लेखक परिचय

ललित गर्ग

ललित गर्ग

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ललित गर्गLonely-old-age

जिन्दगी कठिन है। यह कठिन इसलिये है कि हम अपनी क्षमताओं को पहचानते ही नहीं। अपने आपसे रू-ब-रू नहीं होते, लक्ष्य की तलाश और तैयारी दोनों ही अधूरेपन से करते हंै। इसी कारण जीने की हर दिशा में हम औरों के मुंहताज बनते हैं, औरों का हाथ थामते हैं, उनके पदचिन्ह खोजते हैं। आखिर कब तक औरों से मांगकर उधार सपने जीते रहेंगे? कब तक औरों के साथ तुलते रहेंगे और कब तक बैशाखियों के सहारे मीलों की दूरी तय करते रहेंगे यह जानते हुए भी कि बैशाखियां सिर्फ सहारा दे सकती है, गति नहीं? मनुष्य जीवन में तभी ऊंचा उठता है जब उसे स्वयं पर भरोसा हो जाए कि मैं अनन्त शक्ति सम्पन्न हूं, ऊर्जा का केन्द्र हूं। अन्यथा जीवन में आधा दुःख तो हम इसलिये उठाते फिरते हैं कि हम समझ ही नहीं पाते कि सच में हम क्या है? इसीलिये जिन्दगी कठिन है। हमें जिन्दगी को कठिन मानते हुए ही जीना चाहिए और हमें बिना समय, भाग्य, परिस्थिति, अवसर, व्यक्ति की प्रतीक्षा किये इस कठिन जीवन के संग्राम को ‘कुछ’ कर सकने के हौसले जीतने के लिये अग्रसर होना चाहिए।

एक महत्वपूर्ण पुस्तक ‘दि रोड लेस टेªवल्ड’ के लेखक एम. स्काॅट पैक, एम.डी. कहते हैं कि ‘जिंदगी कठिन है’ एक महान सत्य है, क्योंकि जब हम सचमुच इस सत्य को जान लेते हैं तो उससे पार हो जाते हैं। जब हम वाकई जान लेते हैं कि जिंदगी कठिन है, उसे अच्छी तरह समझ लेते हैं, स्वीकार कर लेते हैं तो फिर जीवन कठिन नहीं रहता।

अधिकांश लोग इस सत्य को नहीं देख पाते या देखना नहीं चाहते कि जिंदगी कठिन है। इसके बदले वे संताप करते रहते हैं कि उनकी जिंदगी में समस्याएं ही समस्याएं हैं। वे उनकी विकरालता, उनके बोझ की ही शिकायत करते रहते हैं। परिवार में, मित्रों में इसी बात का रोना रोते रहते हैं कि उनकी समस्याएं कितनी पेचीदी, कितनी दुःखदायक है और उनकी दृष्टि में ये समस्याएं न होती तो उनका जीवन कितना सुखद और आसान होता। उनके लिए ये समस्याएं उनकी अपनी करनी का फल नहीं, वे उन पर औरों के द्वारा थोपे गए अभिशाप हैं। हमारा जीवन दुखी और कठिन इसलिए है कि समस्याओं का सामना करना, उन्हें सुलझाना एक हमारे लिये पीड़ादायक और कष्टकारक प्रक्रिया है।

समस्याएं हमारे साथ क्या करती हैं? वे अपने स्वरूप के अनुसार या उनके प्रति हमारी अपनी दृष्टि के अनुसार, हमारे मन में कभी निराशा, कभी हताशा, कभी एकाकीपन-अकेलेपन का भाव भरती है। कभी वे हममें व्यथा को जन्म देती हैं और कभी अपराध-बोध की भावना को या फिर कभी खेद को, कभी क्रोध को, कभी भय और कभी एक पराभूत मनःस्थिति को। और विभिन्न प्रसंगों, घटनाओं, संघर्षों या मतभेदों के कारण जन्मी इसी पीड़ा को सामान्यतः हम समस्या मानते हैं। जिंदगी फूलों भरा ही रास्ता नहीं है वह ऐसा ही समस्याओं के कांटों से पग-पग भरा है। इसलिए जिंदगी सदैव कठिन ही होती है, कांटोभरी लेकिन फूला भरी भी हो सकती है।

इन्हीं समस्याओं रूपी चुनौतियों का सामना करने, उन्हें सुलझाने में जीवन का उसका अपना अर्थ छिपा हुआ है। समस्याएं तो एक दुधारी तलवार होती है। समस्याएं हमारे साहस, हमारी बुद्धिमता को ललकारती है और दूसरे शब्दों में वे हममें साहस और बुद्धिमानी का सृजन भी करती है। मनुष्य की तमाम प्रगति, उसकी सारी उपलब्धियों के मूल में समस्याएं ही हैं यदि जीवन में समस्याएं नहीं हो तो शायद हमारा जीवन नीरस ही नहीं, जड़ भी हो जाता। प्रख्यात लेखक फ्रेंकलिन ने सही ही कहा था- ‘‘जो बात हमें पीड़ा पहुंचाती हैं, वही हमें सिखाती भी हैं।’’ और इसलिए समझदार लोग समस्याओं से डरते नहीं, उनसे दूर नहीं भागते। बल्कि वे समस्याओं के प्रति भी सकारात्मक नजरिया विकसित करते हैं।

अनिश्चितताओं और संभावनाओं की यह कशमकश जीवनभर चलती रहती है। जन्म, पढ़ाई, करियर, प्यार, शादी कोई भी क्षेत्र हो। नई दिशा में कदम बढ़ाने से पहले कई सवाल खड़े होने लगते हैं। सबकुछ अनुकूल एवं परिपूर्ण होता है तब भी अनिश्चितताएं साथ नहीं छोड़तीं। पर क्या हम काम करना छोड़ देते हैं? मोटिवेशनल स्पीकर टाॅनी राॅबिन्स कहते हैं, यही क्षण होते हैं जब कोई संभावनाओं के नए क्षितिज ढूंढ लेता है। और कोई अपनी ही आशंकाओं में कैद होकर रह जाता है। कुछ तय और स्थिर न होना ही भौतिक व आत्मिक विस्तार की नई राहें खोलता है। यही अनिश्चितताओं की खूबसूरती है।’

बाबा आमटे ने भी एक जगह लिखा है- ‘‘समस्याओं को आगे बढ़कर गले लगाइए। उसी तरह जैसे कोई जवां मर्द बैल से डरकर भागता नहीं, आगे बढ़कर उसके सींग पकड़ता है, उससे जूझता है, उस पर काबू करता है। हम सब में ऐसा ही उत्साह, ऐसी ही ललक, ऐसी ही बुद्धि होनी चाहिए, समस्याओं से जूझने के लिए।’’

सफलता और संघर्ष साथ-साथ चलते हैं। चुनौतियां केवल बुलंदियों को छूने की नहीं होती, खुद को वहां बनाए रखने की भी होती है। ठीक है कि एक काम करते-करते हम उसमें कुशल हो जाते हैं। उसे करना आसान हो जाता है। पर वही करते रह जाना, हमें अपने ही बनाए सुविधा के घेरे में कैद कर लेता है। रोम के महान दार्शनिक सेनेका कहते हैं, ‘कठिन रास्ते भी हमें ऊंचाइयों तक ले जाते हंै।

पर हममें से अधिकांश इतने बुद्धिमान, ऐसे उत्साह से भरे नहीं होेते। समस्याओं में छिपे दर्द से बचने के लिए हममें से अधिकांश, उन समस्याओं से कतराने की कोशिश करते हैं, हम उनसे मुंह मोड़ना चाहते हैं, उन्हें अनदेखा करना चाहते हैं, उनके प्रति उपेक्षा का भाव रखना चाहते हैं, उन्हें भूल जाना चाहते हैं। कभी-कभी समस्याओं का अस्तित्व भी है, यह ही नहीं मानते। सोचते हैं, ऐसा रूख अपनाने से शायद समस्याएं अपने आप गायब हो जायेंगी। कभी-कभी इन समस्याओं की उपेक्षा करने, उन्हें भूलने के लिए मादक द्रव्यों का सहारा भी लेते हैं- शराब, सिगरेट, नींद की गोलियां। समस्याओं से आगे बढ़कर जूझने की बजाय हम उनसे बचकर निकल जाने की कोशिश करते हैं उनकी पीड़ा भुगतने की बजाए हम उनसे दूर भाग जाना चाहते हैं।

समस्याओं से कतराने, उनमें छिपी भावनात्मक व्यथा से बचकर निकल जाने की यह प्रवृत्ति ही मनुष्य की तमाम मानसिक रूग्णता का मूल कारण है। ऐसी प्रवृत्ति हम सभी में न्यूनाधिक रूप में विद्यमान है और हम सभी मानसिक रूग्णता के शिकार हैं। कभी कम, कभी अधिक। इसी कारण हम मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ भी नहीं होते। कभी-कभी हम समस्याओं के स्पष्टतः बुद्धितापूर्ण अच्छे समाधान खोजने की चेष्टा करने के बजाय कल्पना लोक में विचरकर उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। ऐसे कल्पना लोक में जो यथार्थ से, वास्तविकता से बहुत दूर होता है। यह भी एक प्रकार से समस्याओं से भागने के लिए एक नशे जैसा होता है। कल्पना लोक में विचरण मानसिक रोगों का सूत्रपात है और समस्याओं में अंतर्निहित पीड़ा से कहीं अधिक दुखदायी, कहीं ज्यादा घातक होता है।

अंग्रेजी में एक शब्द है- ‘न्यूरोसिस’ अर्थात् स्नायु रोग। यह ‘न्यूरोसिस’ स्वयं में एक बहुत बड़ी समस्या होता है- इलाज खुद रोग बन जाता है। हमारा मानसिक विकास अवरुद्ध हो जाता है। दूसरे शब्दों में हम समस्याओं में छिपे दर्द से छुटकारा पाने के लिए जब उनसे अर्थात् समस्याओं से कतराते हैं तो हम अपने मानसिक विकास की राह में स्वयं ही रोड़े डालते हैं।

इसलिए जरूरी है कि हम स्वयं में और अपने बच्चों में मानसिक रूप से स्वस्थ रहने की आदत डालें। उन उपायों को खोजें जिनसे हम अपना यह लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं। हम स्वयं समस्याओं से जूझना, उनसे होने वाले दर्द को सहना सीखें। अपने बच्चों में भी ऐसी ही प्रवृत्ति का विकास करें।

क्या ये कठिन बाते हैं, जिनके लिए हमें कठोर परिश्रम और अभ्यास की जरूरत पड़ती है? जी नहीं, ये बेहद आसान हैं। दस वर्ष का बच्चा भी उन्हें सरलता से अपना सकता है। लेकिन अक्सर बड़े-से-बड़े लोग उन्हें अपनाना भूल जाते हैं और अंततः स्वयं ही अपने पतन का कारण बनते हैं। समस्या यह नहीं कि ये बातें कठिन हैं। बल्कि हम उन्हें अपनाने की इच्छाशक्ति ही नहीं रखते। इन बातों के जरिए ही हम समस्याओं में छिपे दर्द का सामना कर सकते हैं।

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