लेखक परिचय

शिवदेव आर्य

शिवदेव आर्य

आर्ष-ज्योतिः मासिक द्विभाषीय शोधपत्रिका के सम्पादक

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organic farmingकिसी भी कार्य की दिशा में बढाया गया प्रथम कदम सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि प्रथम कदम मार्ग को प्रशस्त करता है।

समय तथा हमारा जीवन हमसे अपेक्षा करता है कि हम स्वयं का ध्यान रखें तथा ध्यान हम तभी रख सकते हैं जब हमारा आहार शुध्द हो एवं शुध्द आहार के लिए कृषि (खेती) पर ध्यान अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं।

भारतवर्ष में प्रायः खेती मानसून पर आधारित रहती है। यदि मानसून अच्छा रहा तो कृषि अच्छी रहेगी और यदि कृषि अच्छी रही तो बाजार की स्थिति भी मजबूत रहेगी।

जैविक कृषि की चर्चा को करने से पूर्व जान लें कि जैविक कृषि क्या है? जैविक कृषि वह सदाबहार कृषि पध्दति है, जो यथार्थ में पर्यावरण की शुध्दता को यथावत् स्थापित रखती है। मिट्टी की जल धारण क्षमता को बढ़ाती है, इसमें रसायनों का उपयोग बिल्कुल नहीं होता और कम लागत में गुणवत्तापूर्ण उत्पादन होता है। इस पध्दति में रासायनिक उर्वरकों, रासायनिक कीटनाशकों तथा खरपतवारनाशकों आदि के स्थान पर गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद, बैक्टीरिया कल्चर, जैविक खाद, जैविक कीटनाशकों जैसे साधनों से खेती की जाती है।

भारतीय भूविज्ञों के मतानुसार मिट्टी में असंख्य जीव निवास करते हैं, जो एक-दूसरे के पूरक होते हैं तथा पौधों के विकास के लिए पोषक तत्व भी उपलब्ध कराते हैं। जैविक कृषि का मूल उद्देश्य तेजी से बढ़ती जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए मृदा संरक्षण की प्रक्रियाएॅं अपनाकर जैविक विधियों से कीट व रोगों पर नियन्त्रण रखते हुए दलहनी फसलों के उत्पादन को बढ़ाना है, ताकि लोगों को सुरक्षित स्वाध्यवर्धक कृषि उत्पाद प्राप्त हो सकें और कृषि प्रक्रिया के अन्तर्गत अत्यल्प प्राकृतिक संसाधनों व पर्यावरण की क्षति हो सकें।

जैविक कृषि समय की सबसे बड़ी जरूरत है। इन दिनों लोग रासायनिक खाद पर ही पूरी तरह से निर्भर हैं। यूरोप, जापान व अमेरिका जैसे देशों में बच्चों में कैंसर के अधिक मामले आने पर अब पाॅंच साल तक के बच्चों के लिए जैविक खाद्य पदार्थ अनिवार्य कर दिए गए हैं। जबकि भारत में ऐसा नहीं है। लोग रासायनिक खाद पर ही पूरी तरह से निर्भर हैं। इन सब की रोकथाम जैविक कृषि से ही सम्भव है। इसके लिए जरूरी है कि किसान के पास जैविक बीज और जैविक खाद की उपलब्धता हो। अभी भी लोगों का मानना है कि जैविक खेती के लिए बड़े पैमाने पर जमीन की आवश्यकता होती है। जबकि वास्तविकता यह है कि यह खेती छोटे से भूभाग पर भी की जा सकती है। किसान चाहें तो शुरुआत में अपने परिवार के लिए जैविक फसल उगा सकते हैं। बाद में इसे बड़ा आकार या व्यावसायिक रूप दे सकते हैं। प्रारम्भिक अवस्था में गेहूॅं, धान, सब्जी, मक्का, अरहर आदि की खेती की जा सकती है। जैविक खेती की सबसे बड़ी शर्त यह है कि इसमें रासायनिक खाद का नाममात्र भी प्रयोग नहीं होता। खाद के नाम पर इसमें नीम व सरसों की खली, नीम का तेल, वर्मी कम्पोस्ट को प्रयोग में लाया जाता है। जैविक खाद के लिए ढैंचा सबसे अच्छा विकल्प होता है। ढैंचा मई-जून में बोया जाता है तथा करीब ३॰-४॰ दिन के बाद इसे पलट दिया जाता है। इसके बाद धान आदि की रोपाई वैदिक कृषि के उत्पादन में जैविक खाद का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है।

इसलिए जानने का यत्न करते हैं कि जैविक खाद को किस प्रकार से तैयार किया जाता है। भारत में पहले से ही गोबर की खाद, कम्पोस्ट, हरी खाद और जैविक खाद का प्रयोग विभिन्न फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए किया जाता रहा है। जैविक खाद बनाने के लिए पौधों के अवशेष, गोबर, जानवरों का बचा हुआ चारा आदि सभी वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए। जैविक खाद बनाने के लिए फुट १० लम्बा, ४ फुट चैड़ा व ३ फुट गहरा गढ्डा करना चाहिए। सारे जैविक पदार्थों को अच्छी प्रकार से मिलाकर इस गढ्डे में डालकर उपयुक्त पानी से भर दें। गढ्डे में पदार्थों को ३० दिन के बाद अच्छी तरह से पलटना चाहिए और उचित मात्रा में नमी रखनी चाहिए यदि नमी न हो तो उचित मात्रा में पानी का पुनः प्रयोग करना चाहिए। पलटने की क्रिया से जैविक पदार्थ जल्दी से सड़ जाते हैं और खाद में पोषक तत्वों का मात्रा बढ़ जाती है। इस प्रकार से खाद तीन महीनें में बन कर तैयार हो जाती है।

जैविक कृषि से किसानों का भविष्य उज्ज्वल है, लेकिन इसके लिए उनको लीक से हटकर काम करना होगा। जैविक कृषि के दौरान शुरुआत में उत्पादन में कुछ गिरावट और खेती को सुव्यवस्थित लाने में कुछ समय जरूर लगेगा। इसके लिए किसानों को मानसिक रूप से तैयार रहना होगा, क्योंकि हमारे लिए वेदव्यास ने आशा का संदेश ‘आशा बलवती राजन्..’ महाभारत में दिया है।

जैविक कृषि से उत्पन्न फसल में खनिज तत्वों की मात्रा अधिक होती हैै, ये स्वास्थ्य के लिए बहुत ही उपयोगी तथा रोगप्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने वाली है। रासायनिक खाद व कीटनाशकों का उपयोग न सिर्फ भूमि अथवा हमारे स्वास्थ्य को पूर्णतया समाप्त कर देता है।

ऐसा नहीं है कि संसार में जैविक कृषि नहीं हो रही है। भारत में वर्ष २००३-०४ में जैविक खेती को लेकर गम्भीरता दिखायी गई और ४२,००० हेक्टेयर क्षेत्र से जैविक खेती की शुरुआत हुई। मार्च २०१० तक यह बढ़कर १० लाख ८० हजार हेक्टेयर हो गयी है। मार्च २०१५ तक ग्राफ काफी बड़ा है। भारत में जैविक निर्यातों में अनाज, दालें, शहद, चाय, मसाले, तिलहन, फल, सब्जियाॅं, कपास के तन्तु आदि भी शामिल हैं।

हमारे युवा भी जैविक कृषि में बढ़-चढ़ कर भाग ले रहें हैं। बिहार, उत्तरप्रदेश, झारखण्ड और पंजाब के कई प्रतिशत युवा उच्च शिक्षा को करने के पश्चात् जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए आगे आ रहें हैं। ये खुद तो जैविक खेती कर ही रहें हैं। साथ ही आसपास के गाॅंवों में जाकर युवाओं को जैविक कृषि करने के प्रकार व लाभ बता रहें हैं। युवा संगठन बनाकर काम कर रहें है। जैविक कृषि को वो कृषि तक ही सीमित नहीं रहने देना चाहते वे जैविक कृषि का व्यापारिक स्तर भी तैयार कर रहें हैं। गाॅंव के जो लोग काम की तलाश में इधर- उधर जा रहें हैं, उनको जैविक खाद आदि सामग्री के कार्य में लगाया जा रहा है।

इस जैविक कृषि को सरकार की ओर से भी पूर्ण समर्थन मिल रहा है। कृषि मन्त्रालय में जैविक कृषि को बढ़ावा देने के लिए राष्टीय जैविक खेती परियोजना, राष्टीय बागवानी मिशन, पूर्वोत्तर के लिए प्रौद्योगिकी मिशन और राष्ट्रीय कृषि विकास योजना संचालित कर रहा है।

राष्ट्रीय जैविक खेती परियोजना, गाजियाबाद स्थित राष्ट्रीय जैविक खेती केन्द्र तथा बेंगलुरू, भुवनेश्वर, हिसार, इंफाल, जबलपुर और नागपुर स्थित छह क्षेत्रीय केन्द्रों के माध्यम से अक्टूवर २००४ में शुरुआत की गई थी अब देश में अनेक स्थलों पर ऐसे क्षेत्रीय केन्द्र खुल गयें हैं, जहाॅं जैविक कृषि को बढ़ावा देने के लिए कार्य किया जाता है।

प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी जी ने १ अप्रैल २०१६ से कृषि फलस बीमा योजना शुरु की है। ये सब काम कृषि कार्य को बढ़ावा देने के लिए ही किया जा रहा है।

देशभर में जैविक कृषि का उत्साहजनक वातावरण बनता जा रहा है, जिसके कुछ रोचक आंकडे़ आपके सामने हैं-

४५ लाख हेक्टर में जैविक कृषि से उत्पादन किया जा रहा है।

६५ प्रतिशत लोग खेती से जुड़कर अपनी आजीविका चला रहें हैं।

८० प्रतिशत लागत कम लगती है रासायनिक कृषि की अपेक्षा।

४० प्रतिशत से ज्यादा एंटी आॅंक्सीडेंट पाए जाते हैं जैविक कृषि में।

५० प्रतिशत उत्पादन भारत में होता है पूरी दुनिया के जैविक कपास का।

८९ कृषि परियोजनाओं के क्रियान्वयन को शीघ्रता से पूरा करने का प्रवधान सरकार कर रही है।

ऐसे उत्साह जनक वातावरण को ध्यान में रखकर हम सभी को जैविक कृषि की शुरुआत करनी चाहिए, जिससे स्वयं तथा समाज का कल्याण हो सकेगा।

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