लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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walkडॉ. दीपक आचार्य

जो लोग शरीर के कहे अनुसार चलते हैं वे जल्दी ही थक जाया करते हैं। इसके विपरीत जो लोग शरीर को अपने अनुसार चलाते हैं उनका शरीर लम्बे समय तक चलता है और स्वस्थ भी रहता है।

अपना शरीर घोड़े की तरह है जिसे मन के संकल्पों की सुदृढ़ लगाम से संचालित किए जाने पर वह लम्बे समय तक काम करने लायक रहता है। और ऎसा नहीं करने पर वह हमें भार स्वरूप और बोझ मानकर हमारा साथ छोड़ देता है।

श्वास-प्रश्वास से लेकर पिण्ड और ब्रह्माण्ड तक में जो जो परिवर्तन होते हैं उनका निरन्तर परिमार्जन और शुद्धिकरण रोजाना जरूरी होता है। यह मार्जन-परिमार्जन यानि की साफ-सफाई का काम पंच तत्व करते हैं।

जिन पंचतत्वों से शरीर का निर्माण होता है उनकी मिश्रित क्रियाओं,चयापचय, तत्वों का संयोग-वियोग और शरीर के चक्रों से लेकर अंग-उपांगों तक में परिभ्रमण का दौर हर क्षण बना रहता है।

इन क्रियाओं के फलस्वरूप शरीर में विजातीय द्रव्यों और दूषित गैसों का प्रभाव रोजाना पैदा होता है जो ज्यादा दिन तक संचित हो जाने पर पूरे शरीर के किसी भी सूक्ष्म और स्थूल अंग तक में समस्या पैदा कर उस अंग या उपांग की गति को अप्रत्याशित रूप से धीमी या तेज कर देता है ।

इस अवस्था में हमें आरंभिक तौर पर कुछ पता नहीं चलता है लेकिन धीरे-धीरे शरीर के अवयवों की कार्यक्षमता थमने लगती है और इसके कारण से हमारा पूरा शरीर विजातीय पदार्थों व जहरीली एवं आत्मघाती गैसों का घर होकर रह जाता है।

इस वजह से शरीर में रक्त से लेकर वायु तक का परिभ्रमण बाधित हो जाता है और विभिन्न अंग-उपांगों में ऎसे स्थल या गुहाएं अपने आप निर्मित होने लगती हैं जो शरीर के लिए घातक हो जाती हैं।

इसीलिए शरीर के प्रत्येक अंग-उपांग के संचालन की प्रक्रिया रोजाना करने का विधान रहा है ताकि विजातीय द्रव्य, प्रदूषित वायु आदि हरकत में आकर शरीर से बाहर निकल जाएं। इनका भी उत्सर्जन रोजाना, निरन्तर और नियमित रूप से होना जरूरी है।

जो लोग रोजाना योगाभ्यास करते हैं, नियमित भ्रमण करते हैं उनके शरीर का संचालन तेज-तेज होने की वजह से शरीरस्थ घर्षण के माध्यम से सारी गैसें और शरीर के हानिकारक पदार्थ पसीने के माध्यम से बाहर निकल जाते हैं। इससे शरीर मेंं स्फूर्ति का संचार हो जाता है और अनावश्यक तत्वों का उत्सर्जन नियमित रूप से होता रहता है।

पर अधिकांश लोग अपनी कमाई और धंधों में व्यस्त हैं अथवा जवानी के जोश में होते हैं। इस कारण शरीर पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाते हैं। हमारे जीवन की सभी प्रकार की मानसिक और शारीरिक बीमारियों का मूल कारण यही है।

ये हानिकारक तत्व ही शरीर के अंग-उपांगों को बिगाड़ डालते हैं और एक समय बाद नाकारा करने लगते हैं। यह अवस्था हमारे लिए गंभीर बीमारी की होती है जिसमें सिवाय दवाओं और निरन्तर जांचों के सिवा कोई और काम नहीं आता। आजकल सब जब यही हो रहा है।

और कुछ न कर सकें तो रोजाना पैदल चलेंं । जितनी रोटियां खाएं, कम से कम उतने या दुगूने किलोमीटर पैदल चलने का अभ्यास बनाएं तभी हमारा जीवन सुखद और स्वस्थ रह पाएगा।

जो लोग किसी न किसी प्रकार के बाड़ों में बंद रहते हैं उन लोगों के लिए यह बीमारियां ज्यादा प्रभावी होती हैं। लेकिन जो लोग पैदल चलने के अभ्यासी हैं उन लोगों के जीवन में बीमारियां कम ही होती हैं।

हमारे आस-पास देख लें या दूसरे लोगों को, जो लोग हमेशा पैदल चलते हैं वे आलस्य से मुक्त रहते हैं, हमेशा मस्ती में दिखते हैं और लम्बे जीते हैं। पैदल चलने वाला हमेशा दीर्घायु होता है। ऎसे बहुत से लोग हमारे आस-पास हैं जो पैदल चलते हैं और जिन्दगी का भरपूर आनंद पाते हैं।

कई लोग प्रातःकालीन और सायंकालीन भ्रमण के नाम पर अभिजात्य होने का दंभ भरते हुए वॉकिंग करते हैं। लेकिन ये लोग ऎसे चलते हैं जैसे कि शादी के प्रोसेशन में चल रहे हों। धीरे-धीरे चलने, बातें करते हुए चलने वालों का भ्रमण नाकारा ही हैं। इन लोगों का भ्रमण केवल दिखावा ही होता है।

यों भी आजकल वॉकिंग की फैशन भी चल पड़ी है जहां अपने आपको बड़े और महान कहने वाले लोग हर जगह मिल जाएंगे। बहुत सारे लोग उन रास्तों पर प्रातः या सायंकालीन भ्रमण करते हैं जहां मुख्य मार्गों पर वाहनों का निरन्तर आवागमन लगा रहता है।

ऎसे लोग वॉकिंग के नाम पर अपनी मौत को ही जल्दी बुला रहे होते हैंं क्योंकि जितना वॉकिंग ये करते हैं उतनी धूल और धूंए के गुबार अधिक तेजी से इनके फेफड़ों में जाते हैं। लेकिन वॉकिंग के नाम पर शौक पूरा करने वाले लोगों के लिए इसका कोई मतलब नहीं है। ये लोग वॉकिंग के नाम पर लोक दिखाऊ कुछ भी कर सकते हैं।

वाहनों का मोह त्यागें, साईकिल का सहारा लें और जितना अधिक हो सके, पैदल चलने का अभ्यास डालें। यही सेहत का महा राज है।

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