लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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-डॉ. कुलदीप चन्द अग्निहोत्री-

लोक सभा चुनावों को लेकर पिछले लगभग डेढ़ महीने से चल रहा महापर्व बारह मई को अन्तिम चरण के मतदान के बाद समाप्त हो गया। इसे भी महज़ संयोग ही कहना चाहिये कि दस अप्रैल को देश की राजनैतिक राजधानी देहली में हुये मतदान से प्रारम्भ होकर यह महापर्व बारह मई को देश की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी में मतदान से समाप्त हुआ। यह अलग बात है कि इस बार मतदान के अन्तिम चरण तक आते आते लोकतन्त्र का पूरे विश्व में सबसे बड़ा महापर्व, पूरी तरह महाभारत में तब्दील हो चुका था। १९५२ से शुरू हुये चुनावों से लेकर अब तक शायद ही ऐसा कोई चुनाव रहा होगा जिसमें अपने प्रतिद्वन्द्वी के लिये लगभग गाली गलौज तक की भाषा का प्रयोग किया गया हो। लगता था एक दूसरों को गाली देने की होड़ चल रही हो। सहारनपुर से प्रत्याशी, सोनिया गान्धी की पार्टी के इमरान मसूद ने इस प्रतियोगिता की शुरुआत सार्वजनिक रुप से यह कह कर की कि यहाँ आने पर मोदी की बोटी-बोटी काट कर रख देंगे। उसके बाद प्रतियोगियों ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। बिहार में गिरिराज सिंह ने जब यह कहा कि मोदी का विरोध करने वालों को पाकिस्तान चले जाना चाहिये तो नेशनल कान्फ्रेंस के फारुख अब्दुल्ला ने मोदी के पक्षधरों को समुद्र में डुबो देने की बात कही। उनके पुत्र, जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर पाकिस्तान चले जाने का अपना इरादा सार्वजनिक कर दिया। मायवती ने अंदाज़ा लगाया कि समय का फेर है, यह न होता तो मुलायम सिंह आज किसी ज़मींदार के घर भैंसें चरा रहे होते। मुलायम सिंह ने मायावती के चरित्र को लेकर परोक्ष टिप्पणी कर डाली तो मायावती ने पूरी गंभीरता से नेता जी के घर वालों को सलाह दी कि उन्हें आगरा के पागलखाने में भर्ती करवा देना चाहिये। चुनाव के अंतिम चरणों में बंगाल की अग्निकन्या ममता दीदी भी पटरी से उतर गईं। उन्होंने मोदी को पागल कहा और अपनी मंशा ज़ाहिर की कि वे उन्हें रस्सी से बांध कर जेल में भेज देंगी। चुनाव के अंतिम चरणों में ही मैदान में उतारी गईं प्रियंका बढेरा ने मोदी की जाति को ही चुनाव का मुद्दा बना दिया। मोदी की जाति को नीच कहने पर प्रियंका पर एफआईआर तक दर्ज हो गईं इसी बीच योग गुरु रामदेव ने राहुल गान्धी पर दलितों के घर जाने को लेकर अत्यन्त आपत्तिजनक टिप्पणी की तो तूफ़ान खड़ा हो गया।

चुनाव अभियान से पूर्व जिस नीतिश कुमार को लेकर उनके प्रधानमंत्री बनने तक के क्यास लगाये जा रहे थे, वे पूरे चुनाव अभियान में हाशिये पर ही रहे। यही हाल पूरे अभियान में साम्यवादी टोले का रहा। लेकिन सबसे आश्चर्यजनक रहा पूरे चुनाव में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का ग़ायब रहना। सोनिया गान्धी की पार्टी ने आसन्न संकट भांप कर प्रियंका बढेरा को तो मोर्चे पर उतार दिया लेकिन अपने प्रधानमंत्री को इस लायक नहीं समझा कि उन्हें चुनावी सभाओं से जोड़ा जाये। उन्हें कम से कम पंजाब में तो भेजा ही जा सकता था।

दुर्भाग्य से पूरे चुनाव में मुद्दों को छोड़ कर जाति व मज़हब पर चुनाव को केन्द्रित करने का प्रयास किया गया। यह शायद मुसलमानों को ख़ुश करने का प्रयास ही था कि ममता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से ही कहना शुरू कर दिया कि भारत में घुसे हुये अवैध बांग्लादेशियों को उनके रहते कोई बाहर निकालने का साहस नहीं कर सकता। भाजपा के किसी मंच पर अयोध्या नरेश राम का चित्र देख कर सोनिया कांग्रेस के लोग इस क़दर भड़के कि उन्होंने चुनाव आयोग तक गुहार लगा दी। उनका एक ही तर्क रहा। राम का नाम लेना साम्प्रदायिकता ही माना जाना चाहिये। मामला यहां तय बिगड़ा कि मोदी ने राम राज्य की बात कही तो सोनिया कांग्रेस का पारा फिर उछाल पर आ गया। ज़ाहिर है कि यह सारा तमाशा मुसलमान वोटों को अपने अपने खेमे में हांकने के लिये हो रहा था। यदि बात मुद्दों पर रहती तो मुसलमानों के भी भटक जाने का ख़तरा हो जाता। इसलिये उनके तथाकथित संरक्षक चौकन्ने हो गये। इसलिये मुसलमानों में मोदी को लेकर जितना भय पैदा किया जाये वे उतना ही गोलबन्द होकर एक साथ वोट ‘गेरेंगे’- इसी रणनीति के तहत सब दल भाजपा के नाम पर मुसलमानों को डराने के धन्धे में जुट गये।

इस चुनाव को लेकर प्रायः कहा गया कि नरेन्द्र मोदी ने इसे संसदीय प्रणाली का चुनाव न रहने देकर अमेरिका की तर्ज़ पर राष्ट्रपति प्रणाली का चुनाव बना दिया। दरअसल पूरे चुनाव में मोदी का व्यक्तित्व और नाम इतना छाया रहा कि यह चुनाव एक प्रकार से मोदी बनाम आल हो गया। लेकिन यह भी शायद पहली बार हुआ कि पूरे देश में अन्य भेद गौण हो गये और एक ही मुद्दा मोदी का प्रमुख हो गया। मोदी इस पूरे चुनाव में समतल कारक के तौर पर उभरे। १९७५ में आपात स्थिति के बाद हुये चुनावों में इस प्रकार की लहर देखी गई थी। तब भी आपात स्थिति के अत्याचार, यही एक मुद्दा रह गया था और इसी लहर में कांग्रेस अमृतसर से लेकर कोलकाता तक साफ़ हो गई थी। लेकिन तब भी वह लहर विन्ध्यांचल पार नहीं कर पाई थी और उन पहाड़ियों से टकराकर वापस हो गई थी। लेकिन इस बार मोदी की लहर ने पूरे दक्षिण तक को आप्लावित कर दिया।

इस लहर का भय सभी राजनैतिक दलों पर इतना गहरा था कि उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय के वर्गों ख़ास कर मुसलमानों और इसाइयों को रिझाने में ही सारा चुनाव लड़ लिया। अनेक स्थानों पर तो देखा गया कि पादरियों की ओर से अपने अपने समुदाय के लोगों को स्पष्ट निर्देश दिये गये थे कि उसी प्रत्याशी को वोट दें जो मोदी के प्रत्याशियों को हराने की स्थिति में हो। यहां तक की सोनिया गान्धी के पार्टी के एक केन्द्रीय मंत्री चुनाव अभियान के दौरान ही वेटिकन गये और वहां बाक़ायदा पोप से भेंट भी की। अरविन्द केजरीवाल ने अवश्य अपने आप को और अपनी पार्टी को विकल्प के तौर पर पेश करने की कोशिश की, लेकिन चुनाव अभियान के दौरान ही अमेरिका के फोर्ड फ़ाउंडेशन से उनको मिले धन का ज्यों-ज्यों ख़ुलासा होने लगा त्यों त्यों केजरीवाल ख़ुद ही विवादों के घेरे में फंसते गये।

बहरहाल, चुनाव आयोग को इस बात का श्रेय अवश्य जायेगा कि उसने इतने उत्तेजक वातावरण में हो रहे चुनावों को बिना किसी बड़ी हिंसा की वारदात के सम्पन्न करवाने में सफलता प्राप्त की। लेकिन आयोग के अनेक निर्णय विवाद का केन्द्र बनते गये। ख़ासकर जब उसने एक मतदान केन्द्र पर ईवीएम मशीन के पास राहुल गान्धी के होने की घटना का संज्ञान न लेते हुये उसे क्लीन चिट दे दी। पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड की सामाजिक अध्ययन की अरसे से चली आ रही एक पुस्तक में मुख्यमंत्री के चित्र पर आयोग इतना आग बबूला हुआ कि उसने पाठ्यक्रम बनाने वाले विद्वानों की शिनाख्त का इरादा ज़ाहिर कर दिया। चुनाव आयोग की इस अतिरिक्त सक्रियता की इन्तहा तब हुई जब उसने मतदान का चुनाव प्रचार समाप्त हो जाने के बाद वाराणसी में भारतीय जनता पार्टी के क्षेत्रीय कार्यालय के अन्दर पड़े साहित्य और अन्य सामग्री को ही ज़ब्त करना शुरू कर दिया। जब इसको लेकर हो हल्ला मचा, तब जाकर आयोग ने वह साहित्य वापस किया। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि नेहरु और इन्दिरा गान्धी के बाद शायद पहली बार इन चुनावों ने सचमुच किसी केन्द्रीय नेता की पहचान स्थापित ही नहीं कि बल्कि स्वीकार भी की है। लेकिन चुनाव के अन्त में एक जुमला ऐसा प्रचलित हुआ कि उसने अगले पिछले सभी प्रभावों को निष्प्रभावी कर दिया। मोदी के गिर्द खड़े कुछ लोग नारा लगाते दिखाई दे रहे हैं कि अच्छे दिन आने वाले हैं। उसके बिल्कुल सामने खड़े कांग्रेस के महासचिव दिग्विजय सिंह कह रहे हैं कि अच्छी रातें आने वाली हैं।

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