लेखक परिचय

कुन्दन पाण्डेय

कुन्दन पाण्डेय

समसामयिक विषयों से सरोकार रखते-रखते प्रतिक्रिया देने की उत्कंठा से लेखन का सूत्रपात हुआ। गोरखपुर में सामाजिक संस्थाओं के लिए शौकिया रिपोर्टिंग। गोरखपुर विश्वविद्यालय से स्नातक के बाद पत्रकारिता को समझने के लिए भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी रा. प. वि. वि. से जनसंचार (मास काम) में परास्नातक किया। माखनलाल में ही परास्नातक करते समय लिखने के जुनून को विस्तार मिला। लिखने की आदत से दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण, दैनिक जागरण भोपाल, पीपुल्स समाचार भोपाल में लेख छपे, इससे लिखते रहने की प्रेरणा मिली। अंतरजाल पर सतत लेखन। लिखने के लिए विषयों का कोई बंधन नहीं है। लेकिन लोकतंत्र, लेखन का प्रिय विषय है। स्वदेश भोपाल, नवभारत रायपुर और नवभारत टाइम्स.कॉम, नई दिल्ली में कार्य।

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कुन्दन पाण्डेय

भू-अधिग्रहण नीति से भूस्वामी के परिवार के जीवन-स्तर में वृद्धि अवश्य होनी चाहिए, अन्यथा वह खुशी से अधिग्रहण के लिए कभी भी तैयार नहीं होगा। सारी जमीन पर राज्य के स्वामित्व वाले एमिनेंट डोमेन के सिद्धांत से यदि भूस्वामी के जीवन-स्तर पर नकारात्मक असर पड़े तो यह राज्य के लोकहित का निर्णय कभी नहीं कहा जा सकता।

भूस्वामी भी राज्य का ही एक अत्यंत छोटा भाग है, फिर राज्य का अपने ही एक अत्यंत छोटे भाग का गला घोंटने को न्यायोचित कैसे कहा जा सकता है? भूस्वामी के परिवार की आय के ऐसे स्थानापन्न स्थायी साधन की व्यवस्था करने को ही न्यायोचित कहा जा सकता है, जो उसके भूस्वामी बने रहने से निश्चित रुप से बेहतर हो। खेती की जमीन के अधिग्रहण पर सख्त प्रतिबंध लगना चाहिए क्योंकि सरकार कुल राष्ट्रीय जोत कम करके देश में अनाज की उपज को दीर्घकाल में इतना घटा देगी की इसकी भरपाई असंभव ही होगी। क्योंकि बढ़ती हुई जनसंख्या से खेती की जमीन पहले से ही घटती जा रही है।

वर्तमान में ‘सार्वजनिक हित’ की जो विस्तृत दायरे वाली परिभाषा है उसे सीमित करने की जरूरत है। भूमि न केवल उत्पादन का दुर्लभ प्राकृतिक साधन है, बल्कि मानव के सभ्यता, विकास व अस्तित्व का आधार भी है। कोई भी राष्ट्र या व्यक्ति उपलब्ध राष्ट्रीय जमीन को बढ़ा नहीं सकता, न ही इसका विदेशों से (पूंजी) निवेश या आयात किया जा सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि इसका केवल विवेकसम्मत सदुपयोग ही किया जा सकता है। दुरुपयोग से अकेले भूस्वामी को क्षति नहीं होगी, बल्कि अर्थव्यवस्था का दुर्लभ प्राकृतिक साधन अनवरत कम होता जाएगा।

1894 में अंग्रेजों के बनाये भूमि अधिग्रहण कानून को लोकहित में बनाया गया कानून मानना कांग्रेस द्वारा अंग्रेज शासन की प्रशंसा करना है। वैसे आज के समय में लागू हमारे संविधान के अधिकतर कानून अंग्रेजों के राष्ट्र-शोषण के लिए बनाये गये कानूनों से ही लिए गए हैं।

विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) बनाने की भारत की नीति अनोखी है। क्योंकि सेज सरकार द्वारा संचालित जरूर है, लेकिन अपनी आवश्यकता-प्राथमिकता के आधार पर नहीं बल्कि निजी क्षेत्र की मांग के आधार पर यह बनाया जाता है। सेज के आकार-प्रकार-स्थान का फैसला सरकार अपने अनुसार नहीं करती है। इसका फैसला निजी कम्पनियों की आवश्यकता और मांग के आधार किया जाता है। केन्द्रीय वाणिज्य मंत्रालय एवं मंत्रियों के अधिकार प्राप्त समूह (जीओएम) ने 15 जून 2007 को यह दिशानिर्देश जारी किया था कि राज्य निजी सेज के लिए जबरन भूमि अधिग्रहण न करे। राज्यों ने इन निर्देशों का पालन नहीं किया।

वर्तमान भू अधिग्रहण मसौदे में कुछ चालाकी भरे प्रावधान किए गए हैं। जैसे पहला सौ से अधिक परिवारों के विस्थापन होने पर एक जनजातीय विकास योजना बनाने का उल्लेख किया गया है, क्योंकि जहां सरकार की पहुंच कम है उन अति पिछड़े व आदिवासी इलाकों में सौ परिवारों का एक साथ मिलना मुश्किल है। दूसरा प्रावधान केवल सिंचित एवं बहुफसलीय कृषि भूमि को अधिग्रहण के दायरे से मुक्त रखने का है। आदिवासियों की जमीनें अधिकांशतः गैर सिंचित वर्षा आधारित एकफसलीय ही होती है। तीसरे प्रावधान के तहत नागरिकों के भ्रष्टाचार में पकड़े जाने पर एक लाख रुपए का अर्थदण्ड एवं एक माह की सजा जबकि सरकारी कर्मचारी के पकड़े जाने पर केवल अनुशासनात्मक कार्रवाई की व्यवस्था। ये तीनों प्रावधान अत्यंत चालाकी भरे हैं, जिससे कमजोर तबके खासकर छोटे किसानों, आदिवासियों की जमीनों को आसानी से हड़पा जा सके। नर्मदा के सरदार सरोवर बांध व महेश्वर बांध दोनों से लगभग साठ फीसदी आदिवासी प्रभावित हुए हैं। कुल मिलाकर सरकार आदिवासियों के विस्थापन को मंत्रियों व नौकरशाहों के एक बंगले से दूसरे बंगले में पुर्नस्थापित करने जैसा समझ रही है। कांग्रेस सरकार केवल इस समय अधिग्रहण विरोधी जनमानस को भुलावे में रखने का झुनझुना देने का प्रयत्न कर रही है। वैसे कांग्रेस को अगले साल होने वाले यूपी के चुनावों में इसका कोई लाभ नहीं मिलने वाला है।

आंध्र प्रदेश और तमिलनाडू सहित अन्य राज्य सरकारें भी भूमि के जबरिया अधिग्रहण के लिए भूमि अधिग्रहण कानून की आपात धारा 17/4 का धड़ल्ले से प्रयोग कर रही है। इसके पक्ष में सरकारें यह हास्यास्पद तर्क दे रही हैं कि ये भूमि औद्योगिक विकास निगमों के पास पहले से ही मौजूद है, लेकिन यह नहीं कह रही है कि किसानों से इसे लोकहित में न्यूनतम मूल्यों पर लिया गया था। अब सरकार उनसे कौड़ियों के भाव खरीदी गई जमीन को सोने के भाव निजी कम्पनियों को बेच कर कई गुना अधिक लाभ कमा रही है।

यदि यह लोक कल्याणकारी राज्य का धवल-चेहरा है तो लोक-शोषक राज्य कैसा होना चाहिए, गंभीर विचारणीय प्रश्न है? इसी तरह लोक शोषण से त्रस्त होकर किसान यदि किसी हिंसक संगठन की तरफ आकर्षित हो जायें तो राज्य कितना आर्थिक विकास करेगा और कैसे करेगा कानून-व्यवस्था की अराजक स्थिति बनाकर? नक्सल प्रभावित राज्यों को इस पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

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