लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

हमारे यहां एक कहावत है, जितने उमर फोडेंगे, उतने कीड़े निकलेंगे। ऐसा ही हाल सलमान खुर्शीद और उनके डा जाकिर हुसैन स्मृति न्यास के साथ हो रहा है। वे न्यास में कोर्इ गैर – कानूनी काम न होने की सफार्इ दे रहे हैं, उतने ही कानूनी शिकंजे के घेर में आते जा रहे हैं। इस न्यास के अध्यक्ष खुद सलमान खुर्शीद और उनकी पत्नी लुर्इस खुर्शीद परियोजना निदेशक हैं। विकलांगों को शिविर लगाकर सरकारी आर्थिक मदद से कृत्रिम उपकरण बांटने वाले इस न्यास पर आरोप है कि उसने 71.50 लाख अनुदान तो लिया, लेकिन सदुपयोग नहीं किया। टीवी चैनल आज तक द्वारा सिटंग आपरेशन धृतराष्ट्र में किए खुलासे से न्यास की गड़बडि़यां सार्वजनिक हुर्इ। हालांकि पहले, इस मामले में बरती अनियमितताओं का नोटिस भारत सरकार के समाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्री मुकुल वासनिक ले चुके थे। उन्होंने तत्काल जांच का दायित्व उत्तरप्रदेश सरकार को सौंप दिया था। इसके बाद नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की ताजा रिपोर्ट ने भी इस बात की पुष्टि कर दी कि न्यास में गड़बड़झाला सामने आ जाने के बावजूद मंत्रालय ने 2011 में न्यास को आर्थिक मदद दे दी। प्रेस-वार्ता में सफार्इ पेश करते हुए कानून मंत्री ने माना कि विकलांगों को उपकरण बांटने की सरकारी प्रक्रिया से जुड़े 10 लोगों ने कहा है कि उनके हस्ताक्षर या उनके पदनाम से जारी शपथ-पत्र फर्जी हैं। अब तो उत्तरप्रदेश के आर्थिक अपराध अनुसंधान ने जांच अपने हाथ लेकर ताबड़तोड़ 17 स्थानों पर छापे डाल कर दस्तावेज जुटा लिए हैं, जिससे उनमें फेरबदल न किया जा सके।

अकसर कांग्रेस और उसके नेता स्वयं सेवी संगठनों की कार्यप्रणालियों पर सवाल उठाते रहे हैं। कुछ समय पहले खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कुडनकुलम परमाणु विधुत संयंत्र का विरोध करने वाले एनजीओ पर उंगली उठाते हुए कहा था, कि ये संगठन अमेरिका और पशिचमी देशों से मिली आर्थिक इमदाद से इस परियोजना की खिलाफत कर रहे हैं, क्योंकि इसे रुस के सहयोग से खड़ा किया गया है। लेकिन अब जो पूर्व राष्ट्रपति डा जाकिर हुसैन न्यास का मामला उजागर हुआ है, उसके सर्वेसर्वा कांग्रेस के खुर्शीद दंपत्ति हैं और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू है कि स्वयंसेवी संगठन से जुड़ा मामला होने के बावजूद पूरी कांग्रेस और उसके कर्इ मंत्री दस्तावेजी तथ्यों को नकारते हुए खुर्शीद दंपत्ति के बचाव में उतर आए हैं। संप्रग में इस्पात मंत्री बेनीप्रसाद वर्मा ने तो सभी मर्यादाओं को ताक पर रखकर यहां तक कह दिया कि 71 लाख बहुत मामूली रकम है, 71 करोड़ होती तो इसे गंभीरता से लेने की जरुरत थी। यह सही है जब देश में 1.76 लाख करोड़ का 2जी और 1.86 लाख करोड़ का कोयला घोटला सामने आ गया हो तो उस दौर में महज 71 लाख रुपये के घोटाले की क्या बिसात ? लेकिन यह राशि उन विकलांगों के लिए बहुत बड़ी थी, जिन्हें चलने व सुनने का आधार बनती। मानवीयता का तकाजा था कि इस राशि के एक-एक पैसे का सदुपयोग होता। यह तब और जरुरी था, जब इस न्यास के प्रमुख कर्ता-धर्ता भारत सरकार के कानून मंत्री हैं। किंतु कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि 17 जिलों में विकलांगों को कृत्रिम उपकरण व तिपहिया साइकिलें 34 शिविर लगाकर बांटने वाले न्यास के अध्यक्ष सलमान खुर्शीद ने मात्र एक व्यकित को खड़ा करके और दो छायाचित्र दिखाकर यह दावा किया कि दस्तावेजों में दर्शाये सभी शिविर लगाए गए। इन दो छायाचित्रों में से एक चित्र में जो वेनर दिखार्इ दे रहा है, उस पर तारीख जुलार्इ 2010 की अंकित है। जबकि इस मामले से जुड़ी जो गड़बडि़यां सामने लार्इ गर्इं हैं, वे वित्तीय साल 2009-10 की हैं। यह खुलासा अरविंद केजरीवाल ने किया। यहां यह भी सवाल उठता है कि आप एक व्यकित और दो तस्वीरें दिखाकर 34 शिविर लगाने की भरपार्इ कैसे कर लेंगे ? कायदे से सरकारी अनुदान प्राप्त विकलांग शिविरों में जिन्हें मदद पहुंचार्इ जाती है, उनमें से प्रत्येक की उपकरण भेंट करते हुए तसवीर खींची जाती हंै और वीडियोग्राफी कराए जाने का प्रावधान भी परियोजना में शामिल होता है। यहां विडंबना है कि एक भी शिविर की वीडियो फिल्म सामने नहीं लार्इ गर्इ। बाद में आयोजित शिविर की सचित्र विज्ञपित जारी कर समाचार भी छपाये जाते हैं। लेकिन बेहद चिंतनीय पहलू है कि सिंटग आपरेशन धृतराष्ट्र और इंडिया अंगेस्ट करप्सन द्वारा खड़े किए सवालों का जबाव एक व्यक्ति और दो छायाचित्रों के माध्यम से दिया जा रहा है। यह सीधे-सीधे हकीकत को सिरे से झुठलाने और मानवता से जुड़े सवालों को नकारने की निरंकुश कवायद है।

कैग रिपोर्ट के जरिये भी न्यास में गड़बडि़यों के आरोप सामने आए हैं। इस जांच प्रतिवेदन के मुताबिक केंद्र के समाज कल्याण एवं अधिकारिता मंत्रालय ने 2009-10 के लिए न्यास को विकलांगों के कल्याणार्थ 71.50 लाख रुपये की राशि बतौर अनुदान दी थी। इसका उपयोग उत्तरप्रदेश के 17 जिलों में विकलांगों को तिपहिया साइकिल, वैशाखी और श्रवण यंत्र मुफत में देने के लिए होना था, लेकिन छानबीन करने पर यह पुष्टि नहीं हुई कि वाकर्इ विकलांगों को उपकरण दिए गए। रिपोर्ट के अनुसार 17 में से 4 जिलों में उपकरण बांटने के लिए जनवरी 2010 में शिविर लगने थे, लेकिन शिविर लगे नहीं। बाकी 13 जिलों में जनवरी से मार्च 2010 के दौरान शिविर लगाने का उल्लेख दस्तावेजों में है, लेकिन न्यास ने उपकरणों की खरीद जुलार्इ 2010 में की, इसलिए शिविरों का लगना संदिग्ध है। इन अनियमितताओं को नजरअंदाज कर मंत्रालय ने 2011 के लिए 68 लाख का अनुदान न्यास को और दे दिया। जाहिर है, मंत्रालय ने नयास पर यह कृपा इसलिए बरती क्योंकि सलमान खुर्शीद केंद्रीय सत्ता में कानून मंत्री हैं। लिहाजा सीधे-सीधे यह मामला सत्ता के दुरुपयोग के दायरे में भी आता है। इधर केजरीवाल ने जो नए सबूत पेश किए हैं, उनसे तो यह भी साबित हो रहा है कि जिन विकलांगों को उपकरण वितरित किए हैं, उनमें से कर्इ शिविर लगने की दर्शाई तारीख के पहले ही मर चुके थे। पूर्व विशेष सचिव रामराज सिंह पहले ही कह चुके हैं कि न्यास ने उनके जाली दस्तखत किए। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार के वरिष्ठ अधिकारी जे बी सिंह ने बयान दिया कि उनके नाम से जो शपथ-पत्र पेश किया गया है, वह झूठा है। सलमान खुर्शीद की प्रेस वार्ता के बाद बुलंद शहर के कांग्रेस अध्यक्ष ने कर्इ विकलांगों को तिपहियां साइकिल समेत पत्रकारों को यह सफार्इ पेश करने की कोशिश की कि ये साइकिलें वित्तीय साल 2009-10 में आयोजित शिविरों में भेंट की गर्इ हैं। लेकिन जब पत्रकारों ने विकलांगों से पूछा कि साइकिलें कब मिलीं तो उनका कहना था कि कल ही मिलीं है। साफ है, सलमान खुर्शीद दंपत्ति इस गड़बड़ झाले की दल-दल से उबरने के लिए जितने हाथ-पैर मार रहे हैं, उतने और – और धंसते जा रहे हैं।

शिक्षा, स्वास्थ्य और जन-कल्याणकारी योजनाओं से स्वयं सेवी संगठनों को इसलिए जोड़ा गया था, जिससे दूरांचलों और वंचित तबकों को सीधा और वास्तविक लाभ मिल सके। जो संगठन वास्तव में समाजसेवियों द्वारा खड़े किए गए थे, वे आज भी उल्लेखनीय काम कर रहे हैं और उन पर उंगली उठाना मुश्किल है। ऐसे संगठनों में बाबा आम्टे, अन्ना हजारे, मदर टेरेसा, सुब्बा राव और राजेन्द्र सिंह के संगठन हैं। प्राथमिक शिक्षा और विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के क्षेत्र में होशंगाबाद के एकलव्य संगठन ने भी अनुकरणीय काम किया है। लेकिन इन संगठनों पर जब से नेताओं सेवानिवृत्त नौकरशाहों और उनकी पतिनयों का कब्जा हो गया, तब से इनकी सेहत खराब होती चली गर्इ। ये कागजी, खानापूर्ति कर राशि हड़पने का जरिया बन रहे ह्रै। सलमान खुर्शीद का न्यास तो एक बानगी भर है। महात्मा गांधी कहते थे, कि दुनिया बदलने की शुरुआत खुद से होनी चाहिए। लेकिन हमारे नेता और नौकरशाहों से जुड़े स्वैचिछक संगठन बदलाव की कैसी सूरत पेश कर रहे हैं, यह इस तथ्य से साबित होता है कि संगठनों की नियंत्रक संस्था कपार्ट ने डेढ़ हजार से भी ज्यादा एनजीओ की आर्थिक मदद रोक दी है और 833 संगठनों को काली सूची में डाल दिया है। सलमान खुर्शीद के इस न्यास पर यदि र्इओडब्ल्यू की जांच में आरोप सिद्ध होने पर कठोर कार्रवार्इ सामने आ जाती है तो अन्य नेताओं व नौकरशाहों के एनजीओ पर भी शिकंजा कसेगा और छदम समाज सेवा पर अंकुष लगेगा। बषर्ते उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा करार्इ जा रही यह जांच डीलिंग पांइट बनने की बजाए टर्निंग पांइट बने।

 

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