लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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मलेशिया के दो राज्य सबसेअधिक रूढ़िवादी माने जाते हैं.एक तो टेरेंगानु और दूसरा पेनांग मलेशिया में यही दो राज्य हैं, जहाँ साप्ताहिक छुट्टियां शुक्रवार और शनिवार को होती हैं,नहीं तो पूरे मलेशिया में सप्ताहांत शनिवार और रविवार के रूप में प्रचलित है.टेरेंगानु राज्य  की राजधानी टेरेंगानु है,और पेनांग की क्वांटन, पर यह प्रेम कहानी तो पनप रही थी,करतीह केआसपास,जो इन दोनों नगरों के बीच एक छोटा सा शहर है और टेरेंगानु राज्य का हिस्सा है.

करतीह के एक कोने में यह दमनशारा कालोनी है.कुल पचास बंगले हैं ,इसमें,फिर भी कालोनी तो है.जिस तरह से गतिविधियाँ अब  यहाँ शुरू हुई है,उससे लगता है कि इसे बड़ा बनाया जा रहा है.अभी तक कालोनी का चौथाई हिस्सा तो एक होटल के कब्जे में है.इसके अतिरिक्त यहाँ कुछ भी नहीं है,पर पता लगा है   कि इसके विस्तार के साथ यहां स्विमिंग पूल और क्लब बनाने की भी योजना है.इस छोटी सी  कालोनी में भी  सब एक जगह के लोग नहीं हैं.कुछ भारतीय हैं तो कुछ चीनी.यहाँ के निर्माण कार्य से सम्बंधित भी कुछ लोग हैं.वे मूलतः मलेशियन यानि मलय हैं, उनके साथ कुछ नेपाली भी हैं. ऐसे जो मलय हैं,उनके बारे में यह नहीं कह सकते कि वे मूल मलेशिया निवासी हैं या मलेशियन इंडियन है.मलेशियन इंडियन भी एक अजीब वर्गीकरण है यहाँ.मलेशिया एक मुस्लिम राष्ट्र है.पर यहाँ के  अधिकतर  मलेशियन इंडियन  हिन्दू हैं,जिनके   पूर्वज  भारत के दक्षिणी हिस्से से आकर बसे हुए हैं,खास कर तमिलनाडु से. यह सिलसिला बहुत पहले से जारी है,क्योंकि चेन्नई  बन्दरगाह यहाँ से नजदीक पड़ता है.ऐसे मलेशिया में सरदारों की संख्या भी काफी हैं पर उनको यहाँ बंगाली माना जाता है,ऐसा शायद इसलिए है,क्योंकि उनके पूर्वज कोलकाता बंदरगाह से यहाँ आये थे. भारतीय परिवारों  में केवल वे लोग हैं,जो यहाँ की एक बड़ी पेट्रोलियम कंपनी में काम करते हैं.उनमे आपसी भाईचारा बहुत ज्यादा है.कोई दिल्ली या नागपुर का हिन्दू है,तो दूसरे केरल या उत्तर प्रदेश के मुस्लिम भी हैं,पर यहाँ तो सब भारतीय है.

यह इन्ही मलय परिवारों में से एक की कहानी है.

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करतीह के एक तरफ तेरंगानु है तो दूसरीन तरफ क्वांटिन.यह कहना कठिन है कि करतीह के किस तरफ प्रकृति का सौंदर्य अधिक है. ऐसे करतीह से दोनों शहरों की दूरी लगभग १०० किलोमीटर है.साफ़ सुथरी सड़कें हैं,तो घने जंगल और पहाड़ियां भी हैं. इन सबसेअलग हट कर हैं,पाम के वृक्ष ,जो मलेशिया के आय के मुख्य स्रोतों में है.पर पहले तो पाम के ये पंक्तियों में लगाए वृक्ष यहाँ की प्राकृतिक छट्टा को निखारने में योगदान देते हैं.पर इन सबसे  हट कर है कृष्णन,मलेशियन इंडियन माता पिता  की एकलौती संतान.देखने में सुन्दर,पढ़ाई लिखाई में अव्वल माँ बाप को इससे ज्यादा क्या चाहिए?   पर नहीं.कृष्णन के माता पिता उससे प्रसन्न नहीं हैं.उनका इकलौता  बेटा उनकी चिंता को कम करने के बदले बढ़ाये जा रहा है. मलेशिया में वर्षों से बसे होने के बावजूद उनके इस दक्षिण भारतीय,खास कर तमिलियन संस्कृति में अभी भी कोई परिवर्तन  नहीं आया है. इसके बहुत साल गुजर चुके हैं,जब कृष्णन के पितामह पहली बार यहाँ  आये थे. उस समय तो शायद उनको भी नहीं पता था कि वे यहीं का होकर रह जाएंगे.

उनके यहाँ आने की कहानी भी विचित्र सी  है.उसके दादा को  बचपन से ही पढ़ने लिखने में  कोई ख़ास अभिरूचि नहीं थी.स्वाभाविक था  कि जैसेजैसे वे बड़े होते गए माँ बाप की चिंता भी बढ़ती गयी.

ऐसे कृष्णन के खानदान में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था कि कोई  पढाई लिखाई में इतना फिस्सडी हो,पर जब उनका एक लड़का इस  तरह का निकल रहा था,तो उनके लिए चिंता स्वाभाविक थी.इसी बीच पड़ोसी के घर उनके मलेशिया में बसे हुए भाई का आगमन हुआ.बातों ही बातों में कृष्णन के दादा की बात उनके पिता  जी ने छेड़ दी.उन सज्जन ने सुझाव दिया कि अगर आप चाहें तो मैं आपके लड़के को अपने साथ मलेशिया ले जा सकता हूँ.पहले तो वे थोड़ा झिझके.फिर इस पर आगे बातें हुई.उन सज्जन ने अपने कारोवार का व्योरा भी दिया.उनके कारोवार के मुख्य आधार उनके खेत थे,जहाँ नारियल और पाम की खेती होती थी.वहां कृष्णन के दादा  को उनके सहायक के रूप में कार्य करना था.उनके पिताजी को कोई ख़ास ज्ञान तो था नहीं मलेशिया के बारे में,पर विस्तार पूर्वक बातचीत से उनको लगा कि  प्रस्ताव अच्छा है.कृष्णन के दादा तो न जाने क्यों ,आनन फानन में उनके साथ जाने को तैयार हो गए और इस तरह कृष्णन के पूर्वजों का एक हिस्सा कट कर मलेशिया की ओर चल  पड़ा,पर उस समय किसी को कहाँ पता था कि भारत से उनका यह बाहर  निकलना स्थाई रूप ले लेगा,पर हुआ ऐसा ही.

जिंदगी भी क्या रंग बदलती है. उसके  जो दादा वहां जिंदगी की दौड़ में पिछड़ रहे थे और फिस्सडी साबित हो रहे थे,यहां आते हीं कुलाच्चें  भरने लगे.  कृष्णन ने  होश सँभालने  के बाद जब उनके प्रारंभिक दिनों की कहानी सुनी ,तो उसको विश्वास ही नहीं हुआ कि उसके इतने सफल पितामह ने जिंदगी में इतनी  अड़चने झेली और सब कठिनाइयों का सामना करते हुए इतनी सफलता हासिल की. उसके पितामह ने स्वीकार किया था कि वे आम पढाई में सचमुच कमजोर थे,पर बाद में हँस कर बोले थे कि तुम देख ही रहे हो कि मेरा दिमाग इधर उधर बहुत चलता था और उसी का परिणाम है कि मैंने इतना सब अर्जित किया.यह सच था कि कृष्णन के पिता अपने पिता द्वारा फैलाये गए कारोबार को सुचारू रूप में चला रहे थे.उनको अपनी तरफ से कुछ खास करने की आवश्यकता  कभी नहीं पडी .

कृष्णन के पितामह को तो एक तरह से उनके पिता जी ने यह सोच कर पड़ोसी केसाथ लगा दियाथा कि शायद वह वहाँ रहकर सुधर जाये. कोई ख़ास उम्मीद तो उन्होंने किया नहीं था. कृष्णन के दादाजी अपने नए मालिक को उनकी कृषि सम्बंधित व्यापर में सहायता करने लगे,पर साथ ही इस प्रयत्न में भीलगे रहे कि यहां आगे कैसे बढ़ा जाए?मालिक का कारोबार अच्छा चल रहा था और वे उनको बहुत पसंद भी करते थे,अतः उसके दादा को वेतन भी अनुमान से ज्यादा हीं मिल रहा था.उसके दादा समझ रहे थे कि उनके परिवार को उनके वेतन से कुछ पाने की उम्मीद तो नहीं हीं है और  नउनको इसकी कोई आवश्यकता थी,अतः उन्होंने पैसे बचाने  और जमा करने शुरू  कर दिए.वे शादी योग्य अवश्य हो गए थे,पर न उन्हें कोई जल्दी थी और न परिवार वाले दबाव डाल रहे थे.दो तीन वर्ष इसी तरह बीत गए.जब एक दिन उन्होंने अपने मालिक से नौकरी छोड़ने  की अनुमति मांगी,तो उन्हें थोड़ा अटपटा लगा..कारण पूछने पर उन्होंने साफ़ साफ़ कहा कि अब वे अपना अलग कार्य करना चाहते हैं. कृष्णन के दादा   बोले थे,”सोचो,उनके चेहरे पर क्या भाव आया होगा?वे तो आश्चर्य से उछल पड़े थे. फिर उन्होंने बड़े धैर्य से  विस्तार पूर्वक सब सुना. मैंने उनको सबकुछ साफ़ साफ बता दिया था.कैसे मैं  उनके दिए वेतन से बचत करता रहा.कैसे मैंने अवसर देखते हीं जमीन खरीदी और अपना एक सहायक रख कर काम करवाता रहा.कैसे मैंने उनके काम में कोई   ढिलाई नहीं होने दी. उन्होने तब यह भी पूछा था कि अभी भी  वैसा ही चलने देने में क्या हर्ज है? मैंने उन्हें अपनी  कठिनाई बताई.उन्होंने आशीर्वाद के साथ मुझे विदाई दी.जब तक वे जिन्दा रहे.मेरा सम्बन्ध  उनसे बना रहा” कृष्णन ने उनसे पूछा था कि क्या तब तक उन्होंने शादी नहीं की थी.उसके दादा उसका यह प्रश्न सुनकर बड़ी जोर से हँसे थे.बोले थे,” जिसका विदेश में अपना ही कोई ठिकाना नहीं था,उसे लड़की कौन देता देता,पर अब जब मेरे कारोबार कसमाचार वहां पहुंचा तो दबाव पड़ना आरम्भ हुआ और एक दिन तुम्हारी दादी ने इस बिरान घर को रोशनी  से भर दिया.” बगल में बैठी दादी भी हंस पडी थी,अंतिम वाक्य सुनकर

कृष्णन की दादी तमिलनाडु से ब्याह करके लाई गयी थी.उसके पिता ने भी अपने पिता के नक़्शे कदम पर चलते हुए अपना जीवन संगिनी तमिल लड़की हो ही चुना.

पढ़ाई लिखाई तो कृष्णन के पिता जी ने भी कोई ख़ास नहीं की,पर कृष्णन का झुकाव उस तरफ   देख कर उन्होंने उसको सब सुविधा प्रदान की और आज वह एक सफल आर्चिटेक्ट है.

यहां तक तो सब ठीक था.माता  पिता भी उससे बहुत प्रसन्न थे,पर कृष्णन बेचैन रहता था.उसके माता पिता के कान में  कृष्णन के सम्बन्ध में कुछ भनक अवश्य पडी थी,पर उन्होंने इसे अफवाह समझ कर इस कान से सुनकर उस कान से उड़ा दियाथा.वे अपने पुत्र के बारे में ऐसा कुछ सोच ही नहीं सकते थे.उसके परिवार की तीसरी पीढ़ी मलेशिया में रह रही थी,पर उन्हें फक्र था कि वे अपनी संस्कृति ,अपनी परम्परा को अक्षुण रखने में सफल रहे थे.उसकी दादी भी तमिल परिवार से आई थी और माँ भी.

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कृष्णन और आयशा का मिलन अचानक नहीं हुआ था,पर यह तो कृष्णन और आयशा दोनों को नहीं पता चला कि वे कब एक दूसरे को प्यार करने लगे.वे बचपन से एक दूसरे के साथ थे.स्कूल जाना भी साथ साथ  आरम्भ हुआ. कृष्णन और आयशा केपरिवार भी आपस में बहुत घनिष्ट थे.उसी घनिष्टता का परिणाम था कि दोनों बच्चे भी आपस में बहुत घुले मिले थे. दोनों के अभिभावक भी इनकी इस मित्रता को सराहते थे.उनको तो यह बहन भाई की जोड़ी लगती थी.ऐसे भी आयशा मुस्लिम परिवार की बेटी थी,पर मलेशिया में लड़का लड़की का वह फर्क तो नहीं दिखता है,जो अन्य स्थानों पर दृष्टिगोचर होता है.ऐसे तमिल भी अपनी संस्कृति के लिए बहुत कट्टर समझे जाते हैं,पर मैंने भारत में भी देखा है कि वे इस मामले में उत्तर भारतीयों की अपेक्षा ज्यादा आजाद ख्यालों के हैं. हो सकता है कि यहाँ आकर वे ज्यादाआजाद ख्यालों वाले हो गएँ हों.कारण कुछ भी हो ,पर परिणाम यह था कि कृष्णन और आयशा के मित्रता में कोई रूकावट नहीं पड़ा.वे आपस में झगड़ते भी थे,पर वह झगड़ा भी मात्र कुछ क्षणों का होता था. इन क्षणों में वे अपनी अपनी माताओं से एक दूसरे की शिकायत भी करते थे,पर वे लोग भी जानती थी कि यह सब कुछ क्षणों का है,बाद में सब ठीक हो जायेगा और होता भी  वही था.कभी कभी झगड़े ज्यादा खिंच जाते थे और वे एक दूसरे से रूठ भी जाते थे,पर  न जाने प्रेम की वह कौन सी डोर थी,जो उन्हें ज्यादा देर तक रूठे भी रहने नहीं देती थी.

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समय इसी तरह बीतता रहा कृष्णन और आयशा अब किशोर हो गए थे और उच्च कक्षाओं में आ गए थे,पर आपसी सम्बन्ध वे बचपन वाले हीं थे.आयशा भले ही  कभी कभी थोड़ा संकोच करने लगती थी,पर कृष्णन उसको संकोच करने देता तब न.आयशा कभी कभी उसको हंसी हंसी में झिड़क भी देती थी,पर उसको यह भी लगता था कि कहीं कृष्णन बुरा न मान जाये,पर कभी जब ऐसा हो भी जाता था,तो वह उसे मना लेती थी.आयशा की माँ आखिर लड़की की माँ थी.उन्हें अब लगने लगा था कि शायद इस मेल जोल को थोड़ा कम करना होगा,पर वह भी कोई अचानक कदम नहीं उठाना चाहती थी,क्योंकि  दुनिया दारी   की बात अलग थी,पर उनको उन दोनों के सम्बन्ध में कोई खोट नहीं नजर आ रहा था.वह यह भी सोचती थी कि अब साथ भी कितने दिनों का है.स्कूल की पढाई के बाद तो दोनों को अलग होना ही है,क्योंकि कृष्णन इंजीनियर या आर्किटेक्ट बनाना चाहता था.उसके माता पिता भी यही चाहते थे,पर आयशा के माँ बाप का इरादा उसे सामान्य लाइन में रखने का था और आयशा को भी उस तरफ   कोई खास रुचि नहीं थी.पता नहीं वह उस समय यह क्यों नहीं सोचती थी कि कृष्णन का साथ छूट जायगा.शायद वे दोनों इस सम्बन्ध को उतनी गहराई से समझ भी नहीं पा रहे थे.

कृष्णन और आयशा इतनी कहानी सुना कर चुप हो गए थे.उनको लग रहा था किअगर सचमुच उस स्तर पर वे एक दूसरे के सम्बन्ध की गहराई को समझ जाते तो न जाने क्या होता?इस दम्पतिसे ,जिनका एक बहुत सुन्दर एक वर्षीय बेटा भी था,मिलना भी महज संयोग था.वे युवा दम्पति हमलोगों के बंगले से बहुत कम दूरी पर रहते थे.शायद  आठ बंगलों के बाद उनका बंगला था.पांच या छह बंगले तो एक ही कतार में थे,पर उसके बाद सड़क मुड़ जाती थी और एक बंगले के बाद उनका बंगला आता था.फिर तीन अन्य बंगले.दूरी कम होते हुए भी इन लोगों से जान  पहचान नहीं हो पायी थी.  ऐसे भी हमलोग कुछ महीने हीं पहले अपने बेटे बहू के घर आये थे.पर उस दिन अचानक यह दूरी,यह अजनबीपन  समाप्त हो गयी थी.हमलोग अपने सांध्य कालीन भ्रमण में कॉलोनी का चक्कर लगा रहे थे.इसे हमारे बेटे बहू के मित्र ऑफिसियल टहलना कहते थे,क्योंकि यह हमलोगों का नियमित कार्यक्रम था,जबकि वे लोग कभी कभार ही टहलने निकलते थे.उस शाम,जब हमलोग वहां से गुजर रहे थे ,तो देखा कि एक युवती अपने बंगले से निकल कर पड़ोसी को पुकार रही थी.उसका छोटा बच्चा उसकी गोद में निढाल पड़ा हुआ था.हमलोग तुतरत उसके पास पहुँच गए.उस बच्चे का पीठ सहलाने लगे और पास के नल से उसके सर पर थोड़ा पानी भी डाले,क्योंकि बच्चे को बुखार था.उसने शायद पड़ोसन को अपनी भाषा में कार लाने को कहा था. वह बहुत घबड़ा रही थी.हमलोगों ने उसे धीरज बंधाया.फिर वह पड़ोसन के साथ क्लिनिक चली गयी.यही आयशा थी.उसने अपना नाम तो दूसरे दिन बताया.

दूसरे दिन सायं काल फिर हमलोग अपने नियमित कार्यक्रम केअनुसार टहलने निकले.दिन में भी हमलोग उस युवती और उसके बच्चे के बारे में सोचते रहे थे.जब हमलोग उस बंगले के पासपहुंचे तो उत्सुकता बस हमलोगों की आँखें उस तरफ उठी.आज उस युवती ने देखते ही हमलोगों को अंदर बुला लिया.बच्चे की हालत जानने की उत्सुकता तो थी ही.बच्चा वहीँ बिस्तर पर लेटा  हुआ   था,पर उछल कूद तो कर ही रहा था.आज उसका पति भी साथ था.उसने अपना नाम कृष्णन बताया और पत्नी का आयशा.हमलोग ज्यादा देर बैठना नहीं चाहते थे.बच्चा भी ठीक हो ही गया था,एक उत्सुकता अवश्य थी यह जानने की,कि यह कृष्णन और आयशा एक साथ कैसे,क्योंकि मैंने सुन रखा था कि मलेशिया में रहते हुए भी अधिकतर  इंडियन मलेशियन अभी भी अपनी पत्नी भारत से ही लाते थे.कुछ लोग अवश्य अपनी बिरादरी में यहां भी विवाह रचाते थे,पर  बिरादरी के बाहर कभी नहीं.  पर यह शादी तो बिरादरी के बाहर थी.चाय के दौरान यह कहानी सुनने को मिली,पर कृष्णन तो इतनी कहानी सुना कर चुप हो गया था.हमलोगों के लिए तो यह उत्सुकता की पराकाष्ठा थी.कृष्णन शरारत पूर्वक मुस्कुराया और पत्नी की ओर इशारा किया. आयशा भी कम शरारती नहीं निकली.जान रही थी कि आगे की कहानी सुनने के  लिए हमलोगों का दम  निकला जा रहा है,पर बोली,” आगे की कहानी सुनना चाहते हैं ,तो आपलोगों को कल एक बार फिर चाय पीने आना होगा’ हमलोग कह भी क्या सकते थे.विदा लेकर टहलते हुए अपने घर आ गए.टहलना तो कोई ख़ास नहीं हुआ था,फिर भी अफ़सोस नहीं था.

हम दोनो के आगे के चौबीस घंटे इस प्रतीक्षा में कटे कि कब शाम हो और हम लोग आगे की कहानी सुने.पर जब दूसरे दिन सांध्य काल आया ,तो मन में एक हिचक सी होने लगी.हमलोगों को लगने लगा कि क्या यह अच्छा लगेगा कि न जान न पहचान. केवल चंद क्षणों की मुलाकात और पहुँच गए धरना देने.हमलोगों ने विचार किया कि हमलोग टहलने तो निकलेंगे,पर उनके बंगले की तरफ मुंडेंगे नहीं,क्योंकि कहानी सुनने और चाय पीने के बहाने वहां जाना अच्छा नहीं लग रहा था.हमलोग अपने बेटे बहु से भी पहले दिन की पूरी बात नहीं बताये थे,अतः उनसे सलाह भी नहीं ले सकते थे.केवल इतना ही बताये थे कि उधर के बंगले के मलय दम्पति से हैल्लो हैल्लो करके आये थे पर आज तो न मुड़ने का प्रश्न ही नहीं उठा. आयशा मोड़ पर ही मिल गयी.उसने ही हमलोगों को नमस्ते किया.हमलोगों ने बच्चे के बारे में पूछा  तो उसने बताया,”वह अब एकदम ठीक है.कृष्णन भी आ गया है.इसीलिये अभी मैं थोड़ा बाहर निकली थी.मुझे यह भी लगा था कि आपलोग टहलते हुए मिल जाएंगे. चलिये चाय  पीकर जाइयेगा” पत्नी बोली,”आज रहने दो.फिर कभी आ जाएंगे.” आयशा तुरत बोली,”यह क्या आंटी? आप तो औपचारिकता करने लगी.हमलोगों ने आपसे अपनी कहानी का बाकी अंश सुनाने का  भी  तो  वादा किया था.आपलोगों को वह भी तो सुनना है.”अब क्या बहाना करते?उसके साथ हो लिए.

पता नहीं क्यों मुझे लग रहा था कि हमलोगों को जितनी कहानी सुनने की जिज्ञासा है उतना ही उसको अपनी कहानी सुनाने की उत्कंठा है.खैर.

अब हम लोग उसके ड्राइंग रूम में बैठे थे और कृष्णन से आगे की कहानी सुन रहे थे.आयशा तो चाय का प्रवन्ध करने किचन में चली गयी थी.आगे की कहानी तो सचमुच बेहद रोचक थी.स्कूल की पढाई ख़त्म हो चुकी थी.अब दोनों परीक्षा के परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे थे. उनके उस छोटे शहर में स्कूल की पढाई से आगे  के लिए कोई  प्रबंध था नहीं.अब देखना यह था कि कहाँ प्रवेश मिलता है,पर  अब  जब परीक्षा समाप्त होने और परिणाम आने के बीच के समय उनलोगों को किताबों से फुर्सत मिली तो उनलोगों ने एक दूसरे के बारे में सोचना शुरू किया और उनलोगों को पहली बार महसूस हुआ कि वे लोग एक दूसरे से अलग हो जाएंगे. इसके पहले तो बचपन से वे ऐसे साथ थे कि इस तरफ कभी ध्यान हीं नहीं दिया उनलोगों को तो यह भी पता नहीं चला कि कब वे गुड्डे गुड़ियों का ब्याह रचाते अपने व्याह योग्य हो गए थे.उनका साथ इतना सहज और स्वाभाविक था कि वे बिछुड़ने की पीड़ा को अब तक समझ ही नहीं सके थे,पर अब उनलोगों को यह सोचने में भी कष्ट होने लगा.इसी बीच परीक्षा का परिणाम आ गया और फिर दोनों का कॉलेज में प्रवेश की तैयारी.

एक बात बड़ी विचित्र लगी. आयशा ने कहा कि हमलोग  तो अब तक  यह भी नहीं समझ  पाये  थे कि बचपन से एक दूसरे को साथ रहने को क्या नाम दिया जाये.हमलोग बस एक दूसरे के साथी थे,क्योंकि  हमलोग अगल बगल रहते थे.एक दूसरे के साथ खेलते खाते हँसते रोते बड़े हुए थे.हमलोग,  न यह सोचे थे कि कभी साथ भी छूटेगा और न यह सोचते थे कि साथ छूटने पर कैसा लगेगा.आज जब उन दिनों की याद आती है,तो लगता है कितने बेवकूफ थे हमलोग भी.पर अब जब साथ छूटने को हुआ,तब पता चला  अपने सम्बन्ध की गहराई का.तब लगा कि हमलोग तो एक दूसरे के लिए ही बने हुए हैं.कृष्णन ने भी हामी भरी.हमलोग तो किसी तरह का प्लान भी नहीं बना पाये थे,क्योंकि हमलोगों को इसका एहसास ही नहीं हुआ था,पर अब?अब तो सोचने भी कष्ट हो रहा था.लगता था कि कैसे रह पाएंगे हमलोग एक दूसरे के बिना?

आगे की पढ़ाई के लिए जिस तरह का उनका प्लान था उसमे उन दोनों का साथ रहना नामुमकिन था.हुआ भी वही.आयशा को क्वांटन में जगह मिली तो कृष्णन को कुआलालम्पुर में. दोनों नगरों की दूरी करीब २५० किलोमीटर यानि बस से करीब चार घंटें.कृष्णन  क्वांटन में नहीं पढ़ सकता था,क्योंकि वहां  आर्किटेक्चर की पढाई नहीं थी और आयशा चाह कर भी कुआलालम्पुर नहीं जा सकी,क्योंकि कुआलालम्पुर   जाने का मतलब २५० किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी,जिसके लिए उसके मातापिता तैयार नहीं थे,क्योंकि वे अपनी एकलौती बेटी को नजदीक से नजदीक रखना चाहते थे.उसकी माँ के मन में तो शायद यह  भी था कि बेटी व्याह योग्य हो गयी है ,तो उसका कृष्णन से दूर रहना ही अच्छा .ऐसा कहते कहते वे दोनों हँस  पड़े.मेरी धर्म पत्नी से न रहा गया.वह पूछ ही बैठी,”आखिर तुमलोग फिर साथ हुए कैसे?”

उनलोगों ने बताया बड़ी लम्बी कहानी है यह.वे लोग  जिस दिन दोनों नगरों के लिए अलग अलग प्रस्थान किये वह दिन याद करके आज भी वे दोनों रोने रोने को हो गए.उसी दिन उन्होंने पहली बार यह महसूस किया कि वे दोनों एक दूसरे के बिना एक पल भी नहीं रह सकते थे.दोनों को लग रहा था कि उनके  दिल के टूकड़ेटुकड़े हुए जा रहे है.वे बच्चों की तरह मचल भी नहीं सकते थे.मन मसोस कर अपने आँखों से उमड़ते हुए आंसुओं को अपने अपने माता पिता  की नज़रों से छिपाए हुए वे अलग अलग नगरों के लिए रवाना हुए.

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चार वर्ष गुजर गए थे .दोनों ने अपनी डिग्रियां हासिल कर ली थी और  आज दोनों अब खड़े थे अपने माता पिता के सामने.आज भी जब वे इस दिन को याद करते हैं ,तो लगता है,जैसे कल की बात हो.कवांटन और क्वालालम्पुर  की दूरी भी उनको अलग नहीं कर पायी थी.आयशा के लिए तो अकेले क्वालालम्पुर की यात्रा करना उतना आसान नहीं था.ऐसे वहां बस या टैक्सी सेअकेली लड़की को आने जाने में किसी तरह काखतरा नहीं था. मलेशिया में तो लड़कियां रात के बारह या एक बजे भी सडकों पर मोटर साइकल या कार चलाती हुई दिख जाती हैं.उनके सर पर हिजाब अवश्य रहता है.असल खतरा था पकडे जाने का,क्योंकि क्वालालम्पुर  की तरफ जाने का उसके पास कोई बहाना नहीं होता.अतः  वह कृष्णन के लिए इंतजार के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकती थी.साथ साथ पढाई का भी ध्यान रखना था,खासकर कृष्णन के लिए,क्योंकि वह जानती थी कि अगर कृष्णन असफल हो गया ,तो सारा दोष  उसके माथे मढ़  दिया जायगा और फिर उनका मिलन  तो शायद असंभव ही हो जाये.कोई नहीं समझ सकता था,उनकी पीड़ा को. कहाँ तो दिन रात केसाथ और कहाँ कैलेण्डर की ओर टकटकी.

हर छुट्टियों में भी कृष्णन नहीं आ पाता था.हालांकि  जब उसे फुर्सत नहीं मिलती थी ,तो वह खबर कर देता था.भला हो मोबाईल फोन का जो उनलोगों का एक मात्र सहारा था गुफ्तगूं का .फिर भी बहुत मुश्किल होता था दोनों को अपने दिल को समझाने  में कि जाने कब समाप्त होगी प्रतीक्षा की  ये घड़ियाँ?सप्ताहांत या पखवाड़े का यह मिलन इतनी जल्द समाप्त हो जाता था कि उनका दिल तड़प कर रह जाता था,पर वे एक दूसरे की मजबूरी अच्छी तरह समझते थे और इन्तजार कर रहे थे अपनी पढ़ाई के समाप्ति का.इस तरह ये लूका छिपी का खेल खेलते हुए ये चार वर्ष किस तरह गुजरे थे,वह तो उनका दिल ही जानता है.बीच बीच में उनके शादी व्याह की बात भी उठती रही थी,खासकर आयशा के,पर वे एक न एक बहाना बना कर इसको टालते गए थे. वे जल्दी में ऐसा भी कोई कदम नहीं उठाना चाह रहे थे,जिससे दोनों परिवारों कि बदनामी हो और न एक दूसरे को छोड़ सकते थे. उनको पता था कि माँ बाप को मनाना इतना आसान नहीं होगा,खासकर कृष्णन के लिए,क्योंकि उसके माता पिता को गर्व था कि मलेशिया में इतना वक्त गुजारने के बाद भी वे अपनी परम्परा को अक्षुण रखने में सफल रहे थे.आयशा के माता पिता भी कभी नहीं चाहते कि उनकी एकलौती बेटी उनके समुदाय से हट कर शादी रचाये

अब उनकी शिक्षा पूरी हो गयी थी.कृष्णन को तो एक अच्छी कंपनी में जॉब का भी ऑफर मिल चूका था.आयशा अभी नौकरी की इतनी इच्छुक नहीं थी.ऐसे भी उसने यह भी सोचा था कि जब कृष्णन के साथ ही रहना है,तो इतनी भी जल्दी क्या है?पहले अपने जिंदगी की यह बड़ी परीक्षा तो उत्तीर्ण हो लें.उनलोगों ने नीडर होकर  परिस्थितियों का सामना करने के लिए अपने को तैयार किया,क्योंकि वे जानते  थे कि अपने माता पिता को मनाना बहुत ही कठिन कार्य होगा.फिर भी उनको इसके लिए प्रयत्न तो करना ही होगा,क्योंकि एक दूसरे से  अलग होकर वे जिंदगी का बोझ  ढोने को सोचना भी नहीं चाहते थे.  वे जान चुके थे कि अब उनका जीना मरना साथ ही साथ है.पर उन्होंने निर्णय कर लिया था कि अगर माता पिता सचमुच नहीं माने तो वे जान दे देंगे,पर न एक दूसरे के साथ दगा करेंगे और न माता के सर झुकने लायक कोई कार्य करेंगे.ऐसे वे दोनों बालिग़ थे,अतः   माँ बाप की अनुमति के बिना भी शादी के बंधन में बंध सकते थे,पर न जाने क्यों उनको लग रहा था कि ऐसा करके वे अपने माँ बाप के प्यार का अपमान कर देंगे.मेरी पत्नी ने पूछा था,” तुमलोगों ने यह क्यों नहीं सोचा कि मृत्यु का वरण करने पर भी तो माता पिता दुःखी होंगे?” उन्होंने स्वीकार किया कि इस दृष्टि कोण से उन्होंने सचमुच नहीं सोचा था.खैर उसकी नौबत ही नहीं आई.माता पिता अपनी   जिद्द पर अड़े हुए थे,तो उनकी संतानें भी पीछे नहीं थी.मिलना जुलना भी बंद था.मोबाइलें नहीं छीनी गयी थीं,पर घर में रह कर बात कर लेना इतना आसान नहीं था,पर किसी न किसी तरह वे एक दूसरे से सलाह ले ही लेते थे. अंततः उन्होंने भूख हड़ताल कर दिया .माँ बाप इसके लिए एक दम नहीं तैयार थे.दोनों की एकलौती संतान थे वे.माँ बाप कब तक उनको भूख से तड़पते देख सकते थे?अंत में उन्होंने हथियार डाल दिए.परिवारों की आपस में कोई रंजिश  भी नहीं हुई,क्योंकि  मामले को इस स्थिति तक  पहुंचाने लिए दोनों परिवार अपने को जिम्मेवार मानते थे.अब जब सब ठीक हो गया,तो दोनों परिवारों ने मिलजुल कर अपने अपने रस्मोरिवाज को निभाते हुए इनकी शादी रचाई.अब तो ऐसा लगता भी नहीं कि वे लोग इस झंझावात  से भी गुजर चुके हैं. मैं अंत तक चुप ही रहा था.अब बोला,” so all is well now.”  यह सुनकर वे दोनों जोर से हंस पड़े.

 

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