लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बैंच ने जब फैसला सुनाया तो उसके पहले उसने सभी पक्षों के वकीलों को यह आदेश दिया था कि वे मीडिया के सामने तब तक कुछ न बोलें जब तक अदालत के द्वारा फैसले की कॉपी मीडिया वालों को वितरित न हो जाए। लेकिन अदालत के प्रति सामान्य सम्मान तक बनाए रखने में हिन्दू संगठनों के वकील असफल रहे।

अदालत के बाहर एक मीडिया मंच बना दिया गया था जहां से वकीलों को सम्बोधित करना था, तय यह हुआ था कि पहले मीडिया को फैसले की कॉपी अदालत देगा और उसके बाद वकील लोग अपनी राय बताएंगे। इस सामान्य से फैसले का हिन्दू संगठनों के वकील सम्मान नहीं कर पाए और उन्होंने फैसला आते ही दौड़कर मीडिया को सम्बोधित करना आरंभ कर दिया।

फैसला सुनाए जाने के बाद सबसे पहले भाजपा के नेता और सुप्रीम कोर्ट में वकील रविशंकर प्रसाद ने इस नियम को भंग किया उसके बाद हिन्दूमहासभा और बाद में शंकराचार्य के वकील ने भी नियमभंग में सक्रिय भूमिका अदा की। रामलला के वकील और भाजपा के वकील साहब तो फैसला बताते हुए इतने उन्मत्त हो गए कि उन्होंने वकील और संघ के स्वयंसेवक की पहचान में से वकील की पहचान को त्याग दिया और संघ के प्रवक्ता की तरह मुसलमानों के नाम अपील जारी कर दी। कहने के लिए यह सामान्य नियमभंग की घटना है लेकिन हिन्दुत्ववादियों में राम मंदिर को लेकर किस तरह की बेचैनी है यह उसका नमूना मात्र है।

वकील का स्वयंसेवक बन जाना वैसे ही है जैसे रथयात्रा के समय कुछ पत्रकार संवाददाता का काम छोड़कर रामसेवक बन गए थे। इसबार हिन्दुओं के वकील इस फैसले पर हिन्दुत्व की जीत के उन्माद में भरे थे। उनका मीडिया को इस तरह सम्बोधित करना अदालत के आदेश का उल्लंघन था। इसके विपरीत मुस्लिम संगठनों के वकीलों ने संयम से काम लिया और मीडिया को तब ही अपनी राय दी जब अदालत की कॉपी मीडिया को मिल गयी।

लखनऊ बैंच के फैसले पर भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी और आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत ने एक-दूसरे के पूरक बयान दिए हैं। इन दोनों बयानों में क्या कहा गया है इसे बाद में विश्लेषित करेंगे, पहले यह देखें कि लखनऊ बैंच के फैसले से संघ परिवार के रवैय्ये में मूलतः क्या बदलाव आया है।

एक बड़ा बदलाव आया है संघ परिवार ने अदालत के फैसले का स्वागत किया है। राम मंदिर आंदोलन के दौरान संघ परिवार का स्टैंण्ड था कि हम अदालत का फैसला नहीं मानेंगे, राम हमारे लिए आस्था की चीज है। विगत 20 सालों से उत्तर प्रदेश में राम मंदिर का फैसला आने के पहले संघ परिवार ने जनता और मीडिया में जिस तरह का राजनीतिक अलगाव झेला है उसने संघ परिवार को मजबूर किया है कि वह अदालत का फैसला माने। यह मीडिया और जनता के दबाब की जीत है। हम उम्मीद करते हैं संघ परिवार के संगठन और उसके नेतागण सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी ऐसे ही स्वागत करेंगे चाहे फैसला उनके खिलाफ आए।

उल्लेखनीय है सिद्धांततः अदालत का फैसला मानने में संघ परिवार को पांच दशक से ज्यादा का समय लगा है और अभी वे एक गलतफहमी के शिकार हैं कि विवादित जमीन पर राममंदिर बनाकर रहेंगे।

बाबरी मसजिद विध्वंस की आपराधिक गतिविधि के लिए संघ परिवार के कई दर्जन नेताओं पर अभी मुकदमा चल रहा है और उस अपराध से बचना इनके लिए संभव नहीं है। श्रीकृष्ण कमीशन में बाबरी मसजिद विध्वंस के लिए संघ परिवार के अनेक नेताओं को कमीशन ने दोषी पाया है और बाबरी मसजिद विध्वंस का मामला जब तक चल रहा है विवादित जमीन पर कोई भी निर्माण कार्य नहीं हो सकता। वैसे भी यदि सुप्रीम कोर्ट के द्वारा हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी जाती है तो मामला लंबा चलेगा और वैसी स्थिति में संघ का भविष्य में क्या स्टैंण्ड होगा इसका कोई अनुमान नहीं लगा सकता।

लखनऊ बैंच का फैसला आते ही संघ परिवार के नेताओं ने तत्काल ही अदालत की राय के बाहर जाकर मुसलमानों को मिलने वाली एक-तिहाई जमीन को राममंदिर के लिए छोड़ देने की तत्काल मांग ही कर ड़ाली और आडवाणी जी ने रामजी के भव्यमंदिर के निर्माण के साथ नए किस्म के सामाजिक एकीकरण की संभावना को व्यक्त किया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपील की है कि अतीत को भूल जाएं। हम मांग करते हैं कि बाबरी मसजिद विध्वंस को लेकर संघ परिवार सारे देश से माफी मांगे। बाबरी मसजिद गिराने का महाअपराध करने के बाबजूद अतीत को कैसे भूला जा सकता है।

लखनऊ फैसले का तीसरा महत्वपूर्ण पहलू है बाबरी मसजिद-राम मंदिर विवाद के राजनीतिक समाधान की असफलता। अदालत ने जनवरी-सितम्बर 2010 के बीच में सुनवाई करके जिस रिकॉर्ड समय में फैसला किया है वह इस बात का संकेत है कि अदालतें आज भी संसद से ज्यादा विश्वसनीय हैं।

निश्चित रूप से केन्द्र सरकार और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की धर्मनिरपेक्ष दृढ़ता और प्रशासनिक मशीनरी की कुशलता ही है जिसने इस फैसले को एक सामान्य फैसले में बदल दिया। अदालतों में संपत्ति के प्रतिदिन फैसले होते रहते हैं और यह एक रूटिन कार्य-व्यापार है। यह संदेश देने में अदालत और केन्द्र सरकार सफल रही है।

दूसरी ओर संघ परिवार के लिए यह फैसला गले की हड्डी है। इस फैसले ने राममंदिर के विवादित क्षेत्र को तीन हिस्सों में बांटकर और उसमें मुसलमानों का एक-तिहाई पर स्वामित्व मानकर मुसलमानों को अयोध्या से बहिष्कृत कर देने की संभावनाओं को खत्म कर दिया है। आगे अदालत का कोई भी फैसला आए उसमें हिन्दू-मुसलमानों की विवादित जमीन पर साझेदारी रहेगी।

इस संदर्भ में ही लालकृष्ण आडवाणी के बयान में कहा गया है कि इस फैसले से ‘न्यू इंटर कम्युनिटी एरा’ की शुरूआत हुई है। यह बयान और अदालत का फैसला अनेक खामियों के बाबजूद जिस बड़ी चीज पर ध्यान खींचता है वह है ‘न्यू इंटर कम्युनिटी एरा’, यह संघ परिवार की समूची विचारधारा के ताबूत में कील ठोंकने वाली चीज है। नया अंतर-सामुदायिक युग, ‘अन्यों’ को खासकर मुसलमानों को बराबर मानता है।

यह अदालत के जरिए संघ परिवार की हिन्दुत्ववादी विचारधारा की विदाई का संकेत भी है। अब वे चाहें तो मंदिर ले सकते हैं लेकिन मुसलमानों के साथ मिलकर बाबरी मसजिद की विवादित जमीन पर मसजिद के साथ बराबरी के आधार पर रहना होगा। इससे अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के भेद को दीर्घकालिक प्रक्रिया में समाप्त करने में मदद मिलेगी।

आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत का यह कहना कि हमें अतीत को भूलकर आगे देखना चाहिए। इस बयान में भी संघ परिवार के संभावित परिवर्तनों की ध्वनियां छिपी हुई हैं। संभवतः संघ परिवार अपने हिन्दुत्ववादी एजेण्डे की बजाय अब विकास की बातें करे जिससे वह युवाओं का दिल जीत सके। क्योंकि राममंदिर आंदोलन ने भारत के युवाओं को संघ परिवार और राममंदिर आंदोलन से एकदम दूर कर दिया है। यही वजह है राम मंदिर आंदोलन के अतीत को मोहन भागवत भूल जाने की अपील कर रहे हैं। वे जानते हैं राम मंदिर का मसला संघ परिवार को मिट्टी में मिला सकता है यही वजह है कि विगत 10 सालों से किसी लोकसभा या विधानसभा चुनाव में रामंदिर चुनाव का मसला नहीं उठाया गया।

संघ परिवार धीरे-धीरे मंदिर विवाद से लखनऊ बैंच के फैसले का स्वागत करते हुए अपने को अलग कर रहा है। देखना है संघ परिवार किस दिशा में जाता है। क्योंकि बाबरी मसजिद विवाद का असली सच तो सुप्रीम कोर्ट ही बताएगा।

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29 Comments on "लखनऊ बैंच का फैसला और संघ परिवार का पैराडाइम शिफ्ट"

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विजय कुमार
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निर्णय जबसे है सुना, नहीं होश में वाम
मानो छत से हों गिरे, टूटे दांत तमाम।
टूटे दांत तमाम, नहीं आधार बचा अब
था मंदिर प्राचीन, कोर्ट में सिद्ध हुआ जब।
कह ‘प्रशांत’ फिर भी थूके को चाट रहे हैं
कैसे समय बिताएं, लिख-लिख काट रहे हैं।।

जगदीश्वर चतुर्वेदी
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जगदीश्वर चतुर्वेदी

सुंदर कविता है।

अली अलबेला
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जगदीश्‍वर चतुर्वेदी जी बहुत अच्छा लेख लिखा आपने
बधाई हो
इस लेख में ऐसा कुछ भी नहीं है जो गलत या झूट हो
फिर भी न जाने क्यू कुछ लोग सच्चाई बर्दास्त नहीं कर पाते
और श्री राम तिवारी जी हमेशा संतुलित टिप्परी करते हैं

Vishwash Ranjan
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इस फैसले से लोगो को यह समझ मैं आ गया है की संघ और बीजेपी ने जन्मभूमि के लिए जो प्रयास किये वो राष्ट्रहित मैं और इस देश की बहुसंख्यक आबादी के सम्मान को बनाय रखने की लिए किया गया एक समर्पित प्रयास था| और जो लोग इस प्रयास को साम्प्रदायिकता बताते थे उनके पास बगलें झाँकने के अलावा कोई चारा नहीं. उन लोगो को समझना चाहिए राम के आदर्शों पर चलकर ही इस विश्व का कल्याण हो सकता है| हमें गर्व करना चाहिए की राम ने इस भारत भूमि पर जन्म लिया| और हमारे पास मौका है की पूरी… Read more »
जगदीश्वर चतुर्वेदी
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जगदीश्वर चतुर्वेदी

जल्दी से रामराज्य बनाओ,हम तंग आ गए हैं। इंटरनेट से,पढ़ने लिखने से तंग आ गए हैं। रामराज्य आ जाय तो बस बैठकर भजन करेंगे और मालपुआ खाएंगे।

जगत मोहन
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बकवास जारी रखो है जगदीश्वर

जगदीश्वर चतुर्वेदी
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जगदीश्वर चतुर्वेदी

अरे बंधुवर कुछ और तो बोलो।

Vishwash Ranjan
Guest

जदिश्वर और श्रीराम तिवारी जैसे लोग ही इस देश के नाम पर धब्बा हैं, आप लोगों को यह भी तमीज नहीं की कंहा प्रतिक्रिया करें अपनी| जन्हा सारा देश इस फैसले का स्वागत कर रहा है वंहा आप अपना राग अलाप रहे हैं. किसी भी वकील ने कुछ गलत काम नहीं किया, वो तो मीडिया वाले ही जबरदस्ती बयान लेने पहुँच जाते हैं. वैसे जिलानी बयान देनेवालों मैं सबसे आगे थे| आप जैसे लोगो का बहुत बुरा होगा, क्योंकि हिन्दू सहिष्णु है तो आप उसका फायदा उठा रहे हो किसी मुस्लमान की विरोध मैं लिखो अभी स्वर्गवासी हो जाओगे.

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