लेखक परिचय

सुधा सिंह

सुधा सिंह

विजिटिंग प्रोफेसर, ओरिएंटल लैंग्वेज डिपार्टमेंट, इंस्टीट्यूट ऑफ वर्ल्ड लैंग्वेज, तुर्कमेनिस्तान.

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भाषा का प्रयोग और भाषिक संकल्पनाएं वर्गाधारित रही हैं। भाषा को लेकर जितनी भी धारणाएं है उन सबमें एक आम राय है कि भाषा निरपेक्ष नहीं होती। बोलना कभी भी निरपेक्ष नहीं रहा है। भाषिक व्यवहार उदासीनता का व्यवहार नहीं हुआ करता न, ही भाषा केवल सम्प्रेषण का माध्यम है। भाषा की भूमिका इससे कहीं बड़ी है। भाषा वर्चस्व के संबंधों के सम्प्रेषण का भी माध्यम है। ये वर्चस्व के संबंध वर्ग, लिंग, नस्ल, राष्ट्र आदि कई स्तरों पर अभिव्यक्त होते हैं। इसी कारण विश्व की प्रत्येक भाषा में साहित्य के आरंभिक झगड़े भाषा के झगड़े हैं। और ऐसा भी नहीं है कि ये झगड़े अंतिम निष्कर्ष पर पहुँच चुके हों बल्कि किसी भी नए विचार के संदर्भ में भाषा का विवाद उठ खड़ा होता है। वह विचार साहित्यिक हो, सांस्कृतिक या राजनीतिक सभी का निपटारा भाषा के अंतर्गत होता है।

भाषा को लेकर मार्क्स की धारणा है कि भाषा अधिरचना का हिस्सा होती है। उसमें परिवर्तन तब होता है जब आधार में परिवर्तन होता है। आधार की तुलना में यह परिवर्तन धीमी गति से होता है। भाषा में वर्ग का सवाल तब महत्वपूर्ण हुआ जब एंगेल्स ने भाषा के सामाजिक आधार को खोजने की बात की। उसने कहा कि परिवार में पत्नी सर्वहारा होती है और पति पूँजीपति। संसार का सबसे पहला वर्गविभाजन स्त्री- पुरुष के बीच होता है। एंगेल्स ने लिखा, ”आधुनिक वैयक्तिक परिवार नारी की खुली या छिपी हुई घरेलू दासता पर आधारित है। और आधुनिक समाज वह समवाय है जो वैयक्तिक परिवारों के अणुओं से मिलकर बना है। …….परिवार में पति बुर्जुआ होता है और पत्नी सर्वहारा की स्थिति में होती है।”

एंगेल्स ने सामाजिक विकास की व्याख्या करते हुए इस बात की तरफ ध्यान खींचा कि सामाजिक व्यवस्था मातृसत्ता से पितृसत्ता की तरफ गई। यह इतिहास की एक बड़ी घटना है। इतना बड़ा परिवर्तन सहज ही नहीं घटा होगा। लेकिन यह बिना खून-खराबे के घट गया। इसका कारण संपत्ति का एकत्रीकरण था। ”जैसे-जैसे संपत्ति बढ़ती गई, वैसे-वैसे इसके कारण एक ओर तो परिवार की तुलना में पुरुष का दर्जा ज्यादा महत्वपूर्ण होता गया, और दूसरी ओर पुरुष के मन में यह इच्छा जोर पकड़ती गई कि अपनी पहले से मजबूत स्थिति का फायदा उठाकर उत्तराधिकार की पुरानी प्रथा को उलट दिया जाए, ताकि उसके बच्चे हक़दार हो सकें। परंतु जब तक मातृसत्ता के अनुसार वंश चल रहा था, तब तक ऐसा करना असंभव था। इसके लिए आवश्यक था कि मातृसत्ता को उलट दिया जाए, और ऐसा किया भी गया। ……यह पूर्णत: प्रागैतिहासिक काल की बात है। यह क्रांति सभ्य जनगण में कब और कैसे हुई इसके बारे में हम कुछ नहीं जानते पर यह क्रांति वास्तव में हुई थी।”

”मातृसत्ता का विनाश नारी जाति की विश्व ऐतिहासिक महत्व की पराजय थी। अब घर के अंदर भी पुरूष ने अपना आधिपत्य जमा लिया। नारी पदच्युत कर दी गई। वह जकड़ दी गई। वह पुरुष की वासना की दासी, संतान उत्पन्न करने का यंत्र बनकर रह गई।”

समाज में स्त्री की मातहत अवस्था और उसके ऐतिहासिक कारणों पर विचार करते हुए मार्क्स ने लिखा कि ”आधुनिक परिवार में न केवल दासप्रथा बल्कि भूदास-प्रथा भी बीज-रूप में निहित है, क्योंकि परिवार का संबंध शुरु से ही खेती के काम-धंधे से रहा है। लघु रूप में इसमें वे तमाम विरोध मौजूद रहते हैं जो आगे चलकर समाज में और उसके राज्य में बड़े व्यापक रूप से विकसित होते है।”

भाषा की उत्पत्ति सामूहिक श्रम के दौरान होती है। भाषा के वर्गीय आधार से पहले भाषा का लिंगीय आधार तैयार किया गया। मार्क्स-एंगेल्स ने लिखा है कि संतानोत्पत्ति के लिए पुरुष और नारी के बीच श्रम-विभाजन ही पहला श्रम-विभाजन है। एंगेल्स ने इसमें जोड़ते हुए लिखा कि इतिहास में पहला वर्ग-विरोध, एकनिष्ठ विवाह के अंर्तगत पुरुष और नारी के विरोध के विकास के साथ-साथ और इतिहास का पहला वर्ग-उत्पीड़न पुरुष द्वारा नारी के उत्पीड़न के साथ-साथ प्रगट होता है।

मार्क्स के अनुसार भाषा अधिरचना है और वर्ग के द्वारा निर्मित होती है। इस तरह से एक वर्ग अपनी भाषा को दूसरे पर लाद सकता है और एक भाषा गायब हो सकती है यदि इसका व्यवहारकर्ता वर्ग गायब हो जाए। या इसका इस्तेमाल न करे। यही कारण है कि सामाजिक और आर्थिक क्रांति के कारण भाषा के विकास में बड़ी-बड़ी दरारें हैं, तोड़-मरोड़ हैं। मार्क्स के भाषा-चिंतन को पार्टी के आधिकारिक नजरिए का दर्जा मिला लेकिन 1950 में स्टालिन ने भाषा पर मार्क्स से भिन्न राय रखी और बहस की दिशा बदली। स्टालिन ने भाषा को अधिरचना मानने से इंकार कर दिया साथ ही वर्ग-भाषा के सिध्दान्त को भी अस्वीकार किया। इसके पीछे तात्कालिक राजनीतिक कारण सोवियत संघ का एकीकरण था।

मार्क्स और स्टालिन की भाषा-संबंधी धारणाओं के पीछे जो भी कारण रहा हो लेकिन दोनों भाषा के संबंध में गलत निष्कर्षों का शिकार हुए। भाषा के सार्वजनीन या राष्ट्रीय आधारों की खोज और वर्ग-भाषा की स्वीकृति-अस्वीकृति के क्रम में दोनों ही भ्रांति के शिकार हुए हैं। भाषा विज्ञान के उन्नत सिध्दान्तों और पध्दतियों के आधार पर आज ज्यादा बेहतर निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। स्त्रीवादी चिंतकों ने मार्क्स-स्टालिन के भाषाविज्ञान संबंधी निष्कर्षों को चुनौती देते हुए साबित किया है कि दोनों ने भाषा और इसके भाषिक व्यवहार में विरोध को बिल्कुल कम करके देखा गया है।

प्रत्येक मस्तिष्क में एक व्याकरणिक व्यवस्था होती है- यह सॉस्यूर की धारणा है। बातचीत के विविध तरीकों जो कि प्रयोक्ता के भाषिक ज्ञान का प्रकार्य हैं साथ ही कुछ व्यक्तिगत कारक जैसे स्मृति, ध्यान, आवेग आदि और भाषिक तथा स्थितिगत संदर्भ जिसमें वाक् उत्पन्न होता है इन सब को ध्यान में रखकर ही भाषा के सार्वजनीन आधार और वर्गभाषा के होने के बारे में बात की जा सकती है।

नॉम चॉमस्की के अनुसार सार्वजनीन की समस्या को हमेशा सतह और गहराई दोनों बनावटों में देखा जाना चाहिए केवल शाब्दिक आधार पर नहीं।

भाषा का वर्ग होता है कि नहीं होता इस बहस का केन्द्र शब्द और वाक्य विन्यास में अतिशयोक्तिमूलक दूरी है। स्टालिन ने माना कि ‘वर्ग-बोलियाँ’ और ‘वर्ग जार्गन’ शाब्दिक विशेषताओं के कारण होते हैं लेकिन इसे वह विशिष्ट भाषा, बुर्जुआ की भाषा, सर्वहारा या किसान की भाषा मानने से इंकार करता है। इन बोलियों का न तो अपना कोई व्याकरण होता है न ही कोई वाक्य विन्यास वे इसे राष्ट्र-भाषा से उधार लेते हैं। इसके विपरीत मार्क्स की धारणा है कि चाहे बुर्जुआजी कहें चाहे सर्वहारा कहें, वर्ग-व्याकरण होता है और वह सार्वजनीन शब्दों के प्रयोग पर टिका होता है जो सामाजिक आर्थिक संरचना के अनुसार होता है। यदि यह माने कि विमर्श का उत्पादन भाषा का प्रकार्य है और इसमें भेजनेवाले, संदर्भित वस्तु और प्राप्तकर्ता का संदर्भ अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

मज़दूर वर्ग के द्वारा सहज रूप से बनाये गए वाक्य और मध्यवर्ग के द्वारा बनाए गए वाक्य में फ़र्क हो जाता है। यह देखा गया है कि दोनों की भाषा में शाब्दिक विशिष्ट्ताएं भिन्न हैं, शब्द चयन में अंतर है। सबसे ज्यादा उल्लेखनीय है शब्दावली का अंतर। उच्चारण की विविध शैलियाँ आसानी से अलगायी जा सकती हैं। कई ऐसी भिन्नताएं मिलती हैं जिनके आधार पर वर्ग भाषा को परिभाषित किया जा सकता है बजाए शब्दों के आधार पर करने के। शब्द की व्याख्या भी वाक्यगत और अर्थगत विश्लेषण की मांग करती है।

मज़दूर वर्ग की भाषा का अध्ययन करने पर पता चलता है कि विषय का संज्ञा रूप अमूमन ‘मैं’, ‘हम’, ‘कोई’ आदि होता है जो कि संदेश देनेवाले विषय और पैदा किए गए वक्तव्य के बीच कम-से कम अंतर का आभास देता है। संज्ञा के लिए अन्य पद सजीव, चल रूप होते हैं या विशिष्ट जड़ रूप। क्रिया-रूप प्राय: प्रक्रिया या कार्यरूप में होते हैं जिसमें करना महत्वपूर्ण होता है। रूपान्तरण की प्रक्रिया और चयन किए गए क्रियारूप वर्तमान अथवा अतीत में ‘नरैटिव’ के प्रचलन को दिखाते हैं। वस्तु के संज्ञा रूप में सजीव और विशिष्ट ठोस जड़ की प्रमुखता होती है।

मज़दूर वर्ग के लिए काम भाषा में उपस्थित नहीं होता बल्कि वह वक्ता के साथ ही संलग्न होता है जिसको भाषा में शाब्दिक अनुवाद के जरिए नहीं लाया जा सकता। मध्यवर्ग के लिए भाषा स्वयं में उत्पादन का औजार है जिसमें इसका मैनिपुलेशन व्याकरण और सैद्धान्तिक अवधारणाओं को जन्म दे सकता है साथ ही विचारधाराओं को भी; विचारधाराएं जो आर्थिक उत्पादन के तंत्र पर नियंत्रण के लिए आवश्यक साधन हैं। सवाल उठता है कि तात्कालिक अनुभव पर आधारित विमर्श और सामाजिक-सांस्कृतिक माध्यमों का निर्माण करनेवाले विमर्श में क्या अंतर है ? लुइस ईरीगरी का मानना है कि वक्तृता के इन दोनों ढंगों में प्रस्तुति के तरीके और विमर्श के वास्तविक उद्देश्य के बीच दूरी है। एक मामले में काम या काम का नरैटिव ‘संसार’ में लाया जाता है तो दूसरे में भाषा का मैनिपुलेशन भाषिक ‘वस्तु’ को अन्य में परिभाषित करने के लिए किया जाता है। वक्तृता के ये विविध प्रकार्य इस बात से तय होते हैं कि उत्तर देनेवाले के काम का सामाजिक महत्व क्या है?

चूँकि श्रम का महत्व हमारे समाज में घटता गया है, इस कारण मेहनतकशों की भाषा शैली ,उनके शब्द-भंडार हेय दृष्टि से देखे जाने लगे। मजदूरों की भाषा , स्त्रियों की भाषा के प्रति जो धारणाएं प्रचलित हैं उनका उत्स यही चालाकी भरी घृणा और उपेक्षा का भाव है जिसमें अपने वर्चस्व की चिंता सर्वोपरि है। यह एकदम सच है कि शोषक वर्ग हमेशा से अपने हितों के संरक्षण के लिए एक रहा है। विचारों के उत्पादन के क्षेत्र में भी यह सच है। मजदूर वर्ग की बोली के लिए अशिक्षित, गंवारू, ग्राम्य बोली की संज्ञा देना; मज़दूर नेता चीख-चीखकर भाषण देते हैं अत: चीख-चीखकर बोलना गंवारपन की निशानी है। असभ्यों की शैली है। क्रोध में भी गंभीर ढंग से बोलना, स्वर धीमा रखना, भावहीन ढंग से लगभग रोबोट की तरह बोलना- सभ्य शैली है।

आजकल जो तमाम एटीकेट सिखाने वाली संस्थाएं हैं वे काँटा-छुरी कैसे पकड़ें के साथ यह भी सिखाती हैं कि बातचीत में कैसे स्वर का प्रयोग करें, अपने से उच्च अधिकारी से बात कर रहें हों तो आपके हाव-भाव ,निगाहें कहाँ हों, इसी तरह से स्त्रियों के मामले में कि उनकी बातचीत सभाओं, गोष्ठियों में किस तरह की हो, कैसे मिश्रित समूह में बात करते समय उनकी भूमिका फैसिलिटेटर की होनी चाहिए। उन्हें सर्पोटिव ढंग से बातचीत में पहल करनी चाहिए, कोई असुविधाजनक स्थिति पैदा करनेवाली या सवाल उठानेवाली भाषा से बचना चाहिए। उनकी भाषा कुल मिलकर ‘यस बॉस’ की भाषा होनी चाहिए।

-सुधा सिंह

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