लेखक परिचय

अंकुर विजयवर्गीय

अंकुर विजयवर्गीय

टाइम्स ऑफ इंडिया से रिपोर्टर के तौर पर पत्रकारिता की विधिवत शुरुआत। वहां से दूरदर्शन पहुंचे ओर उसके बाद जी न्यूज और जी नेटवर्क के क्षेत्रीय चैनल जी 24 घंटे छत्तीसगढ़ के भोपाल संवाददाता के तौर पर कार्य। इसी बीच होशंगाबाद के पास बांद्राभान में नर्मदा बचाओ आंदोलन में मेधा पाटकर के साथ कुछ समय तक काम किया। दिल्ली और अखबार का प्रेम एक बार फिर से दिल्ली ले आया। फिर पांच साल हिन्दुस्तान टाइम्स के लिए काम किया। अपने जुदा अंदाज की रिपोर्टिंग के चलते भोपाल और दिल्ली के राजनीतिक हलकों में खास पहचान। लिखने का शौक पत्रकारिता में ले आया और अब पत्रकारिता में इस लिखने के शौक को जिंदा रखे हुए है। साहित्य से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं, लेकिन फिर भी साहित्य और खास तौर पर हिन्दी सहित्य को युवाओं के बीच लोकप्रिय बनाने की उत्कट इच्छा। पत्रकार एवं संस्कृतिकर्मी संजय द्विवेदी पर एकाग्र पुस्तक “कुछ तो लोग कहेंगे” का संपादन। विभिन्न सामाजिक संगठनों से संबंद्वता। संप्रति – सहायक संपादक (डिजिटल), दिल्ली प्रेस समूह, ई-3, रानी झांसी मार्ग, झंडेवालान एस्टेट, नई दिल्ली-110055

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-अंकुर विजयवर्गीय-

pakistan

पाकिस्तान में साल 2011 में बने इस कानून के बावजूद, कि तेजाब से हमला करने वालों की सजा में आजीवन कैद तक शामिल है, तेजाब फेंककर शरीर जलाने के मामलों में तेजी से इजाफा हुआ है, खास तौर से 1990 के दशक से। औरतें इसका ज्यादातर शिकार बनती हैं। साल 2000 के बाद से हर साल पाकिस्तान में इसके औसतन 100 मामले दर्ज किए जा रहे हैं। इंसानी हक-हकूक की लड़ाई लड़ने वाली जमातें दावा करती हैं कि यह आंकड़ा ज्यादा है। वह सालाना 400-700 पीड़िताएं बताती हैं। दरअसल, कई मामले दर्ज ही नहीं होते, तो कई खबर नहीं बनतीं। बहरहाल, ज्यादातर मामले दक्षिणी पंजाब से आते हैं। कई बेहद दर्दनाक दर्ज मामलों में से एक वारदात बताती है कि साल 2012 में पाकिस्तान में एक पंद्रह साल की बच्ची की मौत तेजाबी हमले से हो गई। उसके घर के ही सदस्य ने यह इल्जाम लगाते हुए उस पर हमला किया कि वह लड़कों को ताकती रहती है। पाकिस्तान में ‘इज्जत’ का एक अजीब ही मतलब है।

हाल ही में बलूचिस्तान सूबे में तेजाब फेंकने के कई मामले दर्ज किए गए हैं। पहले इस सूबे में यह जुर्म न के बराबर था। मगर अब यहां की औरतें खौफजदा हैं, क्योंकि कुछ ही दिनों पहले तीन औरतों को उनके ही घरों में तेजाबी हमले का शिकार बनाया गया। यही नहीं, एक व्यस्त बाजार से गुजर रही दो लड़कियों पर मोटरसाइकिल सवारों ने तेजाब फेंका और रफूचक्कर हो गए। इलाकाई लोगों का मानना है कि इसमें कुछ ‘मजहबी’ जमातें शामिल हो सकती हैं। इन हमलों के पीछे कौन है, यह जानने की बजाय नसीहत दी जा रही है कि औरतें सार्वजनिक जगहों से परहेज करें। साफ है कि कानून का अमल अब तक नहीं हुआ और यह अपने आप में नाकाफी है। तभी तो मुजरिम बेखौफ होकर चौक-चौराहे पर घूमते दिखते हैं। कुछ दिनों पहले कराची में तेजाब के हमले के आरोपी चार लोग सिटी कोर्ट से फरार हो गए। पुलिस उन्हें पकड़ने में अब तक नाकाम है। इससे पहले तो अदालत परिसर में ही दो लोगों ने दो शख्स पर तेजाब फेंका था। पुलिस-प्रशासन की मुस्तैदी और अदालत के नजीरी फैसले से ही ऐसे जुर्म रुक सकते हैं।

ऐसा नहीं है कि यह समस्या सिर्फ पाकिस्तान में है। भारत सहित दक्षिण एशियाई देशों में एसिड अटैक (तेजाबी हमला) बेहद गंभीर समस्या है। यह हमला सिर्फ महिला के चेहरे को ही खराब नहीं करता, बल्कि उसकी आंखों की रोशनी छीन लेता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस हमले के बाद समाज उस पीड़िता को दोयम दर्ज का नागरिक बना देता है। हो सकता है उसकी जान ना जाए, मगर जिंदगी बेहद बोझिल और दर्दनाक होकर रह जाती है। इस हमले के बाद जिस्‍म पर लगे घाव तो सबको दिखते हैं, मगर पीडि़ता के ज़हन पर लगे घाव किसी को नजर नहीं आते। आत्मनिर्भर और जिंदादिली से भरपूर एक औरत देखते ही देखते असहाय, दूसरों पर आश्रित महिला बन जाती है। स्वयंसेवी संस्था एसिड सरवाइवल ट्रस्ट इंटरनेशनल (एएसटीआई) के मुताबिक भारत में हर साल एसिड अटैक के करीब 500 मामले होते हैं। हालांकि इस जघन्‍य और नरकीय घटना के आधिकारिक आंकड़ें तो मौजूद नहीं है, मगर भारत में पिछले एक दशक में तेजाबी हमलों में बढ़ोत्तरी हुई है। बीबीसी ने पिछले कुछ दिनों में तेजाबी हमलों की शिकार हुई महिलाओं से बात कर उनकी आप बीती जानने की कोशिश की। जितनी भी पीड़िओं से बात की गई, सबने एक ही बात कही कि तेजाब से हुआ हमला जिस्म ही नहीं ज़हन को भी अंदर तक छलनी कर जाता है।

एसिड सरवाइवल ट्रस्ट इंटरनेशनल के अनुसार दुनिया के करीब 23 देशों में हाल के वर्षों में एसिड हमलों की घटनाएं हुईं। इनमें अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया जैसे विकसित देशों के भी नाम हैं। लेकिन इन देशों में दूसरी जगहों की अपेक्षा हमलों की संख्या बेहद कम है। महिलाओं पर एसिड हमलों की सबसे अधिक घटनाएं भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश के अलावा कंबोडिया में दर्ज की गई हैं। आमतौर पर इस हमले की शिकार महिलाएं होती हैं, या फिर ये कहें कि इस हमले की शिकार महिलाएं ही होती हैं, तो कोई अतिश्‍योक्ति नहीं होगी। घरेलू हिंसा हो या फिर टूटा प्रेम संबंध हर मामले में गाज महिला पर ही गिरती है। कई मामलों में देखा जाता है कि दोषी जमानत पर रिहा हो जाते हैं और उनकी जिंदगी आगे बढ़ जाती है। जबकि पीड़ित की जिंदगी वहीं की वहीं थम कर रह जाती है। लेकिन इस सब के बावजूद भारत जैसे देशों में एसिड अटैक के मामले सुर्खियों से दूर और सरकारी निगाह से परे कहीं भटकते रहते हैं। एसिड या तेजाब से हमला होने की सूरत में भारत में कोई सशक्त कानून नहीं है। यूं तो ऐसे अपराध भारतीय दंड संहिता की धारा 329, 322 और 325 के तहत दर्ज होते हैं। लेकिन इसके अलावा पीड़ितों के इलाज, पुनर्वास और काउंसलिंग के लिए भी सरकार की तरफ से कोई व्यवस्था नहीं है, जबकि ऐसे हादसों में पीड़ित को अपूरणीय क्षति उठानी पड़ती है।

एक सर्वे के मुताबिक भारत चौथा ऐसा देश है, जहां महिलाओं को सबसे ज्यादा खतरा है। चाहे वह किसी भी जाति, धर्म या वर्ग की हों। जनवरी 2002 से अक्टूबर 2010 तक भारत में एसिड अटैक के 153 मामले सामने आए। इनमें से 34 फीसदी मामले ऐसे थे, जिसमें युवती ने शादी के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। पिछले कुछ सालों में एसिड अटैक के मामले इस कारण भी बढ़े हैं क्योंकि यह सस्ता व आसानी से सुलभ था बजाय किसी और हथियार के। एसिड अटैक के बढ़ते मामलों के कारण पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने कुछ अहम फैसले किए। शीर्ष अदालत ने कहा कि ऐसे हमले में दोषी पाए गए लोगों का जमानत नहीं मिलेगी। पीड़िता को बढ़ा मुआवजा देने व उसके पुनर्वास के भी निर्देश जारी किए गए। यहां तक कि तेजाब की खुलेआम ब्रिकी रोकने का निर्देश भी दिया गया। अब तेजाब की ब्रिकी के लिए विक्रेता को तेजाब खरीदने का सही कारण भी बताना होगा। विक्रेता को ग्राहक का नाम, पता व टेलीफोन नंबर भी रिकार्ड में रखना होगा। तेजाबी हमले की शिकार ज्यादातर गरीब परिवारों की युवतियां थीं, जिनके पास अपना इलाज कराने के लिए पर्याप्त पैसे भी नहीं थे। सरकार को अब इनके प्रति मानवीय होना होगा। उन्हें निर्धारित मुआवाज राशि तो देनी ही है। उनका इलाज भी कराना होगा। समाज के लोगों को भी इनके प्रति अपना नजरिया बदलना होगा। इससे इनकी जिंदगी के कुछ दर्द कम होंगे और जीवन जीने की उम्मीद जगेगी।

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