लेखक परिचय

अरूण पाण्डेय

अरूण पाण्डेय

मूलत: इलाहाबाद के रहने वाले श्री अरुण पाण्डेय अपनी पत्रकारिता की शुरुआत ‘दैनिक आज’ अखबार से की उसके बाद ‘यूनाइटेड भारत’, ‘राष्ट्रीय सहारा’, ‘देशबंधु’, ‘दैनिक जागरण’, ‘हरियाणा हरिटेज’ व ‘सच कहूँ’ जैसे तमाम प्रतिष्ठित एवं राष्ट्रीय अखबारों में बतौर संवाददाता व समाचार संपादक काम किया। वर्तमान में प्रवक्ता.कॉम में सम्पादन का कार्य देख रहे हैं।

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अरूण पाण्डेय
क्या है गरीब, कैसे चलता है उसका जीवन , कैसे पालता है अपने बच्चों को ,जिन्हें सरकारी में बैठे अधिकारी कैसे निगल जाते है इसका ताजा उदाहरण है दिल्ली का लेबर विभाग। इन्हें बाल मजूदर काम करते नही दिखते, लडकियांे का शोषण नही दिखता और यदा कदा अगर कोई इनके पास पगार न मिलने पर शिकायत करने आ जाय तो उसके पास इतना पैसा भी नही छोडते कि वह जहर खा सके। कहने को तो भारतीय संविधान में यह लेबरों के लिये बनाया गया है लेकिन यहां के जो कारनामे है उसमें लेबर को छोडकर सभी कुछ है, उसकी सुनने वाला कोई नही है। लेबर वर्ग का प्रतिनिधित्व करने का ढोगं करने वाली केेजरीवाल सरकार भी खुलेआम लेबरों का शोषण पर मौन है। आखिर इन कार्यालयों से लेबर को मिलता क्या है तारीख ।
क्या कहते है लेबर इंस्पेक्टर
मामले के बाबत लेबर अधिकारियों का कहना है कि उनके पास अधिकार नही है, उनके हाथ बंधे हुए है। पूसा व अशोक विहार लेबर कोर्ट के अधिकारी ने बताते है कि कम्पनी मालिक दिल्ली में फैक्टी खोलता है ओर उसके बाद दूसरे प्रदेश में भाग जाता है वहां नोटिस भेजकर इसलिये बुलाया नही जा सकता क्योंकि वह हमारे दायरे से बाहर है। उससे पैसे लेबर को कहां से दिलाया जाय जबकि लेबर इस बात से परेशान है कि उसे तनख्वाह कहां से मिले, महीनों जूता घिसने के बाद उसे उम्मीद की कोई किरण दूर दूर तक दिखायी नही पडती। उसके बच्चों का क्या होगा और कैसे जीवनयापन करेंगे। इस डर से वह आत्म हत्या कर लेता है या बीबी बच्चों को छोडकर भाग जाता हैं।
कहां जाय लेबर
लेबर विभाग की बात है तो यह विभाग कई जगहों पर है लेकिन जहां यह विभाग है वहंा आने जाने का साधन न के बराबर है और कोई लेबर यह सोचे कि वह पैदल चला जायेगा तो कठिन सा है। किसी तरह चला जाय तो उसे वहां कुछ हासिल नही होता , जनाब तारीख पर गये है तारीख ले लो । एक महीने की तारीख एैसे दी जाती है जैसे रेवडिया बांटी जा रही हो वह भी एहसान जताकर । यदि सामने वाला नही भी आता तो उसे एक्स पार्टी आर्डर भी नही मिलता , तारीख पर तारीख दी जाती है इस आश्रय से कि कभी न कभी प्रतिवादी आयेगा और कुछ देकर जायेगा।
दलालों का है बोलबाला
इस जगह पर भी लेबर संगठनों का बोलबाला है एक आदमी पूरा संगठन चलाता है जिसे हम यूनियन भी कह सकते है। यह लोग दस प्रतिशत पर लेबर का केस लेते है और आगे बढाते है। बिना इनके किसी वाद का फैसला हो जाय यह संभव भी नही है। चुंकि आये दिन यह यही रहते है इसलिये अधिकारी से दोस्ताना सा हो जाता है और लोगों का भी सोचना है कि कुछ मिल जायेगा। इस उम्मीद में उनके जाल में फंस जाते है। इसके बाद इतना चक्कर लगाना पडता है कि पैर के जूते घिस जाते है लेकिन कुछ मिलेगा इसकी संभावना प्रतीत सी होती है लेकिन मिलता कुछ नही , जब कुछ मिलता है तो वह इतना नही होता कि लेबर का कुछ हो सके।
क्या है इन विभाग की कार्यशैली
अब इन विभाग की कार्यशैली की बात की जाय तो यह विभाग एक महीने की तारीख पहले प्रार्थनापत्र पर देता है ओर कहा जाता है कि विपक्षी को नोटिस भेज दी गयी है। उसके बाद जब विपक्षी नही आता है तो उससे टेलीफोन पर वार्ता करने का प्रावधान है और फिर एक महीने की तारीख देकर वादी को चलता कर दिया जाता हे। तीसरी तारीख पर यदि विपक्षी आ जाता है तो उसे मौका दिया जाता है कि वह सुलह कर ले , फिर बात न बनी तो अगली तारीख तक मौका दिया जाता है। इन तारीखों के बीच लेबर के कई महीने गुजर चुके होते है और या तो वह वाद को छोडकर चला जाता है या फिर कहीं और नौकरी करने के कारण उसके मामले को रफा दफा कर बंद कर दिया है।
क्या देते है अधिकारी सलाह
इतने के बाद भी यदि वह आता रहे तो उसे सलाह दी जाती है कि वह दिल्ली शाप एंड स्टपलिशमेंट एक्ट मे वाद असिंटेंस लेबर कमीशनर के यहां दाखिल करे । उसे इस जगह वाद दाखिल करने के लिये संगठनों के पास जाना पडता है और वहां भी फिर से वही प्रकिया चालू हो जाती है जिसे वह छोडकर आया था। इसके बाद लेबर के नाम पर संगठन , अधिकारी व कम्पनी मालिक सांठगांठ कर लेते है और मामला को किसी तरह निपटा दिया जाता है। जिससे लेबर का कोई भला होने वाला नही हे।
क्या होता है जब …..
इस प्रक्रिया में सबसे खास बात यह है कि लेबर अधिकारी के पास सिवाय समझौता कराने के अलावा कोई और रास्ता नही दिया है । संगठन व अधिकारी का प्रयास होता है कि समझौता हो जाये। लेबर को क्या मिलेगा इससे दोनों में से किसी को कुछ नही लेना या उससे ज्यादा समय लग जाये तो भी वह मौन रहते है। छह महीने वह लेबर क्या करेगा , कैसे वह व उसका परिवार जियेगा। इस बात से किसी को कोई सरोकार नही है। तारीख देने वाले हर
महीने की पहली तारीख को पगार सरकार से लेते है लेकिन उन्हें इस बात की कतई चिन्ता नही होती कि लेबर जिसे पगार नही मिली । उसका क्या होगा । समझौता कराने वाले अधिकारी को बार बार मौका देने का मतलब कुछ समझ से परेय है। सबसे खास बात यह है कि जिन फाइलों पर आदेश देना होता है , उसे तीन बजे के बाद बुलाया जाता है और जिस पर बात नही बनती, उस पर यह कहा जाता है कि साहब हाईकोर्ट गये है तारीख ले लो।
क्या करे सरकार
इन सारे मामलों पर एक बात खुलकर सामने आती है कि सरकार का रवैया इस मामले पर ढीला क्यांे है लेबर अधिकारी , संगठन व कम्पनी मालिकों के बीच निवाला बन रहा है और सरकार मौन बैठी है। जिन लेबरों का वाद इन न्यायालयों में लंबित है उनका कहना है कि सरकार को चाहिये की दो चार पेशी में ही मामले का निस्तारण होना चाहिये और एक महीने की तारीख देने के मसले पर रोक लगनी चाहिये। लेबर गरीब वर्ग से आता है और वेतन रूकने की स्थित में इतने लंबे समय तक जीवनयापन नही कर सकता इसलिये सरकार को एक एैसी पालिसी बनानी चाहिये जिससे की कोई भी अधिकारी एक मौके के बाद मामले को आगे न खीच सके और तारीख एक हफते से ज्यादा न दी जा सके।
और अंत में ……….
सबसे बडा एरिया अशोक विहार के लेबर आफिस का है इसलिये उसे दयाबस्ती रेलवे स्टेशन से बीस रूपये न्यूनतम खर्च करके एक तरफ से जाया जा सकता है।इसी तरह सेन्टल लेबर आफिस पूसा में है जहां के लिये न्यूनतम उतने ही रूप्ये खर्च होते है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि लेबर को अगर अपना पैसा चाहिये तो उसे उतने पैसे खर्च करने पडेगें कि बाद में कुछ न बच सके। इसलिये कहा जाता है कि जहर खाने के लिये पैसे भी नही बचे लेकिन लेबर के लिये यह हकीकत है।

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