस पा लिया था। इसके पांच पीढ़ी राजा गजपति राव ने अपना मुख्यालय गनेशपुर ले गये। उनके भाइयों के उत्तराधिकारी अभी भी ग्राम पौंदा, भैंनसी तथा हर्रैया व बस्ती तहसील के कुछ गांवों में बसे हुए हैं। राजा गजपतिराव के छोटे  चार पुत्रों ने पिपरा तालुका के 60 गांवों तथा चार अन्य पुत्रों ने गनेशपुर के 54 गांव प्राप्त किये थे।

नगर के राजा गजपतिराव सिंह के वारिस उनके बड़े पुत्र हरवंश सिंह हुए जिन्होने अपने छोटे पुत्र को 60 गांव दिया। इसके पंाच पीढ़ी के बाद  राजा अम्बर सिंह के समय 60 और गांव या तो निकल गये या तो वेंच दिये गये। जिससे लगान की भरपाई की गई थी । यद्यपि राजा ने अपने आदमियों से बराबर के गांवों को जप्त कर लिया था। अम्बर सिंह के पौत्र निःसंतान थे। सम्पत्ति पुनः पैतृक शाखा में वापस चली आयी।

व्रिटिस काल के शुरूवात में 1801 ई. में राजा राम प्रकाश सिंह नगर राज्य पर काविज हुए। उस समय उनके पास 114 गांव थे। इसके अलावा 62 अन्य गांवों का मालिकाना भी उन्हें प्राप्त हुआ। उनके पौत्र राजा जय प्रताप सिंह डेंगरपुर के मिल्कियत के लिए हुए दंगे में मारे गये थे। फिर उनके भाई उदय प्रताप सिंह राजा बने। स्वतंत्रता आन्दोलन में उन्होने अपनी पदवी और जागीर दोनों खो दी थी। नगर के राजा एवं उनके आदमियों ने स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान अंग्रेजी सत्ता के विरूद्ध अपने वंश परिवार तथा सारी सम्पत्ति को दांव पर लगा दिया। वे पराजित हुए उन्हें कैद कर गोरखपुर के जेल में डाल दिया गया। वहां उन पर अत्याचार कर करके उन्हें तोड़ने का प्रयास किया गया। जब अंग्रेज कामयाब नहीं हुए तो जेल में उनकी हत्या कर दी गयी और बाहर यह खबर फैलाई गई कि राजा साहब ने जेल में क्षुब्ध होकर आत्म हत्या कर ली। उनके पुत्र का नाम विश्वनाथ सिंह था। उनके पुत्र लाला रूपेन्द्र नारायण सिंह की सारी सम्पत्ति जप्त कर ली गई और अंग्रेजों का साथ देने के कारण इस सम्पत्ति को इसी जिले के एक दूसरे राजा बांसी को पारितोषिक रूप में बांट दिया गया। बांसी के राजा से इन्हें गुजारा के लिए पोखरनी आदि 5 पैतृक गांव ही मिले हुए थे।

अंग्रेजो ने इस परिवार को नेस्सनाबूत कर दिया तो यहां की महारानी साहिबा नगर के निकट के पोखरनी गांव की शरण ली। वहां मकान बनवाकर रहने लगी। इस वंश का जब कोई उत्तराधिकारी नहीं बचा तो इसी वंश के पोखरा बाजार में अवस्थित एक स्ववंशी को गोद लेकर इस राज्य का उत्तराधिकारी बनाया गया था। यह परिवार एक संभ्रान्त नागरिक की तरह सम्मानजनक सामाजिक जीवन आज भी बिता रहे हैं। रानी साहिबा का अयोध्या में सुन्दर भवन नामक एक विशाल मंदिर भी बना हुआ है।

नगर के पश्चिम स्थित टीले के पूर्वी तरफ एक पुरानी खाई या नाला है। चीनी यात्रियों के विवरण के अनुसार कपिलवस्तु के दक्षिण में एक खाई होना चाहिए था, परन्तु इस मामले में चन्दो ताल नगर के इस टीले के दक्षिणी छोर पर ही समाप्त हो जाता है। नगर के दक्षिण 2 मील तथा चन्दो ताल के दक्षिण 1 मील पर कुवानो जैसी एक बड़ी व पौराणिक मनोरमा नदी बहती है। यदि हम मनोरमा के पास स्थित नगर को कपिलवस्तु मान भी लें तो इस नदी का उल्लेख किसी ना किसी एतिहासिक विवरण में अवश्य होनी चाहिए। परन्तु एतिहासिक विवरणों में एक ताल तथा रोहणी नदी का नाम स्पष्ट रूप से आया है। उसमें चन्दो का कोई उल्लेख नहीं है।

कार्लाइल महोदय कुवानों एवं भूइला के बीच स्थित रवई या रोई नदी की पहचान कर चुके हैं। इसके आधार पर वह नगर को कपिलवस्तु को पहचानने से इनकार करते है। वह नगर के पूर्व महुली परगना में स्थित नागरा को भी कपिल नगर के रूप में पहचानने का सुझाव देते हैं, परन्तु यह भी सही पहचान सावित नहीं हो सका है। जहां नगर को कपिलवस्तु मानने में अड़चन है ,वहीं उसे नगरक निगम मानने में कोई अड़चन नहीं है। चूंकि यह गांवों का देश है और यदि कहीं नगर जैसी कोई अलग बसावट या सभ्यता दिखेगी तो वह भी विशिष्ट स्थान अवश्य पायेगी। ईक्ष्वाकु, शाक्य या गौतम सूर्यवंशी प्राचीन रूप में एक ही वंश वृक्ष से निकले हैं। ये यहां के मूल निवासी भी हो सकते हैं और संकट के समय अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए कहीं अन्य़ जाकर या आकर बस भी सकते हैं। पुनः अपनी स्थिति मजबूत होने पर अपनी मातृभूमि वापस आकर बस भी सकते हैं। वे अपनी सम्पत्ति तथा राज्य पर कब्जा जमाये लोगों को भगाकर अपनी पुरानी ख्याति व परम्पराओं की पुर्नस्थापना भी कर सकते हैं।

थार , भर , पठान आदि अवसरवादी लोग इस क्षेत्र में आये और समय के साथ चले भी गये । राजपूतों ने नगर व अमोढ़ा से अपने देश व वंश की रक्षा की है और अपनी प्राचीन गरिमा को वचाया है। भरों व थारूओं को हो सकता है राजपूतों ने ना भगाया हो, उन्हें पठानों ने भगाया हो। इन पठानों को राजपूतों ने भगाया होगा या उनपर विजय प्राप्तकर अपने अधीन किया होगा। इस प्रकार नगर के पश्चिम स्थित बौरागल  में लड़ाई लड़ी गई  या अन्य किसी अर्गल नामक स्थान पर ? यह पूर्ण रूपेण स्पष्ट नहीं हैं। यह भी संभव है कि राजपूत जौनपुर से आकर यहां बसे हों। कुछ सूत्र तो आजमगढ़ से आकर राजपूतों का बसना बताते हैं। यह वैरागल नाम अर्गल को जोड़कर इतिहासकारों की अपनी कल्पना या संभावना प्रतीत होती है।

बारांगल या बाराकोट या अरूनपुरा प्राचीन राजा अन्धरा की राजधानी थी जो गोतमीपुत्र शातकर्णि के नाम से प्रसिद्ध हुआ है। गौतमी पुत्र का मतलब गौतम हुआ। यही वे गौतम हो सकते हैं जो बस्ती जिले के नगर व अमोढ़ा क्षेत्रों में आये और बसे। ये गौतम ऋषि और अहिल्या की सन्तान भी हो सकते हैं। कनिंघम ने गौतमी पुत्र शातकर्णी को शालिवाहन  ( बादमें सातवाहन ) भी कहा है। जिसने 79 ई. में शक संवत को प्रारम्भ किया था।

प्रश्न उठता है कि क्या शाक्य वंशी क्षत्रिय के प्रतिनिधि नगर के गौतम राजपूत हैं या गौतमी पुत्र शातकर्णि या अन्य कोई ? इस बात की जानकारी प्राप्त करने के लिए कार्लाइल महोदय ने इस वंश के अनेक लोगों से जानकारी प्राप्त करनी चाही थी, परन्तु उन्हें कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं हो पायी थी।

गोैतम राजपूत बहुत कुछ संभव है कि शाक्य वंशी हों। परन्तु उनके वंशजों ने अपने मूल व पवित्र इतिहास को ना जानने का प्रयास किया और ना ही कोई प्रमाण संजोकर रखा ,परन्तु यह बात सत्य है कि यदि यहां के राजपूत शाक्यवंशी होते तो उनके वंश का कोई ना कोई अवश्य अपने को शाक्य वंश के विमल इतिहास से अवश्य सम्बद्ध करता । ज्यादा संभव है कि ये गौतम राजपूत गौतमीपुत्र शातकर्णि से ही सम्बन्धित हों। कनिंघम, कार्लाइल एवं फयूहरर के अध्ययन के लगभग सौ वर्षों के अन्तराल पर स्वतंत्र भारत में जब इतिहास का पठन-पाठन शुरू हुआ तो इतिहासकारों  एवं पुराविदों न इस क्षेत्र पर अपनी नजर डाली ।

पुरावशेष:- 1962-63 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के डा. ए. के. नरायण एवं डा. पी. सी. पंत      (भारती 8 (। ) पृ. 119 ) ने इस स्थल का सर्वेक्षण किया था। उन्होंने यहां लाल पा़त्र तथा दुर्गा मंदिर का उल्ल्ेख किया है। भारत कला भवन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के डा. श्रीकान्त भट्ट( पुरातत्व बुलेटिन नं. 3 पृ. 82 ) ने 1964-65 में इस स्थल का सर्वेक्षण किया था। उन्होंने यहां लाल पा़त्र परम्परा के प्रमाण प्राप्त किये हैं। वे इसे बौद्ध धर्म का पुराना नगर मानते हैं। 1995 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के उत्खनन शाखा के अधीक्षण पुरातत्वविद्  डा. बी. आर. मणि ( प्राग्धारा बुलेटिन नं. 8 , पृ. 110) ने यहां का अपेक्षाकृत विस्तृत एवं सघन अध्ययन व विवरण प्रस्तुत किया है। उन्होंने मृदभाडों के अवशेषों एवं ईंटों के रोड़े यहां प्राप्त होने की सूचना दी है। साथ ही पात्रावशेषों के आधार पर लाल पात्र उद्योग का विस्तार बताया है। यहां एकत्र किये गये ठीकरे या तो वहुत प्रारम्भिक काल के हैं या मध्य काल के हैं , किन्तु इनकी मात्रा अत्यल्प है। आरम्भिक काल के प्रमाणों में लाल पात्र के बाहर की तरफ ढ़ले बारी तथा कोर युक्त कंघे के कलश के 2 ठीकरे, लाल पात्र में रस्सी के छाप का एक ठीकरा मिला है। काले लेपित पात्र में एक ठीकरे में लेप बाहर है एक में अन्दर है। ये सुन्दर बनावट से युक्त हैं। जानवरों की मिट्टी की बनी हुई आकृतियां, ज्यादातर पैर तथा हापस्कोच लाल पात्र परम्परा के बने हुए हैं। अन्य लाल पात्रों में पत्ती की छाप, अन्दर की तरफ बनी हुई अलंकरण, कलश की टोटियां ,ढक्कन, समतल आधार वाली छिछली थालियां, कूटकी हाण्डियां जिनके पैर कृूकर बनाये गये हैं, भंडारण पात्र, मध्यम आकार के कलश तथा विना गले की कूटकी पात्र आदि प्राप्त हुए हैं।

 

 

 

2.            द्वितीय: नगर का सुरक्षापूर्ण स्थल:-

शासकीय नगर खास के स्थल से लगभग आधा किमी. दक्षिण गोरया नाला पार करके चन्दो ताल के पूर्वी छोर पर तथा पोखरनी से एक किमी. उत्तर एक छोटा टीला 300 मी. गुणे 300 मी. आकार का 4 मी. ऊंचाई वाला स्थित है। यह एक नाले द्वारा सुरक्षित मध्यम श्रेणी का आश्चर्य जनक टीला तथा चक्राकार है। इसके चारो ओर बांस झाड़ियां उगी हुई है। यह दो पतली खाइयों से घिरा हुआ है। एसा लगता है कि इस स्थल को सुरक्षा की दृष्टि से धन छिपाने, औरतों को शरण देने आदि  के लिए बनाया गया है। बादमें इस स्थान पर लोग स्थाई रूप से रहने लगे। फयूहरर ( मोनोमेन्टल एन्टीक्वटीज पृ. 225 ) इसे किसी स्तूप का अवशेष मानते है।

यहां की सांस्कृतिक अवशेष इसे मध्यकालीन टीले ( प्राग्धारा बुलेटिन नं. 8 , पृ. 111) का स्वरूप प्रदर्शित करती है। इसे स्थानीय जन ‘‘ समय मां का स्थान’’ के रूप में मानते है। इसे ‘‘बरसाती माई’’ भी कहा जाता है।

यहां के पात्रावशेष मध्यकालीन लाल पात्र हैं। यहां से प्राप्त ढ़क्कनों में कोई लेप नहीं है। कुटकी हाण्डी, पैरों को कूटकर बनायी गयी हाण्डी, अभ्रक का चूर्ण से सज्जित पात्र, पत्ती के छापवाली मृदभाण्ड, मध्यम आकार की बारी वाले कलश, मध्यम आकार के बारी वाले हौज प्राप्त हुए हैं। कांचित पात्र में नीले रंग का कटोरा यहां से प्राप्त हुआ है।

3.            तृतीय:नगर खास का कोट या किला:-

नगर गौतम वंश के राजा का आवास स्थल भी था और सुरक्षित किला भी। इस कारण इसे समान्य नगर ना कहके नगर खास कहा गया है। कालाईल (।ण्ैण्प्ण्त्मचवतज टवसण् ग्प्प् च्ंहम 84 ) ने इसे औरंगाबाद नगर अथवा चन्दोनगर भी कहा है। नगर में जो किला या कोट वर्तमान समय में मिलता है वह ज्यादा पुराना नहीं है। यह मध्यकाल अथवा आधुनिक काल का बना हुआ प्रतीत होता है। इसे किसी गौतम राजा ने बनवाया था। 1857 के स्वतंत्रता आन्दोलन में यहां के राजा द्वारा भाग लेने के कारण व्रिटिस सरकार ने इस मिट्टी के किले को नष्ट करवाकर समतल करवा दिया था। यहां के राजा को कैद कर लिया गया था। उन्हें देश से निकाल दिया गया था। उनकी सारी जागीर सरकार ने जप्त कर ली गयी थी। इस कष्ट तथा अपमान को सहन ना कर पाने के कारण राजा साहब या तो मार डाले गये या स्वयं आत्म हत्या कर लिये थे।

किले का भूभाग नगर प्रथम के शासकीय नगर के उत्तर पश्चिम में स्थित है। इसके अवशेष, ईंटों की दीवालें, तथा वुर्जियां देखी जा सकती हैं। यह 50 मी. लम्बे तथा 50 मी. चैड़े में देखा जा सकता है। इसके मध्य भाग में दुर्गा मंदिर बना हुआ है। इस किले में 19 गुणे 16.5 गुणे 5 सेमी. आकार के ईंटें लगे हुए हैं। जब यह किला बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया गया तो यहां के राज परिवार के लोग पास के पोखरनी गांव में अपना आशियाना बनाकर रहने लगे।

1973 ई. में स्थानीय राजा का एक स्मारक उत्तर पूर्वी बुर्जी पर 1857 के युद्ध के घटनाओं का वर्णन करते हुए, उन्हें गोरखपुर जेल में निरूद्ध करने तथा फांसी पर लटकने तथा आत्म हत्या करने के कुप्रचार की बातें लिखी गयी है। दुर्गा मंदिर में उनका एक चित्र भी लगा हुआ है। किले के अवशेष से लाल पात्र परम्परा के औसत बनावट के पैर वाले कूटकी हाण्डी, दीप हौज, मध्यम आकार के कलश, भंडारण पात्र, भारी हत्थेवाली कड़ाही तथा उत्तर मध्य काल के टाइल्स प्राप्त हुए हैं।

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