लेखक परिचय

विश्‍वमोहन तिवारी

विश्‍वमोहन तिवारी

१९३५ जबलपुर, मध्यप्रदेश में जन्म। १९५६ में टेलीकम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि के बाद भारतीय वायुसेना में प्रवेश और १९६८ में कैनफील्ड इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी यू.के. से एवियेशन इलेक्ट्रॉनिक्स में स्नातकोत्तर अध्ययन। संप्रतिः १९९१ में एअर वाइस मार्शल के पद से सेवा निवृत्त के बाद लिखने का शौक। युद्ध तथा युद्ध विज्ञान, वैदिक गणित, किरणों, पंछी, उपग्रह, स्वीडी साहित्य, यात्रा वृत्त आदि विविध विषयों पर ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित जिसमें एक कविता संग्रह भी। १६ देशों का भ्रमण। मानव संसाधन मंत्रालय में १९९६ से १९९८ तक सीनियर फैलो। रूसी और फ्रांसीसी भाषाओं की जानकारी। दर्शन और स्क्वाश में गहरी रुचि।

Posted On by &filed under विविधा.


जब द्वितीय युद्ध ने सामरिक शक्ति के बल पर स्थापित साम्राज्यवाद को तोड़ दिया तब यू एस ने आर्थिक साम्राज्यवाद प्रारंभ किया जिसके प्रसार में बहुल उत्पादन प्रौद्योगिकी ने तथा बहुल विनाश प्रौद्योगिकी ने बहुत मदद की। इसके प्रसार से अंग्रेजी भाषा का भी साम्राज्य बढ़ा। अब आर्थिक साम्र्राज्यवाद को सुदृढ़ करने के लिये भाषाई साम्राज्यवाद बढ़ाया जा रहा है जिसके लिये अधिकांश भारतीय माध्यम पर लगातार ‘आर्थिक दबाव’ डाला जाता है। विश्व की भाषाएं यू एस के आर्थिक दबाव में या तो अंगरेजी से संकर होकर भ्रष्ट हो रही हैं और समाप्त हो रही हैं। पिछले पाँच वर्षों से भारत में अंग्रेजी माध्यम में शिक्षा नर्सरी से ही प्रारंभ कर दी गई है, अत: भारतीय भाषाओं का सम्मान तेजी से कम होता जा रहा है। स्पष्ट है कि अगले दस या पंद्रह वर्षों में भारतीय भाषाएं भारत में ही अनादृत हो जाएंगी और इन भाषाओं में साहित्य पाठक नहीं बचेंगे, बोलचाल की भाषा अंगरेजी और भारतीय भाषाओं का संकरित रूप होगी!! अब भारतीय भाषओं को बचाने के लिये भारतीय आंदोलन की आवश्यकता है।किन्तु अंगरेजी भक्त पूछ सकते हैं कि इस भूमंडलीकरण के दौर में हम भारतीय भाषाएं बचाएं क्यों ?

भाषा बचाने के लिये यह तर्क कि भाषाएं हमारी पहचान हैं, पर्याप्त नहीं है; नया युग है, सब कुछ बदल रहा है, नई पहचान बन जाएगी। भारतीय भाषाओं में नौकरियां नहीं मिलतीं, रोटी नहीं मिलती। किसको चाहिये ऐसी भुखमरी पहचान और भाषा जो रोटी तक न दे सके! अंग्रेजी में तो ब्रैड, बटर और व्हिस्की मिलती है, साहबी मिलती है। अंग्रेजी से तो इंटरनेशनल बनते हैं, अमेरिका का स्वर्ग भोग सकते हैं। यदि भाषा की बात करना है तब टीवी की भाषा की बात करें जो आधुनिकतम है और उसकी दृष्टिक भाषा शाब्दिक भाषा से कहीं अधिक जोरदार है। टीवी की देशी शाब्दिक भाषा में तब तक जान नहीं आती कि जब तक उसे अँगरेजी में न रँगा जाए।इसके साथ ही यह भी दृष्टव्य है कि टीवी की दृष्टिक भाषा पाश्चात्य भोगवादी ही है अतएव टीवी आते ही अंगरेजी परस्त भारत में भोगवाद छाने लगा।जब ब्रैड बटर और व्हिस्की ही जीवन का ध्येय हो तब वह भोगवाद है; और यदि रोटी जीवन का साधन हो साध्य नहीं तब वह भोगवाद नहीं।

यदि मै आप से पूछूं कि ‘प्रेम’ शब्द का अंग्रेजी अनुवाद क्या है? आप कहेंगे ‘लव’। मेरी समझ में यह अनुवाद कभी सही रहा होगा किन्तु आज सही नहीं है, क्योकि आज लव एक ‘फोर लैटर वर्ड‘ हो गया है! लव मानवता की सुन्दर पोशाक में मात्र पैशनेट या पाशविक कृत्य ही रह गया है, जब कि भारतीय भाषाओं में प्रेम ढाई आखर का शब्द है, और दोनो में मानव और दानव का अन्तर है। मानव वह है जो ढाई आखर वाला प्रेम करता है, तथा दानव वह क्रूर व्यक्ति है जो ‘फोर लैटर’ वाला ‘लव’ करता है। मानव जब घोर भोगवादी हो जाता है तब दानव बनने लगता है। शब्दों के अर्थ में अन्तर उनकी संस्कृतियों से आते हैं। उदाहरण के लिये, गुरू और ‘टीचर’ लगभग समानार्थी शब्द माने जाते हैं। किन्तु इन दोनो में गहरा सांस्कृतिक अन्तर है। जो सम्मान भारत में ‘टीचर’ को आज भी मिलता है, वह उसे पाश्चात्य संसार में नही मिलता! पाश्चात्य संसार में ‘टीचर’ तो ‘शिक्षा’ उद्योग का मात्र एक ‘कार्मिक’ है अतएव उसकी शिष्य के प्रति निष्ठा भी सीमित है, यह रोग अब हमारे यहां भी फैलने लगा है। इसी तरह माता, पिता और मॉम तथा डैड, पत्नी तथा वाइफ, पति तथा हजबैण्ड, मृत्यु तथा डैथ आदि में गहरा सांस्कृतिक अन्तर है। आजकल सभी पढे. लिखे आदमी अपनी पत्नी को वाइफ ही कहते है, और महिलाएं पति को हज़बैण्ड।यहां यह व्यवहार मात्र अपने को श्रेष्ठ दिखलाना ही नहीं है वरन हिन्दी शव्दों में जो उदात्त भावनाएं अन्तनिहित हैं कहीं उनसे बचने की भी भावना है। मृत्यु भी गहरी संवेदनाओं से भरा शव्द है, उनसे बचने के लिये हम ‘डैथ’ कह देते हैं।इस तरह देखा जाए तो मातृभाषा के शब्द संवेदनाओ से भरे रहते हैं, जिनका विदेशी शब्दो में हमारे लिये आना कठिन होता है। कम संवेदनाओ से भरे शब्दों का उपयोग करने से हमारी संवेदनशीलता का हास होता है, मानवता का क्षरण होता है तभी मानव राक्षस बनने लगता है।

आज का भोगवादी भारतीय भी ‘आई लव यू’ ही बोलता है।अंग्रेजी शव्द लव का हमारी टीवी की शाव्दिक तथा दृष्टिक दोनों भाषाएं बहुत उपयोग करती हैं। लव तो हम फिल्म से, मिठाई से भी करते हैं किन्तु उनसे प्रेम नही करते। लव इन्द्रियों का विषय अधिक है हदय का कम! लव भोगवाद का विषय अधिक है प्रेम का कम! प्रेम किसी भी संस्कृति का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारक है, समाज का व्यवहार या कहें उसकी संस्कृति उसके प्रेम की अवधारणा पर अधिक निर्भर करती है।अंग्रेजी भाषा का भोगवादी शव्द ‘लव’ हमारे समाज के व्यवहार या संस्कृति को आज निर्धारित कर रहा है। भाषा और संस्कृति के संबन्ध न केवल गहरे हैं वरन जटिल भी हैं।

भोगवाद तथा भोग में अन्तर है। भोग शरीर के पोषण के लिये अनिवार्य है; किन्तु जीवन का मुख्य ध्येय भोग द्वारा सुख प्राप्त करना भोगवाद है। सत्रहवीं शती से लगातार ईसाई धर्म विज्ञान की अवधारणाओं पर आक्रमण करता रहा और विज्ञान उनको एक के बाद एक ध्वस्त करता रहा। यह युद्ध सौरमंडल के केन्द्र से प्रारंभ होकर डारविन के सिद्वान्त, और अब गर्भपात की अवधारणाओं पर चल रहा है। युद्ध न करते हुए भी विज्ञान अंधविश्वासों को तो काटता ही है। हो यह रहा है कि पश्चिम में ईश्वर पर से श्रद्धा घटती ही गई है। बाइबिल का स्वर्ग और अनंत जीवन एक लुभावनी कल्पना है, किन्तु विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी ने वह स्वर्ग इसी प्रथ्वी पर रचने का जिम्मा उठा लिया है, फलस्वरूप भोगवाद वढ़ रहा है।

सामी धर्मों के पास स्वर्ग से बेहतर सुख का विकल्प नहीं है। सुखद आश्चर्य यह है कि हमारे ऋषियों ने स्वर्ग को अवांछनीय घोषित कर उससे बेहतर तथा उदात्त उदेश्य अर्थात सच्चे सुख का मार्ग दर्शाया है तब भी हम पश्चिम के भोगवाद की अन्धी नकल कर रहे हैं। क्योंकि हम अपनी भाषा और संस्कृति भूल गये हैं। दृष्टव्य है कि हममें गुलामी की भावना अभी तक भरी है अतएव हम अंग्रेजी की पूँछ पकड़कर वैतरणी पार करना चाहते हैं।

जीवन में क्या करना चाहिये, जीवन किस तरह जीना चाहिये, जीवन का ध्येय क्या है ? आदि का उत्तर बालकों के पास अन्य पशुओं के बरअक्स जन्मजात नहीं होते, उसे इन के उत्तर घर में, समाज में, ग्रंथो तथा व्यावहारिक संस्कृति के द्वारा मिलते है। किसी शिशु को एक संस्कृति उदार बना सकती है तो अन्य संस्कृति कटृर; एक को मानव तो अन्य को दानव बना सकती है। यदि भाषा भ्रष्ट होगी तो संस्कृति भी भ्रष्ट होगी। हम अन्य भाषाओं से शब्द ग्रहण कर सकते है, किन्तु इतने नही कि हमारी भाषा ही भ्रष्ट हो जाए।

हमारे यहां जीवन के चार पुरूषार्थ हैं, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। कामनाओं की पूत्र्ति के लिये, अर्थात भोग करने के लिये अर्थ का अर्जन धार्मिक मूल्यों के अनुसार करना है, किन्तु जीवन का चरम लक्ष्य भोग नही योग है, परमात्मा से योग अर्थात मोक्ष है। पूंजीवाद तथा साम्यवाद दोनो ही भोगवादी हैं।जब से हमारी भाषा तथा साहित्य पर पाश्चात्य संस्कृति का कुप्रभाव पडा., और टी वी में उसका उपयोग हुआ है, भोगवाद हमारे साहित्य में और भाषा में, और अन्ततः व्यवहार में आने लगा है। मुद्रित तथा इलैक्ट्रॉनिक माध्यमों के मालिकों को घोर भोगवादियों की तरह मुख्यतया अपने आर्थिक लाभ से मतलब, उसके शुभ या अशुभ होने से नहीं! यह भी भोगवाद का ही परिणाम है कि स्त्री स्वातंत्र्य की उदात अवधारणा का उपयोग वहां भी अधिकांशतया स्त्री के शोषण में परिलक्षित होता है, एनरॉन की महिला – कर्मियो के बयान इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।

क्या कारण है कि पिछले बीस– पच्चीस वर्षो में ही हमारा आदर्श त्यागमय भोग के स्थान पर पाशविक भोगवाद हो गया है। दफ्तरों में – सरकारी तथा गैर – सरकारी दोनो में– भ्रष्टाचार को व्यावहारिक मान्यता प्राप्त है, भ्रष्ट आदमी सम्मानित हो गया है क्योंकि उसके पास पैसा है! क्योकि मोक्ष अर्थात सच्चा सुख नही अब ‘अर्थ’ हमारा सबसे बडा. मूल्य हो गया है।यह बिडंबना ही है कि बढ़ती समृद्धि के साथ समाज में भयंकर अपराध, विखंडन, द्वेष, विवाद, और अंततः दुख बढ़ रहे हैं। समाजिक प्रेम तथा पारिवारिक प्रेम का स्थान व्यावसायिकता ने ले लिया है। यह मुख्यतया इसलिये कि हम अपनी भाषा तथा संस्कृति को छोड़ रहे है और पाश्चात्य भाषा तथा संस्कृति की अधकचरी नकल कर रहे है। अनेक अंग्रेजीपरस्त विद्वानों की मान्यता है कि अंग्रेजी के आने से पाश्चात्य संस्कृति नहीं आयेगी। उन्हें उपरोक्त विचार ध्यान में रखकर अपनी मान्यता पर पुनर्विचार करना चाहिये। क्या अपराधों की अमानवता तथा संख्या नहीं बढी. है? आखिर सामाजिक जीवन मूल्यों में इतना पतन कैसे और क्यों हुआ? इनमें तथा अंग्रेजी और टीबी के प्रसार में संबन्ध तो अवश्य है।

भाषा और मनुष्य के जीवन में उतना ही गहरा सम्बन्ध है जितना माता संतान में।और विमाता ओैर विदेशी राजभाषा के व्यवहारों में भी काफी समानता है। समस्त जीवों में शाव्दिक भाषा मात्र मनुष्य के पास ही है। पाशविक प्रवृत्तियों का उदात्तीकरण भाषा और संस्कृति के ही द्वारा सम्भव है। अर्थात मनुष्य भाषा तथा संस्कृति के द्वारा ही मानव या राक्षस बन सकता है। जब भाषा का इतना मूल और क्रांतिकारी प्रभाव पड़ता है तब यह देश भाषा को उचित महत्व क्यों नही देता।यह भी हमारे सांस्कृतिक पतन का एक ज्वलंत उदाहरण है।

मीडिया ने मानवीय संस्कृति को धता बतलाते हुए ऐसी सदा आधुनिक पारिस्थितिकी का निर्माण किया है जिसमें भूमण्डलीय ‘खुला बाजार’ ने ‘सदा – बहार संस्कृति’ के रूप में अवतार लिया है। खुले बाजार में केवल शक्तिशाली ‘फ्र्री’ होते है, ग्राहक नहीं, उसे तो लुभावने विज्ञापन द्वारा, अपने लिये सर्वाधिक लाभदायक उत्पाद को खरीदने के लिये सम्मोहित किया जाता है। यह अतिशयोक्ति न होगी कि भोगवादी विज्ञापनों ने आज भाषा को मानो कोठे पर बिठा दिया है, विज्ञान तथा भाषा का लुभावना रूप ही वेश्या की तरह उसका अर्थ हो गया है, उसकी आत्मा या कथ्य नहीं! भाषा का ऐसा बाजारू उपयोग राजनीति में तथा जीवन के अन्य व्यवहारों में भी आ गया है। आज मानव के साथ वस्तु के समान व्यवहार होता है जो उसे राक्षस बनाता है। मैनिपुलेशन नहीं करना, अर्थात दूसरे मनुष्य को कमोडिटी नहीं समझना, मानवीयता की मूल शर्त है।

जब शासन और शासितों की भाषा में माता और विमाता का सा अन्तर हो तब जनतंत्र सचमुच में कार्य नहीं कर सकता। इस देश में चाहे चुनाव हो रहे हों, सच्चा जनतंत्र प्रभावी रूप में नही है। यह तो अंग्रेजी परस्त लोगो का शासन है; इसीलिये अंग्रेजी भाषा का महत्व सर्वोपरि है। अग्रेजी के आंतक ने जनता को गूंगा बना दिया है, जिसने भारत में न केवल एक गूंगी संस्कृति पैदा की है, वरन बन्ध्या और बंजर संस्कृति पैदा की है।

लगभग दो सौ वर्षो से अंग्रेजी इस देश में शासको की भाषा रही है और पढा.ई जा रही है। तब क्यों विज्ञान में इस देश को एक ही नोबेल पुरस्कार मिला है। और यहूदी भाषी इज़राइल को जिसकी आवादी भारत की आबादी की दशमलव छ प्रतिशत ही है, दस नोबेल पुरस्कार मिले है? इजराइल अपनी भाषा में शिक्षा देता है और अपनी भाषा में जीवन जीता है। सारे यूरोपीय देश, चीन, जापान, कोरिया आदि आदि समुन्नत देश अपनी भाषा में जीते हैं, इसीलिये स्वतंत्र, वाचाल तथा सृजनात्मक है, हमारे सरीखे गुलाम, गूंगे तथा अनुर्वर नहीं हैं।

मात्र रोटी के लिये अंग्रेजी पढ़ने वाला व्यक्ति ‘काम चलाऊ’ अंग्रेजी ही सीखता है। और विडम्बना यह है कि वह ‘श्रेष्ठता ग्रन्थि’ का पोषण करने लगता है। उसकी श्रेष्ठता ग्रन्थि एक ‘अंगे्रजी दां’ होने की नकली होती है। अंग्रेजी ने हमारी गुलामी की भावना को निकलने का अवसर ही नही दिया। और फिर पाश्चात्य देश हमसे प्रौद्यौगिकी में इतने आगे हैं कि उनके प्रति भी हममें हीन भावना ही रहती है। और अंग्रेजी की शिक्षा तो हमें पाश्चात्य सभ्यता तथा संस्कृति का बड़प्पन बतलाती रहती है और हमारी भाषा, सभ्यता और संस्कृति को हीन सिद्ध करती रहती है। हम उनसे प्रौद्योगिकी में पीछे हैं किन्तु हममे आत्मविश्वास होना चाहिये कि हम तेजी से आगे बढ़ सकते है। पश्चिम का व्यक्ति, इतना स्वार्थी नहीं होता कि अपने स्वार्थ को नुकसान पहुंचाए क्योंकि स्वार्थ एक सीमा के बाद आत्मघातक हो जाता है। हम उससे भी अधिक स्वार्थी हो गये है। पश्चिम का व्यक्ति इतना अहंवादी नहीं हो गया है कि दूसरे की अहं पर हमला करते रहे, हम इससे भी अधिक अहंवादी हो गये हैं। तब भी उनकी संस्कृति समाज में सुख के साथ तनाव भी पैदा कर रही है और प्रकृति का बुरी तरह प्रदूषण कर रही है, वन्य प्राणीयों का विनाश कर रही है। उनके भोगवाद ने पृथ्वी के ओज़ोन छाते में छेद कर दिया है। उनकी नकल में हमने गंगा– यमुना को गंदी नाली बना दिया है। हमें उनकी नकल करने की आवश्यकता नही हैं। हमारी संस्कृति मे वे सब तत्व है जिनकी सहायता से हम आधुनिकतम जीवन पूरा किन्तु सम्यक उपभोग कर सकते है।यदि हम अपनी श्रेष्ठ संस्कृति में वापिस जाना चाहते हैं तब हमें अंग्रेजी के मोहपाश से मुक्त होकर, अपनी भाषाओं में वापिस जाना पडे.गा। विश्व के श्रेष्ठ विद्वानों यथा शोपेनहार, एल्डस हक्सले, विलियम जोन्स, टी एस इलियट, टायनवी, आन्द्रे मालार्मे, जोसैफ कैम्पबैल आदि अनेक श्रेष्ठतम विद्वानों ने, घोषित किया है कि भारतीय दर्शन तथा संस्कृति श्रेष्ठतम है।

हम हीन ग्रन्थियों से पीड़ित भारतीय पाश्चात्य सभ्यता तथा संस्कृति की नकल करने में लगे हैं। कोला में हानिकारक जहर हैं, यह सिद्ध होने के बाद भी कोला खूब बिक रहा है, हैमबर्गर तथा पिज्जा जैसे जंक फूड बिक रहे है। हमने अपनी अकल विज्ञापनों को बेच दी है! इस संस्कृति पतन के दो मुख्य कारण हैं – एक, माध्यम के मालिकों को घोर भोगवादियों की तरह मुख्यतया अपने आर्थिक लाभ से मतलब, उसके शुभ या अशुभ होने से नही! दूसरे सत्ता तथा रोटी से जुडी. अंग्रेजी भाषा ने आम पढे. लिखे लोगों को भारतीय भाषाओं के समुचित अध्ययन से हटा दिया, और अंग्र्रेजी भी उतनी ही सीखी गई जितनी रोटी के लिये आवश्यक होती है। अर्थात हमारा सारा ज्ञान मात्र रोटी कमाने के कौशल तक ही सीमित रह गया। एक तो भारतीय भाषाओं का और भारतीय ग्रन्थों का अपूर्ण ज्ञान होने से भारतीय संस्कृति की पकड़ कम हो जाती है, दूसरे नकल के द्वारा पाश्चात्य संस्कृति भी गलत आई। इनके फलस्वरूप मानवीय मूल्य कमजोर हुए ओैर भोगवादी पशुत्व बढ़ा।

यह अकाट सत्य है कि यह युग विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी का है, जो इसमें पिछड़ गया वह विकसित देशो का गुलाम ही रहेगा। विडम्बना यह है कि विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के लिये भारतीय भाषाओं को अयोग्य घोषित कर, अंग्रेजी थोपी गई और थोपी जा रही है।दो सौ वर्षो के पूरे प्रयत्नों के पश्चात अंग्रेजी जानने वालों की संख्या 5% से भी कम है। और विज्ञान जानने वालों की संख्या तो 1 प्रतिशत से भी कम! इसका एक भयंकर दुष्परिणाम यह है कि विज्ञान की खोजों तथा आविष्कार के लिये शेष 95 प्रतिशत आबादी का कोई योगदान नहीं! दूसरा दुष्परिणाम यह है कि वे एक प्रतिशत लोग भी अंग्रेजी द्वारा प्राप्त विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी को आत्मसात नहीं कर पाते हैं, जिसके फलस्वरूप वे विशेष उत्कृष्ट कार्य नहीं कर सकते। तीसरे, जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारण है, आविष्कार, खोज या रचनात्मक कार्यो का स्रोत संवेदनशील मन तथा बुद्धि होता है, मात्र तार्किक बुद्धि नहीं। मानव की रचनाशीलता उसकी संवेदनात्मक भाषा के द्वारा प्रस्फुटित होती है। रोटी के लिये सीखी गई विदेशी भाषा संवेदनात्मक भाषा नहीं होती। असल बात यह है कि व्यक्ति की मातृभाषा उसकी संवेदनात्मक भाषा तथा उसकी बौद्धिक भाषा दोनों होती है, अतएव उसकी मौलिक चिंतन एवं सृजन की भाषा होती है।अन्य भाषाएं, बौद्धिक भाषाएं हो सकती है संवेदनात्मक बहुत कम। भारत में हमने अंगे्रजी के मोह में अपनी मातृभाषा की उपेक्षा की और परिणामतः मौलिकता तथा सृजनशक्ति ने हमारी अवहेलना की। मुख्यतया इसीलिए, हम विश्व की विज्ञान – प्रौद्योगिकी दौड़ में तथा मौलिक चिंतन एवं सृजन कार्यो में पीछे रह गये हैं। आज समृद्धि तथा सम्मान के लिये प्रौद्योगिकी तथा विज्ञान में अग्रणी रहना अनिवार्य है। जब जापान जैसा छोटा देश, विशाल चीन देश, कोरिया, इजराइल समुन्नत देश अपनी – भाषाओं में सारे कार्य सम्मानपूर्वक कर रहे हैं। तब भारत भी कर सकता है, बशर्ते वह अपनी भाषाओ को उचित महत्व दे।

भारत में विज्ञान शिक्षित लोगो में भी अंधविश्वास, निराधार भय तथा कुतर्क देखने मिलते है। भारतीयों को तथ्यों की जानकारी अच्छी होती है, किन्तु उनकी वैज्ञानिक समझ कमजोर ही रहती है। क्योंकि अंग्रेजी में विज्ञान पढ़ने में उनका ध्यान विदेशी पदों को रटने में ज्यादा रहता है न कि वैज्ञानिक अवधारणाओं को समझने में। बंगाल में बीसवीं सदी के प्रारंभ में वहां के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रौफेसर अपने विद्यार्थियों को विज्ञान बांग्ला तथा अंग्रेजी दोनो भाषाओं में समझाते थे, सम्भवतः इसीलिये उनके शिष्यों ने विज्ञान में नाम कमाया। साफ्टवेयर की भाषा प्रमुखतः गणित है, इसीलिये भारतीय भी इसमें नाम कमा रहे हेै, यद्यपि द्वितीय स्तर के कार्य में, मूल शोध में कम।

उपरोक्त चर्चा के आधार पर कुछ निष्कर्ष प्रस्तुत है –

(1) सांस्कृतिक रूप से गरीब देश में रोटी की भाषा ही राजभाषा हो सकती है; अंग्रेजी रोटी की भाषा है।

(2) राजभाषा, यदि वह विदेशी हो, अंततः राष्ट्रभाषा हो जाती है, और मूल राष्ट्रभाषाएं क्षीण हो जाती हैं।

(3) यदि किसी देश में मुख्तया दो समुदाय हों – एक श्रेष्ठता ग्रंथि से पीड़ित, तथा दूसरा हीनता ग्रंथि से, तब ‘श्रेष्ठता – पीड़ित’ समुदाय की संस्कृति तथा भाषा ‘हीनता–पीडित’ समुदाय की संस्कृति तथा भाषा पर हावी हो जाती है।अंग्रेजी भाषा वाले अपने को श्रेष्ठ मानते ही हैं, भारतीय भाषा वाले भी अंगे्रजी वालों को श्रेष्ठ मानते हैं। अतएव…………

(4) जब दो विल्लीयां लड़ती हैं तथा न्याय के लिये बन्दर के पास जाती है तब सारा लाभ बन्दर को खुशी –खुशी मिल जाता है। आज अधिकांश भारतीय भाषाएं अंग्रेजी से ही न्याय चाहती है। अतएव………

(5) विज्ञान और प्रौद्योगिकी में सम्मुन्त देश की संस्कृति ओैर भाषा अन्य कमजोर देशों की संस्कृति तथा भाषा पर हावी हो जाती है।अत: अंग्रेजी तथा पाश्चात्य संस्कृति भारत की भाषा और संस्कृति पर हावी हैं।

(6) ‘क्या भारतीय भाषाओं का भविष्य निराशापूर्ण है, विशेषकर कि जब आज की खुले बाजार की नीति में सर्वाधिक प्रभावी शस्त्र है ‘आर्थिक तथा भाषाई साम्राज्य’!!

प्रौद्योगिक समाज में जो संस्कृति व्यवहार में होना चाहिए भारत में वह नहीं है, यथा, इंजीनियरों एवं मिस्त्रयों को अपने निर्माण तथा रखरखाव में गर्व नहीं है। यदि होता तो सडकें गड्ढों से भरी न होतीं, बिजली चाहें जब गुल न हो जाती; टेलीफोन अपनी मर्जी से चाहे जब सो न जाते, पीने के पानी के लिए घर–घर जल शोधक न लगाने पड़ते, हमारे परमाण्विकी जनित्र महीनों खराब न पडे. रहते, इत्यादि। यह मात्र भ्रष्ट चरित्र की बात नहीं है, वास्तव में इंजीनियरों तथा मिस्त्रियों को अपने कार्य की गुणवता पर गर्व नहीं है, और उनमें सहकारिता तथा सहयोग की कमी है। इन गुणों की कमी से सारा प्रौद्योगिक वातावरण व्यर्थ के खर्च, अदक्षता तथा प्रदूषण से आप्लावित है जब तक यह वातावरण ‘सुसंस्कृत’ नहीं होता, जिसे करने के लिए किसी भी विदेश की उच्च प्रौद्योगिकी के आयात की आवश्यकता नहीं है, तब तक हम वास्तव में प्रौद्योगिकी के इन क्षेत्रों में अग्रिम पंक्ति में नही हो सकते।

कर्म कौशल, कर्म निष्ठा, सहयोग, आत्मसम्मान वाली औद्योगिक संस्कृति यूरोप तथा अमेरिका में है। जब हमने सारे विज्ञान – प्रौद्योगिकी की शिक्षा अंगे्रजी माध्यम के द्वारा प्राप्त की तब हमने इस प्रौद्यौगिक संस्कृति को क्यों नहीं सीखा? विदेशी भाषा से जो संस्कृति हम सीखते हैं वह अनेक कारणों से गड्डमड्ड रहती है। एक तो उस भाषा को सीखने का हमारा ध्येय नौकरी –पेशा होता है। दूसरे, विदेशी भाषा हम खंडों में बाटंकर सीखते हैं तथा मुख्यतया एक या दो खंडो में ही सीमित रखते हैं। मातृभाषा में सीखने पर विभिन्न खंडो के बीच वह अभेद्य दीवार नहीं रहती जो विदेशी भाषा सीखने पर रहती हैं। अतएव विदेशी भाषा से हम संस्कृति की सीख खंड– खंड में लेते हैं। तीसरे, विदेशी भाषा के वे खंड जो संस्कृति शिक्षा प्रदान करते हैं या तो सिखाए नहीं जाते या नौकरी–पेशा इच्छुक विद्यार्थी उनकी तरफ ध्यान नहीं देते।

उपरोक्त चर्चा से कुछ ध्येय स्पष्टतः उभरते हैः

(1) भारत को यदि सम्मान से जीना है तो उसे विज्ञान – प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अग्रिम पंक्ति में आना पडे.गा। और आवश्यक है कि उसकी गड्डमड्ड संस्कृति के स्थान पर एक समेकित भारतीय संस्कृति जीवंत रूप में आए।

(2) उपरोक्तउदृेश्यों को प्राप्त करने के लिए प्रदेशों की अपनी भाषाओं में ही मुख्य शिक्षा हो।

(3) अंग्रेजी की शिक्षा उतनी ही दी जाए जितनी एक विदेशी भाषा की उपयोगिता को देखते हुए आवश्यक है। अंग्रेजी को रोटी के लिए कतई आवश्यक न बनाया जाए।

(4) अंग्रेजी का स्थान हिन्दी को नहीं लेना है क्योंकि अंग्रेजी तो आधिपत्य जमाने वाले सिंहासन पर बैठी है।

(5) सारे प्रदेशों का परस्पर संपर्क सध सके, उतनी ही हिन्दी की शिक्षा दी जाए। त्रिभाषी सूत्र अपनाया जाए।

(6) एक सशक्त अनुवाद–सेना तैयार की जाए।

(7) सांस्कृतिक शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाए ताकि भ्रष्टाचार का उन्मूलन किया जा सके।

जब संविधान में हिन्दी को राष्ट्रभाषा तथा सम्पर्क भाषा बनाने का आदेश है, तथा क्षेत्रीय भाषाओं को अपने क्षेत्रों में राजकाज करने का आदेश है, और हिन्दी तथा क्षेत्रीय भाषाओं में अपना कार्य करने की पूरी क्षमता है, तब सौहार्द तथा त्याग से यह कार्य हो सकता है। यह आपसी प्रेम की भावना पर तथा अपने–देश प्रेम पर निर्भर करता है हमारे राष्ट्र में मूलभूत रूप से सांस्कृतिक एकता है। हमारी मूल संस्कृति ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ वाली संस्कृति है। हमारे साहित्य में एकता है। हम संकीर्ण राजनैतिक स्वार्थो के ऊपर उठ सकते है। हमारी प्रमुख भाषाओं में अधुनातम विज्ञान –प्रौद्योगिकी को अभिव्यक्त करने की शक्ति है। भारत में न केवल विश्व–शक्ति बनने की क्षमता है वरन विश्व को भोगवाद के राक्षस से बचाने की क्षमता है। जय हिंदी, जय भारतीय भाषाएं, जय भारतीय संस्कृति!

-विश्वमोहन तिवारी, एयर वाइस मार्शल (से.नि.)

Leave a Reply

3 Comments on "भाषा और संस्कृति : भारतीय जीवन का संदर्भ"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
Vishwa Mohan Tiwari
Guest

मेरा नया ई मेल पता लिख लें
पुराना तो ‘हैक’ कर लिया गया।
शुभ कामनाएं

विश्‍वमोहन तिवारी
Guest

शैलेन्द्र कुमार जी ‘
आपका धन्यवाद्.
आपने ठीक कहा कि आपको भारतीय होने के लिये किसी उत्प्रेरक की ज़रूरत नहीं, यह तो आपके सच्चे अर्थों में भारतीयता में ‘संस्कारित होने’ को दर्शाता है।
किन्तु आज तो अनेक लोगों को भारतीयता पर जब गर्व होता है जब वे कोई क्रिकैट् मैच् जीतते हैं, या ‘स्लमडाग’ देखते हैं। यह तो उथला गर्व है, सतही गर्व है।
सही गर्व के लिये अपनी सच्ची धरोहर तथा संस्कृति का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है।
आज तो लोगों को क्षुद्रताओं में व्यस्त रखा जाता है. और वे उसी में खुश रहते हैं, यही तो विडम्बना है

शैलेन्‍द्र कुमार
Guest

आपने तो मंत्रमुग्ध कर दिया वैसे मुझे अपने भारतीय होने पर गर्व करने के लिए किसी उत्प्रेरक की जरूरत नहीं है लेकिन आपने तो मन के अन्दर नए संकल्पों को जन्म दे दिया आपको बहुत बहुत धन्यवाद

wpDiscuz