लेखक परिचय

अब्दुल रशीद

अब्दुल रशीद

सिंगरौली मध्य प्रदेश। सच को कलमबंद कर पेश करना ही मेरे पत्रकारिता का मकसद है। मुझे भारतीय होने का गुमान है और यही मेरी पहचान है।

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अबदुल रशीद
मजदूरों की एकता को भंग कर तथाकथित मजदूर यूनियन अपनी-अपनी दुकान चलाने के सिवा करते ही क्या है?
1 मई मजदूर दिवस, आखिर क्यों मनाया जाता है,शायद मजदूरों के हक़ के लिए मनाया जाता है। लेकिन क्या यह वाकई मजदूरों के हक़ के लिए मनाया जाता है। शायद नहीं कम से कम भारत में तो कतई मजदूरों के हक़ के लिए नहीं मनाया जाता। क्योंकि ऐसा होता तो औद्योगिक विकास के साथ साथ मजदूरों का भी विकास होता। इस दिन चतुर चालाक भारत के औद्योगिक घराने अखबारों में बड़े बड़े विज्ञापन जारी करते हैं आयोजन कर यह जताना चाहते हैं की हम मजदूरों के हक़ देने के लिए कटिबद्ध हैं। यदि कटिबद्ध होते तो हादसे के शिकार मजदूर को हक़ जरूर मिलता। दरअसल मजदूर दिवस पर आयोजन और विज्ञापन दे कर औद्योगिक घराना मीडिया का ध्यान भटकाना चाहता है जिसमें वह सफल भी रहता है। मीडिया जो आम जनता कि आवाज़ होने का दावा करती है आयोजन में मिले उपहार और विज्ञापन के प्रभाव में मजदूर के हक़ की बात कि जगह मीडिया औद्योगिक घराने का प्रवक्ता बन कर रह जाता है, और मजदूर दिवस पर भी मजदूर कि जगह पूंजीपति हावी हो जाता है,मानो मजदूरों से कह रहा हो देखो मैने दौलत के दम पर तुम्हारे 1 दिन को भी तुम से छीन लिया।
सबसे पहले अमेरिका में 20 अगस्त 1866 को 60 मजदूर ट्रेडयूनियनों के प्रतिनिधियों ने बाल्टिक मोर में एकत्रित होकर नेशनल लेबर यूनियन गठित किया और मार्क्स व एंगेल्स के साथ मिलकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मजदूरों को हक़ दिलाने के प्रयासों में लग गये। अपने स्थापना सम्मेलन में नेशनल लेबर यूनियन ने एक प्रस्ताव पास किया कि ‘‘ इस देश के मजदूर वर्ग को पूँजीपतियों की दासता से मुक्त कराने के लिये इस समय का प्रथम और प्रधान काम ऐसा कानून पास कराना है, जिससे अमेरिका के सभी अंग राज्यों में आठ घण्टे काम का समय हो। इस महान् लक्ष्य को पूरा करने के लिये हम सारी शक्ति लगाने की शपथ लेते हैं।’’ आठ घण्टे काम, आठ घण्टे मनोरंजन व आठ घण्टे आराम का मजदूर वर्गीय आन्दोलन एटलांटिक महासागर से प्रशांत महासागर व न्यू इंग्लैण्ड से कैलिफोर्निया तक फैल गया।
नेशनल ट्रेड यूनियन और अन्य मजदूर संगठनों ने मिलकर यह निर्णय लिया कि 1 मई, 1886 को श्रमिक दिवस मनाया जाएगा। कुछ राज्यों में बहुत पहले से ही मजदूरों के लिए आठ घंटे काम करने का चलन था परंतु इसे कानूनी मान्यता नहीं दी गई थी। अमेरिका फेडरेशन ऑफ लेबर ने सन् 1884 के 7 अक्टूबर को एक प्रस्ताव पासकर 1886 की पहली मई से 8 घण्टे काम का दिन की वैधता मानने का प्रस्ताव पास किया और वैधानिक बनाने के लिए पूरे अमेरिका में 1 मई, 1886 को हड़ताल हुई। जिसके बाद पहले जहां मजदूरों को 10 घंटे प्रतिदिन काम करने की जगह 8 घंटे निश्चित कर कर दिया गया। तब से लेकर आज तक प्रतिवर्ष पहली मई को मजदूर दिवस के रूप में मनाने की परम्परा चल पड़ी।

कम्युनिस्ट नेता सिंगारवेलु चेट्टियार ने भारत में पहली बार वर्ष 1923 में मई दिवस मनाने का सुझाव दिया उनका कहना था कि जब दुनियां भर के मजदूर इस दिन को मनाते हैं तो भारत में भी इसकी शुरूआत की जानी चाहिए। आज भी विश्व के सभी बड़े देशों में श्रमिक दिवस या मई दिवस मनाया जाता है। भले ही मनाने का तरीका अलग-अलग राष्ट्रों में अलग-अलग है लेकिन इसका एकमात्र उद्देश्य मजदूरों के हक़ को पाने के लिए जागरुक करना है। मजदूर दिवस कहता है गुलामी की नींद से जागो, मजदूर संघर्षों की शानदार विरासत को याद करो। मजदूर वर्ग हमेशा परास्त नहीं हुआ है। लड़ाई अभी जारी है। मुट्ठीभर लोग जोर-जुल्म से करोड़ों-करोड़ मेहनतकश आबादी को हमेशा के लिए दबाकर नहीं रख सकते। जीत के लिए एक होना ही होगा।

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