लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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-अशोक गौतम-    third front cartoon
बरसों से महसूस होने का सारा सिस्टम खटारा होने के बाद भी कई दिनों से मैं महसूस कर रहा था कि जब-जब पत्नी की चिल्ल-पों बंद होती और अपने कानों को जरा चैन देने की कोशिश में होता तो उनके घर के भीतर से किसी चीज को ठोकने-बजाने की आवाजें आने लगतीं। पत्नी की चिल्ल-पों का सिलसिला तो खैर विवाह के छह महीने बाद ही शुरू हो गया था जिसे तीन बच्चे होने के बाद अब मैंने उसे गंभीरता से लेना बंद कर दिया है।
अब साहब! आप ही कहो, एक अकेला मर्द विवाह के बाद क्या क्या गंभीरता से ले? वह बीवी को गंभीरता से या ले बच्चों को? वह अपनी सालियों को गंभीरता से ले या फिर अपने साले को। ऊपर से सास सुसर अलग! उन्हें आप गंभीरता से लें, या न पर उनके सामने उनके प्रति गंभीर होने की सशक्त नौटंकी तो हर हाल में करनी ही पड़ती है। वैसे भी ये आज का जमाना नौटंकी का ही होकर रह गया है।
ऐसे में मेरे पुराने घरवाले और मेरे कुंवारेपन के वक्त के दोस्त बेचारे इग्नोर हो गए हैं, हाशिए पर चले गए हैं। पर सच कहूं, उनके हाशिए पर जाने के लिए मैं कतई जिम्मेदार नहीं हूं। वे ही असल में अपने इस किए की सजा भुगत रहे हैं। न वे मुझे विवाह करने के लिए उकसाते और न आज हाशिए पर जाते। अपने कर्मों की सजा तो साहब सभी को देर सबेर मिलकर ही रहती है, सो वे भी भुगत रहे हैं।
हमारे जैसों के समाज के मनुष्यों के हाथ हों या न पर उनके कहीं न कहीं विवाह की रेखा भगवान जरूर खींच देता है।
असल में मैं विवाह करने को लालायित तो था पर परंपरागत स्टाइल के विवाह से मुझे बास आती थी, सो मैं प्रेम विवाह करना चाहता था। भले ही कहीं मेरा उस वक्त किसीसे प्रेम नहीं था। इससे पहले कि मैं जैसे कैसे मार मूर खा, अपना सिर टांगें तुड़वा प्रेम का कोई चांस अवेल करता, मां-बाप ने मेरा ये चांस खराब कर जबरदस्ती मेरा परंपरागत विवाह कर डाला। मां बाप की इस महागलती के लिए मैं जब तक इस पत्नी के साथ रहूंगा, तब तक तो उनको माफ नहीं करूंगा, पर कहीं अगर गलती से अगले जन्म में भी ये ही मेरी पत्नी फिर बनी तो तब भी मैं अपने मां बाप का माफ नहीं करूंगा, चाहे जो हो जाए सो हो जाए। दुनिया मुझे चाहे जो कहे सो कहे!
मां-बाप हों तो होते रहें। जो मां-बाप अपने बच्चों के पैर पर कुल्हाड़ी ढोल नगाड़ों की आवाज में अपने बेटे की चीख दबा मारें, वे काहे के मां बाप? अब वे ये शिकायत करते हैं कि मैं उनके प्रति उतना गंभीर नहीं जितना अपने सास-ससुर के प्रति गंभीर हूं तो उसमें मेरा कोई दोश नहीं। पर हे मेरे मां बाप! अब अपको कैसे कहूं कि मैं तो विवाह के बाद ससुराल वालों के आगे पूरी तरह सरेंडर कर चुका हूं या कि मुझसे सरेंडर करवाया जा चुका है। अब तो मुझे धुंधला सा बस इतना भर याद है कि मैं कभी कुंवारा था! मेरे भी मां बाप थे। मेरे कुछ कुंवारेपन के दोस्त थे जो कभी चौपाल पर बैठ बतियाया करते थे।
हे मेरी पत्नी के ससुराल वालों! आपके प्रति गंभीर दिखने का मौका तो तब मिले जो मैं पत्नी के रिश्तेदारों की ओर से अपनी गंभीरता से मुक्त होऊं!
आखिर आज जब पत्नी की चिल्ल-पों बंद हुई तो हैरानी, उनके घर से किसी चीज को ठोंकने बजाने की आवाज भी बंद लगी तो मैं एक ही सांस में उनके घर जा पहुंचा। देखा तो वे इतमिनान से सिगार लगाए बैठे थे। सामने उन्होंने कुछ उल्टा पुल्टा सा जोड़ रखा था। राम जाने उन्होंने क्या बनाया था। उनके बनाए में मेरी दिलचस्पी इससे पहले कि और भी गहरी होती मैंने उनसे पूछा,‘ और मित्र! लगता है काम खत्म हो गया!’
‘हां! बड़ी मुश्किल से काम निपटा! अब कहीं जान में जान आई! ’
‘पर आपने यह बनाया क्या? देखो भाई साहब, अपनी समझ तो अब पानी भरने जा चुकी है। ये मॉडर्न आर्ट-वार्ट तो छोड़ो. अब तो बस गृहस्थ आर्ट का ज्ञान ही बचा है। आपने जो बनाया, कमाल का है! पर ये है क्या? टांगों की जगह हाथ, सिर की जगह पेट, पेट की जगह पैर, आंखों की जगह नाक… पीठ की जगह मुंह… राम कसम! मेरे तो आपकी इस कृति ने होश उड़ा दिए… इससे पहले कि मैं पागल हो जाऊं मेरी जिज्ञासा शांत करो हे कृतिकार!’ तो वे भीतर ही भीतर हंसते बोले,‘ शुक्र मनाओ, समय रहते जो जुड़ गया सो जुड़ गया! वरना अबके इज्जत को वाट लग जाता! इनको जैसे कैसे भी जोड़ना कोई खाला जी का बाड़ा नहीं था! ’
‘ पर ये बना क्या?’
‘ तीसरा मोर्चा!’ वे चीखते चिल्लाते उठेे और पत्रकारों को बुलाने निकल पड़े।

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