लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

Posted On by &filed under आलोचना.


जगदीश्वर चतुर्वेदी

हिंदी साहित्य का प्रचलित इतिहास अधूरा है। रामचन्द्र शुक्ल का इतिहास हो या हजारीप्रसाद द्विवेदी का लिखा इतिहास हो। इन दोनों में अधूरापन साफ नजर आता है। इसके बाबजूद छात्रों को हम यही पढ़ाते हैं कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मुकम्मल इतिहास लिखा था। इतिहास के अधूरेपन का पहला प्रमाण है इसमें स्त्री और दलित साहित्य की अनुपस्थिति। दूसरा बड़ा कारण है अपडेटिंग की परंपरा का अभाव। हिंदी में इतिहास की अपडेटिंग क्यों बंद है , इसका कोई संतोषजनक उत्तर आलोचना के पास नहीं है। वैसे हमारे आलोचक यह समझाते हैं कि आलोचना में जो कुछ लिखा जा रहा है वह इतिहास का अंग है। इन सबसे पूछा जाना चाहिए कि आलोचना को इतिहास में बदल दें तो इतिहास कैसा लगेगा ? यह भी सवाल किया जाना चाहिए कि जब आलोचना लिखी जा रही है तो फिर इतिहास की अलग से क्या जरूरत है ?

इसके अलावा जो इतिहास की अपडेटिंग कर सकते थे (रामविलास शर्मा,नामवर सिंह,नगेन्द्र आदि) वे आलोचना लिखने और बोलने में व्यस्त रहे। इससे भी इतिहास की अपडेटिंग का काम पिछड़ गया। इतिहास की गंभीर उपेक्षा हुई है। हमने आलोचना से इतिहास की क्षतिपूर्ति करने की कोशिश की है लेकिन इससे इतिहास नहीं बनता। इतिहास और आलोचना दो अलग विधा रूप हैं और हमें इनकी स्वायत्तता की रक्षा करनी चाहिए। इतिहास और आलोचना में अन्तस्संबंध है। लेकिन इसमें एक की कीमत पर दूसरे की उपेक्षा नहीं की जा सकती। इतिहास को आलोचना में संकुचित नहीं किया जा सकता।

मसलन् यह सवाल उठता है कि नामी समीक्षकों ने हिंदी साहित्य का इतिहास क्यों नहीं लिखा ? विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की मदद से अनेक विश्वविद्यालयों को इतिहासलेखन के लिए लाखों रूपये की अनुदान राशि मिली है लेकिन इतिहास सामने नहीं आया। इतिहास के नाम पर साहित्यिक थेगड़ियों का प्रकाशन हुआ है। हिंदी का सफेद हाथी केन्द्रीय हिंदी संस्थान भी है ,जिसका बजट करोड़ों में है। वहां से हिंदी साहित्य का अपडेटेड इतिहास क्यों नहीं आया ? साहित्य के इतिहासकारों के रूप में इन संस्थानों में कोई ख्यातिलब्ध इतिहाकार-शिक्षक क्यों नहीं है ? हिंदी के प्रोफेसर शोधकार्यों से चिढ़ते और भागते क्यों हैं ? वे इन संस्थानों में अच्छे रिसर्चरों की टीम पैदा क्यों नहीं कर पाए ? हिंदी में शोध प्रविधि पर एक भी लिखी किताब क्यों नहीं है ? विश्वविद्यालय शिक्षक अपने शोधार्धियों के शोध का कभी अपने लेखन में जिक्र और विवेचन क्यों नहीं करते ? नामी प्रोफेसरों ने अपने निर्देशन में हुई या अन्य के निर्देशन में हुई शोधों का कभी अपने आलोचना लेखन में जिक्र क्यों नहीं किया ? आदि सवाल हिंदी अध्यापन और इतिहास के प्रति हमारे नजरिए से जुड़े हैं।

सवाल यह है हम किस तरह के हिंदी विभाग बनाना चाहते हैं ? इससे तय होगा कि हम किस तरह का इतिहास पढ़ाना चाहते हैं। किस तरह की आलोचना लिखना चाहते हैं। हमें गंभीरता के साथ यह भी सोचना चाहिए कि हमारे आलोचकों ने आलोचना में अब तक कोई नई मौलिक धारणा का सृजन क्यों नहीं किया। समूची परंपरा ने विश्वसमीक्षा में कौन सी नई अवधारणा को जोड़ा है ? विश्व में आज भी भरत के नाट्यशास्त्र से लेकर संस्कृत काव्यशास्त्र के विभिन्न स्कूलों का किसी न किसी रूप में जिक्र मिलेगा। लेकिन आधुनिक हिंदी आलोचना का कहीं कोई नामोल्लेख नहीं मिलेगा। यानी आलोचना में मौलिक सैद्धांतिकी के सृजन में हमें सफलता क्यों नहीं मिली ? ये कुछ सवाल हैं जो हमें परेशान करते हैं। हमें गंभीरता के साथ आलोचनात्मक ढ़ंग से इन सवालों पर विचार करना चाहिए।

शोध और इतिहास-

हिन्दी में शोध की उपेक्षा का प्रधान कारण है खोज के प्रति एडवेंचर का अभाव,नए के प्रति अनास्था, परजीवीपन, इतिहास और आलोचना का शोध के साथ अलगाव, शिक्षकों में स्वयं नए के प्रति खोज की मानसिकता का अभाव, वर्तमान समय को न जानने की प्रवृत्ति ,स्वयं को बड़ा दिखाने की प्रवृत्ति और अन्य को छोटा दिखाने की मानसिकता। इन सबसे बड़ा कारण है शिक्षक-आलोचक का यह मानना कि सब कुछ महत्वपूर्ण तो पहले वाले इतिहासकार कह गए हैं ,अब उसमें नया कुछ भी जोड़ा नहीं जा सकता।

रामचन्द्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने जो लिखा है वह पत्थर की लकीर है।नामवर ने जो कहा है वह स्वर्णाक्षर में लिखा जाने योग्य है।मुक्तिबोध ने जो लिख दिया है उसे प्रणाम करके स्वीकार करो।इन सबके अलावा जो लोग लिख रहे हैं उसमें नया कुछ भी नहीं है।इस तरह की मानसिकता हमारे साहित्यिक और अकादमिक परिदृश्य के पतन की द्योतक है।

सवाल उठता है रामचन्द्र शुक्ल को पत्थर की लकीर या रूढि क्यों बनाया गया ? इस तरह के रूढिवाद को किसने जन्म दिया ? असल में यह एक खास किस्म का सामंतवाद है जो हिन्दी में पैदा हुआ है। इसकी जड़ें बड़ी गहरी हैं। यह नए से डरता है,विचारों का जोखिम उठाने से डरता है।साहित्य सैद्धान्तिकी से डरता है।अन्य से सीखने और स्वयं को उससे समृद्ध करने में अपनी हेटी समझता है।स्वयं दूसरों का चुराता है और उसे मौलिकता के नाम पर परोसता है।साहित्य को अनुशासन के रूप में पढ़ने पढ़ाने में इसकी एकदम दिलचस्पी नहीं है।

आज वास्तविकता यह है कि ज्यादातर शिक्षक और समीक्षक आजीविका और थोथी प्रशंसा पाने के चक्कर में रहते हैं। वे किसी भी चीज को लेकर बेचैन नहीं होते। उनके अंदर कोई सवाल पैदा नहीं होते। एक नागरिक के नाते उनके अंदर वर्तमान की विभीषिकाओं को गहराई में जाकर जानने की इच्छा पैदा नहीं होती।वे पूरी तरह अतीत की रेती के टीले में सिर गडाए बैठे हैं।वे न तो कुछ सुनते और न कुछ देखते हैं। वे न तो कुछ सीखते और न कुछ सिखाते हैं। ऐसे ही शिक्षक-समीक्षक हमारे आराध्य बने हुए हैं।अन्नदाता हैं।नौकरी दिलाने वाले हैं। डिग्री दिलाने वाले हैं।ऐसे में हिन्दी अनुसंधान का भविष्य और वर्तमान आशाविहीन नजर आता है तो कोई आश्चर्य नहीं है। क्योंकि जिन पर हमने आशाएं टिकायी हुई हैं,वे इस लायक नहीं हैं कि किसी को आशान्वित कर सकें। ऐसे शिक्षक-आलोचक बड़े पद हासिल कर सकते हैं।नौकरियां दिला सकते हैं।लेकिन हिन्दी को ज्ञानसंपन्न नहीं कर सकते। हिन्दी प्रोफेसरों की ज्ञान विपन्नता का ही यह दुष्परिणाम है कि आज हमारे पास हिन्दी का सुसंगत रूप में लिखा मुकम्मल इतिहास तक उपलब्ध नहीं है।कल्पना कीजिए रामचन्द्र शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी ने आरंभिक कार्य न किया होता तो हम कितने गरीब होते ? इन दोनों इतिहासकारों की इतिहास कृतियां हिन्दी के विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए तैयार की गई थीं।

हिन्दी की सबसे बड़ी समस्या यह है कि शिक्षक और आलोचक अपने नियमित अभ्यास और ज्ञान विनिमय का अनुसंधान को अभी तक जरिया नहीं बना पाए है।वे पढ़ाने और बोलने को प्रथमकोटि का काम मानते हैं और शोध को दूसरे दर्जे का काम मानते हैं। वे वादानुवाद के लिए तो किसी कृति पर चर्चा करेंगे किन्तु उस कृति को इतिहास और आलोचना के इतिहास में शामिल करके विद्यार्थियों को लाभान्वित नहीं होने देते।इसका प्रधान कारण है हमारे हिन्दी विभागों का वर्तमान की वास्तविकता के साथ एकदम संबंध विच्छेद।हिन्दी विभागों के शिक्षकों और विद्यार्थियों को देखकर लगता नहीं है कि ये लोग इस युग के लोग हैं।वे जिस मासूमियत और अज्ञानता के साथ वर्तमान के साथ पेश आते हैं उसके कारण सारा माहौल और भी बिगड़ा है।विद्यार्थियों में मासूमियत और अज्ञानता को बनाए रखने में शिक्षकों की बड़ी भूमिका है।ये ऐसे शिक्षक हैं जो ज्ञान के आदान-प्रदान में एकदम विश्वास नहीं करते।वे ज्ञान को बांटने में नहीं ज्ञान को चुराने में सिद्धहस्त हैं।कायदे से शिक्षक को पारदर्शी, निर्भीक और ज्ञानपिपासु होना चाहिए।किन्तु हिन्दी विभागों में मामला एकदम उल्टा नजर आता है।हिन्दी के शिक्षक भोंदू ,आरामतलब, ज्ञान-विज्ञान की चिन्ताओं से दूर और दैनन्दिन जीवन की जोड़तोड़ में ही मशगूल रहते हैं। ऐसी अवस्था में हिन्दी का शोध और शिक्षा का गतिरोध खत्म नहीं हो सकता। शिक्षकों ने हिन्दी शोध के बारे में मिथ बनाए हैं और बड़े घटिया मिथ बनाए हैं, यह कहावत प्रचलन में है रिसर्च यानी चार किताब पढ़कर पांचवी किताब लिखना या फिर नकल।हमारे शिक्षकों ने कभी इस मिथ के खिलाफ मुहिम भी नहीं चलायी। बल्कि इस धारणा को तरह-तरह से पुष्ट करते रहते हैं।इसके विपरीत होता यह है कि यदि कोई शिक्षक निरंतर शोध कर रहा है या निरंतर लिख रहा है तो उसका उपहास उडाने में केरीकेचर बनाने में हमारे शिक्षक सबसे आगे होते हैं और कहते हुए मिलते हैं कि बड़ा कचरा लिख रहे हैं।हल्का लिख रहे हैं।यानी हमारे शिक्षकों को निरंतर लिखने वाले से खास तरह की एलर्जी है।वे यह भी कहते मिल जाते हैं कि फलां का लिखा अभी तक इसलिए नहीं पढ़ा गया या विवेचित नहीं हुआ क्योंकि जब तक उनकी एक किताब पढकर खत्म भी नहीं हो पाती है तब तक दूसरी आ जाती है।इस तरह के अनपढों के तर्क उसी समाज में स्वीकार किए जाते हैं जहां लिखना अच्छा नहीं माना जाता। जहां गंभीर लेखन के प्रति एलर्जी या उपेक्षा का भाव होता है वहीं पर ऐसी प्रतिक्रियाएं आती हैं।

हिन्दी में देश में सबसे ज्यादा अनुसंधान होते हैं।आजादी के बाद से लेकर अब तक कई लाख शोध प्रबंध हिन्दी में लिखे जा चुके हैं।एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष हिन्दी में 7हजार से ज्यादा थीसिस जमा होते हैं। हिन्दी में शोध की दशा को देखना हो तो हमें यह देखना चाहिए कि आलोचक वर्तमान के सवालों पर कितना समय खर्च कर रहे हैं। कितना लिख रहे हैं। रामविलास शर्मा, नगेन्द्र,नामवर सिंह,विद्यानिवास मिश्र, मैनेजर पांडेय,शिवकुमार मिश्र, कुंवरपाल सिंह , चन्द्रबलीसिंह ,परमानन्द श्रीवास्तव,नन्दकिशोर नवल आदि की पीढ़ी के आलोचकों ने कितना वर्तमान पर लिखा और कितना अतीत पर लिखा ? इसका यदि हिसाब फैलाया जाएगा तो अतीत का पलड़ा ही भारी नजर आएगा। ऐसे में हिन्दी के वर्तमान जगत की समस्याओं पर गौर कौन करेगा ? खासकर स्वातंत्र्योत्तर भारत की जटिलताओं का मूल्यांकन तो हमने कभी किया ही नहीं है।रामविलास शर्मा से लेकर नामवर सिंह तक के स्वातन्त्रयोत्तर भारत के बारे में अब तक के विवेचन से भारत कम से कम समझ में नहीं आता। हिन्दी क्षेत्र और हिन्दी साहित्य की जटिलताओं का आभास तक नहीं मिलता। हिन्दी से जुड़े अधिकांश जटिल सवालों की हमारी समीक्षा ने उपेक्षा की है। किसी भी साहित्यिक और सांस्कृतिक बहस को मुकम्मल नहीं बना पाए हैं।

हिन्दी में साहित्यिक बहसें विमर्श के एवं संवाद के लिए नहीं होतीं,बल्कि यह तो एक तरह का दंगल है,जिसमें डब्ल्यू डब्ल्यू फाइट चलती रहती है।हमने संवाद,विवाद और आलोचना के भी इच्छित मानक बना लिए हैं। इसे भी हम अनुशासन के रूप में नहीं चलाते।परंपरा के नाम पर जो विपुल सामग्री स्वातत्रंयोत्तर दौर में रची गयी है वह भी इच्छित तरीके से। उसमें भी हमने शोध के अनुशासन का पालन नही किया है। इसने हमारे हिन्दी के परजीवी शिक्षक को परंपरापूजक बना दिया है। हम भूल ही गए कि परंपरा पर इकहिरे ढ़ंग से विचार करने से एक खास किस्म का सांस्कृतिक माहौल बनता है। जिसमें वर्तमान तो उपेक्षित होता ही है स्त्री और दलित भी उपेक्षित होते हैं। यही वजह है कि दलित और स्त्री को परंपरा से सख्त नफरत है। वे परंपरा के नाम पर किए गए किसी भी किस्म के प्रयास को स्वीकार नहीं करते। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा परंपरा का इन दोनों से सीधा अंतर्विरोध।

परंपरा का मूल्यांकन करते हुए हमने सरलीकरण और साधारणीकरण से काम लिया है।परंपरा की इच्छित इमेज बनाई है।परंपरा की जटिलताओं को खोलने की बजाय परंपरा के वकील की तरह आलोचना का विकास किया है।परंपरा की इच्छित इमेज बनाने का सबसे अच्छा उदाहरण हैं रामविलास शर्मा का लेखन।इसमें वाद-विवाद और संवाद के लिए कोई जगह नहीं है। कुछ-कुछ यह भाव है हम बता रहे हैं और तुम मानो।

मजेदार बात यह है कि परंपरा का मूल्यांकन करते हुए जो लेखक परंपरा के पास गया वह परंपरा का ही होकर रह गया।परंपरा का मूल्यांकन करते हुए हमें बार-बार परंपरापूजक का बोध पैदा करने की कोशिश की गई। इसकी साहित्य में गंभीर प्रतिक्रिया हुई है लेखकों का एक तबका एकसिरे से परंपरा को अस्वीकार करता है। परंपरा पर बातें करना नहीं चाहता। खासकर प्रयोगवाद,नयीकविता और आधुनिकतावादी साहित्यकार के लिए परंपरा गैर महत्व की चीज है।

परंपरा के बारे में हमारे यहां तीन तरह के नजरिए प्रचलन में हैं।पहला नजरिया परंपरावादियों का है जो परंपरा की पूजा करते हैं।परंपरा में सब कुछ को स्वीकार करते हैं। दूसरा नजरिया प्रगतिशील आलोचकों का है जो परंपरा में अपने अनुकूल की खोज करते हैं और बाकी पर पर्दा डालते हैं।तीसरा नजरिया आधुनिकतावादियों का है जो परंपरा को एकसिरे से खारिज करते हैं। इन तीनों ही दृष्टियों में अधूरापन है और स्टीरियोटाईप है।परंपरा को इकहरे,एकरेखीय क्रम में नहीं पढ़ा जाना चाहिए।परंपरा का समग्रता में जटिलता के साथ मूल्यांकन किया जाना चाहिए।परंपरा में त्यागने और चुनने का भाव उत्तर आधुनिक भाव है।यह भाव प्रगतिशील आलोचकों में खूब पाया जाता है। परंपरा में किसी चीज को चुनकर आधुनिक नहीं बनाया जा सकता।नया नहीं बनाया जा सकता।परंपरा के पास हम इसलिए जाते हैं कि अपने वर्तमान को समझ सकें वर्तमान की पृष्ठभूमि को जान सकें।हम यहां तक कैसे पहुँचे यह जान सकें।परंपरा के पास हम परंपरा को जिन्दा करने के लिए नहीं जाते। परंपरा को यदि हम प्रासंगिक बनाएंगे तो परंपरा को जिन्दा कर रहे होंगे।

परंपरा को प्रासंगिक नहीं बनाया जा सकता।परंपरा के जो लक्षण हमें आज किसी भी चीज में दिखाई दे रहे हैं तो वे मूलत: आधुनिक के लक्षण हैं नए के लक्षण हैं।नया तब ही पैदा होता है जब पुराना नष्ट हो जाता है। परंपरा में निरंतरता होती है जो वर्तमान में समाहित होकर प्रवाहित होती है वह आधुनिक का अंग है।वर्तमान का रूप है,उसका हिस्सा है।

साहित्य के लिए परंपरा का जो अर्थ है वही अर्थ ‘दलित साहित्य’ और ‘स्त्री साहित्य’ के लिए नहीं है।साहित्य की परंपरा इतिहास के साथ ‘दलित साहित्य’ और ‘स्त्री साहित्य’ का सीधा अन्तर्विरोध है।यह अंतर्विरोध कैसे खत्म हो इस पर हमने कभी विचार नहीं किया।समग्रता में देखें तो ‘परंपरा’ वर्चस्वशाली ताकतों का हथियार रही है। वर्चस्व स्थापित करने का माध्यम रही है।यही वजह है कि वंचितों ने हमेशा परंपरा को चुनौती दी है। उसे अस्वीकार किया है।यही स्थिति कमोबेश इतिहास की भी है। वंचितों ने इतिहास को भी चुनौती दी है। परम्परा और इतिहास के जितने भी मूल्यांकन हमारे सामने हैं वे दलित और स्त्री को सही नजरिए से देखने में मदद नहीं करते।बल्कि इसके उलट सही नजरिए से देखने में बाधा देते हैं।

वर्चस्वशाली ताकतों की सेवा में साहित्य का इतिहास तब तक सेवा करता है जब तक उसे चुनौती नहीं मिलती। आजकल जमाना बदल चुका है। बदले जमाने की हवा वर्चस्वशाली ताकतों और उनके विचारकों के लिए सिरदर्द बन गयी है। वंचितों के वैचारिक और सामाजिक दबाव का ही सुफल है कि आज आलोचना के किसी एक स्कूल के आधार पर मूल्यांकन करने की बजाय अन्तर्विषयवर्ती समीक्षा पद्धति का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग हो रहा है। हिन्दी में इस पद्धति का चलन काफी धीमी गति से हो रहा है।

हिन्दी आनुसंधान की सबसे बड़ी बाधा है उसका आलोचक और आलोचना से संबंध विच्छेद। अनुसंधान और आलोचना में किसी भी किस्म का संपर्क ,संबंध और संवाद ही नहीं है। आलोचक इस संवाद में अपनी हेटी समझता है। वह आलोचना को उत्तम कोटि का कर्म और अनुसंधान को दोयमदर्जे का कर्म मानता है। सवाल किया जाना चाहिए कि आलोचना महान कैसे हो गयी और अनुसंधान निकृष्ट कोटि का कैसे हो गया ? ये दोनों वर्गीकरण किसने किए ?

हिंदी में ऐसे समीक्षक हैं जिनको ‘साहित्य सिद्धांत’ से चिढ़ है। वे इस पदबंध की बजाय आलोचना पर ज्यादा जोर देते हैं। खासकर नामवर सिंह ने साहित्य सिद्धान्त के खिलाफ कई बार बोला है। इस तरह की आलोचनाओं को मद्देनजर रखते हुए रेनेवेलेक-आस्टिन वारेन ने लिखा है “ठोस साहित्यिक कृतियों को अध्ययन का आधार बनाए बिना साहित्य-सिद्धान्त गढ़ पाना असंभव है। बिना किसी आधार के मानदण्ड ,श्रेणीभेद और विधाभेद नहीं हो सकता।लेकिन इसी तरह,बिना कुछ प्रश्नों ,अवधारणाओं,सन्दर्भों और सामान्य नियमों के,साहित्यालोचन और इतिहास भी संभव नहीं हो सकता।”

एक अन्य सवाल यह है कि क्या हमारे समीक्षकों ने लेखकों का कभी मुकम्मल मूल्यांकन किया ? क्या कभी हमने ठोस रूप से साहित्यिक कृतियों पर बहस चलायी,पता किया जाना चाहिए कितनी कृतियां हैं जिन पर हिन्दी में सुनियोजित और सुसंगत बहस चली है। एक दर्जन किताबें और लेखक भी नहीं हैं जिनका मुकम्मल मूल्यांकन किया गया हो।

हिन्दी आलोचना की सबसे बड़ी बीमारी है इसमें तटस्थ विवेचन का विवेक नहीं है।हिंदी में साहित्येतिहास लेखन में मुख्यतः कृति के सामाजिक उद्देश्य और आशय को आधार बनाकर इतिहास लिखा गया है। सवाल यह है कि कृति की सामाजिकता और लेखक के आशय में युग बदलने के साथ बदलाव आता है या नहीं ? इस बदली हुई सामाजिकता और आशय के साथ ऐतिहासिक नजरिए का किस तरह सामंजस्य बिठाएं यह मूल चिंता होनी चाहिए।

दूसरा बड़ा सवाल यह है क्या इतिहासदृष्टि अप्रासंगिक होती है या बदलती है ? इतिहासदृष्टि का संबंध वर्तमान से होता है अतः परिवर्तित वर्तमान के कारण रामचन्द्र शुक्ल या हजारीप्रसाद द्विवेदी की इतिहासदृष्टि में परिवर्तित समय के अनुसार बदलाव करके पढ़ा जाना चाहिए।इसी तरह इन दोनों इतिहासकारों ने जब इतिहास लिखा था उस समय तक अनेक नए सवाल नहीं उठे थे। मसलन्, स्त्री साहित्येतिहास और दलित साहित्येतिहास के सवाल नहीं उठे थे, लेकिन आज ये मुख्य सवाल हैं। इसी तरह अनेक नए विधारूप जन्म ले चुके हैं जिनको इन इतिहासकारों ने कभी विधा की नजर से नहीं देखा था। मसलन् चिट्ठी या पत्रों को ही लें। पत्र पहले विधा नहीं था। लेकिन ‘निराला की साहित्य साधना’ आने के बाद विधा बना गया है। इतिहास और आलोचना लिखते समय यह भी देखा गया है किसी कृति के मूल्यांकन में अंतर्वस्तु के मूल्यांकन पर खूब जोर रहा है लेकिन विधा के लक्षणों के साथ मिलाकर कृति का मूल्यांकन कम किया गया है। इन दिनों हिन्दी में आत्मकथाओं की बाढ़ आ गयी है। प्राइवेसी या निजता,व्यक्तिवाद और लोकतंत्र के प्रति सजगता जितनी गहरी होती जाएगी आत्मकथाएं उतनी ज्यादा लिखी जाएंगी।

रामविलास शर्मा ने निराला पर लिखते समय व्यक्तिगत और सामाजिक के द्वंद्व का सुंदर चित्रण किया है। इसके लिए उन्होंने वैयक्तिकता को तरजीह दी है। उनके देशी ठाट, देशी अनुभूतियां, देशी गुण-अवगुण आदि को खूब उभारा है। चेतन-अवचेतन के सामाजिक खेलों का विवरण दिया है। साथ ही लेखक को देशी जनसमुदाय के मध्य रखकर विश्लेषित किया है। निराला के व्यक्तिगत, सांस्कृतिक, पारिवारिक और राजनीतिक अन्तर्विरोधों को रेखांकित किया है। इस कृति को आख्यान शैली में लिखा है। इसी क्रम में अन्य लेखकों और अन्य लोगों के आख्यान या कहानियां भी साथ में चली आई हैं। इस समूची पद्धति में वे लेखक के निजी और सार्वजनिक अधिकारों की रक्षा करते हैं।

निराला पर लिखने के लिए रामविलास शर्मा ने जिस पद्धतिशास्त्र का इस्तेमाल किया है।वह क्या है ? वे लेखक के विचार,परिवेश,आत्मसम्मान,तथ्य और कल्पना मेल-बेमेल दोनों की तलाश करते हैं। इसके आधार पर ही निराला के अतीत में प्रवेश करते हैं और उन्हें यथार्थ मनुष्य के रूप में चित्रित करते हैं। वे निराला के काल्पनिक और वास्तव जगत के द्वंद्वों का चित्रण करते हुए उन्हें वास्तव की प्रक्रियाओं में विकसित होते हुए दिखाते हैं। इस पद्धति के बहाने स्वयं रामविलास शर्मा का मन और संसार भी उसमें अभिव्यक्त हुआ है।

इस किताब में सबसे सुंदर पक्ष है निराला की मंशाओं का विवेचन। निराला की ईमानदार मंशाओं का विस्तार से रामविलास शर्मा ने खुलासा किया है। इस क्रम में ईमानदार मंशा और छद्म मंशा में अंतर करते हैं। ईमानदार मंशा पर जोर देने के कारण निराला के व्यक्तित्व के सकारात्मक पहलुओं का उद्घाटन करने में उन्हें सफलता मिली है। इस जीवनी में निराला के उन पहलुओं का उद्घाटन किया है जिसे सामान्य पाठक नहीं जानता। पाठक जब इस जीवनी को पढ़ेगा तो वो रामविलास शर्मा से भिन्न निराला की जीवनी को रचेगा। जीवन को पढ़ते समय पाठक अपने ढ़ंग से जीवनी को बनाता है। प्राथमिकताएं तय करता है। इसमें पाठक का संदर्भ नए तत्व के रूप में दाखिल होता है। रामविलास शर्मा ने इस कृति में जीवनी के चारों प्रमुख मानकों स्वायत्तता,आत्मानुभूति,प्रामाणिकता और व्यक्तित्वान्तरण का पूरी तरह पालन किया है। इन मानकों के आधार निराला के सांस्कृतिक मूल्यों और उपलब्धियों को बुनियादी रूप से रेखांकित किया है।

परवर्ती पूंजीवाद में साहित्य –

परवर्ती पूंजीवादी साहित्य फ्यूजन का साहित्य है। यह पूंजीवादीयुग के साहित्य से मूलतः भिन्न है। सतह पर साहित्य का वर्तमान बदला रूप अधिकतर लोगों की समझ में नहीं आता । भाषिक प्रयोगों ,आख्यानकला और मध्यकालीन प्रयोगों की और रूझान बढ़ा है। इनदिनों कुछ ऐसे लेखक भी हैं जो अभी प्रगतिशील आंदोलन के प्रयोगों के आगे नहीं बढ़े हैं। इसमें कुछ ऐसे हैं जो अभी भी छायावादी भावबोध में जी रहे हैं। यही हाल कथा साहित्य का है। किसी को कथा सरितसागर की कहानियों का फारमेट अच्छा लगता है तो कुछ के लिए प्रेमचंद का कथा रूप अपील करता है। कुछ ऐसे हैं जो राजेन्द्र यादव के दीवाने हैं तो कुछ को उदयप्रकाश में जादुई यथार्थ के दर्शन हो रहे हैं। तात्पर्य यह है कि हिन्दी में साहित्य के नाम पर प्राचीन से लेकर नवीन सब कुछ चल रहा है। यही हाल पापुलरकल्चर का है। उसमें भजन से लेकर भांगड़ा तक,पॉप संगीत से लेकर शास्त्रीय संगीत तक सबमें फ्यूजन चल रहा है। वगैर किसी सिद्धांत और मकसद के पुरानी से लेकर नई शैलियों और देशी-विदेशी सिद्धांतों की खिचड़ी परोसी जा रही है।

अतीत की शैलियों से लेकर अत्याधुनिक शैलियों का मनमाना प्रयोग इस बात का संकेत है कि कलाओं में नियमरहित अतीत का संगम हो रहा है। शैलियों को संतुलित कर देने, एक ही धागे में पिरो देने की इस प्रवृत्ति ने खास किस्म का सर्वसंग्रहवाद पैदा किया है।

साहित्य पुनर्सृजन है। वह वास्तव की बजाय कल्पना का खेल है। लेकिन कथाकार उसे वास्तव के रूप में व्याख्यायित करने में लगे हैं। दूसरी ओर वास्तव घटनाओं का नकली रूप टीवी चैनलों से नाट्य रूपान्तरण के जरिए आ रहा है। कुछ ऐसे विचारक भी हैं जो बता रहे हैं कि वेदों की ऋचाएं,लोकगीत, महाकाव्यों की कविताएं आदि सब कुछ सच था। वे उन्हें किसी न किसी वास्तव घटना से जोड़ रहे हैं और उनकी वैधता की तलाश कर रहे हैं।

यानी साहित्य सच है ,सच के अलावा कुछ भी नहीं है। कलाओं में सच के पूजकों की ऐसी भीड़ पहले कभी नहीं देखी गयी। वे बता रहे हैं कि सब कुछ उपभोग के लायक है। सब कुछ आत्मसात किया जा सकता है। ‘सब कुछ कला और सब कुछ यथार्थ’ के नारे के नाम अतीत से लेकर वर्तमान तक की विलक्षण खिचडी पक रही है और उसे हम अनालोचनात्मक ढ़ंग से खा रहे हैं।

‘सब कुछ कला है’ के नारे के मानने वालों को साहित्य में कैसे प्रतिष्ठित किया जा रहा है और सब की रचनाओं को एक पदबंध में कैसे बांधा जा सकता है इसका साहित्यिक खेल ‘नया ज्ञानोदय’ के ‘प्रेम’ और ‘बेबफाई’ विशेषांकों को देखकर लग सकता है। संपादक महादय ने उपरोक्त पदबंधों के आधार पर अतीत से लेकर वर्तमान तक की साहित्यिक रचनाओं को वर्गीकृत करके पेश किया है और अच्छे जनप्रिय अंक प्रकाशित किए हैं। इन विशेषांकों में शामिल रचनाओं को समझने के लिए किसी परिप्रेक्ष्य,ऐतिहासिक संदर्भ,कल्पना आदि के वैविध्य आदि को समझने की जरूरत नहीं है। यह तो ‘प्रेम’ और ‘बेबफाई’ का सर्वसंग्रह है।

विचार विशेष पर इस तरह के संग्रहों के प्रकाशन का हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं में खूब चलन है। यह साहित्य में नए और पुराने का सर्वसंग्रहवाद है। इस तरह के सर्वसंग्रहवाद के पीछे इस तरह के संग्रहों को निकालने वालों की अपनी साहित्यिक समझ रही है जिसके आधार पर वे इस तरह के खिचडी साहित्य की साहित्यिक प्रासंगिकता पर रोशनी ड़ालते हैं। उनके पास अपने सर्वसंग्रहवाद के लिए सुंदर तर्क हैं।

पुराने और नए को एक ही साहित्यिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का साहित्य सिद्धांत पिटा हुआ उत्तर आधुनिक सिद्धांत है। इसके अलावा ‘सब कुछ साहित्य है और यथार्थ है’ और ‘प्रत्येक चीज प्रासंगिक है’,ये दोनों साहित्यिक नारे हमारे साहित्यिक क्षय को व्यंजित करते हैं। कलाबोध को नष्ट करते हैं। इन दो नारों के तहत प्रस्तुत सामग्री उपभोक्तावाद से संचालित है। इसका साहित्य से कम संबंध है।

उपभोक्तावाद के लिए सब कुछ जरूरी है। सब कुछ बिक सकता है। वहां कचरा और कूड़ा भी प्रासंगिक है। जिस तरह बाजार में रीसाईकिलिंग की गई वस्तुओं और प्लास्टिक के मालों की बाढ़ आयी हुई है वैसे ही साहित्य में भी नए किस्म का रीतिवाद आ गया है। इसमें पुराने रीतिवाद के लक्षण भी शामिल हैं। रीतिवाद की विशेषता है सृजन के केन्द्र में नकली यथार्थ और निर्मित साहित्य का आना। कहानी,उपन्यास से लेकर आत्मकथाओं तक निर्मित साहित्य की बाढ़ आयी हुई है। साहित्य की बजाय निर्मित साहित्य ने अंधानुकरण को बढ़ावा दिया है। यह साहित्य का स्टीरियोटाईप है।

जिस तरह रीसाईकिल से बनी सामग्री का निजी जीवन छोटा होता है। वैसे ही स्टीरियोटाईप साहित्य की भी उम्र कम होती है। वह स्मृति में टिकता नहीं है।साहित्यिक विवादों के केन्द्र में जमा नहीं रहता। हमारे बीच में साहित्यिक प्रवृत्तियों की रीसाईकिलिंग हो रही है। साहित्यिक रीसाईकिलिंग में एक खास किस्म की मनोदशा या प्रवृत्ति या विचार को लेकर विशेषांक निकाले जा रहे हैं।

सर्वसंग्रह खूब बिकता है। वह वस्तु को उसके अतीत से विच्छिन्न कर देता है । उसे तात्कालिक खपत से जोड़ देता है। इसे साहित्य का उपयोगितावाद कहते हैं। यह ‘टाइम पास’ करने वाली साहित्य प्रवृत्ति है।

मीडिया मालों का आस्वाद लेते हुए हम आज कृत्रिम यथार्थ के अभ्यस्त हो गए हैं। यथार्थ और कृत्रिम यथार्थ का अंतर भूल गए हैं। साहित्य और गैर साहित्य का भेद भूल गए हैं। सामयिक और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य का अंतर करना भूल गए हैं। अब हम चीजों को अनालोचनात्मक या संशयवादी की तरह देखते हैं। स्वाभाविक और आलोचनात्मक ढ़ंग से देखने और परखने की कला हमारे जीवन से चली गयी है। हमें वास्तव घटना से ज्यादा निर्मित घटना अपील करती है। वास्तव की तुलना में कृत्रिम सुंदर लगने लगा है। वास्तव खबर नकली और नकली खबर वास्तव लगने लगी है। फ्रेडरिक जेम्सन के शब्दों में यह‘नए की असफलता और अतीत की कैद है।’

थीम पर केन्द्रित साहित्यिक पत्रिकाओं के अंक इस बात की सूचना है कि हिन्दी जगत गहरे अवसाद से गुजर रहा है। फ्रेडरिक जेम्सन के शब्दों में थीम पर केन्द्रित होकर बातें तब ही होती हैं जब बहुराष्ट्रीय कंपनियों अथवा परवर्ती पूंजीवाद के प्रति समाज अवसाद में डूबा हुआ हो। जो अवसाद में डूबे हैं उनके लिए विशेषांक अपील कर रहे हैं। साथ ही दार्शनिक तौर पर यह व्यक्ति को चर्चा के केन्द्र से हटाने की कोशिश है। इसी अर्थ में यह उत्तर आधुनिक साहित्यिक प्रयास है जिसमें व्यक्ति के अंत की घोषणा कर दी गई है।

साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता में थीम का महत्वपूर्ण होना स्वयं में समस्यामूलक है।हिन्दी की अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं ने फासीवाद, प्रेम,बेबफाई , साम्प्रदायिकता, आतंकवाद,भूमंडलीकरण आदि पर विशेषांक निकाले हैं। इन सभी विशेषांकों का एक ही साझा संदेश है कि हम विषय के बारे में, अपने बारे में कितना जानते हैं। इससे थीम केन्द्र में आई है और व्यक्ति का स्थानान्तरण हुआ है। थीम के हिमायती भूल गए हैं कि साहित्य का थीम के आधार पर प्रसार नहीं होता। इससे अनुकरण,पैरोडी और साहित्यानुकरण होता है।

एक पत्रिका ने युवा रचनाकार विशेषांक निकाला तो बाकी पत्रिकाएं अनुकरण करके युवा लेखन पर विशेषांक निकाल रही हैं। किसी ने स्त्री या दलित पर विशेषांक निकाला तो बाकी पत्रिकाएं उससे बेहतर विशेषांक निकाल रही हैं। इस विशेषांक संस्कृति ने थीम को प्रतिष्ठित किया है विषय और व्यक्ति को अपदस्थ किया है। साहित्य में इस बहाने व्यक्ति का बहिष्कार हुआ है। विषय का अंत हुआ है।

पहले साहित्य और साहित्यिक पत्रिकाओं में लेखक के विज़डम और मासकल्चर के रूपों पर जोर था। इन दिनों साहित्य में आकर्षक,इकसार और रूढ़िबद्ध विषयों का महिमामंडन चल रहा है।

मसलन् यदि किसी दलित ने एक खास अंदाज में अपनी आत्मकथा में कुछ खास पक्षों को उठाया है तो हठात् दलित आत्मकथाओं में मिलते -जुलते चित्रों की बाढ़ आ गयी है। दलित और स्त्री आत्मकथाओं में एक खास किस्म का अंधानुकरण साफतौर पर देख सकते हैं। एक जमाना था साहित्य में विषय की विशिष्टता थी। विशिष्टता की जगह इन दिनों अंधानुकरण हो रहा है।

विषय से लेकर समस्या के ट्रीटमेंट तक इकसारता के कारण साहित्य से व्यक्ति की विदाई और विशिष्टता का अंत हो गया है। पहले पाठ का संबंध ऑब्जेक्ट के साथ था इन दिनों ऑब्जेक्ट की जगह फैशन ने ले ली है। थीम ने ले ली है। इन दिनों साहित्य थीम से थीम की ओर बढ़ रहा है। थीम से पैदा होने वाला साहित्य स्टीरियोटाईप और बोगस होता है चाहे उसे कितने ही बड़े लेखक ने लिखा हो। साहित्य का आधार अब जीवन नहीं थीम है और यही वह बिंदु है जहां साहित्य का अंत हो जाता है। दूसरी प्रवृत्ति निर्धारणवाद की है। इसमें स्त्री,युवा,दलित आदि को निर्धारणवादी ढ़ंग से पेश किया जा रहा है। अब कोई भी रचना मर्दवाद के आतंक-उत्पीड़न, वर्णाश्रम व्यवस्था के उत्पीड़न ,भूमंडलीकरण के उत्पीड़न के बिना नहीं लिखी जा रही।

साहित्य को ‘स्पेस’ के संदर्भ में देखें तो ऐसी रचनाएं ज्यादा आ रही हैं जिनमें ‘घर’ का चित्रण ज्यादा है। व्यक्तिगत ,करीबी बातों और लोगों का चित्रण ज्यादा हो रहा है। अब ऐसी रचनाएं कम लिखी जा रही हैं जिनमें सार्वजनिक स्पेस हो। साहित्य की स्टाईल की बजाय खास अंचल या भौगोलिक क्षेत्र पर बातें हो रही हैं।

एक जमाना था हिन्दी में लेखकगण समय पर बातें करते थे,युग पर बातें करते थे, अब समय को स्थान ने अपदस्थ कर दिया है। स्पेस का विकृतिकरण हो रहा है। इसे घर,बाहर, शहर,कामकाजी स्थान आदि के संदर्भ में देख सकते हैं।

स्त्री और दलित पर लिखी रचनाओं में स्टाइल के रूपों में पुरानी पितृसत्तात्मक अभिव्यक्ति शैली को चुनौती दी जा रही है। पुरानी पितृसत्तात्मक शैली और नयी शैली में क्या अंतर है। इस पर बातें नहीं हो रही हैं। इसी तरह दलित लेखन में कामुकता और वर्चस्व की स्मृतियों की व्यापक अभिव्यक्ति हुई है। उनके विभिन्न आख्यान या रूपक सामने आए हैं।

कामुकता और वर्चस्व की स्मृतियों का आना इस बात का संकेत है कि हमारा लेखक मीडिया इमेजों से गहरे प्रभावित है। मीडिया इमेजों के प्रभाव के कारण ही स्मृतियों को साहित्य में अभिव्यक्ति के लिए प्रेरित करता है। स्मृतियों का साहित्य मीठा होता है और उसकी खपत आसानी से हो जाती है। साहित्य में चीजों को माल बनाकर पेश करने की प्रवृत्ति ने उसकी खपत बढ़ा दी है। इस क्रम में संस्कृति और यथार्थ का अंतर मिटा है।

खासकर स्त्री और दलित केन्द्रित आत्मकथाओं में यथार्थ और संस्कृति का अंतर खत्म हो गया है। इन आत्मकथाओं के जरिए स्त्री के यथार्थ की बजाय संस्कृति पर ज्यादा बातें हो रही हैं। चित्रण में भी यथार्थ गौण है संस्कृति प्रमुख है। साहित्य के चित्रण में यथार्थ की जगह संस्कृति और विचार विशेष का आना और यथार्थ का गायब हो जाना साहित्य के वस्तुकरण की प्रक्रिया को सामने लाता है। इस तरह के साहित्य की रूपान्तरणकारी भूमिका नहीं होती। वह बिकता ज्यादा है,उसकी खपत ज्यादा होती है ,वह आलोचनात्मक नजरिए से रहित होता है। साहित्य का वस्तुकरण वस्तुतः परवर्ती पूंजीवाद की सांस्कृतिक विजय है।

फ्रेडरिक जेम्सन ने लिखा है नए युग की विशेषता है कि हमारे कानों में इतिहास का आवाजें आनी बंद हो जाती हैं। इतिहास के प्रति बहरापन एक सामान्य फिनोमिना है। नए युग का विचारशास्त्र संस्कृति में सत्य को खोज कर रहा है। संस्कृति के परे सत्य के किसी भी आयाम को ये लोग नोटिस ही नहीं लेते।

सार्वजनिक इतिहास से हमारा संबंध कमजोर हुआ है और नए किस्म की निजी सामयिकता से उसे जोड़ दिया गया है। इसके कारण एक खास किस्म की उन्मादी भाषा का प्रयोग हो रहा है। साहित्य और मीडिया में शुद्ध भौतिक अनुभवों को उभारा जा रहा है। साहित्य में दैनन्दिन जीवन के सतही मनो अनुभवों और स्पेस केन्द्रित सांस्कृतिक भाषा के वैविध्यपूर्ण चित्रों की बाढ़ आयी हुई। बैचैनी के चित्र यथार्थ के बिना आ रहे हैं। नई संचार तकनीक का साहित्य पर गहरा असर हुआ है। नई तकनीक पुनर्रूत्पादन की तकनीक है। फलतः साहित्य सृजन कम और उसका पुनर्रूत्पादन ज्यादा हो रहा है।

उत्तर आधुनिक अवस्था में ‘साहित्य के अंत’ की भी घोषणा की गई है। इसका वास्तव में क्या अर्थ है इस ओर हमारे समीक्षकों ने कभी गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। लेकिन एक परिवर्तन आया है साहित्य को विधाओं में वर्गीकृत करके पढ़ने की परंपरा का अंत हुआ है। साहित्य के पुराने वर्गीकरण और मानक अप्रासंगिक हो गए हैं।

मसलन् एक जमाना था साहित्य की कोटि में अखबार का लेखन नहीं आता था। लेकिन इधर यह नहीं कह सकते। सवाल उठता है स्व. प्रभाष जोशी के निबंधों को हिन्दी गद्य साहित्य का हिस्सा  मानें या नहीं ? इसी तरह बड़े पैमाने पर साहित्येतर समस्याओं पर हिन्दी में लिखा जा रहा है वह साहित्य का हिस्सा है या नहीं ? विधाओं के दायरे टूटे हैं, साहित्य में आए दिन नई विधाएं जन्म ले रही हैं। कल तक जिस लेखन को विधा नहीं मानते थे उसे अब विधा मानते हैं।

मसलन ,निजी पत्र साहित्य का हिस्सा नहीं थे। लेकिन रामविलास शर्मा ने ‘निराला की साहित्य साधना’में पत्रों का इस्तेमाल किया और पत्रों का ही एक खण्ड बना दिया। अपनी आत्मकथा में भी उन्होंने यही पद्धति अपनायी। इसी तरह नवजागरण संबंधी बहस में भी उन्होंने ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण’नामक किताब लिखकर बड़े पैमाने पर साहित्येतर विषयों को साहित्य बना दिया। यही काम अपने से तरीके नामवर सिंह ने आलोचना पत्रिका के पुनर्प्रकाशन के साथ किया और उन्होंने आलोचना का फासीवाद विरोधी विशेषांक निकाला। कहने का तात्पर्य है कि साहित्य अब पुराने अर्थ को त्याग चुका है। नए रूप में साहित्य को लेखन के नाम से जाना जाता है। इसमें अब साहित्य और साहित्येतर का भेद नहीं रह गया है। विधाओं का वर्गीकरण नहीं रह गया है। विधाओं का भी लेखन की अवधारणा में विलय हो चुका है। अब सब कुछ लेखन है।

 

पहले साहित्य की सीमाएं थीं आज साहित्य की कोई सीमा नहीं है।  अब साहित्य में सब कुछ शामिल है। साहित्य में यह परिवर्तन नयी संचार तकनीक आने के साथ आया है। कम्प्यूटर के आने साथ आया है। जिस तरह कम्प्यूटर में उससे पहले के सभी माध्यमों का विलय हो गया, कनवर्जन हो गया। ठीक वैसे ही लेखन में सब विधाओं का विलय हो गया है। पहले रचना का एक ही अर्थ होता था ,यही कहा जाता था लेखक का काम है सत्य की खोज करना। लेकिन अब किसी भी रचना का एक अर्थ नहीं है। बल्कि अनेक अर्थों की चर्चा हो रही है। एक सत्य की नहीं एकाधिक सत्य की चर्चा हो रही है। एक व्याख्या नहीं व्याख्याओं का अनंत आकाश खुल गया है। इस पूरी प्रक्रिया में आलोचना, सत्य,व्याख्या आदि के संदर्भ में ‘सापेक्षतावाद’ घुस आया है। अब हम सापेक्ष रूप में विचार करते हैं। सत्य ,कथ्य और व्याख्या की एकाधिक अस्मिताओं पर जोर दिया जा रहा है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो पुराने साहित्य की धारणा का अंत हो गया है।

‘साहित्य के अंत’ की प्रक्रिया में ‘साहित्य’ पर नहीं ,साहित्य के सवालों पर बहस हो रही है। ‘साहित्य’ पर जब बातें कर रहे थे तो साहित्य समीक्षा के आधार पर कृति का विवेचन कर रहे थे,समीक्षा या आलोचना का विकास कर रहे थे। साहित्य के नियमों को लागू करते हुए बता रहे थे कि साहित्य की सीमा क्या है और रचना में साहित्येतर क्या है ? साहित्य को साहित्येतर से दूर रखने में आलोचना मदद कर रही थी। लेकिन अब ऐसा नहीं हो रहा।

हमारे साहित्यिक बंधु साहित्य के सवालों पर चर्चा करते हुए साहित्यालोचना के दायरे के बाहर चले गए हैं. अब साहित्य और साहित्येतर का विभाजन खत्म हो गया है। यह विभाजन और किसी ने नहीं साहित्य के दो महान आलोचकों रामविलास शर्मा और नामवर सिंह ने किया है। जब आप साहित्य की बजाय साहित्य के सवालों पर चर्चा रहे होते हैं तो साहित्य की सीमाओं को खत्म करते हैं। इस क्रम में साहित्य की अपनी कोई निजी पहचान नहीं रह जाती। अब तक यह कहा जाता था कि साहित्य की अपनी पहचान या अस्मिता होती है।  लेकिन यह पहचान अब खत्म हो गयी है। अब हम नहीं जानते कि साहित्य की अस्मिता क्या है ? पहचान क्या है ? यही वह जगह है जहां पर साहित्यालोचना की जगह साहित्य सैद्धांतिकी आ गयी है। अब ज्यादा से ज्यादा साहित्यालोचना नहीं साहित्य की थ्योरी के आधार पर चर्चाएं हो रही हैं।

पहले ‘आलोचना’ लिखी जाती थी अब ‘परिप्रेक्ष्य’ की बातें हो रही हैं। आलोचना को परिप्रेक्ष्य ने अपदस्थ कर दिया है। इसका गहरा असर हुआ है। अब साहित्य में अनेक परिप्रेक्ष्यों के आधार पर मूल्यांकन किया जा रहा है। जैसे मार्क्सवाद,संरचनावाद,उत्तर आधुनिकतावाद, स्त्रीवाद आदि।

मजेदार बात यह है कि हिन्दी में आलोचना के मसलों को पूरी तरह दुरूस्त भी नहीं कर पाए थे कि अचानक आलोचना को परिप्रेक्ष्य ने अपदस्थ कर दिया। अब परिप्रेक्ष्य के आधार पर साहित्य में व्यक्त सत्य को तय किया जा रहा है। परिप्रेक्ष्य अलग हैं तो सत्य भी भिन्न होगा। इसके कारण दुनिया भी अलग दिखाई देगी। दुनिया का अलग-अलग हिस्सा दिखाई देगा।

मसलन् स्त्रीवादी और मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य को ही लें ,इसके मानने वाले ‘लिंग’ और ‘वर्ग’ के अलावा और किसी भी बात पर ध्यान नहीं देते। वे अन्य पक्षों की अनदेखी करते हैं। व्यवस्था में ‘लिंग’ और ‘वर्ग’ के अलावा भी चीजें हैं जिन्हें हमें देखना चाहिए। वे साहित्य को ‘लिंग’ और ‘वर्ग’ के सीमित दायरे में ऱखकर देखते हैं, जबकि साहित्य का दायरा बहुत बड़ा है,स्त्रीसाहित्य और मार्क्सवादी साहित्य या दलितसाहित्य के दायरे की तुलना में। फलतः साहित्य में टुकड़ों या अंशों पर बातें हो रही हैं,समग्रता में साहित्य पर बातें नहीं हो रहीं। इसी अर्थ में साहित्य की पुरानी धारणा का अंत हुआ है।

परिप्रेक्ष्य में देखने की यह खूबी काफी पहले से चली आ रही है इसमें उत्तर आधुनिकतावाद के आने से मामला दूसरी दिशा में चला गया है। जितने भी परिप्रेक्ष्य प्रचलन में हैं उनमें राजनीति गहरे समायी हुई है। राजनीति के बिना इन पर बातें करना संभव नहीं है।

इस समूची प्रक्रिया का साहित्य के पठन-पाठन पर भी गहरा असर हुआ है। अब साहित्य के विभाग नहीं होते, बल्कि उनकी जगह साहित्यिकया सांस्कृतिक अध्ययन के विभाग होते हैं। साहित्यिक अध्ययन विभाग बनते ही अनुसंधान और अध्ययन के क्षेत्र में हिंसा,दमन, उत्पीडन, विभाजन आदि राजनीतिक केटेगरी का अध्ययन प्रमुख हो गया है।

अब कोई शोध ऐसा नहीं होता जिसका ठोस आधार राजनीति न हो। अब प्रत्येक निर्णय राजनीतिक आधारों पर हो रहा है। राजनीतिक आधार पर सोचने का परिणाम निकला है कि अब कोई चीज निश्चित नहीं है। टिकाऊ नहीं है। राजनीति के अलावा अन्य पहलुओं को छिपाया जा रहा है।

जब कोई चीज निश्चित नहीं है तो अब अनुमानाधारित दर्शन,काल्पनिक साहित्य और रेडिकल गणित पर जोर दिया जा रहा है और इसी क्रम में गेम या खेल की सैद्धांतिकी सामने आई है।

खास सीमा के बाद ज्ञान,विचार,अनुभव आदि को ठेल दिया जाता है। लेकिन राजनीतिक एक्शन को लक्ष्य से नहीं हटाया जा सकता। चूंकि चीजें राजनीति से जुड़ी हैं अतः संदर्भ को वास्तव होना चाहिए। बिना वास्तव संदर्भ के राजनीति की व्याख्या संभव नहीं होती। इस क्रम में वास्तव पर संदेह नहीं किया जा सकता। अथवा यह भी कह सकते हैं कि कुछ सवाल उठाए ही नहीं जा रहे। ऐसी स्थिति में जो भी मूल्यांकन करेंगे उसके लिए वास्तव के बाहर जाने की जरूरत पड़ेगी।

हमें चलताऊ तुलनाओं ,प्रतिगामी उपेक्षाभाव ,अतार्किकता ,सांस्थानिकता, बौद्धिकता विरोध, अराजनीति आदि से बचना होगा। वास्तव पर निर्भर आलोचना लिखेंगे तो राजनीति और स्कॉलरशिप दोनों में संतुलन बना रहेगा।  इस संतुलन को डिस्टर्ब न किया जाए।

 

इन दिनों वास्तव और अवास्तव ,व्यक्ति और अव्यक्ति,जीवन और मृत्यु, उपस्थित और अनुपस्थित आदि के बारे में सवाल नहीं किए जाते। जो कुछ भी कहा जाता है वह खास सीमा में रहकर ही कहा जाता है। देरिदा ने लिखा है अब ऐसे विद्वान नहीं रहे जो वास्तव अर्थ में विद्वान हों ,और विद्वान की तरह ही भूत के बारे में बता सकें। परंपरागत विद्वान् भूत में विश्वास नहीं करते थे और नहीं इसे वर्चुअल स्पेस का नजारा ही कह सकते हैं। अब ऐसे विद्वान नहीं रहे जो बता सकें कि यथार्थ और अयथार्थ में अंतर क्या है,वास्तव और अवास्तव में अंतर क्या है। जीवित और मृत में अंतर क्या है। व्यक्ति और अ-व्यक्ति में अंतर क्या है। उपस्थित और अनुपस्थित में अन्तर्विरोध बताने वाले विद्वान नहीं रहे।

इसी तरह साहित्य में जो सवाल उठे हैं या उठाए जा रहे हैं वे निज या सेल्फ को उद्घाटित करने वाले हैं। वे ही बातें लिखी जा रही हैं जो अस्मिता की संगति में आती हैं। निज की संगति में आती हैं। ये सभी उत्तर आधुनिक अवस्था के लक्षण हैं। उत्तर आधुनिक अवस्था का चरमोत्कर्ष है समाजवादी व्यवस्था का विघटन। जिस तरह सन् 1917 की सोवियत संघ की बोल्शेविक क्रांति से हिन्दी साहित्य प्रभावित था ,ठीक उसी तरह समाजवाद के पराभव का भी हिंदी पर गहरा असर हुआ है।जिस तरह ब्रिटिश साम्राज्यवाद और उसके खिलाफ चले संघर्षों ने असर डाला था, वैसे ही नव्य आर्थिक उदारीकरण ने भी साहित्य की विभिन्न विधाओं से लेकर मीडिया तक सबको प्रभावित  किया है।

सोवियत संघ के पराभव के बाद  सारी दुनिया में मार्क्सवादी चिंतकों को करारे वैचारिक सदमे और अनिश्चितता से गुजरना पड़ा है। सूचना समाज किस तरह वैचारिक विपर्यय पैदा कर सकता है इसके बारे में कभी विचार ही नहीं किया गया। अधिकांश समाजवादी विचारक इसे सामान्य और एक रूटिन परिवर्तन मानकर चल रहे थे। वे यह भी देखने में असमर्थ रहे कि परवर्ती पूंजीवादी मॉडल को लागू किए जाने के बाद मार्क्सवाद का भी रूप बदलेगा। पुराने किस्म का मार्क्सवाद चलने वाला नहीं है। लेकिन अनेक विचारकों के यह बात गले नहीं उतर रही है। एक तरफ मीडिया में समाजवाद विरोधी उन्माद और दूसरी ओर सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ की धड़कनों का हाथ में न आना, यही वह बिडम्वना थी जिसने मार्क्सवादियों को हतप्रभ अवस्था में पहुँचा दिया।

सूचना समाज में मार्क्सवाद और साहित्य की प्रकृति और भूमिका एकदम बदल गयी है। राजनीतिक प्रतिवाद की शक्ल बदल गयी है। लोगों को जोड़ने ,उनसे संवाद और संपर्क करने के तरीके बदल गए हैं। सूचना समाज आने के पहले राजनीतिक मुहावरे,पदबंध आदि संचार के हथकंड़े के रूप में इस्तेमाल किए जाते थे। सूचना समाज के जन्म के साथ ही राजनीतिक पदबंधों और मुहावरों की जगह सांस्कृतिक पदबंधों और मुहावरों ने ले ली। अब सारी चीजें वस्तुओं और उपभोक्तावादी तत्वों के जरिए व्याख्यायित होने लगीं हैं। साहित्य से लेकर राजनीति तक सब जगह उपभोक्तावाद की भाषा और मुहावरे चले आए हैं।

मसलन पहले नामवर सिंह की तुलना आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के साथ की जाती थी नए दौर में उनकी तुलना अमिताभबच्चन से होने लगी। प्रसिद्ध आलोचक सुधीश पचौरी ने उन्हें हिन्दी के अमिताभ बच्चन के नाम से पुकारा। कहने का अर्थ यह है कि सूचना समाज अपने साथ नया यथार्थ और नयी भाषा लेकर आया है और इस नए यथार्थ को पढ़ने के लिए नए किस्म की सैद्धांतिकी की भी जरूरत है। इसी प्रसंग में प्रसिद्ध मार्क्सवादी विचारक फ्रेडरिक जेम्सन ने मार्क्सवाद की पांचवी थीसिस में लिखा  ‘‘राजनीतिक तथा आर्थिक दोनों क्षेत्रों के लिए संस्कृति का बढ़ता हुआ महत्व इन क्षेत्रों के सोद्देश्यमूलक अलगाव या विभेदीकरण का परिणाम नहीं, बल्कि स्वयं जिन्सीकरण (कमोडिफिकेशन) की अपेक्षाकृत अधिक विश्वव्यापी संतृप्ति और प्रवेश है। जिन्सीकरण अब उस सांस्कृतिक क्षेत्र के उन विशाल क्षेत्रों को अपना उपनिवेश बनाने में सक्षम हो गया है, जो क्षेत्र अब तक इससे बचे थे और सचमुच इसके विरुद्ध या इसके तर्क से असहमत थे। यह तथ्य कि संस्कृति आज अधिकांशतया व्यवसाय में बदल गई है, इसका परिणाम यह हुआ है कि अधिकांश चीजें जो पहले विशिष्ट रूप से आर्थिक और वाणिज्यिक समझी जाती थीं, वे भी अब सांस्कृतिक बन गई हैं, यह ऐसी व्याख्या है जिसमें इमेज सोसायटी या उपभोक्तावाद के विभिन्न निदानों को शामिल करने की आवश्यकता है।’’

‘‘इस प्रकार के विश्लेषण, मसलन जिन्सीकरण (कमोडिफिकेशन) की अवधारणा संरचनात्मक और गैर-उपदेशात्मक, में अपेक्षाकृत अधिक सामान्य रूप में मार्क्सवाद को सैद्धांतिक बढ़त हासिल है। नैतिक मनोवेग राजनीतिक कार्रवाई उत्पन्न करता है लेकिन यह बहुत ही क्षणिक होती है जो शीघ्र ही पुनर्समाहित और पुनर्शमित हो जाती है। यह अपने विशिष्ट विषयों को अन्य आंदोलनों के साथ बांटने के लिए शायद ही प्रवृत्त होती है। लेकिन केवल इस प्रकार के संलयन और निर्माण द्वारा ही राजनीतिक आंदोलनों का विकास और विस्तार संभव है। सचमुच मैं इस मुद्दे को दूसरी तरह से कहना चाहूंगा कि उपदेशपरक राजनीति में वहीं विकसित होने की प्रवृत्ति होती है जहां संरचनात्मक संज्ञान और समाज का मानचित्रण (मैपिंग) अवरुध्द होता है। समाजवाद के असफल होने का बोध होने पर उत्पन्न आक्रोश को आज के संजातीय और धार्मिक प्रभुत्व के रूप में, उस शून्य को नए अभिप्रेरकों से भरने के एक हताश अंध प्रयास के रूप में देखा जा सकता है।’’

‘‘जहां तक उपभोक्तावाद का संबंध है, यह आशा की जा सकती है कि यदि इसके स्थान पर जान बूझकर कुछ और बिलकुल भिन्न चीज चुनना हो तो यह ऐतिहासिक रूप में उतना ही महत्वपूर्ण सिध्द होगा जितना कि मानव समाज को एक जीवन शैली के रूप में उपभोक्तावाद के अनुभवों से गुजरना। लेकिन विश्व के अधिकांश के लिए उपभोक्तावाद के व्यसन वस्तुनिष्ठ रूप में उपलब्ध नहीं होंगे, तब यह संभव प्रतीत होता है कि 1960 के दशक की रैडिकल थ्योरी का दूरदर्शितापूर्ण निदान : कि पूजीवाद स्वयं ठीक उसी रूप में एक क्रांतिकारी शक्ति है जिस रूप में यह नई आवश्यकताओं और इच्छाओं को जन्म देता है लेकिन जिनकी पूर्ति यह नहीं कर सकता है : नई विश्व व्यवस्था के विश्व स्तर पर प्राप्त होगा।’’

‘‘सैध्दांतिक स्तर पर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान में स्थायी संरचनात्मक बेरोजगारी, वित्तीय सट्टेबाजी और अनियंत्रणीय पूंजी संचलन, इमेज सोसाइटी के ज्वलंत मुद्दे व्यापक रूप में उस स्तर पर एक दूसरे से अंतर्संबंधित हैं जिसे उनकी अंतर्वस्तु, उनके अमूर्तन का अभाव (ठीक उसके विपरीत जिसे किसी अन्य काल में उनका ‘आत्मनिर्वासन’ (एलीनेशन) कहा जाता) कहा जा सकता है। जब हम वैश्वीकरण एवं सूचनाकरण (इनफार्मेटाइजेशन) जैसे मुद्दों को जोड़ने का प्रयास करते हैं तो द्वंद्वात्मकता का और भी विरोधाभासी स्तर मिलता है। जब नए विश्व नेटवर्कों (वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों) की राजनीतिक और विचारधारात्मक संभावनाओं को आज के विश्व तंत्र की स्वायत्तता के लोप तथा किसी राष्ट्र या क्षेत्र की अपनी स्वायत्तता और अस्तित्व प्राप्त करने की असंभावना या स्वयं को विश्व बाजार से अलग करने की असंभावना के साथ जोड़ा जाता है तो प्रतीयमानत: जबरदस्त असमंजस की स्थिति उत्पन्न होती है। किसी एक विचार को अपना लेने मात्र से बुद्धिजीवी इस गलियारे से रास्ता नहीं निकाल सकते। वास्तव में संरचनात्मक विरोधाभासों के परिपक्व होने से ही नई संभावनाओं का जन्म होता है।’’

Leave a Reply

1 Comment on "परवर्ती पूंजीवाद और साहित्येतिहास- भाग-1"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
आर. सिंह
Guest
चतुर्वेदी जी ने अपने इस वृहत लेख में एक साथ बहुत बातें कहने का प्रयत्न किया है,पर एक तो ये इसमे अस्पष्ट (कन्फ्यूज्ड ) नजर आते हैं हैं,दूसरी और पुनरावृति के शिकार हैं.चतुर्वेदी जी को कुछ लोगों से हमेशा शिकायत रही है कि उन्होंने यह नहीं किया वह नहीं किया,पर जो उन लोगों ने किया क्या चतुर्वेदी जी उसका सही मूल्यांकन कर पा रहे हैं?मेरे जैसा साधारण पाठक यह समझने में असमर्थ हैं कि आलोचक इतिहास कार भी बने ऐसी उम्मीद क्यों की जाए?इतिहास का नवीनीकरण या उसमें सुधार करना आवश्यक है,पर जब चतुर्वेदी जी समकालीन आलोचकों से इसकी अपेक्षा… Read more »
wpDiscuz