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भगवान बुद्ध

भगवान बुद्ध

“सचं नेरसी अन्तान्म कन्सो उपहतो यथा
एस पत्तो सि निब्बानं सारम्भो न विज्ज्ती “(धम्मपद गा.१३४)
टूटे हुए कांसे के थाल को पीटने पर भी आवाज नहीं करता ,वैसे ही यदि तुमने स्वयम को निशब्द कर लिया तो ऐसा समझो कि तुम निर्वाण पा गये ,क्योंकि प्रतिक्रिया तुम्हारे लिए जाती रही .
ये पंक्तियाँ उन भगवान बुद्ध की हैं जिन्हें आर्य/वैदिक हिंसा के विरुद्ध प्रतिक्रिया में उत्पन्न सिद्ध किया जाता है.इन्हें पढकर पाठशाला से विश्व विद्यालय तक सब ताश के पत्ते के समान भरभरा कर ढहता प्रतीत हो रहा है.सारा कथित इतिहास गल्पकथा में परिवर्तित हो रहा है.जैसे सारी शिक्षा एक क्षण में मुट्ठी से रेत के समान फिसल रही हो.
मन में प्रश्न कौंध रहा है कि क्या उपरोक्त पंक्तियों को कहने वाला बुद्ध प्रतिक्रियावादी और उसका धर्म प्रतिक्रिया से उत्पन्न हो सकता है?कदापि नहीं !तो क्या वो शिक्षा जिसने झूंठी है जिसने बौद्ध धर्म को ब्रहामण धर्म और आर्य व्यवस्था की प्रतिक्रिया में उत्पन्न बताया.बौद्ध धर्म का चरम लक्ष्य तो निर्वाण है जो प्रतिक्रिया से रहित होने पर प्राप्त होता है.यदि बुद्ध को प्रतिक्रियावादी माना जाये फिर तो बोधिसत्व को बुद्ध के जन्म में भी निर्वाण प्राप्त होना कैसे सम्भव है ?और कुशीनगर निर्वाण नहीं केवल मृत्यु स्थल है ?ब्रहामणों के विरुद्ध प्रतिक्रिया में संघ चलाने वाले बुद्ध निर्वाण पाए ?
यदि एक क्षण को इसे सत्य मान लिया जाये कि धर्म-दर्शन की बात प्रथक है पर सामाजिक सत्य यही है कि बुद्ध ब्रहामण धर्म और आर्य व्यवस्था की प्रतिक्रिया में खड़े हुए.किन्तु तब उनके उपदेशों में आर्य देवों,आर्यों,ब्रहामणों तथा ऋषियों का नकारात्मक चित्रण होना अवश्यम्भावी है .भले निंदा न हो पर विरोधियों की प्रशंसा तो सम्भव नहीं.इसके विपरीत बुद्ध ने जहाँ भी आर्य देवों,आर्यों,ब्रहामणों तथा ऋषियों का उल्लेख किया पूर्ण सकारात्मकता और आदर के साथ.
बुद्ध के समस्त ज्ञान का सार चार सत्य हैं जिन्हें वे बौद्ध सत्य नहीं आर्य सत्य कहते हैं(चत्तारी अरिय सच्चानी –गा.९०).धम्मपद बुद्ध के उपदेशों की मूल संहिता है.जिससे ज्ञात होता है कि बुद्ध उस भारतीय धर्म परम्परा के ही आर्य सम्वाहक हैं जिसमें स्वयं अद्यतनीकृत होने और काल बाह्य हो गये विचारों को सुधार कर स्वयमेव नवीन चेतना का संचरण करते हुए धर्म की चिर पुरातन एवं नित नूतनता की प्रवृति को सिद्ध करती हुई अपने अनंत जीवन को दैदीप्यमान करती है .बुद्ध स्वयं को उस परम्परा से अलग क्रांतिकारी नहीं बल्कि बहुत से बुद्धों (मुमुक्षुओं )में से एक कहते हैं.जिनका लक्ष्य सत्य की खोज है.वे सदैव बुद्धों ‘बहुवचन’का प्रयोग करते दीखते हैं.
यथा –“देवापि ते सं पिह्यंती
स्म्बुद्धानम सतीमतं “(१८१)
अर्थात उन स्मृतिमान तथा सम्यक बुद्ध लोगों की स्पृहा देवता भी करते हैं.
“किच्छो बुद्धान मुत्पादो”(१८२)
बुद्धों का जन्म दुर्लभ है.
“बुद्धानां सासनम”-बुद्धों की शिक्षा
इस प्रकार ज्ञात होता है कि बुद्ध ने स्वयं बुद्ध शब्द-संज्ञा को एक परम्परा के रूप में ही उपदिष्ट किया है न कि एक अपरम्परागत नये विचार के रूप में.
उपरोक्त १८१ में देवता का वर्णन है.ये बौद्ध देवता नहीं आर्य देवता है क्योंकि बौद्ध देवता तो बुद्ध के परवर्ती हैं.महायान और वज्रयान की उत्पत्ति के बाद के ,इससे ज्ञात होता है कि बुद्ध न केवल देवताओं के अस्तित्व को स्वीकारते हैं बल्कि देवों को श्रेष्ठ भी मानते हैं.एक अन्य उदाहरण दृष्टव्य है.
“वे देवा पसंसन्ति सुद्धाजीवी अतन्दित”(३६६) –देवता उस सुद्धाजीवी अतन्दित की प्रशंसा करते हैं .
इसी प्रकार बुद्ध भिख्खुओं को को स्पष्ट निर्देश देते हुए ऋषियों के मार्ग का अनुसरण करने को कहते हैं.ये वैदिक ऋषि हैं क्योंकि अभी बौद्ध ऋषि तो मात्र स्वयं बुद्ध ही हैं.अत:यहाँ उनकी ऋषि परम्परा के प्रति श्रृद्धा ही व्यक्त होती है.
“आराधये मग्गनि ऋषिप्प वेदितं”(२८१)ऋषियों के वेद मार्ग से आराधना करें.
उस काल में आर्यों के आलावा कापालिक,चार्वाक आदि अनार्य मत भी प्रबल हो चुके थे.बुद्ध श्रमणों को सत्संगति की प्रेरणा देते हुए कहते हैं –
“साहू दस्सनं अरियानं
सान निवासो सदा सुखो” (२०६)
आर्यों का दर्शन हितकर और उनके साथ रहना सुखकारी है.
एक अन्य स्थान पर बड़ी मधुर गाथा है.
“धीरं च पंचम च बहुस्सुतं च
धोरम्हसीलम वतवृतं अरीयं
तं तादिशं स्प्पुरीसं सुमेधं
भजेथ नक्खत्त पथम चन्दिमा “
जैसे चन्द्रमा नक्षत्र पथ का अनुसरण करता है वैसे ही जो धीर,प्रज्ञावान,बहुश्रुत नेत्रित्व कर्ता बुद्धिमान आर्यजन हैं.सदैव उनका अनुसरण करना चाहिए.
एक अन्य उदाहरण-
“अरियप्प वेदितं धम्म सदा रमति” (१५१)सदा आर्योपदिष्ट धर्म में रत रहो.
इन वचनों से यह प्रकट होता है कि न स्वयं को आर्य परम्परा से अलग मानते हैं तथा न ही निंदा करते हैं.हाँ,वह अपना मुनि का दायित्व निभाते हुए ब्रहामण और श्रमणों को कर्म-निष्ठा का उपदेश देते हैं.
“न जटाही न गोत्तेन न जच्चा होति ब्रहामणा
यक्ही सच्चं च धम्मो च सो सूची सो ब्रहामणा”
न जन्म ,न जटा धारण ,न गोत्र से ब्रहामण होता है बल्कि ब्रहामण वह है जो पवित्र और धर्मयुक्त है.
बुद्ध के ब्रहामण विषयक विचार देखें
“न ब्रहामण पहरेय्य “(३८९)-ब्रहामण पर प्रहार नहीं करना चाहिए.
“बहितपापो ति ब्रहामण “–ब्रहामण पाप से मुक्त है.
“धी ब्रहामणस्य हन्तारम” –ब्रहामण के हत्यारे को धिक्कार है .
“दन्तं अन्तिम सारीरम तमहं ब्रूहि ब्रहामणा”-जिसका ये अंतिम देह है (मुक्तिगामी)वह ब्रहामण है
धम्मपद में लगभग ४५ गाथाये (उपदेश)ब्रहामणों के विषय में है जिनमें वे ब्रहामण की प्रशंसा करते है और उन्हें निर्वाण का प्राकृतिक अधिकारी मानते हैं.
“अलन्कतो चे पि समम् चरेय्य
सन्तो,दन्तो,नियतो,ब्रह्मचारी
सब्बेसू भूतेषु निधाय दण्डम
सो ब्रहामणो सो श्रमणों स भिक्खू “
अलकृत होते भी शम का आचरण करने वाला शांत दांत नियत ब्रह्मचारी है वही ब्रहामण श्रमण या भिक्खू कहलाने योग्य है.
इस प्रकार जैसे-जैसे बुद्ध उपदिष्ट ब्रहामण बग्गो का अध्ययन करते जाते हैं तो बुद्ध को साफ होता जाता है वह षड्यंत्र जो बुद्ध को आर्य धारा के विरुद्ध प्रदर्शित करने और आर्यजन को हीनता बोध से ग्रसित कर एक निष्ठावान भारतीय को दुसरे निष्ठावान भारतीय समुदाय से लडवाने हेतु रचा गया है.
सामान्यतया लोग मूलग्रंथों के स्थान पर पाठ्य पुस्तकें और पत्रिकाओं के लेख पढ़ते हैं.इसका लाभ उठाकर भारतीय संस्कृति के वैरियों ने यह फूटबीज बोने का उपक्रम किया किन्तु यह स्पष्ट है कि बादल कितने भी गहरे हों सूर्य को सदैव के लिए छुपा नहीं सकते.

लेखक –अच्युतम केशवम

 

 

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