लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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192 किलोमीटर लंबी भारत-पाक सीमा पर युद्ध के हालात कमोवेश निर्मित हो गए हैं। भारत में सैनिक और ग्रामीण कई दिनों से पाक फौज की गोलाबारी से हताहत हो रहे हैं। अब पाकिस्तान के भी 15 सैनिक व नागरिकों के मारे जाने की खबर है। इसी खबर से उत्साहित होकर अब तक मौन रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महाराष्ट्र की एक चुनाभी सभा में अपनी चुप्पी तोड़ दी। बारामती में उन्होंने कहा कि ‘लोग मेरे इरादे जानते हैं,लिहाजा मुझे बोलकर बताने की जरूरत नहीं है। जब जवान को बोलना होता है तो ट्रिगर पर उसकी अंगुली बोलती है और वे इसी भाषा में बोलना जारी रखेंगे‘। मसलन मोदी ने इस बयान में साफ कर दिया है कि वे मजबूत इरादों के हैं और वे अब पाकिस्तान को बख्शेंगे नहीं। कुछ ऐसे ही लफ्जों का इस्तेमाल गृह मंत्री राजनाथ सिंह और रक्षा मंत्री अरूण जेटली ने भी किया है। अंतरराष्ट्रिय सीमा और नियंत्रण रेखा पर पाक फौज जिस तरह से बेवजह,बैखोफ होकर आतंक का खूनी खेल रही है,उसे इसी भाषा में जवाब देने और सीमा पर जवाबी सैनिक कार्रवाई करने की जरूरत थी। कहावत भी है,लातों के भूत बातों से नहीं मानते। बावजूद सीमा पर निर्णायक लड़ाई की उम्मीद कम ही है।

नरेंद्र मोदी वैश्विक पुख्ता रणनीतियों के चलते लगता है कि पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रियकरण करने मे कामयाब नहीं होगा। हालांकि वह संयुक्त राष्ट्र की देहरी पर दस्तक दे चुका है। नतीजतन संयुक्त राष्ट्र की महासचिव बानकी मून को कहना पड़ा कि दोनों देश आपसी बातचीत से मुद्दे का हल निकालें। लेकिन मजबूत इरादों और दृढं इच्छाशक्ति रखने वाले मोदी ने मून के संदेश को नजरअंदाज कर दिया। इसके उलट दोहराया कि आतंक और नियंत्रण रेखा पर उल्लघंन की वारदातों के चलते भारत कोई वार्तालाप नहीं करेगा। इसे हम पाक को मुंहतोड़ जबाब देने का नया दृष्टिकोण भी मान सकते हैं और पाक बलों द्वारा भारत के निहत्थे नागरिकों को मारने के विरूद्ध करूणा और प्रतिकार का भाव भी मान सकते हैं। मोदी से अवाम की यही अपेक्षा थी। चंद लोग भले ही कहते रहें कि मोदी विकास का एजेंडा लागू करने के बहाने सत्ता में आए हैं। यह पूरा सच नहीं है। मोदी को जनता ने वोट पाक को सबक सिखाने और भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने के लिए भी दिए हैं। क्योंकि बाजारवाद से जुड़ा विकास क्रम एक ऐसा अनवरत सिलसिला है,जो कभी किसी मुकाम पर पहुंचने वाला नहीं है।

पाक में चुनी हुई सरकार को लाचार बनाए रखने की कोशिश हमेशा वहां की सेना और गुप्तचर संस्था आईएसआई करते रहे हैं। इसलिए जब भी कोई पाक का प्रधानमंत्री भारत से संबंध सुधारने की पहल को तब्बजो देता है तो उसमें रोड़े अटकाने का काम शुरू हो जाता है। संबंध तनावपूर्ण बने रहें इसीलिए सेना बेवजह गोलाबारी करके आतंकवादियों की भारतीय सीमा में घुसपैठ कराने की फिराक में भी रहती है,जिससे जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में अशांति और हिंसा बनी रहे। हर साल जाड़ा शुरू होने से पहले पाक भारत में घुसपैठ की मुहिम तेज कर देता है। क्योंकि बर्फबारी होने के बाद रास्ते बंद हो जाते हैं,लिहाजा घुसपैठ भी नामुमकिन हो जाती है।

इस मर्तबा केंद्र में सत्ता परिवर्तन के बाद एक तो हालात बदल गए हैं,दूसरे विश्व-पटल पर मोदी छाते दिख रहे हैं। विदेश नीति में मोदी कुछ इस तरह के मोड़ दे रहे हैं कि पाक को मदद करने वाले देश उनके प्रभाव में आकर भारतीय हितों की रक्षा करें। अमेरिका में मोदी की जिस तरह से आवभगत हुई, उनकी मौजदूगी का जैसा डंका अमेरिका की धरती पर पिटा, उससे पाक सरकार, फौज और खुफिया तंत्र तीनों ही हैरान-परेशान हैं। मंगल अभियान की सफलता कई नए युद्धपोतों की समुद्र में तैनाती और देश के हथियार कारखानों में एफडीआई के जरिए आयुध सामग्री निर्माण का रास्ता खोल देने से पाक खैफजदा है। मोदी ने व्यापारिक संबंधो के बहाने चीन,जापान,नेपाल और भूटान के राष्ट्राध्यक्षों से सीधे रूबरू होकर एक विशिष्ट अंतरराष्ट्रिय शख्सियत की हैसियत हासिल कर ली है। मोदी के इन देशों से द्विपक्षीय संबंध ऐसी कूटनीतिक रणनीति की उपज हैं कि अब अमेरिका व चीन भारत को इकतरफा दरकिनार करके पाकिस्तान की खुली मदद नहीं कर पाएंगे।

पाक के माथे पर बल इसलिए भी हैं, क्योंकि अब भारत का मुखिया मनमोहन सिंह की तरह कठपुतली प्रधानमंत्री नहीं है। उन्हें किसी आदेश पर अनुमोदन के लिए दस जनपथ का दरवाजा खट खटाना नहीं पड़ता। यही नहीं अमित शाह के भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष बनने के बाद दल और सरकार दोनों मोदी की मुठ्ठी में ही हैं और देश की संसद में आधिकारिक रूप से विपक्ष का नेता नदारद है। इसलिए सरकार जिस मुखरता से सैनिकों को सीमा पर खुली छूट देने की बात कह रही है, उसके प्रति उत्तर में विपक्ष की यह हैसियत नहीं रह गई है कि वह बातचीत से हल ढूढंने, अंतरराष्ट्रिय कूटनीति से दबाव बनाने की बजाय शस्त्र के जरिए ईंट का जबाव पत्थर से देने का उत्तर सरकार से मांगे ?

पाक को चिंता इसलिए भी है कि यदि वह आतंकियों की घुसपैठ कश्मीर में कराने में सफल नहीं होता हैं तो मोदी घाटी में विकास की गंगा बहाने कामयाब हों जाएंगे। वैसे भी पिछले माह जम्मू-कश्मीर में तबाही लेकर आई बाढ़ से निपटने में मोदी सरकार ने जो तत्परता दिखाई थी, उससे अलगाववादियों के हौसले पस्त हुए हैं। सत्तारूढ़ नेशनल कांफ्रंेस और अन्य विपक्षी दल हाथ पर हाथ धरे बैठे रह गए। बाढ़ के हालात घाटी में भाजपा के लिए एक अवसर के रूप में उभरे हैं। जिसका लाभ भाजपा को इसी साल के अंत में इस राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव में मिल सकता है।

इन अवसरों को केंद्र सरकार न भुना पाए इस नजरिए से पाक लगातार घुसपैठ कराने की कोशिश में लगा रहा है। सेना की सतर्कता और केंद्र की खुली छुट के चलते पिछले एक-डेढ़ माह के भीतर ही सेना ने 17 आतंकी घुसपैठियों को मार गिराकर पाक सेना और आईएसआई के मंसूबों पर पानी फेर दिया है। इससे बौखलाई पाक सेना भारतीय सुरक्षा चौकियों व ग्रामों पर हमला कर सीधी लड़ाई करने को विवश हुई है बावजूद सीमा पर शुरू हुई लड़ाई निर्णायक युद्ध में बदलने वाली नहीं है। क्योंकि वर्तमान में एक तो पाक अमेरिका और चीन के सैनिकों के लिए अपनी धरती का इस्तेमाल होने दे रहा है। इसलिए ये देश भारत से व्यापारिक संबंध कितने ही मजबूत क्यों न बना लें, पाक को नेस्तनाबूद होते देखने में आज की स्थिति में नहीं हैं। दूसरे मुस्लिम देशों में सउदी अरब पाक का पतन होते देखना नहीं चहेगा। क्योंकि पश्चिम एशिया में जिस आतंकवाद का निर्यात हो रहा है, उसका रास्ता पाक होकर ही निकलता है और उसकी आर्थिक आर्पिूर्त खासतौर से सउदी अरब ही करता है। लिहाजा जारी लड़ाई के निर्णायक मोड़ पर आते ही विराम लगने की उम्मीद बढ़ जाएगी ।

 

 

प्रमोद भार्गव

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