लेखक परिचय

डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री

डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री

जन्म लखनऊ में, पर बचपन - किशोरावस्था जबलपुर में जहाँ पिताजी टी बी सेनिटोरियम में चीफ मेडिकल आफिसर थे ; उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान में स्नातक / स्नातकोत्तर कक्षाओं में अध्यापन करने के पश्चात् भारतीय स्टेट बैंक , केन्द्रीय कार्यालय, मुंबई में राजभाषा विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त ; सेवानिवृत्ति के पश्चात् भी बैंक में सलाहकार ; राष्ट्रीय बैंक प्रबंध संस्थान, पुणे में प्रोफ़ेसर - सलाहकार ; एस बी आई ओ ए प्रबंध संस्थान , चेन्नई में वरिष्ठ प्रोफ़ेसर ; अनेक विश्वविद्यालयों एवं बैंकिंग उद्योग की विभिन्न संस्थाओं से सम्बद्ध ; हिंदी - अंग्रेजी - संस्कृत में 500 से अधिक लेख - समीक्षाएं, 10 शोध - लेख एवं 40 से अधिक पुस्तकों के लेखक - अनुवादक ; कई पुस्तकों पर अखिल भारतीय पुरस्कार ; राष्ट्रपति से सम्मानित ; विद्या वाचस्पति , साहित्य शिरोमणि जैसी मानद उपाधियाँ / पुरस्कार/ सम्मान ; राजस्थान हिंदी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर का प्रतिष्ठित लेखक सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान , लखनऊ का मदन मोहन मालवीय पुरस्कार, एन सी ई आर टी की शोध परियोजना निदेशक एवं सर्वोत्तम शोध पुरस्कार , विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अनुसन्धान अनुदान , अंतर -राष्ट्रीय कला एवं साहित्य परिषद् का राष्ट्रीय एकता सम्मान.

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lord maikale( डा. रवीन्द्र  अग्निहोत्री )

 लार्ड मैकाले की आत्मा अगर कहीं से देख पाती होगी तो यह देखकर अवश्य ही संतोष का अनुभव करती होगी कि उसे उसके अपने देश ने भले ही  भुला दिया हो, कोई वहां उसका नाम भी न लेता हो ,  पर इंडिया नाम की  जिस असभ्य , गंवार , जंगली “ कालोनी “ को उसने सभ्य – सुसंस्कृत बनाने के लिए  अपने देश की महान भाषा और महान  संस्कृति का बिरवा रोपने का संकल्प लिया था, उसकी खेती आज यहाँ के गाँव – गाँव में लहलहा रही है । इस देश के लोग उपकार को हमेशा याद रखते हैं । इसीलिए यहाँ के लोगों ने न केवल  मैकाले की बताई  संस्कृति को अपनाया है, बल्कि   इस संस्कृति से हमारा परिचय कराने के लिए मैकाले का उपकार मानते हुए उसे भी अपने सीने से लगा रखा है । हमारे देश में उसका जन्मदिन भी धूमधाम से मनाया जाता है क्योंकि लोगों ने यह मान लिया है कि मैकाले जैसे महापुरुष के कारण ही आज यह देश  अंध – विश्वास, अज्ञानता और निर्धनता के अँधेरे से निकलकर आधुनिक विश्व के सुशिक्षित, अंध – विश्वासों से दूर, ज्ञानी और संपन्न लोगों के बीच उठने – बैठने योग्य बना है । अतः समझदार लोग उसका मुक्तकंठ से प्रशस्तिगान करते हैं, पर कुछ ऐसे ‘ सिरफिरे ‘ लोग भी हैं जो इसी बात का रोना रोते रहते हैं कि उसने ऐसी शिक्षा की व्यवस्था की जो अंग्रेजों का  साम्राज्य ( अब यह अंग्रेजी का साम्राज्य बन गया है ) चलाने के लिए “ बाबू “ तैयार करती है और उन्हें पूरे दिल से अँगरेज़ बना देती है ।

अब कुछ समय से लार्ड मैकाले की याद को अमर बनाए रखने का लोगों ने एक ऐसा उपाय भी खोज लिया है जिससे  एक ओर  सर्वश्रेष्ठ भारत के स्वर्णिम अतीत पर  गर्व  करने का सुख मिलता है तो दूसरी ओर  देश की वर्तमान  दुरवस्था के लिए कुचाली मैकाले की दूषित मनोवृत्ति को उत्तरदायी ठहरा कर अपने को पाक – साफ बताने का संतोष भी मिलता है । इस उपाय से मेरा परिचय पहले एक मित्र की मेल के माध्यम से हुआ  और फिर  शीघ्र ही इसके विश्वव्यापी प्रभाव का परिचय  अंतर-राष्ट्रीय पत्रिकाओं में कनाडा , ब्रिटेन जैसे देशों में रहने वाले ऐसे विद्वानों के  लेखों से हुआ जिनकी कृतियों का अध्ययन  विश्वविद्यालयों  में किया जा रहा है । उन्होंने बताया  कि 2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश पार्लियामेंट में भाषण देते हुए मैकाले ने कहा,

 

“  I have travelled across  the length and breadth of India and I have not seen  one person who is a beggar, who is a thief. Such wealth I have seen in this  country, such high moral values , people of such  calibre  , that I do not think  we would ever conquer this country unless we break the very backbone of this nation , which is her  spiritual and  cultural heritage , and therefore, I propose  that we replace  her old and ancient education system , her culture , for if the Indians  think that all that is foreign  and English is good and greater  than their own , they will  lose their self esteem , their native culture and they will become what we want them, a truly dominated nation. “

 

इसे पढ़कर मन प्रसन्न हो गया । मैकाले के श्रीमुख से भारत की प्रशस्ति ! यहाँ कोई चोर नहीं, कोई भिखारी नहीं , यहाँ के उच्च नैतिक मूल्य , यहाँ  के प्रतिभावान लोग !    एक बार

याद आया – जादू वह जो सिर पर चढ़कर बोले ; पर तभी पता नहीं क्यों मैकाले के कुछ और वाक्य याद आ गए ।

 

मैकाले ने भारत में लिखे अपने ‘ मिनट ‘ में भारत के लोगों को, भारत की  भाषाओं को , भारत के  साहित्य को और भारत की संस्कृति को  यूरोप के लोगों – भाषाओं – साहित्य – संस्कृति से न केवल कमतर बताया, बल्कि  इस सबकी कठोर निन्दात्मक स्वर में चर्चा की । अतः इस नए उद्धरण में मेरी रुचि बढ़ गई । मैं पूरा भाषण पढ़ने के लिए अधीर हो गया । पर यह क्या ?  जिस ग्रन्थ के बारे में यह सुनता आया हूँ कि उसमें  मैकाले के सारे  भाषण संग्रहीत किए गए हैं  ( The Miscellaneous Writings and Speeches of Lord Macaulay, 4 Volumes ) , उस में  न तो  2 फरवरी 1835  को ब्रिटिश पार्लियामेंट में दिया मैकाले का  कोई भाषण मिला और न कोई और ऐसा भाषण मिला जिसमें उक्त उद्धरण मौजूद हो।   जब मैंने इस उद्धरण का स्रोत अपने मित्र से जानने का प्रयास किया तो वह  भी नहीं बता पाया । जिन लेखकों ने इस उद्धरण का अपने लेखों में उल्लेख किया है उन्होंने भी वहां इसका  स्रोत नहीं बताया  है।  अतः इस की प्रामाणिकता पर अन्य दृष्टियों से विचार करना मेरे लिए आवश्यक हो गया ।

 

मैकाले ( 25 अक्तूबर  1800 –  28 दिसंबर  1859 ) से हमारा  परिचय तब हुआ जब वह  गवर्नर जनरल के विधि सदस्य ( Law Member )  के रूप में  भारत आया । ब्रिटेन में 1830  में जब वह पहली बार मेंबर ऑफ़ पार्लियामेंट बना, तब उसे ” बोर्ड ऑफ़  कंट्रोल ” का  भी सदस्य  बनाया गया । यह बोर्ड ईस्ट इंडिया कंपनी के डाइरेक्टरों  को दिशा – निर्देश देने के लिए बनाया गया था । मैकाले इस बोर्ड में 18  महीने रहा । इसी दौरान उसने भारत के बारे में अध्ययन करने का प्रयास अवश्य किया, और निश्चित रूप से यह अध्ययन अंग्रेजी में ही किया  क्योंकि उसे  वह विश्व की महान भाषा मानता था और उसके  विशाल समृद्ध  साहित्य पर उसे बहुत गर्व था । इस अंग्रेजी साहित्य की सम्पन्नता ने उसे वहां पहुंचाया जिसके लिए केवल एक ही शब्द है – घृणा ,  भारतीय साहित्य  से घृणा , भारतीय भाषाओं से घृणा, भारतीय कलाओं से घृणा, भारतीय विज्ञानों से घृणा, भारतीय धर्म से घृणा, भारतीय  दर्शन से घृणा, भारत के नैतिक आदर्शों से घृणा , भारतीय संस्कृति से घृणा, दूसरे शब्दों में भारत की हर चीज़ से घृणा । इसीलिए  वह  भारत तो कभी आना ही नहीं चाहता था, मगर एक मजबूरी उसे भारत ले आई । क्या थी वह मजबूरी ?

 

वह अपने माता – पिता की सबसे बड़ी संतान था। उसकी दो बहनें थीं – मार्गरेट और हन्नाह । मैकाले ने स्वयं तो विवाह किया नहीं क्योंकि जिस लड़की से प्यार किया उससे बात बनी नहीं, पर उसकी दोनों बहनों के विवाह संपन्न परिवारों में हुए थे । मैकाले अपनी बहनों और उनके परिवार से बहुत प्यार करता था। अपने मन की बातें वह अपनी बहनों को ही बताता था। उन्हें बराबर पत्र लिखता रहता था।  उसके भांजे सर जार्ज ट्रेवेलियन ने बाद में उन पत्रों के आधार पर ही ” Life and Letters of Lord Macaulay ” ग्रन्थ लिखा । जिस ” इंडिया ” से वह घृणा करता था, वहां आने का निश्चय उसने क्यों कर लिया, इसका राज़ उसने अपनी बहन को बताया ।

 

उसने अपनी बहन को लिखा कि मैं अभी प्रति मास दो सौ पौंड से अधिक नहीं कमा पा रहा हूँ जबकि जिस तरह का जीवन मैं जीना चाहता हूँ उसके लिए कम से कम पांच सौ पौंड तो चाहिए ही । गरीबी के इस आलम में उसके लिए कोढ़ में खाज वाली बात यह हुई कि जिस  व्हिग पार्टी से वह  संसद में आया था , वह आतंरिक झगड़ों के कारण विखंडित होने लगी । इसलिए उसे इंग्लैण्ड में अपना भविष्य आर्थिक दृष्टि से भी अंधकारमय दिखाई देने लगा । “…my political outlook is very gloomy. A schism in the Ministry is approaching …..In England I see nothing before me, for some time to come, but poverty, unpopularity, and the breaking of old connections .”

तभी एक ऐसी घटना घटी जिससे सारा परिदृश्य बदल गया । ब्रिटिश पार्लियामेंट ने जो नया इंडिया बिल बनाया , उसमें सुप्रीम काउन्सिल ऑफ़ इंडिया में ” Law Member ” का एक नया पद बनाया गया जिस पर ऐसे ही व्यक्ति की नियुक्ति की जानी थी जो न तो  ईस्ट इंडिया कंपनी का कर्मचारी हो, न उससे संबंधित हो । उस ज़माने में इंग्लैंड के सरकारी क्षेत्र में ऐसे लोगों का मिलना कठिन था जो ईस्ट इंडिया कंपनी से संबंधित न हों ( दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि जो लूट – मार में शामिल न हों ) । मैकाले के पिता तो इसमें शामिल थे, पर स्वयं मैकाले  इससे दूर था ।  अतः इस पद का प्रस्ताव उसे दिया गया । इस पद के लाभ बताते हुए उसने अपनी बहन को लिखा कि इससे मुझे इज्ज़त तो मिलेगी ही, उससे भी अधिक पैसा मिलेगा – पूरे दस हज़ार पौंड प्रति वर्ष । मैंने सारी बात पता कर ली है । कलकत्ता  में पांच हज़ार पौंड में बड़ी शान से रहा जा सकता है , इसलिए बाकी सारा पैसा बचेगा। उस पर ब्याज मिलेगा। मैं जब 39 वर्ष की जवान उम्र में ही वापस आऊँगा तो मेरे पास तीस हज़ार पौंड होंगे। मैं सारी ज़िंदगी ऐसी शान से रहूँगा जैसे कोई राजकुमार रहता है ; और मजेदार बात यह कि इंडिया में मुझे कोई मेहनत का काम भी नहीं करना है। आराम से बैठे – बैठे शाही काम करने हैं । ऊपर से उस देश में जितनी भी सुविधाएं मिल सकती हैं, वे सब भी मुझे मिलेंगी । बस यह लालच मैकाले को उस इंडिया में ले आया जो अन्यथा उसे बिलकुल पसंद नहीं था ।
नया पद ग्रहण करने के लिए उसे  पार्लियामेंट की सदस्यता से त्यागपत्र देना पड़ा । भारत आने पर उसे ” कमेटी ऑफ़ पब्लिक इंस्ट्रक्शन ” का भी अध्यक्ष बनाया गया । इस कमेटी को यह तय करना  था कि जो  रुपया शिक्षा पर खर्च करने का आदेश ब्रिटेन की संसद ने कंपनी को दिया है, वह किस प्रकार की शिक्षा देने पर खर्च किया जाए । इस कमेटी में दस सदस्य थे जो संस्कृत / अरबी / फारसी की शिक्षा या  अंग्रेजी की शिक्षा के विवाद की दृष्टि से 5 – 5  सदस्यों के दो वर्गों में बंट गए थे । मैकाले ने   इसी विवाद को  सुलझाने के लिए अपना ” मिनट ”  2 फरवरी 1835  को  गवर्नर जनरल को  पेश किया ; और गवर्नर जनरल विलियम बेंटिंक द्वारा इसे स्वीकार कर लेने पर शिक्षा जगत में कई महत्वपूर्ण परिवर्तन आए – जैसे , शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी बनी , अंग्रेजी के माध्यम से शिक्षा देने वाले शिक्षक तैयार करने के लिए ” टीचर्स ट्रेनिंग ” की नई परम्परा शुरू हुई,   शिक्षा का अर्थ हो गया अंग्रेजी बोलना , अंग्रेजी के अखबार पढ़ना,  यूरोपीय ज्ञान – विज्ञान का ही प्रशस्तिगान करना । और  अगर कभी     भूले – भटके भारतीय साहित्य पढ़ने की इच्छा मन में आ जाए तो वह भी अंग्रेजी में पढ़ना आदि ।

अब चर्चित उद्धरण पर ध्यान दीजिए । इसके अनुसार मैकाले ने सम्पूर्ण भारत की यात्रा करने के बाद 2 फरवरी 1835  को यह भाषण दिया । गवर्नर जनरल की सुप्रीम काउन्सिल का विधि सदस्य बनने से पहले उसने भारत की कोई यात्रा की हो,   ऐसा कोई  विवरण  नहीं  मिलता । उपलब्ध  रिकार्ड  के अनुसार  वह   केवल एक  बार भारत  आया ,  10 जून 1834   को मद्रास  ( वर्तमान  चेन्नई ) के तट पर उतरा । उस समय देश की राजधानी कलकत्ता ( वर्तमान कोलकाता ) थी । अतः स्थल मार्ग से वहां चला गया । आया तो था पांच वर्ष के लिए,  पर  स्वास्थ्य ठीक न रहने के कारण निर्धारित समय से पहले  ही  दिसंबर 1837 के अंत में इंग्लैण्ड वापस चला  गया ।

 

तो  यह कैसे  संभव है कि मैकाले 2 फरवरी 1835 को भारत में अपना मिनट भी पेश करे और उसी दिन ब्रिटिश पार्लियामेंट में भाषण भी दे जिसका वह अब सदस्य नहीं था ? तब वीडियो कान्फरेंसिंग की सुविधा तो दूर, न टेलीफोन की सुविधा थी न तार की और न हवाई यात्रा की ।  पानी के जहाज़ से इंग्लैण्ड तक की यात्रा में तीन महीने लगते थे  !

 

अगर आपको ऐसा लगे कि मैकाले के भाषण की तारीख बताने में भूल हो गई होगी, तो उद्धरण की विषयवस्तु पर विचार कर लें। मैकाले मद्रास तट पर उतरा, ‘ पालकी ‘ में  ऊटी गया जहाँ  भारत की गर्मी से परेशान गवर्नर जनरल विलियम बेंटिंक आराम फरमा रहा था। अगस्त अंत तक वहां रुककर फिर रेल मार्ग  से  कलकत्ता चला गया।   इसे अगर भारत का विस्तृत भ्रमण मानें तो दूसरी बात है, वरना उसके भारत भ्रमण का कोई अधिकृत  विवरण उपलब्ध नहीं। भारतीयों और अंग्रेजों के नैतिक गुणों के सम्बन्ध में मैकाले के विचार 10 जुलाई 1833 को हाउस ऑफ़ कामंस में दिए भाषण में भी देखे जा सकते हैं। उसने कहा था कि इंग्लैण्ड का तो सामान्य व्यक्ति भी बहुत  अधिक बुद्धिमान और सद्गुणी व्यक्ति  है, the average intelligence and virtue is very high in this country ( i . e . England ) जबकि भारत के लोग असभ्य, जंगली, गंवार, लोभी, दगावाज़  और अन्धविश्वासी हैं  people sunk in the lowest depths of slavery and superstition. क्या इन्हीं को ” high moral values कहते हैं ? मैकाले ने तो भारतीयों को सभ्य बनाने के लिए अंग्रेजी की शिक्षा देना, यूरोपीय ज्ञान – विज्ञान सिखाना, नैतिकता में अँगरेज़ बनाना इंग्लैण्ड का परम दायित्व बताया था और इसी आधार पर उसने इंग्लैण्ड के लिए स्व – शासन की  तथा   भारत के लिए तानाशाही शासन की वकालत की . What  is the best mode of securing good governance in Europe ? The merest smatterer in politics would answer , representative institutions . In India you cannot have representative institutions .   ” But she may have the next best thing — a firm and impartial despotism ”

 

उद्धरण के अनुसार  देश में कोई  चोर – भिखारी नहीं था । जहाँ तक चोर की बात है,  ज्ञात इतिहास में कोई युग ऐसा नहीं है जब चोर न रहे हों । हाँ, उनकी संख्या कम – अधिक अवश्य मिलेगी । महर्षि पतंजलि ( ईसा से अनेकानेक शताब्दियों पूर्व ) के अष्टांग योग में पांच यम बताए गए हैं जिनमें एक है – अस्तेय जिसका अर्थ है ” चोरी का त्याग “. अगर चोर न होते तो चोरी के त्याग की बात कहाँ से आती ? जैन तीर्थंकर महावीर स्वामी  ( ईसा से लगभग छह शताब्दी पूर्व ) ने भी अस्तेय की चर्चा की है ।  मनुस्मृति (रचनाकाल अनिश्चित, पर सबसे प्राचीन स्मृति )  में उस राजा को अतीव श्रेष्ठ बताया है जिसके राज्य में चोर न हो ( यस्य स्तेनः पुरे नास्ति ) ।   ईसा की प्रथम शताब्दी की संस्कृत में एक रचना है – महाराज शूद्रक की लिखी मृच्छकटिक जिसमें चोर भी है और उसके चौर्य कर्म की विवेचना भी । साहित्य और इतिहास की बात छोड़ यदि  पंडितों की मानें तो भी 19 वीं शताब्दी में सतयुग या त्रेतायुग नहीं , घोर कलियुग ही था । कलियुग में चोरों का अकाल थोड़ी है ! रही बात भिखारी की । यह न भूलें कि मैकाले तो 1834  में आया , ईस्ट इंडिया कंपनी लूटमार करने और इस देश को भिखारी बनाने सन  1600 में आ गई थी । जब यह कंपनी आई थी, उस समय की आर्थिक स्थिति का फ्रांसीसी यात्री बर्नियर ने  इन  शब्दों में वर्णन किया है,

 

यह हिन्दुस्तान एक ऐसा अथाह गड्ढा है जिसमें संसार का अधिकांश सोना और चांदी चारों तरफ से अनेक रास्तों से आ – आकर जमा होता है और जिससे बाहर निकलने का उसे एक भी रास्ता नहीं मिलता

 

यही देखकर तो ईस्ट इंडिया कंपनी यहाँ आई थी ; पर लगभग सवा सौ वर्ष बाद मैकाले के समय का भारत ऐसा नहीं था । कंपनी ने यहाँ का सोना – चांदी बाहर ले जाने के अनेक रास्ते बना ही नहीं लिए थे, वह सारा सोना चांदी ले जा चुकी थी और अब तो उसे यह आदेश दिया जा रहा था कि अपना कारोबार समेटो। वह सब विस्तार से जानने की इच्छा हो तो रोमेश चन्द्र दत्त आई सी एस की ” भारत का आर्थिक इतिहास ” ( दो खंड ), सखाराम गणेश देउस्कर की ” देश की बात ” , सुरेन्द्र नाथ गुप्त की ” सोने की चिड़िया और लुटेरे अँगरेज़ “, सुन्दरलाल की ” भारत में अंग्रेजी राज “( दो खंड ) जैसी कोई पुस्तक पढ़ जाइए ।

 

इस ओर भी ध्यान दीजिए कि कंपनी की नीतियों के कारण एक ओर तो उद्योग धंधे चौपट होते जा रहे थे और दूसरी ओर देश बार – बार  अकाल की चपेट में आ रहा था ।  सन 1769 से लेकर 1773 तक बंगाल में ऐसे  अकाल पड़ चुके थे जिनमें एक करोड़ से अधिक लोग भूख से मर गए थे। सन 1800 से लेकर 1825 के दौरान पांच बार अकाल पड़ चुके थे ।  अकालों के कारण ईस्ट इंडिया कंपनी का राजस्व घट गया तो इंग्लैण्ड में उसके शेयर लुढ़कने लगे । इस संकट से अपने को उबारने के लिए कंपनी सरकार ने किसानों से ली जाने वाली मालगुजारी को 10 % से बढ़ाते – बढ़ाते 50 % तो कर ही दिया था , इसमें 10 % की वृद्धि और की जा रही थी । इस सबके परिणामस्वरूप अब जो स्थिति थी वह विलियम डिग्बी ने बताई है ,

 

करीब दस करोड़ मनुष्य ब्रिटिश भारत में ऐसे हैं जिन्हें किसी भी समय भरपेट अन्न नहीं मिल पाता । ” ( बर्नियर और डिग्बी के उक्त उद्धरणों के लिए  देखें : सुन्दरलाल , भारत में अंग्रेजी राज ; प्रकाशन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, भारत सरकार ; चतुर्थ  मुद्रण 1982 ; प्रथम पृष्ठ ) । क्या ऐसे समय में यह कल्पना की जा सकती है कि देश में कोई भिखारी नहीं था ? उत्तम खेती मध्यम बान , निखिद चाकरी भीख निदान – यह कहावत क्या 1835  के बाद  बनी ?

 

इससे आप यह न समझें कि मैकाले ने वह सब नहीं किया जिसकी चर्चा उद्धरण के उत्तरार्ध में की गई है । उसने यही काम किया । उसके जीवनी लेखक ट्रेवेलियन ने भी लिखा है  कि 1835 में एक नए भारत का जन्म हुआ । उसकी प्राचीन सभ्यता की आधारशिलाएँ हिलने लगीं, उसके  प्रासाद के स्तम्भ एक – एक करके ढहने लगे ,” A new India was born in 1835. The very foundations of her ancient civilization began to rock and sway. Pillar after pillar in the edifice came crashing down.”

पर यह काम मैकाले ने स्पष्ट शब्दों में घोषणा करके नहीं , ‘ सरकारी तर्क ‘ देकर किया । आप जानते ही हैं , सरकार चाहे तब की हो या अब की, वह अपने कामों को ” जनता के हित में ” ही बताती है और उसके लिए अपने ढंग से  तर्क भी जुटा लेती है ।  मैकाले ने भी यही किया । उसने पहले तो  यूरोपीय ज्ञान – विज्ञान की श्रेष्ठता प्रतिपादित की,  intrinsic superiority of the Western literature , और  फिर  भारतीय साहित्य से तुलना करते हुए कहा कि  a single shelf of a good European library was worth the whole native literature of India and Arabia.  इतना ही नहीं, उसने यह भी सिद्ध कर दिया कि अंग्रेजी के महत्व को ‘ समझदार भारतीय ‘ समझने लगे हैं , तभी तो जहाँ  अरबी / फारसी / संस्कृत की शिक्षा  पाने  के लिए लोग छात्रवृत्ति  चाहते हैं ,  वहां  अंग्रेजी पढ़ने के इच्छुक लोग  स्वेच्छा से मोटी फीस देने को तैयार हैं those who learn English are willing to pay us. अंग्रेजी शिक्षा का प्रचार करने में राजा राममोहन रॉय के प्रयास भी मैकाले के निष्कर्षों की पुष्टि करते हैं।

इन तथ्यों के आलोक में विचार कीजिए कि संदर्भित उद्धरण क्या मैकाले का हो सकता है ? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अपने शब्द उसके मुंह में रखना चाह रहे हैं ? पर इसकी आवश्यकता क्या है ? मैकाले न तो भारत – मित्र था न भारत – विद् ।  यह बात अब जग जाहिर  है कि  उसने  अंग्रेजी साम्राज्य की नींव  मज़बूत करने के ही प्रयास किए । रही बात देश की तत्कालीन स्थिति की, तो ज़रा सोचिए  कि जिस युग में थोड़े से विदेशी पूरे  देश को अपना  गुलाम बना लें , देशवासियों  पर  तरह – तरह के अत्याचार करें , उनकी जीविका के साधन तक नष्ट कर दें, और  देशवासी इस सबके बावजूद  उनकी जी – हुजूरी करना  अपना सौभाग्य मानें  ,   क्या वह उस देश  का स्वर्ण युग  हो सकता है ?

सुदूर अतीत के जिस भारत की छवि  आपकी आँखों में बसी हुई  है ,  जिस युग में लोग घर में ताले नहीं लगाते थे, जब राजा गर्व से यह कहता था कि मेरे राज्य में कोई चोर नहीं, व्यभिचारी नहीं, उसकी सराहना मैकाले भले ही न करे , पर दूसरे  देशी – विदेशी विद्वानों की कोई कमी नहीं । अतः मैकाले को छोड़िए,  दूसरे विद्वानों के उद्धरण दीजिए और गर्व का अनुभव कीजिए ।

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1 Comment on "मैकाले और हमारे भ्रम"

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डॉ. राजेश कपूर
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लेखक का गहन अध्ययन प्रशंसनीय है। एक निवेदन है कि राजीव दीक्षित के अनुसार मैकाले ने अपना यह वक्तव्य कलकत्ता में गवर्नर के सामने २ फ़रवरी,१८३५ को दिया था। क्या आप इसकी प्रमाणिकता की जाँच कर सकेते हैं ? बड़ी कृपा होगी।

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