लेखक परिचय

डॉ. मनोज जैन

डॉ. मनोज जैन

लेखक जैन महाविद्यालय, भिण्ड में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक है;

Posted On by &filed under धर्म-अध्यात्म.


डॉं. मनोज जैन

सारांश : भारतीय दर्शन में परमात्मा को समस्त क्लेशों की शान्ति का उपाय स्वीकार किया है, और आस्था तत्व से ऐसा ही प्रतीत होता है कि परमात्म तत्व के प्रति अगाध श्रध्दा। वास्तव में परमात्मा या प्रकृति दौनों ही तत्वों के प्रति आस्था व्यक्ति के तम, रज या सत गुण से प्रभावित होती है। आधुनिक युग में भी ऐसा साहित्य बहुतायाद में लिखा जा रहा है जो प्रकृति और परमात्मा दौनों ही के प्रति आस्था को व्यक्त करता है। योग गुरुओं, धर्म गुरुओं मेनेजमेण्ट गुरुओं की रचनाएँ आस्था तत्व की स्थापना करती हुयी प्रतीत होती है।

आस्था एक ऐसा तत्व है जिसके बिना हर बुनियाद खोखली है। विश्वास के ही प्रगाढ रुप को आस्था कहा गया है। लौकिक और पारलौकिक दौनों ही सम्बन्ध आास्था के अभाव में अधूरें हैं। आस्था दर्शन का मूल तत्व है। किसी भी सभ्यता और संस्कृति की नीव ही उसके अनुयायिओं की आस्था पर टिकी रहती है। भारतीय दर्शन के चार प्रमुख तत्व माने जाते हैं।

1. हेय- अर्थात दु:ख का वास्तविक स्वरुप क्या है जो हेय अर्थात् त्यागने योग्य है।

2. हेयहेतु- अर्थात दु:ख का स्त्रोत क्या है।

3. हान – जहां दु:ख का नितान्त अभाव हो जाता है उसे हान कहते हैं।

4. हानोपाय – दु:ख के नितान्त अभाव की स्थिति को प्राप्त करने का उपाय क्या है।

इन प्रश्नों का चिन्तन करने पर तीन बातें स्पष्ट होती हैं।

1. चेतन : चूंकि जीव दु:ख से मुक्ति के प्रयत्न करता है इससे यह प्रकट होता है कि दु:ख जीव की मूल प्रवृति नहीं है। इस चेतन के पूर्ण ज्ञान से जीव हान की अवस्था को प्राप्त कर सकता है।

2. प्रकृति : प्रकृति चेतन तत्व से भिन्न है एंव यह ही हेयहेतु है। अर्थात दु:ख की उत्पत्ति प्रकृति से ही उत्पन्न होती है।

3. परमात्मा : चेतन और प्रकृति के अलावा एक अन्य तीसरा तत्व है जिसमे समस्त प्रकार के दु:खों का अभाव है। और इसकी प्राप्ति का उपाय ही हानोपाय है। अर्थात परमात्मा में आस्था ही मनुष्य के दु:खों की निवृति का एकमात्र और चिरकालीन उपाय है।

इसलिये प्राचीन काल से ही आस्था तत्व भारतीय साहित्य की आत्मा में समाया हुआ रहा है। और इसी आस्था तत्व के सहारे से भारतीय समाज ने जीवन दु:खों से मुक्ति का मार्ग खोजा हुआ है। यही कारण है कि ईश्वर के प्रति आस्था के सहारे एक सन्ंयासी कंटक वन में भी वस्त्रों को त्याग कर भीषण शीत ऋतु के प्रकोप को बिना किसी बाधा के आराम से रह लेता है।

भगवान श्री कृष्ण श्रीमद्भगवद्भीता के अध्याय 7 के श्लोक 21 में कहते हैं; जो जो सकामी भक्त जिस जिस देवता को श्रध्दा से पूजना चाहता है उस उस भक्त मैं उस ही देवता के प्रति श्रध्दा को स्थिर करता हॅू। यह श्रध्दा आस्था से ही उपजती है। आस्था यानि आपका विश्वास और विश्वास भी साधारण नहीं दृढ़ विश्वास। जब आप किसी के प्रति भी दृढ़ विश्वास रखते हैं। तो आप श्रध्दा से अभिभूत हो जाते है। अब यह आस्था चेतन से हो, अचेतन से हो, या परमात्मा से हो। यह व्यक्ति के सत्, तम, अथवा रजो गुण पर निर्भर करता है। यदि आप सतो गुण के धनी के हैं तो आप परमात्मा में आस्था रखते हैं, यदि आपके अन्दर तमो गुण की प्रधानता है तो आप मूर्ति तक ही सीमित रह जाते हैं, तथा यदि आप रजोगुण के धनी हैं तो आप पुजारी के प्रति ही आस्थावान रहतें हैं। पुजारी जड़ भी है और चेतन भी यहां भौतिक लाभ भी हो सकता है और आस्था को चोट भी पहुंच सकती है। प्रतिमा केवल जड़ है उसके प्रति आस्था से आपका नफा नुकसान कुछ नही होने वाला है। पर परमात्मा तो सदैव चैतन्य है उनके प्रति आस्था से हमें सदैव सकारात्मक उर्जा की अनुभूति होती ही है।

आस्था तत्व की विविध विद्वानों नें विविध व्याख्यायें की हैैं। जीवन विद्या के प्रणेता बाबा नागराज आस्था को पारिभाषित करते हुये कहते हैं कि आस्था के मायने है कि एक ऐसी चीज में विश्वास जिसे न तो देखा ही है और न ही जाना ही है। यानि अज्ञात में विश्वास। वहीं स्वामी विवेकानन्द कहते है कि तुम ईश्वर में विश्वास रखते हो या नही यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि स्वंय में विश्वास।

यद्यपि वर्तमान साहित्य से आशय प्रकट होता है कि विगत एक दशक में की गयी साहित्य रचनाएं। परन्तु आस्था तत्व साथ में जुड़ जाने से इसे किसी काल की रस्सी से नहीं बांधा जा सकता हैं। क्यों कि हमारे सम्पूर्ण आस्था वांग्मय को प्रकाशित करने वाले सूर्य देव तो हमारे वेदों में ही विराजमान हैं वहीं से शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त,छन्द और ज्योतिष की किरणे फूट रहीं है। मींमासा, वेदान्त, न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग रुपी षट दर्शनों की छटाओं के अभाव में किसी भी प्रकार से आस्था तत्व को निरुपित करना संभव नहीं हैं। क्योंकि यह तो काल से परे रचनाएं हैं हर काल में यह प्रांसगिक रहीं हैं और रहेगीं।

यदि वर्तमान साहित्य पर विचार किया जाये तो भारतीय दर्शन के आलोक में विभिन्न विचारकों की रचनाएँ आज भी न केवल प्रासगिंक है अपितु उन्हौने साहित्य के क्षेत्र में भी अपनी मजबूत स्थिति कायम रखी हुयी है। रामकृष्ण विवेकानन्द भावधारा का सम्पूर्ण साहित्य जो आज भी निरन्तर प्रकाशित हो रहा है न केवल ईश्वरीय आस्था को प्रेरित करता है अपितु मानव की स्वंय में आस्था के लिये भी प्रेरित करता है। इसी प्रकार गीता प्रेस गोरखपुर, आर्चाय श्रीराम शर्मा का कालजयी साहित्य हमें प्रेरित करता हैं ओशो साहित्य भी आस्था के विषय पर अपनी जीवन्तता बनाये हुये है। परमहंस योगानन्द की पुस्तक एक योगी की आत्मकथा एक शताब्दी बीत जाने के बाद भी साहित्य के क्षेत्र में अपनी मजबूत पकड़ बनाये हुये है। संत आशाराम बापू, सन्त मुरारी बापू, बाबा रामदेव, सहित अनेको महापुरुष सत्साहित्य के माध्यम से भारतीय समाज में ईश्वरीय आस्था की अलख जगाये हुये हैं।

हमारे देश को प्राचीन काल से ही भारत माता कहा जाता है हमने अपनी मातृभूमि का जागृत देवता के रुप में माना है। और इसीलिये ऋग्वेद से लेकर आज तक भारतीय साहित्य में मातृभूमि के प्रति आस्था तत्व कमोवेश बना हुआ है। अनिल माधव दवे ने अपनी लघु पुस्तिका शताब्दी के पाँच काले पन्ने 1900-2000 में भारतमाता के प्रति हुये पाँच प्रमुख कुठाराघातों के उदाहरणों से राष्ट्रदेवता के प्रति जन समुदाय की सो रही आस्था को झकझोरने का प्रयास किया है। वह लिखते हैं कि प्रजातंत्र की इस मातृभूमि में 25 जून, 1975 की मध्यरात्रि में सत्ता के चाटुकारों और दलालों ने जनतंत्र के साथ बलात्कार किया। मध्य रात्रि में सोते हुए भारत के गणतंत्र पर जो हिटलरी हमला हुआ, वह गत शताब्दी का चौथा काला पन्ना है। इसे लगानेवालों को भूलना स्वयं में बड़ा पाप है। लेखक पाप शब्द के माध्यम से भारतीयों की राष्ट्रीय आस्था को जगाना चाहता है। राष्ट्रीय आस्था को प्रेरणा देने वाली कई काव्य रचनाएँ इस दशक में लिखी गयी है। कवि हरिओम पवार ने अपनी काव्य रचनाओं में मातृभूमि के प्रति आस्था तत्व को सदैव प्रकट किया है। भिण्ड जिले के चाचर जैसे छोटे से ग्राम से निकल कर देश भर मे अपनी कविताओं की खुशबू विखेर रहे युवा कवि कमलेश शर्मा की रचना ”पीर किससे कहें” में राष्ट्रीय आस्था का सैलाव उमड़ा दिखायी देता है। आज के ऐसे दौर में जब सिनेमा के गीतो में भी श्रव्य तत्व का अभाव होकर दृश्य तत्व ही रह गया है, ऐसे माहौल में कवि कमलेश शर्मा के गीतों में देश, समाज, संस्कृति और धर्म के प्रति आस्था की प्रगाढता सम्बल प्रदान करती है। काव्य की यह विशेषता होती है कि वह शब्दों के द्वारा ही चित्रण करता है इसकी बानगी देखिये

”आज क्यों भीष्म चुप, क्यों नहीं रोष है?

रक्त में मिल गये अन्न का दोष है

आज आदर्श-दर्पण यहाँ है क्षार-क्षार,

पीर किससे कहें?

भीष्म के मौन के माध्यम से कवि हमारी संदिग्ध आस्था पर कुठाराघात करता है। हम सब अन्याय को देख कर सह कर भी मौन रहते है इसका कारण कहीं यह तो नहीं कि हम अपने छोटे-छोटे लालचों की खातिर देश के प्रति होने वाले बड़े बडे भ्रष्ट्राचार की भी अनदेखी करते रहते हैं। यही नहीं अपनी एक अन्य रचना में वह देश के प्रति आस्था प्रकट करते हुये कहते हैं गीता और वेदों के उदाहरणों से अपनी संस्कृति और संस्कारों के की महानता के प्रति आस्था जगाने वाला साहित्य आज भी लिखा जा रहा है। और यह विषय तो चिर नूतन है।

करता हो राजा घोटाले हमने अतीत में सुना नहीं।

लूटने राष्ट्र सम्पदा हेतु हमने उनको चुना नहीं ॥

भारत समस्त विश्व में सबसे महान है॥

गीता यहाँ सदैव कर्म योग सिखाती।

निष्काम-भाव कर्म का है मार्ग दिखाती॥

वेदों की ज्ञान ज्योति प्रज्ज्वलित है आज भी।

मानस सभी को प्रेमपूर्ण भक्ति बताती।

संसार को ही शून्य का कराया ज्ञान है

भारत समस्त विश्व में सबसे महान है॥

आधी सदी पूर्व लिखी गयी पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की कविताएँ जब ”मेरी इक्यावन कविताएँ” के रुप में बाजार में आयी तो इसे हाथों हाथ लिया गया। कवि वाजपेयी जब हिन्दू का परिचय देते है तो उनके शब्दों की शक्ति से ही हिन्दुत्व को बल मिलता है और हिन्दुत्व के प्रति आस्था बलवान होती है। वह कहते है।

मेरे वेदों का ज्ञान अमर, मेरे वेदों की ज्योति प्रखर।

मानव के मन का अंधकार, क्या कभी सामने सका ठहर?

मेरा स्वर नभ में घहर-घहर, सागर के जल में छहर-छहर।

इस कोने से उस कोने तक, कर सकता जगती सौरभमय।

हिन्दू तन-मन, हिन्दू जीवन, रग-रग हिन्दू मेरा परिचय॥

व्यंग्य, साहित्य की लोकप्रिय और शक्तिशाली विधा है इसके माध्यम से शरदजोशी जी आम आदमी की सच्चाई में आस्था व्यक्त करते थे। नरेन्द्र कोहली ने भी 1998 में प्रकाशित ”इश्क एक शहर का” जैसे व्यंग्य संग्रह के द्वारा रामलुभाया के माध्यम से आम आदमी में ही आस्था प्रकट की है। जनतंत्र के सिध्दांत में वह कहते हैं, ” तुमने कहा था न कि सत्य के अनेक पक्ष हैं। दूसरा पक्ष भी देखो।” मैनें कहा, ”रावी के इस पार बहुमत का सम्मान नहीं होता और उस पार अल्पमत की उपेक्षा होती है। इसलिए जनतंत्र न इस ओर है, न उस ओर।” जनतंत्र में आस्था का जितना सटीक उदाहरण है, उतनी ही जनतंत्र के लिये लेखक की प्यास भी है, और यही प्यास तमाम अंधकारों में रोशनी के प्रति आस्था का एक उदाहरण भी है। क्यों कि लेखक जब लिखता हैं तो वह निराशा का वर्णन इसी आशा में करता है कि एक न एक दिन निराशा के बादल छटेंगे ही और आशा की किरण फूटेगी ही फूटेगी।

डॉ. यतीन्द्र नाथ शर्मा ने अपने ग्रन्थ ”ब्रह्म जिज्ञासा” जो अभी अभी वर्ष 2008 में ही प्रकाशित हुआ है और जिसके लेखन का में पल-पल का साक्षी रहा हूं, में परमात्मा के प्रति आस्था तत्व को बडे सुन्दर शब्दों में प्रकट किया है। ग्रन्थ की हर पकृति चैतन्य के प्रति आस्था से ओत- प्रोत है। यही आस्था जीवात्मा को परमात्मा से मिला देती है। डाँ. यतीन्द्र नाथ शर्मा का ही उपनिषदों पर भाष्य के रुप में इसी वर्ष 2010 में ‘सब में वही समाया’ ग्रन्थ प्रकाशित हुआ है। उक्त ग्रन्थ में कृतिकार ने कदम-कदम पर आत्मतत्व को परमात्मा के प्रति आस्था के लिये प्रेरित किया है। सरल बोधगम्य शैली में लिखा गया यह ग्रन्थ उपनिषदों जैसे गूढ विषय को भी सरल और प्रेरक रुप में प्रस्तुत करता है।

यँ तो योग विषय पर वर्षो से लिखा जा रहा है पर इस दशक में बाबा रामदेव ने जो योगक्रांन्ति का सूत्रपात किया है उसका विराट प्रभाव योग साहित्य पर पड़ा है। इस दशक में योग और अध्यात्म पर एक सैकड़ा से अधिक पुस्तकें आयीं है जो परमात्मा और जीवात्मा में आस्था तत्व को निरुपित करती हैं। आस्था के अभाव में योग की प्रथम सीढ़ी पर भी नहीं चढ़ा जा सकता है। यही नहीं योग विषयक कई पुरानी पुस्तकों के नवीन संस्करण भी बाजार में आये है। जिनमे परमहंस योगानन्द विरचित योगी कथामृत या एक योगी की आत्मकथा प्रमुख है। इस पुस्तक में आस्था तत्व को गुरु केन्द्रित करने पर बल दिया है। व्यक्तित्व विकास केन्द्र के श्री श्री रविशंकर की पुस्तकें भी वर्तमान में अत्यन्त लोकप्रियता की सीढ़ी पर चढ़ी है जिनमें भी आस्था तत्व की ही प्रधानता है।

बेस्टसेलर पुस्तक ‘संपूण लक्ष्य’ के लेखक सर श्री अपनी नवीन पुस्तक स्वसंवाद का जादू में आस्था तत्व को बिल्कुल अनौखे ढ़ंग से प्रस्तुत करते है। वह कहते हैं कि ईश्वर को कोमल फूल चढ़ाना ठीक है, ईश्वर से क्षमा मांगना अच्छा हैं?, पर सब को क्षमा कर ईश्वर को निर्मल मन चढ़ाना उत्तम है। आस्था तत्व का एक अन्य प्रयोग देखिए, अपना काम खुद करना ठीक है, अपना काम करके दूसरों की मदद करना अच्छा है, हर काम को ईश्वर की अभिव्यक्ति समझना उत्तम है।

एक अन्य लेखक शिव खेड़ा जिन्हौने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त की है अपनी बेस्टसेलर पुस्तक ‘जीत आपकी’ में अनेकों बार आस्था तत्व की आवश्यकता पर जोर डालते है और अपनी आस्था की प्रगाढता पर बल देतें है।

”लगे रहो मुन्ना भाई ” नामक फिल्म ने गांधी दर्शन को गांधीगीरी जैसा एक निहायत ही चालू नाम भले ही दिया हो, परन्तु गाधीं जी की स्वयं की लिखी और उनके ऊपर लिखी अन्य लेखकों की किताबें भी इसी दशक में आयीं हैं और युवाओं के बीच खासी लोकप्रिय हुयी हैं। गांधी साहित्य में राजनीति को नैतिक आचरण से मर्यादित किया गया है। तथा परमात्मा के प्रति अगाध आस्था गांधी दर्शन की विशेषता है।

पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे.अब्दुल कलाम की लिखित पुस्तके जो इसी दशक में प्रकाशित हुयीं हैं। उनमें ईश्वर के प्रति आस्था को ही जीवन की प्राथमिकता निरुपित किया है । वह कहते हैं कि ईश्वर उन्हीं को प्रेम करता है, जो दृढ़ और स्थिर हैं। ऐसे लोग भी हुए हैं, जिन्हौनें अपने ऊपर आने वाली हर विपत्ति का मुकाबला करते हुए भी अपने लक्ष्य का मार्ग नहीं छोड़ा-चाहे वह साम्राज्य, संगीत, आस्था, गणित जो भी रहा हो।

युवा लेखक विनय सूर्या ने अपनी पुस्तक मोक्ष द्वार में भी भगवान कृष्ण के प्रति तथा अपने गुरुदेव के प्रति आस्था तत्व को निरुपित किया है।

अन्त में यह समझना बहुत आवश्यक है कि किसी भी काल में आस्था तत्व के अभाव में साहित्य तो क्या कोई भी सृजन संभव नहीं हैं। यह दूसरी बात है कि यह आस्था तमो गुण, रजो गुण या सतो गुण किससे प्रभावित है।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz