लेखक परिचय

निर्भय कर्ण

निर्भय कर्ण

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार

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-निर्भय कर्ण-

COURTS-कानून दिवस के मौके पर-

संविधान बनने की प्रक्रिया को लेकर अभी नेपाल लगातार संघर्षशील था ही कि इसी बीच महाभूकंप ने इसे बूरी तरीके से हिलाकर रख दिया। चूंकि संविधान बनने की संभावना क्षीण होती जा रही थी, फिर भी आम जनता को यह भरोसा था कि संविधान बन जाने से काफी हद तक देश में अमन-चैन स्थापित हो सकेगा और खराब व्यवस्था में सुधार हो सकेगा। खैर, वर्तमान स्थिति इसी ओर इशारा कर रही है कि संविधान बनने की प्रक्रिया और भी काफी दूर हो चली है। लेकिन इस बीच यहां की वर्तमान कानून-प्रशासन की स्थिति को टटोलें तो जनता इसमें जबरदस्त सुधार देखना चाहती है जिससे आम जनता राहत महसूस कर सके। इसके पीछे वजह है लचर प्रशासन के भ्रष्टाचार में लिप्त होने की वजह से हर क्षेत्र अपने आप को ठगा महसूस कर रहा है। ऐसे में संविधान के तहत कानून में संशोधन की काफी जरूरत महसूस की जा रही है। कानून में तमाम खामियों व खराब व्यवस्था की वजह से न केवल नेपाल बल्कि भारत भी जूझ रहा है जिसका नाजायज फायदा रसूखदार उठाते हैं।

नेपाल व भारत में प्रशासनिक अव्यवस्था व कानून की खामियों को उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं। सबसे पहले, नेपाल के सप्तरी जिला के शिक्षा विभाग की बात करें तो इससे जुड़ी सरस्वती बाल विकास केंद्र की सहजकर्ता मंजू चौधरी के साथ हुयी घटना सभी की जेहन में ताजा ही है। कुछ दिन पहले ही सप्तरी के राजबिराज-3 की निवासी मंजू चौधरी को तलब नहीं मिल पाने की वजह से उसके 21 वर्षीय बीटा अजय चौधरी की मृत्यु हो गयी। ज्ञात हो कि श्रीमती चौधरी के पति कई महीनों से काम की तलाश में हैं। मंजू चौधरी बताती है ‘जब उसका बेटा टायफैड बीमारी से पीड़ित था तो मैंने राजबिराज स्थित शिक्षा कार्यालय के कई चक्कर काटे लेकिन टाल-मटोल किया जाता रहा जबकि मैंने अपने कमाये हुए पैसे देने की बात कही थी। देखा जाए तो न केवल इंसानियत के आधार पर बल्कि उसके अपने अधिकार के तहत भी समयानुकूल उसकी मजबूरियों को प्राथमिकता देकर उसका वेतन देने की व्यवस्था शिक्षा कार्यालय को करना चाहिए था लेकिन उसे भुगतान नहीं किया गया और पैसे की कमी की वजह से उसका बेटा अकाल मौत के गाल में समा गया। गौर करें तो 10 महीनों से बाल विकास की सहयोगी कार्यकर्ताओं को वेतन नहीं मिला है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि सभी सहयोगी कार्यकर्ता पहले तो तलब के लिए संघर्षरत होती है तो वहीं इसी तलब को प्राप्त करने के लिए आंदोलन तक करना पड़ता है, ऐसे में सवाल उठता है कि शिक्षा प्रदान करने वालों को ही अपना पेट पालने के लिए इतना संघर्ष क्यों करना पड़ता है जबकि वे सभी अपना कीमती समय अपने बच्चों को न देकर समाज के बच्चों को शिक्षित करने में व्यतीत करती है। मतलब साफ है सप्तरी की शिक्षा व्यवस्था में काफी ही कमी और अव्यवस्थित है जिससे हर कोई हताश है।

चूंकि मंजू चौधरी के बेटे की मौत हो गयी है तो अपने वेतन के बारे मंे वह बताती है कि ‘‘जिस वेतन के न दिए जाने से मेरे बेटे की मौत हो गयी है आखिर अब उस वेतन को लेने से क्या होगा, क्या मेरा बेटा जिंदा हो जाएगा’’। दिल को झकझोड़ देने वाली ऐसी घटनाओं से भी यदि संबंधित विभाग सबक लेने की कोशिश करें तो काफी हद तक फैली अव्यवस्था को दूर किया जा सकता है। लेकिन सवाल उठता है कि मंजू चौधरी के बेटे की मौत का जिम्मेवार कौन है- शिक्षा कार्यालय या फिर कानून में फैली तमाम खामियां। आखिर जो हो लेकिन जांच द्वारा यह सुनिश्चित किए जाने की आवश्यकता है कि कोई भी कानून की खामियों का लाभ उठा न सके। यदि कानून में खामियां हैं तो उसे जल्द से जल्द से दूर किया जाए जिससे कोई और घटना भविष्य में न घट सके।

अब भारत की ही बात करें तो, अभी सलमान खान के ‘हिट एंड रन’ का मामला सभी की जुबां पर है। कोई कहता है कि सलमान खान को सजा नहीं मिलनी चाहिए थी तो कोई कहता है सलमान खान को उसके किए की सजा मिलनी ही चाहिए थी। ऐसे में अधिकतर की सहानुभूति सलमान खान के साथ है। गौर करने वाली बात है कि सलमान खान के जो भी हिमायती हैं या तो वो बड़े घरानों व रसूख परिवार से है और दूसरा वो हिमायती हैं जो उनके प्रशंसक है। लेकिन सेलिब्रेटी का मतलब तो यह नहीं है न कि आप किसी को अपनी गाड़ी से शराब पीकर कुचल दें तो आपको सजा नहीं होनी चाहिए। भारतीय संविधान यह कहता है कि कानून सबके लिए बराबर है और कानून ने सलमान खान को उसके किए की सजा दिया भी। लेकिन तब भी सवाल कानून पर ही उठ रहा है कि हमारी व्यवस्था कैसी है कि सलमान खान को 13 साल के बाद सजा मिली। ‘हिट एंड रन’ से पीड़ित लोगों कहते हैं कि ‘अब सलमान खान को सजा मिले या न मिले हमें क्या फायदा। हम तो 13 साल से विकलांग बने बैठे हैं और गरीबी की मार से जूझ रहे हैं।’ ऐसे में यह भी सवाल कानून से है कि क्या इस फैसले से पीड़ित को इंसाफ मिल गया या क्या पीड़ित को कोई भी सुकून मिला जिसके लिए वह अभी भी प्रतीक्षा में है। स्पष्ट है कि हमारी व्यवस्था में खामियां मौजूद है जिसे दूर करने की आवश्यकता है।

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