लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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जम्मू-कश्मीर में चल रहे विधानसभा चुनाव के पहले चरण में हुए रिकॉर्डतोड़ मतदान ने साबित कर दिया है कि घाटी के वाशिंदे अब आज़ादी के थोथे नारे की बजाए संसदीय प्रणाली में विश्वास रखते हुए लोकतंत्र को मजबूत कर रहे हैं| ऐसा पहली बार हुआ कि चुनाव बहिष्कार के बावजूद बड़ी संख्या में लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया और घाटी में हिंसा नहीं हुई। हाल ही में आई भीषण बाढ़ के चलते ऐसा महसूस किया जा रहा था कि घाटी में क्या चुनाव प्रक्रिया निर्बाध होगी? किन्तु तारीफ़ करना होगी घाटी के वासियों की जिन्होंने लोकतांत्रिक प्रक्रिया को और मजबूत किया| हालांकि इस दौरान भी पाकिस्तान अपनी धूर्तता से बाज नहीं आया और सीमा पार आतंकी गतिविधियों में ख़ासा इजाफा हुआ| दरअसल इस बार के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को ऐतिहासिक बढ़त की उम्मीद है| कांग्रेस लोकसभा चुनाव में मिली हार से अब तक सदमे में है, उमर अब्दुल्ला सत्ता विरोधी रुख को महसूस कर रहे हैं, अलगाववादियों को घाटी की जनता ने ही नकार दिया है और महबूबा मुफ़्ती भाजपा की ओर दोस्ती का हाथ आगे बढ़ा रही हैं| ऐसे में भाजपा ने उत्साह और देश के मुकुट पर भगवा लहराने की उम्मीद भी बंधी है| भाजपा कश्मीर से जुड़े अपने विवादास्पद मुद्दों को पीछे छोड़ते हुए विकास के मुद्दे पर चुनाव में उतरी है| जम्मू-उधमपुर और लद्दाख क्षेत्र में भाजपा की पकड़ मजबूत है और यदि कश्मीर में बदलाव की बयार बही तो फिर भाजपा के विजयी रथ को रोकना हर राजनीतिक दल के लिए मुश्किल होगा| हालांकि गाहे-बगाहे अनुच्छेद ३७० पर विरोधाभाषी बयान सुनने को मिलते हैं|
अनुच्छेद ३७० को लेकर पूरवर्ती सरकारों ने जितनी पेचीदगियां पैदा की हैं उससे यह मसला आपसी बातचीत से तो सुलझता नहीं दिखता| १९४७ की परिस्थितियां कुछ और थीं, २०१४ की कुछ और हैं| फिर जम्मू-कश्मीर की स्वायत्ता का मामला भी पाकिस्तान की ओर से संयुक्त राष्ट्र संघ में गया जिसके बाद से यहां यथास्थिति बनी हुई है| यह सच है कि अनुच्छेद ३७० का मामला जितना राजनीतिक है, उतना ही कश्मीर की जनता की स्वायत्ता से भी जुड़ा हुआ है| जम्मू, उधमपुर और लद्दाख क्षेत्र को छोड़ दिया जाए तो कश्मीर में, जहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं, अनुच्छेद ३७० को अपनी आज़ादी का सबसे बड़ा अस्त्र मानते हैं और जाहिर है कि यदि उनकी स्वतंत्रता को कोई छीनने का यत्न करेगा तो यह उन्हें भी बर्दाश्त नहीं होगा| फिर पाकिस्तान भी अनुच्छेद ३७० की आड़ में जब तब जम्मू-कश्मीर में अस्थिरता पैदा करता रहा है| देखा जाए अनुच्छेद ३७० का मसला भारत की राष्ट्रीयता और अखंडता से जुड़ा है और यदि केंद्र सरकार इस पर सार्थक पहल कर रही है तो इस पर तमतमाने से कुछ हासिल नहीं होने वाला है| पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ इस मुद्दे को जिस तरह सियासी रंग देते रहे हैं और मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाई जा रही है, उसे किसी भी नजरिए से सही नहीं कहा जा सकता| आखिर देश की बहुसंख्यक जनसंख्या के मन में यह प्रश्न हमेशा से उठता रहा है कि जब देश की आजादी के बाद रियासतों का भारत में विलय बिना किसी लेन-देन अथवा रियायतों के हुआ तो जम्मू-कश्मीर को आजादी के इतने सालों बाद भी विशेष दर्ज़ा क्यों? क्यों भारत का एक आम नागरिक धरती के स्वर्ग में अपनी जन्नत नहीं तलाश सकता? क्यों वहां बसकर सांस्कृतिक विरासत का आदान-प्रदान नहीं हो सकता? पाकिस्तान का कोई नागरिक यदि कश्मीरी लड़की से शादी या निकाह कर ले तो उसे कश्मीर की नागरिकता मिल जाती है किन्तु यही देश के किसी भी राज्य का नागरिक करे तो भी उसे कश्मीर की नागरिकता से वंचित रखा जाता है| आखिर क्यों? क्या यही अनुच्छेद ३७० का औचित्य है कश्मीर में?
दरअसल संविधान की आड़ में अनुच्छेद ३७० को सही ठहराने की उमर अब्दुल्ला की कोशिश उनकी राजनीतिक मजबूरी है| वैसे भी अब्दुल्ला परिवार का इतिहास रहा है कि चुनाव आते ही उनके नुमाइंदे अनुच्छेद ३७० और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों पर विवाद पैदा करने की कोशिश करते हैं| अनुच्छेद ३७० पर गलत बयानबाजी कर उमर ने कश्मीर की जनता को भड़काने का काम करने की कोशिश भी की थी| अनुच्छेद ३७० के तहत जिस स्वतंत्रता की दुहाई वे कश्मीरी मुस्लिमों को देते हैं वह मात्र एक राजनीतिक छलावा है| क्या देश के किसी भी राज्य में आम नागरिक या खासकर अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को स्वतंत्रता नहीं मिली है? फिर कश्मीरी मुसलमान को ही ख़ास स्वतंत्रता क्यों चाहिए? और यदि उन्हें यह ख़ास स्वतंत्रता नहीं मिली तो क्या वे भारत से अलग हो जाएंगे? क्या पाकिस्तान में उन्हें भारत से अधिक स्वतंत्रता मिल जायेगी और क्या आज़ाद कश्मीर का नारा बुलंद कर वे सच में आज़ाद हो जाएंगे? हालांकि जनता ने उमर की उम्मीदों पर कुठाराघात कर दिया और बड़े पैमाने पर मतदान प्रक्रिया में भाग लिया जो निश्चित रूप से सत्ता-विरोधी रुझानों का संकेत है| हालांकि अभी मतदान का पहला चरण हुआ है, चार चरण अभी बाकी हैं किन्तु जो स्थितियां दिखाई दे रही हैं उनसे तो यही लगता है कि अब घाटी की राजनीति और सामाजिक परिवेश बदलने वाला है| यह घाटी के वासियों के लिए भी विकास के रास्ते खोलेगा|
सिद्धार्थ शंकर गौतम 

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