लेखक परिचय

डा. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

डा. कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

उरई (जालौन) उ0प्र0 में जन्‍म। हिंदी साहित्‍य में पी-एच0 डी0 की उपाधि। लेख, शोध-आलेख, कहानी, लघुकथा, कविता, ग़ज़ल, नाटक आदि का लेखन एवं नियमित रूप से देश की प्रतिष्ठित पत्र/पत्रिकाओं में प्रकाशन। वर्तमान तक कुल 10 पुस्तकों का प्रकाशन। उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा वर्ष 2004 में हिन्दी की बहुआयामी सेवा हेतु सम्मान सहित अनेक पुरस्‍कारों से सम्‍मानित। सम्प्रति - सम्पादक-स्पंदन (साहित्यिक पत्रिका), - प्रवक्ता-गांधी महाविद्यालय, उरई

Posted On by &filed under प्रवक्ता न्यूज़.


MAHENDRA BHATNAGARप्रगतिशील विचारधारा के कवि स्वीकारे जाने वाले महेन्द्रभटनागर को केन्द्र में रखकर ग्वालियर साहित्य अकादमी, ग्वालियर से प्रकाशित होने वाली त्रैमासिक पत्रिका ‘लोकमंगल पत्रिका’ ने अपना नवीनतम अंक ‘अप्रैल-जून 2009’ प्रकाशित किया है। कविवर महेन्द्रभटनागर की साहित्य साधना पर केन्द्रित विशेषांक में उनके बारे में विस्तार से चर्चा की गई है। डा0 भगवानस्वरूप ‘चैतन्य’ के सम्पादन में निकलती इस पत्रिका में महेन्द्रभटनागर को केन्द्र बनाकर समूचे आठ अध्याय शामिल किये गये हैं।

इस त्रैमासिक पत्रिका की सम्पादकीय में सम्पादक महोदय कहते हैं कि महेन्द्रभटनागर हिन्दी साहित्य के इतिहास में प्रगतिवादी आन्दोलन से जुड़े यशस्वी कवियों में प्रमुख हस्ताक्षर रहे हैं। महेन्द्रभटनागर ने तत्कालीन प्रगतिशील पत्रिकाओं में प्रगतिवादी कवियों केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शिवमंगल सिंह ‘सुमन’, त्रिलोचन शास्त्री, गजानन मुक्तिबोध, शील, मलखान सिंह सिसौदिया, ललित शुक्ल, राजेन्द्र प्रसाद सिंह के साथ नियमित रूप से लिखना शुरू किया था।

महेन्द्रभटनागर को लेकर डा0 रमाकांत शर्मा, डा0 हरदयाल, डा0 शिवकुमार मिश्र ने विशेष रूप से आलेख लिखे हैं। इन आलेखों के द्वारा महेन्द्रभटनागर की काव्य क्षमता स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। इसी पत्रिका के आलोक में महेन्द्रभटनागर के व्यक्तित्व को सामने लाने का एक छोटा सा प्रयास है।

26 जून 1926 को झाँसी उ0 प्र0 में अपने ननिहाल में जन्मे महेन्द्रजी का बचपन झाँसी, मुरार, ग्वालियर में बीता। बारह वर्ष की उम्र (कक्षा सात में) से ही काव्य रचना करने वाले महेन्द्रजी की पहली कविता मोहन सिंह सेंगर के सम्पादन में कलकत्ता से प्रकाशित होने वाले मासिक पत्र ‘विशाल भारत’ के मार्च 1944 के अंक में प्रकाशित हुई थी। तब से लेकर आज तक उनकी लेखनी निर्बाध रूप से चलती रही है।

लगभग छह दशक की काव्य यात्रा में अपनी पहली कविता के प्रकाशन के ठीक पाँच वर्ष बाद सन 1949 में आपकी पहली काव्य-कृति ‘तारों के गीत’ प्रकाशित हुई। इनकी विशेषता यही रही है कि वे अनवरत काव्य साधना करते रहे हैं साथ ही अपनी रचनाओं को पुस्तकाकार स्वरूप भी प्रदान करते रहे हैं।

प्रगतिवादी दौर में लिखी उनकी पहली कविता कुछ इस तरह थी-

‘‘हुँकार हूँ, हुँकार हूँ!

मैं क्रांति की हुँकार हूँ!

मैं न्याय की तलवार हूँ!

शक्ति जीवन जागरण का मैं सबल संसार हूँ!

लोक में नव द्रोह का मैं तीव्रगामी ज्वार हूँ!

फिर नये उल्लास का, मैं शान्ति का अवतार हूँ!

हुँकार हूँ, हुँकार हूँ!

मैं क्रांति की हुँकार हूँ!’’

मार्क्‍सवाद से प्रेरणा पाते महेन्द्रभटनागर ने मजदूरों, शोषितों के लिए विशेष रूप से अपनी लेखनी चलाई। ‘नयी सुबह’ शीर्षक से वे मेहनतकश इंसानों की दशा स्पष्ट करते हुए लिखते हैं

‘‘जो बर्फीली रातों में

ओढ़े कुहरे का कम्बल

गठरी से बन

चिपका लेता उर से टाँगे निर्बल

अधसोये-से/कुछ खोये-खोये-से

देखा करते नयी सुबह का स्वप्न मनोरम,

कब होता है विश्वास कराहों से कम?’’

वे बस मजदूरों की बात ही नहीं करते हैं सामन्तवाद की समाप्ति की भी बात करते हैं और साम्राज्यवाद का विरोध भी करते हैं। एक जगह वे कहते हैं-

‘‘सदियों बाद हिले हैं थर-थर

सामन्ती युग के लौह महल,

जनबल का उगला बीज नवल,

धक्के भूकम्पी क्रुद्ध सबल!’’

महेन्द्रभटनागर ने अपने समय के साथ निरन्तर चलने की प्रवृति के कारण बंगाल का अकाल, नौसैनिक विद्रोह, देश के विभाजन, साम्प्रदायिक दंगे, आपातकाल, आतंकवाद, कारगिल आदि पर भी कलम चलाई है। उन्होंने इन विषयों के अतिरिक्त महात्मा गाँधी, तुलसी, निराला, प्रेमचन्द जैसे महापुरुषों पर भी कवितायें लिखीं हैं।

महेन्द्रभटनागर ने मजदूरों, शोषितों की आवाज तो उठाई साथ ही अपना लगाव स्वाभाविक रूप से प्रकृति से भी बनाये रखा। उन्होंने विभिन्न ऋतुओं, दिनरात की विविध बेलाओं आदि को लेकर अपनी काव्य-रचनायें की हैं। यद्यपि उनकी प्रकृति सम्बन्धी रचनाओं में कल्पना के ऐश्वर्य मण्डित स्वरूप के, प्रकृति के रहस्यवादी रूप के दर्शन नहीं होते वरन उस प्रकृति के दर्शन होते हैं जिसे हम सब महसूस करते हैं। ‘हेमन्ती धूप’ उन्हें भी उसी तरह आकर्षित करती है जैसे कि हम सब को करती है-

‘‘कितनी सुखद है/धूप हेमन्ती!

सुबह से शाम तक/इसमें नहा कर भी/

हमारा जी नहीं भरता/

विलग हो/दूर जाने को/

तनिक भी मन नहीं करता!

अरे, कितनी मधुर है/धूप हेमन्ती!’’

प्रकृति के साथ रची उनकी काव्य रचनाओं के साथ-साथ प्रेम के रंग भी उनकी कविताओं में देखने को मिलते हैं। उन्होंने अपनी प्रेम-कविताओं में संयोग और वियोग दोनों के चित्र दर्शाये हैं। जहाँ संयोग है वहाँ दैहिकता प्रधान है और जहाँ वियोग है वहाँ वेदना प्रधान रही है। ‘तिघिरा की एक शाम’ शीर्षक की कुछ पंक्तियाँ इसे सही सिद्ध करतीं हैं-

‘‘तिघिरा के सँकरे पुल पर/नमित नयन/

सहमी-सहमी/

तुम!

तेज हवा में लहराते केश,/सुगन्धित अंगों को/

अंकित करता/फर-फर उड़ता/

कांजीवरम की साड़ी का फैलाव/’’

इसी तरह वियोग में स्मृतियों और अभिलाषाओं की प्रधानता है। उद्दीपक वातावरण में कवि अपने अकेलेपन पर पीड़ा का अनुभव करता है-

‘‘शुष्क नीरस सृष्टि में जब,

छा गये चारों तरफ नव बौर,

भाग्य में मेरे अरे केवल

लिखा है क्या अकेला ठौर?

हो रहा बेचैन मन कुछ भेद कहने को प्रिये!

आज है बेचैन मन कुछ बात करने को प्रिये!’’

महेन्द्रभटनागर का काव्य मूलतः अभिदा काव्य है। इस कारण सउसका मुख्य गुण प्रसाद गुण रहा है। पाठको, श्रोताओं को समझने के लिए माथापच्ची नहीं करनी पड़ती है। देखा जाये तो उनकी कृतियों में काव्य अलंकरण अधिक नहीं है किन्तु अलंकारिकता का अभाव भी नहीं है। अपने काव्य में वे सटीक बिम्बों-प्रतीकों का प्रयोग करते नजर आते हैं। ऐसा कहीं भी प्रतीत नहीं होता है कि वे अपनी कविता को सायास ऐसा बना रहे हैं।

लोकमंगल पत्रिका द्वारा पूरे का पूरा अंक महेन्द्रभटनागर पर केन्द्रित करना उनकी प्रतिभा का ही सम्मान करना है। पत्रिका के एक अध्याय के अन्तर्गत उनकी प्रतिनिधि कविताओं को प्रस्तुत किया है जिन्हें पढ़कर एक अजब अनुभूति से गुजरने का एहसास होता है। उनकी 64 प्रतिनिधि कविताओं में उनके लगभग सभी काव्य-संग्रहों को छुआ गया है। कविता के प्रति उनकी दीवानगी को इन्हीं कविताओं की चन्द पंक्तियों में इस प्रकार से समझा जा सकता है-

‘‘मैं निरन्तर राह नव-निर्माण करता चल रहा हूँ

और चलता ही रहूँगा!

X X X X X X

X X X X X X

विश्व के उजड़े चमन में फूल बनकर खिल रहा हूँ

और खिलता ही रहूँगा!’’

पत्रिका में महेन्द्रभटनागर की रचनाशीलता को एकसाथ प्रस्तुत कर उनकी अदम्य लेखन क्षमता को भी नमन किया है। यह दिखाता है कि कैसे कोई कविता करने वाला व्यक्ति लगातार अपनी लेखनी को जीवित रखे है। अमूमन होता यह है कि कविता करने वाला व्यक्ति एक समय विशेष के बाद या तो संतृप्त होकर या फिर हालात से थककर काव्य-रचना करना बंद कर देता है। महेन्द्रभटनागर ने ऐसा नहीं किया। वे लगातार कविताओं की रचना करते भी रहे और उनको काव्य-संग्रहों के रूप में प्रकाशित भी करते रहे। लोकमंगल पत्रिका में उनके द्वारा लिखीं गईं, संकलित, सम्पादित और उन पर लिखी आलोचनात्मक पुस्तकों की पूरी सूची दी गई है। 72 पुस्तकों की लम्बी सूची के बाद भी 21 प्रकाशनाधीन पुस्तकों की सूची है।

उनके काव्य-संग्रहों में

1-तारों के गीत-सन 1949 (रचना-काल 1941-42)/ 2-टूटती श्रृखलायें-सन 1949 (रचना-काल 1944-47)/ 3-बदलता युग-सन 1953 (रचना-काल 1943-52)/ 4-अभियान-सन 1954 (रचना-काल 1949-50)/ 5-अन्तराल-सन 1954 (रचना-काल 1944-49)/ 6-विहान-सन 1956 (रचना-काल 1941-45)/ 7-नयी चेतना-सन 1956 (रचना-काल 1948-53)/ 8-मधुरिमा-सन 1959 (रचना-काल 1945-57)/ 9-जिजीविषा-सन 1962 (रचना-काल 1947-56)/ 10-संतरण-सन 1963 (रचना-काल 1956-62)/ 11-संवत-सन 1972 (रचना-काल 1962-66)/ 12-संकल्प-सन 1977 (रचना-काल 1967-71)/ 13-जूझते हुए-सन 1984 (रचना-काल 1972-76)/ 14-जीने के लिए-सन 1990 (रचना-काल 1977-86)/ 15-आहत युग-सन 1997 (रचना-काल 1987-97)/ 16-अनुभव क्षण-सन 2001 (रचना-काल 1997-2000)/ 17-मृत्यु-बोध:जीवन शोध-सन 2001 (रचना-काल 2000-01)/ 18-राग-संवेदन-सन 2001 (रचना-काल 2000-01)

प्रतिनिधि काव्य-संकलनों में

1-चयनिका-सन 1966/ 2-बूँद नेह की;दीप हृदय का-सन 1967/ 3-हर सुबह सुहानी हो-सन 1984/ 4- महेन्द्रभटनागर के गीत-सन 2001/ 5-गीति-संगीति-सन 2007/ 6-कवि श्री: महेन्द्रभटनागर-सम्वत 2027/ 7-महेन्द्रभटनागर की कवितायें-सन 1981/

आलोचना के रूप में

1-आधुनिक साहित्य और कला-सन 1956/ 2-दिव्या: एक अध्ययन-सन 1956/ 3-दिव्या: विचार और कला-सन 1972/ 4-समस्यामूलक उपन्यासकार प्रेमचन्द-सन 1957/ 5-विजय-पर्व: एक अध्ययन-सन 1957/ 6-नाटककार हरिकृष्ण ‘प्रेमी’ और संवत-प्रवर्तन-सन 1961/ 7-पुण्य-पर्व आलोक-सन 1962/ 8-हिन्दी कथा-साहित्य: विविध आयाम-सन 1988/ 9-नाट्य-सिद्धांत और हिन्दी नाटक-सन 1992/

लघुकथा/रेखाचित्रों के रूप में-

1-लड़खड़ाते कदम-सन 1952/ 2-विकृतियाँ-सन 1958/ 3-विकृत रेखाएँ: धुँधले चित्र-सन 1966/

एकांकी/रेडियो फीचर के रूप में

1-विद्याधर राजकुमार-सन 1957/ 2-विक्रम भोज-सन 1957/ 3-अजय-आलोक-सन 1962/ 4-अजेय-आलोक-सन 1974/

बाल-किशोर साहित्य

1-हँस-हँस गाने गाएँ हम-सन 1957/ 2- बच्चों के रूपक-सन 1958/ 3-देश-देश की बातें-सन 1967/ 4-देश-देश की कहानी-सन 1982/ 5-जय-यात्रा-सन 1971/ 6-दादी की कहानियाँ-सन 1974/

अन्य पुस्तकों के रूप में उनकी साहित्य-साधना को निम्न रूपों में देखा जा सकता है-

1-हिन्दी-तेलुगु में – दीपान्नी वेलिगिनचु-सन 2003 (कविता संग्रह)/ 2-हिन्दी-कन्नड़ में – मृत्यु-बोध: जीवन-बोध-सन 2005 (कविता संग्रह)/ 3-तमिल अनुवाद Kaalan Maarum (2006) (कविता संग्रह)/ 4-तमिल अनुवाद Mahendra Bhatnagar Kavithaigal (2008) (कविता संग्रह)/ 5-Fourty Poems (1968)/ 6-After The Fourty Poems (1979)/ 7-Dr. Mahendra Bhatnagar’s Poetry (2002)/ 8-Poems : For A Better World (2006)/ 9-A Handful of Light (2009)/

महेन्द्रभटनागर पर केन्द्रित आलोचनात्मक पुस्तकें-

1-कवि महेन्द्रभटनागर: सृजन और मूल्यांकन (1972)/ 2-कवि महेन्द्रभटनागर का रचना-संसार (1980)/ 3-सामाजिक चेतना के शिल्पी: कवि महेन्द्रभटनागर (1997)/ 4-डा0 महेन्द्रभटनागर का कवि-व्यक्तित्व (2005)/ 5-महेन्द्रभटनागर की काव्य-संवेदना: अन्तःअनुशासनीय आकलन (2009)/ 6-महेन्द्रभटनागर की काव्य-साधना (2005)/ 7-महेन्द्रभटनागर और उनकी सर्जनशीलता (1995)/ 8-प्रगतिवादी कवि महेन्द्रभटनागर: अनुभूति और अभिव्यक्ति (2005)/ 9-डा0 महेन्द्रभटनागर के काव्य का वैचारिक एवं संवेदनात्मक धरातल (2009)/ 10-Living Through Challenges : A Study of Dr. Mahendra Bhatnagar’s Poetry (2006)/ 11-Poet Mahendra Bhatnagar : His Mind And Art (2007)/ 12-A Modern Indian Poet : Dr. Mahendra Bhatnagar (2004)/ 13-डा0 महेन्द्रभटनागर समग्र (2002)/ 14-महेन्द्रभटनागर की काव्य-गंगा (2009)/ 15-संकल्प आणि अन्य कविता (मराठी अनुवाद) (2008)/

इन पुस्तकों के प्रकाशन के अतिरिक्त महेन्द्रभटनागर के साहित्य पर शोध कार्य भी हो चुका है। इसको निम्न रूप में देखा जा सकता है-

1-डा0 महेन्द्रभटनागर के काव्य का नव-स्वच्छंदवादी मूल्यांकन (दयालबाग डीम्ड विवि, आगरा 2008)/ 2-डा0 महेन्द्रभटनागर के काव्य में सांस्कृतिक चेतना (कानपुर विवि, कानपुर 2008)/ 3-महेन्द्रभटनागर का काव्य: कथ्य और शिल्प (मिथिला विवि, दरभंगा 2008)/ 4-डा0 महेन्द्रभटनागर: व्यक्तित्व एवं कृतित्व (कर्नाटक विवि, धारवाड़ 2007)/ 5-महेन्द्रभटनागर के काव्य का वैचारिक एवं संवेदनात्मक धरातल (सम्बलपुर विवि, सम्बलपुर 2003)/ 6-महेन्द्रभटनागर और उनकी सृजनशीलता (नागपुर विवि, नागपुर 1990)/ 7-हिन्दी प्रगतिवादी काव्य के परिप्रेक्ष्य में डा0 महेन्द्रभटनागर का विशेष अध्ययन (जीवाजी विवि, ग्वालियर 1986)/ (इनमें से क्रमांक 5, 6 तथा 7 के शोध प्रबन्ध प्रकाशित भी हो चुके हैं।)

लोकमंगल पत्रिका ने महेन्द्रभटनागर के काव्य-संसार को सिरे से देखकर उसे पाठकों के सामने रखा है। हिन्दी तथा अंग्रेजी में समान रूप से काव्य रचनायें करने वाले महेन्द्रभटनागर की कविताओं का अनुवाद देशी भाषाओं के अतिरिक्त तमाम विदेशी भाषाओं-फ्रेंच, जापानी, नेपाली आदि-में भी हो चुका है, साथ ही हो भी रहा है। इंटरनेट की तमाम बेबसाइटों पर आपका साहित्य हिन्दी, अंग्रेजी, फ्रेंच, नेपाली, जापानी भाषा में उपलब्ध है। महेन्द्रभटनागर की कविताओं को कई राज्यों की पाठ्यपुस्तकों में भी समाहित किया गया है।

निसंदेह रूप में महेन्द्रभटनागर का काव्य-संसार वृहद है और उनकी काव्य-साधना स्तुत्य है। इसी क्रम में ग्वालियर साहित्य अकादमी ने लोकमंगल पत्रिका के अपने अंक को महेन्द्रभटनागर की साहित्य साधना को केन्द्रित कर उनकी कविता सम्बन्धी जिजीविषा को, चेतना को तथा उनके काव्य के द्वारा सामने आये उनके मानस रूप को, सरस्वती-पुत्र को वास्तविक रूप में नमन किया है। महेन्द्रभटनागर आज के युवा कवियों, लेखकों के लिए प्रेरणास्त्रोत हो सकते हैं जो दो-चार कविताओं अथवा रचनाओं के बाद स्वयं को अन्तरराष्ट्रीय स्तर का रचनाकार समझने लगते हैं।

CRITICAL STUDY OF MAHENDRA BHATNAGAR’S POETRY

[1]The Poetry of Mahendra Bhatnagar : Realistic & Visionary Aspects Ed. Dr. O.P. Budholia

[2]Living Through Challenges : A Study of Dr.Mahendra Bhatnagar’s Poetry By Dr. B.C. Dwivedy.

[3] Poet Dr. Mahendra Bhatnagar : His Mind And Art / (In Eng. & French) Ed. Dr. S.C. Dwivedi & Dr. Shubha Dwivedi

Translations :

In French : A Modern Indian Poet : Dr. Mahendra Bhatnagar : UN POÈTE INDIEN ET MODERNE / Tr. Mrs. Purnima Ray

In Tamil : Kaalan Maarum, Mahendra Bhatnagarin Kavithaigal.

In Telugu : Deepanni Veliginchu.

In Kannad & In Bangla : Mrityu-Bodh : Jeewan-Bodh.

In Marathi : Samkalp Aaani Anaya Kavita

In Oriya : Kala-Sadhna.

In Malyalam, Gujrati, Manipuri, Urdu. In Czech, Japanese, Nepali,

Links :

HINDI www.blogbud.com/author 5652

ENGLISH-FRENCH www.poetrypoem.com/mpb1

ENGLISH (1) www.poetrypoem.com/mpb2 [Selected Poems 1,2,3]

(2) www.poetrypoem.com/mpb4 [‘Exuberance and other poems’ / ‘Poems : For A Better World / Passion and Compassion]

(3) www.poetrypoem.com/mpb3 [‘Death-Perception : Life-Perception’ / ‘A Handful Of Light’]

(4) www.poetrypoem.com/mpb [‘Lyric-Lute’]

(5)www.anindianenglishpoet.blogspot.com [‘…A Study Of Dr. Mahendra Bhatnagar’s Poetry’]

(6)www.mahendrabhatnagar. blogspot.com [ Critics & Mahendra Bhatnagar’s Poetry]

सम्प्रति शोध-निर्देशक — हिन्दी भाषा एवं साहित्य।

सम्पर्क :

डा. महेंद्रभटनागर,

सर्जना-भवन,

११० बलवन्तनगर, गांधी रोड,

ग्वालियर — ४७४ ००२ [म. प्र.]

फ़ोन : ०७५१-४०९२९०८ / मो. ९८ ९३४ ०९७९३

E-Mail : drmahendra02@gmail.com; drmahendrabh@rediffmail.com

——————————————–

डा0 कुमारेन्द्र सिंह सेंगर

सम्पादक-स्पंदन

उरई (जालौन) उ0प्र0

http://shabdkar.blogspot.com

http://kumarendra.blogspot.com

Leave a Reply

1 Comment on "मानवीय संवेदनाओं के जीवंत कवि – डा0 महेन्द्रभटनागर"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
Dr. Puneet Bisaria
Guest

a good aricle

wpDiscuz