लेखक परिचय

पंडित दयानंद शास्त्री

पंडित दयानंद शास्त्री

ज्योतिष-वास्तु सलाहकार, राष्ट्रीय महासचिव-भगवान परशुराम राष्ट्रीय पंडित परिषद्, मोब. 09669290067 मध्य प्रदेश

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हमारे यहाँ कहावत है कि जोड़े स्वर्ग से तय होकर आते हैं और उनका मिलन पृथ्वी पर निर्धारित समय में विवाह-संस्कार से होता है| अर्थात सब कुछ विधि के विधान के अनुसार तय होने के बावजूद जब बेटी की उम्र 20-21 के पार हो जाती है तो मां-बाप की चिंताएं बढ़ने लगती है| दिन-रात उन्हें यही सवाल सालने लगता है कि हमारी लाडली के हाथ पीले कब होंगे?

उसे पति (वर) कैसा मिलेगा? ससुराल कैसी और कहां होंगी आदि| चिंता मत करिए ज्योतिष शास्त्र में आपके इन सवालों का जवाब है और आप खुद थोड़ी मेहनत करके इन बातों का जवाब जान सकते हैं|

ज्योतिष में लग्न कुंडली का प्रथम भाव जातक का स्वयं का होता है और इसके ठीक सामने वाला सातवां भाव जीवनसाथी का होता है| इस भाव से प्रमुख रूप से विवाह का विचार किया जाता है| इसके अलावा यह भी पता कर सकते हैं कि जीवनसाथी का स्वभाव कैसा होगा? उसका चरित्र कैसा होगा, ससुराल कैसी मिलेगी और वर-वधू में आपसी मित्रता कैसी रहेगी|

 

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केसा होगा जीवनसाथी का स्वभाव..????

सप्तम भावस्थ राश्यानुसार जीवनसाथी के सामान्य स्वभाव के बारे में जानें—

मेष: जिस कन्या के सप्तम भाव में मेष राशि होती है| उसका जीवनसाथी जमीन-जायदाद वाला होता है| इनका दांपत्य जीवन सुखी रहता है|

वृष: इनका जीवनसाथी सुन्दर और गुणवान होता है| मधुर-भाषी, काम-कला में प्रविण और पत्नी भक्त होता है|

मिथुन: सामान्य रंग रूप वाला, समझदार और उच्च विचारों वाला जीवनसाथी मिलता है| जीवनसाथी बातों में चतुर और व्यवसाय करने वाला होता है|

कर्क: सुन्दर, तीखे नाक-नक़्शे वाला जीवनसाथी मिलता है|

सिंह: अपनी बात मनवाने वाला और ईमानदार जीवनसाथी मिलता है|

कन्या: जिस कन्या के सप्तम भाव में कन्या राशि होती है, उसे सुन्दर और सुशील जीवनसाथी मिलता है| विवाह के बाद कन्या का भाग्योदय होता है|

तुला: सुशिक्षित, सुन्दर और मर्यादापूर्ण बात करने वाला, मुसीबत के समय पत्नी के साथ कदम मिलाकर चलने वाला जीवनसाथी मिलता है|

वृश्चिक: जिस कन्या के सप्तम भाव में वृश्चिक राशि होती है| उसका जीवनसाथी सामान्य शिक्षा, कठिन परिश्रमी, हर मुसीबत में हंसने वाला होता है|

धनु: अपने सम्मान को सर्वोपरि समझना, अपने आप पर गर्व करने वाला और साधारण परिवार का जीवनसाथी मिलता है|

मकर: पूजा-पाठ और पराशक्तियों में आस्था रखने वाला, अपने वायदे का पक्का, शौकीन प्रवृत्ति का जीवनसाथी मिलता है|

कुम्भ: भगवान में श्रद्धा रखने वाला, मर्यादित व्यवहार वाला जीवनसाथी मिलता है|

मीन: चंचल, गुणवान, धर्म के प्रति आस्थावान, सुन्दर, बातचीत में होशियार और कन्या के सौभाग्य में वृद्धि करने वाला जीवनसाथी मिलता है|

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कब होगा विवाह..???

प्रायः: माता-पिता की इच्छा यही होती है कि कन्या का विवाह कब होगा? इसका पता लगाने के लिए सप्तम भाव स्थित राशि, सप्तम भाव स्थित गृह व उस पर पड़ने वाली दृष्टियाँ, सप्तमेश की स्थिति व प्रकृति, सप्तमेश पर अन्य ग्रहों की दृष्टि व प्रभाव एवं महादशा आदि का विश्लेषण करते हुए निम्न बातों को ध्यान में रखते हुए विवाह के समय की गणना करें-

सप्तमेश शुभ ग्रह की राशी में बैठा हो, शुक्र अपनी स्वराशी या उच्च राशि में बैठा हो| शुक्र लग्न या केंद्र स्थान में बैठकर शुभ ग्रहों से युति कर रहा हो तो कन्या का विवाह शीघ्र होता है| इसके विपरीत होने पर विवाह में विलम्ब होता है|

सप्तमेश यदि सुभ ग्रह से युति नहीं कर रहा हो या 6 , 8 , 12 वें स्थान में हो, शुक्र व चन्द्रमा पर मंगल या शनि कि दृष्टि हो, 7 या 12 वें स्थान में पाप ग्रहों की युति हो या पंचम भाव में चन्द्रमा हो, सप्तम भाव में केतु हो व शुक्र की दृष्टि हो तो शादी देरी से होती है|

लग्नेश व सप्तमेश के स्पष्ट राशि व अंश जोड़ने पर जो राशि व अंश आते हैं, गोचर का बृहस्पति जब वहां आता है तो शादी का समय समझें|

राशीश (जन्म राशि) व अष्टमेश के योग तुल्य राशी व अंश पर जब गोचर का बृहस्पति आता है तो विवाह का समय समझें|

शुक्र व चन्द्रमा दोनों में से जो बलवान हो उसकी महादशा में गुरु, चन्द्र या शुक्र के प्रत्यंतर में विवाह होता है|

यदि सप्तमेश शुक्र के साथ हो तो सप्तमेश कि अन्तर्दशा में विवाह का योग बनता है| इसके अलावा सप्तम भाव स्थित ग्रह, भाग्येश व कर्मेश की अन्तर्दशा भी विवाह कारक होती है|

गोचर का गुरु लग्न कुंडली में 2 , 5 , 7 , 9 , 11 वें स्थान में आता है तो भी विवाह का समय शास्त्रों में माना गया है|

लग्न सप्तम व द्वितीय भाव में शुभ ग्रह हों एवं इन पर किसी पाप ग्रह की दृष्टि नहीं हो तो शीघ्र विवाह होता है|

लग्नेश व सप्तमेश कुंडली में नजदीक हों तो विवाह शीघ्र होता है एवं दूर हो तो विवाह देरी से होता है| साथ ही शुक्र जिस राशि में बैठा हो, उस राशि के स्वामी की महादशा में, गुरु की अन्तर्दशा में विवाह योग बनते हैं|

कुंडली में सप्तमेश या शुक्र के साथ केंद्र स्थान में गोचरवश जब चन्द्रमा, बृहस्पति आते हैं तो विवाह होता है|

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जानिए की ससुराल कहां होगी …????

ससुराल कि दिशा व स्थान का निर्धारण कुंडली में शुक्र कि स्थिति से किया जाता है| शुक्र यदि शुभ स्थान, राशि में हो व कोई भी पाप ग्रह उसे नहीं देख रहा हो तो ससुराल स्थानीय या आसपास होती है| यदि चतुर्थ भाव, चतुर्थेश व शुक्र किसी पाप ग्रह से देखे जा रहे हों या शुक्र 6 , 8 , 12 वें भाव में हो तो जन्म स्थान से दूर कन्या का ससुराल होता है| विवाह जन्म स्थान से किस दिशा में होगा इसका निर्धारण भी शुक्र से ही किया जाता है| कुंडली में जहां शुक्र स्थित है उस से सातवें स्थान पर जो राशि स्थित है उस राशि के स्वामी की दिशा में ही विवाह होता है| ग्रहों के स्वामी व उनकी दिशा निम्न प्रकार है:-

राशि स्वामी दिशा

मेष, वृश्चिक मंगल दक्षिण

वरिश, तुला शुक्र अग्नि कोण (दक्षिण-पूर्व)

मिथुन, कन्या बुध उत्तर

कर्क चंद्रमा वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम)

सिंह सूर्य पूर्व

धनु, मीन गुरु ईशान (उत्तर-पूर्व)

मकर, कुम्भ शनि पश्चिम

मतान्तर से मिथुन के स्वामी राहु व धनु के स्वामी केतु माने गए हैं तथा इनकी दिशा नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) कोण मानी गयी है|

उदाहरण के लिए किसी कन्या का जन्म लग्न मेष है व शुक्र उसके पंचम भाव में बैठे हैं तो शुक्र से 7 गिनने पर 11 वां भाव आता है, जहां कुम्भ राशि है| इसके स्वामी शनि हैं| राशि कि दिशा पश्चिम है| इसलिए इस कन्या का ससुराल जन्म स्थान से पश्चिम दिशा में होगा| कन्या के पिता को चाहिए कि वह इस दिशा से प्राप्त विवाह प्रस्तावों पर प्रयास करें ताकि समय व धन की बचत हो|

 

 

 

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