लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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pkpकलाकार: कार्तिक आर्यन, ओमकार कपूर, सनी सिंह, नुसरत भरूचा, इशिता राज, सोनाली सहगल, शरत सक्सेना
निर्माता: अभिषेक पाठक
निर्देशक: लव रंजन
संगीत: हितेश सोनिक, शरीब साबरी, तोषी साबरी
स्‍टार: 2.5

एक घोर नारी विरोधी फिल्म मगर देखने वाले दर्शकों में लड़कियों की संख्या ज्यादा है, आज का युवा वर्ग जिस गालियों की भाषा में सहज रूप से बात करता है उसपर लडकियां लड़कों से ज्यादा तालियां पीट रही हैं, जिस प्यार की लोग कसमें खाते थे, उसकी हंसी उड़ाती लडकियां सिनेमाहाल में सीटियां बजा रही हैं। कुछ ऐसे ही बदलाव का दृश्य दिखलाती है लव रंजन की ‘प्यार का पंचनामा 2’। 2011 में लव रंजन ने नए कलाकारों के साथ ‘प्यार का पंचनामा’ जैसी सफल फिल्म बनाई थी जिसमें लड़कियों को दोस्ती, प्यार, सेक्स और अंत में धोखा देते दिखाया गया था और अब चार साल बाद भी लव रंजन उसी लीक पर चलते नज़र आ रहे हैं। पिछली फिल्म की इस एक्सटेंशन को युवा वर्ग के नजरिए से देखें तो ‘प्यार का पंचनामा 2’ सटीक है। जो आज के समाज में हो रहा है, उसको उभारती है ‘प्यार का पंचनामा 2’। कुल मिलाकर कलयुग के त्रिया चरित्र से रूबरू करवाती है ‘प्यार का पंचनामा 2’ जिसमें लड़कियों को लड़कों की जिंदगी का सबसे बड़ा कांटा माना गया है।

कहानी: पिछली फिल्म की तरह यहां भी तीन दोस्त हैं। अंशुल उर्फ़ गोगो (कार्तिक आर्यन), सिद्धार्थ उर्फ़ चौका (सनी सिंह) और तरुण उर्फ़ ठाकुर (ओमकार कपूर)। ये तीनों पढ़े-लिखे हैं, अच्छी जॉब्स करते हैं और एक साथ नोएडा के एक आलीशान फ्लैट में रहते हैं। इनकी दोस्ती और जिंदगी शराब और कबाब के कॉकटेल से मजे में कट रही है। मुश्किलें तब शुरू होती हैं जब इनकी जिंदगी में रुचिका उर्फ़ चीकू (नुशरत भरुचा), सुप्रिया (सोनाली सहगल) और कुसुम (इशिता शर्मा) नाम की लडकियां आती हैं। इन तीनों के आने के बाद से कैसे तीनों दोस्तों के सामने कई तरह की परेशानियां आती हैं और इसके बाद कैसे इनकी अच्छी-ख़ासी ज़िंदगी दूभर हो जाती है, पूरी फिल्म इसी मुद्दे पर चलती है।

निर्देशन: लव रंजन युवाओं की नब्ज पकड़ना जानते हैं तभी उन्होंने ‘प्यार का पंचनामा 2’ को ऐसा ट्रीटमेंट दिया है जिसपर उनका हंसना और तालियां पीटना लाजमी है। हालांकि कहानी और लड़कियों के किरदार पुरानी फिल्म से ही हैं फिर भी दर्शक यदि इस फिल्म को पसंद कर रहे हैं तो इसे लव रंजन की दूरदर्शिता ही माना जाएगा। चूंकि वर्तमान भारतीय समाज; पश्चिमी समाज का अंधा अनुसरण कर रहा है और इसमें युवाओं की संख्या सर्वाधिक है लिहाजा लव रंजन ने जिस नजरिए से फिल्म को आधुनिकता का चोला उढ़ाया है, वह युवा वर्ग को अपने करीब लाएगा। पूरी फिल्म लड़कों के दृष्टिकोण से बनाई गई है और लड़कियों के जमकर खिलाफ है। फिल्म का सार कि लड़कियां बेहद स्वार्थी होती हैं और प्यार के नाम पर लड़के को बॉडीगार्ड, ड्राइवर और एटीएम बना लेती हैं, युवाओं को अपनी कहानी सा लगता है। वहीं लडकियां लड़कों की बेवकूफी और मासूमियत का फायदा उठाकर खुद को अपनी सहेलियों के बीच स्थापित कर लेती हैं। लव रंजन ने कहानी को लेकर कोई कोताही नहीं बरती है और प्यार में पड़े लड़कों को सांत्वना देने का प्रयास किया है।

अभिनय: कार्तिक आर्यन ने एक बार फिर खुद को साबित किया है कि इस तरह के किरदार उनसे बेहतर कोई नहीं कर सकता। पिछली फिल्म की तरह इस फिल्म में भी कार्तिक का लंबा मोनोलॉग है जिससे फिल्म की पूरी थीम को समझा जा सकता है। सनी सिंह का किरदार थोड़ा लूजर किस्म का है पर उन्होंने उसे अच्छे से निभाया है। ओमकार कपूर को थोड़ा सेक्सी किरदार मिला जिसपर उनकी अदाकारी जमी है। नुशरत भरुचा अब एक जैसी एक्टिंग कर रही हैं जिससे वे स्टीरियोटाइप लगने लगी हैं। सोनाली सहगल और इशिता शर्मा भी पुराने सांचे में से बाहर नहीं आ पाई हैं। बाकी किरदार ठीक-ठाक हैं।

गीत-संगीत: फिल्म का गाना ‘शराबी’ म्यूजिक चार्ट्स में ऊपर चल रहा है और कदम थिरकाने के काम आ सकता है। बाकी गाने फिल्म में ब्रेक जैसे हैं जो न भी होते तो कहानी की रफ़्तार पर कोई फर्क नहीं पड़ता। बैकग्राउंड में बजता ‘बन गया कुत्ता देखो बंध गया पट्टा’ लड़कों की हालत बयान करता है।

सारांश: यदि दोस्तों के साथ जा रहे हैं तो फिल्म भरपूर मनोरंजन करेगी। कृपया अपनी गर्लफ्रेंड को फिल्म न दिखाएं वरना फिल्म के नुख्से आप पर भी आजमाए जा सकते हैं। और माता-पिता के साथ फिल्म देखने की गलती न करें वरना जमकर मार पड़ सकती है। फिल्म टोटल टाइमपास है और युवाओं को लुभाएगी।

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