लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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लिमटी खरे

जैसे जैसे समय बीतता जा रहा है वैसे वैसे नए प्रयोगों से चीजें इजाद हो रही हैं। आज दौड़ भाग भरी जिंदगी में दो पल सुकून के किसी के पास नहीं हैं। आम तौर पर यह धारणा है कि आधुनिक चीजें पहले से परिष्कृत और बेहतरीन हैं। कुछ पहलुओं में यह बात सच हो सकती है किन्तु ये चीजें हमारे वातावरण और सेहत के लिए लाभकारी हों यह जरूरी नहीं। हम उन चीजों को बलात अपने से दूर करते जा रहे हैं जो चीजें हमारी भावनाओं से जुड़ी होती थीं वे आज देखने से नहीं मिलती। कभी घर से निकलते वक्त लोग हाथ में लाठी, एक रस्सी और लोटा लेकर निकला करते थे, ताकि रास्ते में जानवरों से बचने के लिए लाठी, कंठ की प्यास बुझाने के लिए कुएं से पानी निकालने रस्सी और लोटा, वक्त बेवक्त काम आ जाता था। आधुनिकता के शोर में वास्तविकत चीजों का अवसान हमें पर्यावरण एवं हमारी संस्कृति के लिए भी काफी हद तक नुकसानदेह माना जा सकता है।

आजाद भारत के काल में और आज के समय में जीवन शैली में जमीन आसमान का अंतर साफ तौर पर परिलक्षित होता है। सत्तर के पेटे में जा चुकी पीढ़ी उस वक्त के साधन और आज के साधनों में जबर्दस्त फर्क महसूस करती होगी। आज फ्रिज का ठंडा पानी पलक झपके हाजिर पर सुराही की वह मिठास और तृप्ति शायद ही किसी को मिल पाए। भाग दौड़ में मेले ठेले शादी ब्याह आदि में रिवाजों में भी अंतर आ गया है। विकास की दौड़ में हमने अपनी परंपरागत जीवन शैली और वस्तुओं को भुला दिया है, जिससे पर्यावरण और सांस्कृतिक नुकसान हो रहा है। अब समय आ गया है कि हम अपने उस पुराने ढर्रे को पहचानें और फिर से अंगीकार करें।

सुबह उठते ही चाय की तलब सभी को लगती है। पुराने जमाने के उमर दराज लोग चीनी मिट्टी के कप में चाय पीना आज भी पसंद नहीं करते। वे आज भी स्टील या पीतल के गिलास में ही चाय पिया करते हैं। इन गिलासों का प्रयोग करना उनकी मजबूरी है, क्यांेकि वे चीनी मिट्टी या प्लास्टिक के कप का उपयोग वर्जित मानते हैं। साथ ही साथ कुल्हड़ उन्हें नसीब नहीं। जी हां, महानगरों मंे रहने वाले बच्चों ने कुल्हड़ शायद ही देखा हो। प्लास्टिक या थर्माकोल के कप धोना नहीं पड़ता इसलिए सभी को यह सुविधाजनक ही लगते हैं किन्तु ये नाले नालियों को जाम कर देते हैं। कुल्हड़ मिट्टी का बना एक गिलासनुमा बर्तन होता था, जो उपयोग के बाद मिट्टी में ही मिल जाता था, यह नाले नालियों को जाम नहीं करने के साथ ही साथ जमीन को बंजर नहीं बनाता है। इससे उठने वाली सौंधी खुशबू इसमंे भरे पदार्थ के स्वाद को बढ़ा दिया करती थी।

जल ही जीवन है का मुहावरा आदि अनादि काल से चला आ रहा है। जब सूर्य नारायण अपने पूरे शबाब पर होते हैं, तब कंठ की प्यास से बड़ी कोई प्यास नहीं होती। अभी ज्यादा समय नहीं बीता जब लोग घरों से निकलते वक्त एक रस्सी और लोटा साथ लेकर निकला करते थे। मार्ग मंे जब उन्हें प्यास लगती वे कुंए से पानी निकालकर शीतल जल से अपनी प्यास बुझा लिया करते थे। अब तो जगह जगह कुंए और बावलियां या तो सूख चुके हैं, या फिर गंदगी से सराबोर हैं। गांव गांव में बोतल बंद पानी और पाउच का बोलबाला है।

पाउच में पानी कितने दिन पुराना है यह पता लगाना बहुत मुश्किल होता है। गांव गांव में पान की दुकानों या ठेलों पर फ्रिज या आईसबाक्स में ठंडा पानी बिक रहा है। राजकुमार अभिनीत ‘पाकीजा‘ फिल्म जिन्होने देखी होगी उन्हें याद होगा कि रेल गाड़ी में अपनी प्यास बुझाने राजकुमार द्वारा मीना कुमारी की सुराही का प्रयोग किया जाता था। एक समय था जब लोग घरों में मटके और सुराही तो सफर में सुराही और छागल लेकर चला करते थे। आज हम सभी बिजली से ठंडा किया पानी उपयोग करते हैं, किन्तु पहले निशुल्क ठंडा पानी जो मटके और सुराही में मिलता था का उपयोग होता था, जिसमें मिट्टी की सौंधी खुशबू हमें तृत्प कर दिया करती थी।

शादी ब्याह, जन्म दिन पार्टियों में आजकल बुफे का सिस्टम चल पड़ा है। शादी ब्याह में पहले खाना दोना और पत्तलों में ही परोसा जाता था। पत्तल में खाने का स्वाद अपने आप ही बढ़ जाया करता था। आजकल तो डिस्पोजेबल प्लेट के उपयोग के उपरांत इन्हें नष्ट करना सबसे बड़ी समस्या बनकर उभर रहा है। इन परिस्थितयों में पत्ते से बनी पत्तल की याद आना लाजिमी ही है। पारंपरिक दोने और पत्तल इतने सुघड़ और मजबूत हुआ करते थे कि आज भी उनका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। पत्तों को लकडियों से जोड़कर इन्हें बड़ी सफाई से बनाया जाता था। इन दोने पत्तलों से पर्यावरण पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि मवेशी जूठी पत्तलों को खा जाते हैं।

अस्सी के दशक के पहले तक शादी ब्याह में दहेज में साईकल मिलना अमीरी की निशानी समझा जाता था। दूल्हा अगर दहेज पर अड़ता तो वह साईकिल और ट्रांजिस्टर की मांग ही किया करता था। महानगरों के साथ ही साथ अब तो छोटे शहरों में सड़कों पर लंबा जाम पसर जाता है। इसके अलावा जानलेवा शोर, दमघोंटू धुंआ, मंहगा ईंधन आदि सबसे निजात पाने का बेहतरीन उपाय है साईकिल।

साईकिल शान की सवारी है आज भी। स्कूल कालेजों में पहले साईकल पर ही विद्यार्थी जाया करते थे। कालांतर में साईकल का स्थान दो पहिया पेट्रोल से चलने वाले वाहनों ने ले लिया। बिना लाईसेंस छोटे छोटे बच्चे इन वाहनों मंे फर्राटे भरते नजर आते हैं, जिन्हें देखकर पालक बेहद खुशी महसूस करते हैं। पालक यह भूल जाते हैं कि साईकल पर चलने से उनके बच्चों की जो वर्जिश होती है, वह बच्चे के नैसर्गिक विकास में सहायक होती है।

सेहत के प्रति फिकरमंद लोग अब तो सुबह और शाम साईकल की सवारी नियमित तौर पर करते हैं। साईकल पर चलना लोगों के शान के खिलाफ बन गया था। किन्तु अब साईकल पर चलना स्टेटस सिंबाल पुनः बनता जा रहा है। विदेशों में साईकल आज भी चलन में है। शहरों मंे बच्चों की साईकल के प्रति घटती रूचि चिंता का विषय है। अगर साईकल का प्रयोग निरंतर किया जाए तो इस जाम और दमघोंटू गैस से निजात पाई जा सकती है। पेट्रोल के मंहगे होने पर अनेक बार सरकारों द्वारा साईकल पर चलने का प्रहसन भी किया जाता है।

गोरे ब्रितानी अफसरान भी साईकल पर ही कार्यालय आया जाया करते थे। आजादी के बाद जिलों में कलेक्टर और एस.पी. तक साईकल का प्रयोग करते थे। आज भी ये अफसरान साईकल का प्रयोग करते हैं, पर उस साईकल का स्वरूप बदल गया है। यह साईकल उनके जिम्नेजिमयम में रखी बिना पहिए वाली एक्सरसाईज वाली साईकल है।

सुबह उठने के लिए मां जब प्यार से सर पर हाथ फेरकर कोयल या चिड़िया की चहचहाट की ओर ध्यान आकर्षित करवाती थी तब जो सुखद अनुभूति होती थी वह अब कहीं देखने को नहीं मिलती। अब तो सुबह उठने के लिए मोबाईल पर अलार्म लगाकर सिरहाने रखकर सोया जाता है। वह समय भी खूब था जब चाभी भरने वाली अलार्म घड़ी सुबह उठाया करती थी। कभी चाभी भरना भूल गए तो रात तीन बजे ही घड़ी का कांटा दम तोड़ दिया करता था। चाभी वाली अलार्म क्लाक में न सेल का झंझट था न ही चार्ज करने की कोई बात ओर न ही हानिकारक तरंगों का भय। मोबाईल रेडिएशन से तो स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता ही है।

आज पुनः हमें सोचना विचारना होगा कि हम आधुनिकता के चक्कर में वास्तविक और सेहत संबंधी बातों को भुलाते जा रहे हैं। आधुनिकता के नाम पर सेहत के साथ खिलवाड़ कहां तक उचित है! विकास की अंधी कभी न खत्म होने वाली दौड़ में हमने अपने पारंपरिक मूल्यों को पूरी तरह भुला दिया है। आधुनिकता के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ कहां तक सही ठहराया जा सकता है। मौसम में होने वाले परिवर्तन से हमें सचेत होकर पुनः अपने पुराने जरूरी ढर्रे को अंगीकार करना आवश्यक है।

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