लेखक परिचय

विनायक शर्मा

विनायक शर्मा

संपादक, साप्ताहिक " अमर ज्वाला " परिचय : लेखन का शौक बचपन से ही था. बचपन से ही बहुत से समाचार पत्रों और पाक्षिक और मासिक पत्रिकाओं में लेख व कवितायेँ आदि प्रकाशित होते रहते थे. दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षा के दौरान युववाणी और दूरदर्शन आदि के विभिन्न कार्यक्रमों और परिचर्चाओं में भाग लेने व बहुत कुछ सीखने का सुअवसर प्राप्त हुआ. विगत पांच वर्षों से पत्रकारिता और लेखन कार्यों के अतिरिक्त राष्ट्रीय स्तर के अनेक सामाजिक संगठनों में पदभार संभाल रहे हैं. वर्तमान में मंडी, हिमाचल प्रदेश से प्रकाशित होने वाले एक साप्ताहिक समाचार पत्र में संपादक का कार्यभार. ३० नवम्बर २०११ को हुए हिमाचल में रेणुका और नालागढ़ के उपचुनाव के नतीजों का स्पष्ट पूर्वानुमान १ दिसंबर को अपने सम्पादकीय में करने वाले हिमाचल के अकेले पत्रकार.

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विनायक शर्मा

हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के नगर निगम के चुनावों के नतीजे राजनीतिक दलों और प्रदेश की भोली-भाली जनता के लिए बहुत ही चौकाने वाले रहे. देश-विदेश के पर्यटकों को लुभाने वाली पहाड़ों की रानी शिमला के २५ सदस्यों वाले प्रतिष्ठित नगर निगम पर विगत २६ वर्षों से चले आ रहे कांग्रेस के बहुमत वाले गढ़ को भेदने में प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा ने जहाँ एक ओर बड़ी सफलता हासिल की वहीँ भाजपा पहली बार १२ सीटों पर विजय प्राप्तकरने के बावजूद भी संख्या के इस खेल में बहुमत से मात्र एक सीट से पिछड़ गई. विदित हो कि इस चुनाव में कांग्रेस ने १० सीटें हासिल की है वहीँ तीसरे स्थान पर रही माकपा प्रथम बार ३ सीटों पर अपना झंडा गाड़ने में सफल रही है. मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का लगभग सभी सीटों पर गंभीरता से चुनाव लड़ने के कारण कांग्रेस को हानि और भाजपा को लाभ मिलना तो तय था, और हुआ भी कुछ ऐसा ही. परन्तु इन सब के मध्य आश्चर्यचकित करने वाली बात यह रही कि केवल ३ वार्डों में विजय पाने वाली माकपा महापौर और उपमहापौर पद के लिए हुए प्रत्यक्ष चुनाव में कांग्रेस और भाजपा को पछाड़ने में कैसे कामयाब हो गई ? नतीजे घोषित होने के पश्चात् अब जय-पराजय पर सभी दलों के नेता अपने स्पष्टीकरण में एक दूजे पर दोषारोपण करते हुए कुछ न कुछ तो कहेंगे ही, परन्तु महापौर और उपमहापौर के नतीजे इस प्रकार से अप्रत्याशित होंगे, ऐसा लेश मात्र भी अनुमान किसी को भी न था. पहली बार हुए प्रत्यक्ष चुनावों में इन दोनों पदों के लिए माकपा (मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी) के उम्मीदवार किस प्रकार अपनी विजय सुनिश्चित करने में सफल रहे इसके पीछे छुपे कारणों को समझने की आवश्यकता है.

25 पार्षदों के चुनाव में कुल १०,२९७ मत प्राप्त करते हुए माकपा के केवल ३ उम्मीदवार ही सफल हो सके वहीँ दूसरी ओर महापौर और उपमहापौर के लिए हुए प्रत्यक्ष चुनावों में उसके दोनों उम्मीदवार कांग्रेस और भाजपा के उम्मीदवारों को पटखनी देते हुए एक बड़े अंतर से इन पदों पर विजय प्राप्त करने में सफल रहे. इसके विपरीत यदि दूसरी ओर २५ वार्डों में भाजपा व कांग्रेस के पक्ष में पड़े मतों की गणना की जाये तो यह क्रमशः १८,८४८ और १७,६२४ बनती है. यहाँ बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि जिस माकपा को शिमला नगर निगम के सभी २५ वार्डों के लिए प्रत्याशी मिलना कठिन हो गया था जिसके चलते उसने चार या पांच निर्दलीय उम्मीदवारों को अपना समर्थन दिया हो, ऐसी स्थिति में पार्षदों के चुनाव में मात्र १०,२९७ मत लेने वाले माकपा को महापौर व उपमहापौर पद के प्रत्यक्ष चुनाव में २१,९०३ और २१,१९५ मत किन कारणों से मिल गए ? दलों को प्राप्त हुए मतों का विश्लेषण करने से तो कुछ अलग ही तस्वीर दिखाई देती है. २५ पार्षदों के चुनाव में भाजपा को जहाँ १८,८४८ मत प्राप्त हुए वहीँ महापौर व उपमहापौर के भाजपा के प्रत्याशी को क्रमशः १४,०३५ और १६,४१८ मत ही प्राप्त हुए. इसी प्रकार कांग्रेस ने भी २५ पार्षदों के लिए चुनाव में १७,६२४ मत प्राप्त किये वहीँ महापौर के लिए १३,२७८ और उपमहापौर के प्रत्याशी ने १३,२०५ मत प्राप्त कर इन पदों के लिए तीसरे नंबर पर रह संतोष करना पड़ा. अब यह तो स्पष्ट हो गया है कि पार्षदों और महापौर के चुनाव में तीनों दलों द्वारा प्राप्त किये मतों के इतने बड़े अंतर में ही सारा रहस्य छिपा हुआ है जिसके चलते महापौर व उपमहापौर पद पर माकपा के प्रत्याशियों का चुनाव संभव हो सका.

यह तो जग जाहिर है कि छोटे व सीमित दायरे वाले चुनावों में पार्टी के साथ-साथ व्यक्तिगत जान-पहचान, प्रत्याशी के गुणदोष व अन्य कई स्थानीय कारण भी मतदान का आधार बनते हैं. शिमला के विषय में यह आम धारणा है कि यहाँ के निवासियों में कांग्रेस पार्टी के समर्थकों की संख्या अधिक है जिसके चलते ही नगर निगम पर १९८६ से ही कांग्रेस का कब्ज़ा रहा है. वैसे भी चुनाव में कामरेडों का प्रत्याशी न होने की दशा में कामरेडों का वोट सेकुलरिसम के नाम पर कांग्रेस को ही मिलता रहा है. हाँ, १९७७ अवश्य ही अपवाद रहा है. माना जाता है कि शिमला में कांग्रेस के गढ़ को भेदने के लिए ही प्रदेश की भाजपा सरकार ने इस बार महापौर व उपमहापौर के प्रत्यक्ष चुनाव करवाने का निर्णय लिया था और भाजपा संगठन भी इस बार पूरी तैयारी से चुनाव में उतरा था. परन्तु महापौर और उपमहापौर पद के लिए पुराने और कर्मठ कार्यकर्ताओं की जिस प्रकार अनदेखी करते हुए नए लोगों को तरजीह दी गई उससे पुराने कार्यकर्ताओं का रुष्ट होना स्वाभाविक था. भाजपा की वास्तविक स्थिति भी यही है कि संगठन और सत्ता में अनदेखी के चलते बहुत से कार्यकर्ता यूँ तो दिखने में भाजपा संगठन के साथ हैं, परन्तु समय आने पर ऐसे कार्यकर्ता असंतुष्ट नेताओं के साथ भी खड़े दिखाई देते हैं चाहे वह महेश्वर सिंह की सभा हो या राजन सुशांत का कोई आन्दोलन. महापौर व उपमहापौर के चुनाव में टिकट के आबंटन से रुष्ट और पूर्व से चली आ रही अनदेखी के कारण नाराज चल रहे भाजपा के तमाम कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने भीतरघात करते हुए महापौर और उपमहापौर पद के भाजपा प्रत्याशियों के पक्ष में मतदान नहीं करने का निर्णय लिया. चूँकि भाजपा और माकपा कार्यकर्ता या समर्थक किसी भी परिस्थिति में एक दुसरे के पक्ष में मतदान नहीं करते, लिहाजा कोई अन्य विकल्प न होने के कारण भाजपा के रुष्ट समर्थकों ने कांग्रेस के समर्थन में मतदान किया ऐसी प्रबल आशंका है. १२ वार्डों में विजय प्राप्त करनेवाली भाजपा के महापौर पद के प्रत्याशी को मात्र ३ वार्डों से बहुमत मिलना मेरी आशंका को और बल देता है. वहीँ माकपा समर्थकों द्वारा उपरी शिमला के मतदाताओं के स्थानीय होने जैसी क्षेत्रवाद की भावनात्मक लहर चलाये जाने से भाजपा के कुछ रुष्ट समर्थकों द्वारा माकपा के समर्थन में सीधे मतदान करने की आशंका को नाकारा नहीं जा सकता. यदि पार्षद, महापौर और उपमहापौर द्वारा प्राप्त मतों का विश्लेषण किया जाये तो २५ पार्षदों के चुनाव में भाजपा के पक्ष में पड़े १८,८४८ मतों से लगभग ४,८०० मत महापौर और उपमहापौर के चुनाव के लिए हुए मतदान के दौरान खिसक कर अधिकतर कांग्रेस और कुछ माकपा की झोली में चले गए. जिसका नतीजा यह हुआ की भाजपा के महापौर के प्रत्याशी को लगभग १४,००० मत ही प्राप्त हुए वहीँ दूसरी और उपमहापौर के प्रत्याशी को महापौर से लगभग २,४०० अधिक मत मिले जिसका कारण यह माना जा सकता है की महापौर पद के प्रत्याशी के मुकाबले उपमहापौर के प्रत्याशी के विरुद्ध टिकट आबंटन को लेकर अवश्य ही कुछ कम रोष रहा होगा जिसके चलते भाजपा के उपमहापौर पद के प्रत्याशी को महापौर से २,४०० अधिक मत मिले.

दूसरी और कांग्रेस में पार्टी के भीतर बड़े पैमाने पर पोषित की जा रही गुटबाजी के चलते ही २५ पार्षदों वाले राजधानी के इस प्रतिष्ठित स्थानीय निकाय में कांग्रेस के प्रत्याशियों को टिकटों का आबंटन भी गुटों के आधार पर ही हुआ. वर्चस्व की लड़ाई लड़ने में मशगूल कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने दुसरे खेमे के प्रत्याशी को हराने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी जिसके चलते केवल १० वार्डों में विजय हासिल करने के साथ ही कांग्रेस पार्टी पार्षदों के चुनाव में मात्र १७,६२४ मत ही हासिल कर दुसरे स्थान पर रही. यही नहीं १९८६ से चले आ रहे कांग्रेस के कब्जे वाले शिमला नगर निगम में जैसा की मेरा आंकलन है, महापौर व उपमहापौर पद के लिए मतदान के समय भाजपा समर्थकों के अंदाजन ४८०० से ५००० मत खिसक कर अधिकतर कांग्रेस के पक्ष चले गए. अब यह प्रश्न उठना भी लाजमी है की इस प्रकार से तो पार्षदों के चुनाव में कांग्रेस को मिले १७,६२४ और भाजपा के खिसके लगभग अंदाजन ५,००० मतों को मिलाकर कांग्रेस के महापौर व उपमहापौर के प्रत्याशी को तो २२-२३ हजार मत मिलने चाहिए थे. यदि गौर किया जाये तो महापौर और उपमहापौर पद के लिए हुए मतदान में ही सभी प्रकार की चालों को चलते हुए गुट्बाज नेताओं के प्रति निष्ठावान कार्यकर्ताओं के द्वारा बड़े पैमाने पर भीतर घात किया गया, ऐसी सम्भावना लगती है. यूँ तो शिमला जैसे कांग्रेस के गढ़ में पार्षद पद के २५ प्रत्याशियों द्वारा मात्र १७,६२४ मत प्राप्त कर केवल १० सीटों पर विजय प्राप्त करना ही संशय पैदा करता है की कांग्रेस के अधिकतर नेता व कार्यकर्ता कहीं पार्षद के चुनाव से ही अपने दल के प्रत्याशियों को ठिकाने लगाने में तो नहीं लगे रहे. भाजपा या माकपा के कार्यकर्ता चूँकि विचारधारा से जुड़े हुए माने जाते हैं इसलिए वह मतदान में एक दूसरे का समर्थन नहीं करते यह तो सर्वविदित ही है. इसके ठीक विपरीत कांग्रेस व माकपा को साम्प्रदायिकता के नाम पर एक दूसरे का समर्थन करने में कोई परहेज नहीं होता. भाजपा के रुष्ट समर्थकों ने महापौर व उपमहापौर पद के चुनाव में विभिन्न कारणों के चलते अपनी नाराजगी जताते हुए भाजपा प्रत्याशी की अपेक्षा कांग्रेस के प्रत्याशी के पक्ष में मतदान किया होगा ऐसी सम्भावना तथ्यों के साथ व्यक्त की जा सकती हैं.

अब प्रश्न उठता है कि कांग्रेस को महापौर व उपमहापौर के चुनाव में इतने कम मत क्यूँ मिले ? यदि भाजपा के मत कांग्रेस को मिलने की बात पर यकीन किया जाये तो यह भी मानने योग्य है कि कांग्रेस को मिले लगभग ९ से १० हजार मत बड़े पैमाने पर हुए भीतरघात के चलते माकपा के प्रत्याशियों को स्थानांतर हुए होंगे, जिसके चलते माकपा के महापौर व उपमहापौर पद के प्रत्याशियों ने २१ हजार से अधिक मतों की प्राप्ति कर विजय हासिल की. मीडिया में माकपा के सिपहसालारों के साथ-साथ अन्य राजनीतिक दलों के वक्तव्य और विश्लेषण आ रहे हैं. यहाँ तक कि कई तो माकपा की इस विजय को विधानसभा में तीसरी ताकत के उभरने से भी जोड़ कर देख रहे हैं, लेकिन वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं होनेवाला. माकपा की यह विजय न तो उसकी विचारधारा की विजय है और ना ही कार्यकर्ताओं की किसी अथक मेहनत का परिणाम. यह तो भाजपा कार्यकर्ताओं की संगठन और सत्ता में अनदेखी व महापौर व उपमहापौर पद के लिए टिकट का गलत आबंटन और कांग्रेस में मुख्यमंत्री बनने के लिए नेताओं में छिड़ी वर्चस्व की लड़ाई के चलते दल में एक दूजे को नीचा दिखाने के लिए किया गया बड़े पैमाने पर भीतरघात का ही परिणाम है कि केवल मात्र तीन वार्डों में विजय हासिल करनेवाली माकपा, भाजपा व कांग्रेस को पछाड़ते हुए महापौर व उपमहापौर के पद पर विजय हासिल कर सकी.

 

स्थानाभाव के चलते विषय के तमाम पहलुओं पर विस्तार से यहाँ चर्चा करना असंभव है. अन्य तमाम पहलुओं पर कांग्रेस व भाजपा को प्रत्येक वार्ड से प्राप्त हुए अलग-अलग पदों के लिए प्राप्त मतों का गहन विश्लेषण करते हुए मंथन करना होगा कि किन कारणों के चलते पार्षद और महापौर पद के लिए प्राप्त मतों में अंतर आया जिसके चलते दोनों बड़े दलों को शर्मनाक पराजय का मुहँ देखना पड़ा. इन दोनों दलों को अपनी कमियों को चिन्हित कर सुधार करना होगा अन्यथा माकपा के मेहनतकशों का बिना किसी मेहनत के शिमला विधानसभा की सीट पर कब्ज़ा करने से कोई नहीं रोक सकेगा. प्रदेश में तीसरे मोर्चे की सम्भावना तलाशने वालों को इतना तो समझना चाहिए कि दूसरे दलों के असंतोष और भीतरघात के चलते प्राप्त हुई विजय को जनाधार बढने का संकेत नहीं माना जा सकता. भाजपा से अलग हुए महेश्वर सिंह की भांति ही यदि कांग्रेस से कोई बड़ा खेमा अलग हो महेश्वर सिंह की हिलोपा से गठबंधन कर चुनाव में उतरता है तो ऐसी अवस्था को अवश्य ही तीसरे मोर्चे का आगाज कहा जा सकता है जो भाजपा और कांग्रेस के मत काटते हुए विधानसभा चुनावों में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकती है. ऐसी परिस्थिति में सत्ता की चाबी उस तीसरे मोर्चे के पास ही होगी. उत्तराखंड और झारखण्ड इसके उदाहरण हैं.

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1 Comment on "कैसे संभव हुई माकपा की विजय"

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श्रीराम तिवारी
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शिमला नगर निगम चुनाव में माकपा के महापौर ,उपमहापौर और तीन सीटों पर विजय का विश्लेष्ण प्रवक्ता .कॉम पर प्रकाशित करने के लिए प्रवक्ता टीम को धन्यवाद!श्री विनायक शर्माजी को साधुवाद!!
जो लोग माकपा को सिर्फ बंगाल,केरल,त्रिपुरा तक सीमित करके देखते हैं या साडी दुनिया में वाम पंथ के पराभव का मर्सिया पढ़ रहे हैं उन्हें इस आलेख रूपी आईने में अपना चेहरा देखना चाहिए.

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