लेखक परिचय

विनोद उपाध्याय

विनोद उपाध्याय

भगवान श्री राम की तपोभूमि और शेरशाह शूरी की कर्मभूमि ब्याघ्रसर यानी बक्सर (बिहार) के पास गंगा मैया की गोद में बसे गांव मझरिया की गलियों से निकलकर रोजगार की तलाश में जब मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल आया था तब मैंने सोचा भी नहीं था कि पत्रकारिता मेरी रणभूमि बनेगी। वर्ष 2002 में भोपाल में एक व्यवसायी जानकार की सिफारिश पर मैंने दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता जगत में प्रवेश किया। वर्ष 2005 में जब सांध्य अग्रिबाण भोपाल से शुरू हुआ तो मैं उससे जुड़ गया तब से आज भी वहीं जमा हुआ हूं।

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विनोद उपाध्याय

देश में अफीम की खेती के लिए किख्यात मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में उजागर हुए मानव तस्करी के ताजे मामले से साफ हो गया है कि पूरे प्रदेश में यह धंधा तेजी के साथ पैर पसार चुका है। राज्य के लगभग आधे जिलों में मानव तस्करी में लिप्त लोगों ने अपना जाल फैला लिया है। लेकिन सबसे आश्चर्र्यजनक बात यह है कि जिस्मफरोशी के अड्डों पर खरीदकर लाई गई मासूम बच्चियों को समय से पूर्व जवान बनाने के लिए हारमोन के इंजेक्शन दिए जाते थे ताकि इन मासूम बच्चियों को जल्द से जल्द देहव्यापार के धंधे में उतारा जा सके। पुलिस जांच में सामने आया कि जिस्मफरोशी करने वाली ज्यादातर महिलाओं के बच्चे हैं ही नहीं। पुलिस द्वारा गिनती करने पर इन डेरों में 842 लड़किया पाई गई। अब पुलिस इनका डीएनए कराकर पता करेगी कि आखिर ये बच्चिया इनकी हैं या तस्करी के जरिये लाई गई हैं।

मानव तस्करों ने आधे मध्यप्रदेश को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। मानव तस्करी पर पुलिस की उदासीनता के चलते गोरखधंधे में लिप्त लोगों ने 50 में से 24 जिलों में नेटवर्क जमा लिया। जिलों से गायब कई युवक-युवतियों का अर्से से पता नहीं चल पाया। पुलिस भी मानने लगी है कि ये मानव तस्करी का शिकार हो गए। पुलिस ने दो महीने में मानव तस्करी पर होमवर्क किया तो चौंकाने वाली जानकारियां पाकर आंखें खुल गईं। पुलिस मुख्यालय ने मानव तस्करी को लेकर जनवरी में सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को एक परिपत्र भेजा था। इसमें महिलाओं व बालक-बालिकाओं के खरीद-फरोख्त के पिछले पांच साल में दर्ज प्रकरणों, अपराध के पीछे किसी संगठित गिरोह के सक्रिय होने और खरीद-फरोख्त की रोकथाम के प्रयास का ब्यौरा मांगा।

मंदसौर और नीमच जिलों में मौजूद बांछड़ा समुदाय खुले आम वेश्यावृत्ति करता है, जहां से मानव तस्करी के मामले उजागर होते हैं। पुलिस की जानकारी में सब कुछ होने के बावजूद इस ओर ध्यान नहीं दिया जाना आश्चर्य का विषय है। पुलिस ने दो महीने में मानव तस्करी पर होमवर्क किया तो चौंकाने वाली जानकारिया पाकर आखें खुल गईं। पुलिस मुख्यालय ने मानव तस्करी को लेकर जनवरी में सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को एक परिपत्र भेजा था। परिपत्र में बालक-बालिकाओं के खरीद-फरोख्त के पिछले पाच साल में दर्ज प्रकरणों, अपराध के पीछे किसी संगठित गिरोह के सक्त्रिय होने और खरीद-फरोख्त की रोकथाम के प्रयास का ब्योरा मांगा। पुलिस अधीक्षकों की ओर से भेजी जानकारी में पता चला कि प्रदेश में पाच सालों के दौरान 30 से 35 युवक-युवतिया मानव तस्करी का शिकार हुई। राज्य में मानव तस्करों की गतिविधियों का पता चलने के बाद पुलिस इन क्षेत्रों पर निगरानी के लिए विशेष व्यवस्था करने पर मजबूर हुई है। पुलिस मुख्यालय ने आईजी की निगरानी में विशेष दल बनाने का फैसला किया। पहले चरण में आठ जिले तथा इसके बाद अगले दो साल में आठ-आठ जिलों में ऐसे दल बनेंगे। जिनमें जबलपुर, कटनी, सतना, मंदसौर, नीमच सीधी, नरसिंहपुर, मंडला, डिंडोरी, झाबुआ, मुरैना, बालाघाट, अनूपपुर, उमरिया शामिल हैं।

पुलिस अधीक्षक,मंदसौर जी के पाठक बताते हैं कि मानव तस्करी रोकने के लिए बने प्रकोष्ठ के बाद जब बाछड़ा जाति के डेरों का गुप्त सर्वेक्षण कराया तो उनके सामने चौंकाने वाले तथ्य आए। इस सर्वेक्षण के दौरान पता चला कि महिला गर्भवती हुई ही नहीं और उसके घर में कुछ माह की बेटी है। इसी आधार पर दबिश दी गई तो लडकियां मिलीं जिनकी खरीद फरोख्त हुई थी। पुलिस पड़ताल में सामने आया कि गरीबी और अशिक्षा का फायदा मानव तस्कर उठा रहे हैं। वे आदिवासियों के परिवारों को रोजगार दिलाने के बहाने बहला-फुसलाकर ले जाते हैं और अनैतिक कार्य में ढकेल देते हैं। पिछले 3 साल में इन जिस्मफरोशी के अड्डों पर 100 से ज्यादा लड़कियों को बेचा गया है। इन लड़कियों का अपहरण कर इन्हें इन डेरों पर बेचा गया था। इनमें से ज्यादातर लड़किया गरीब परिवारों से हैं, जबकि कुछ लड़कियों को घरवालों ने ही बेच दिया है। इंदौर, खरगौन, खंडवा, बडवानी, झाबुआ के अलावा राजस्थान के चित्तौड़, निम्बाहेड़ा इलाके से भी कई लड़कियों को लाकर यहा बेचा गया है। अधिकतर लड़कियों को यहा चित्तौड, निम्बाहेड़ा के आसपास से लाया गया है। बाछड़ा डेरों में कम उम्र की लड़कियों को खरीदने के बाद बड़े ही एहतियात से रखा जाता है। लड़की को खरीदने के बाद 5 साल तक उसे कमरे से बाहर नहीं जाने दिया जाता। ताकि कोई उसे पहचान न सके। मल्हारगढ पुलिस और एंटी ह्यूमन ट्रेफेकिंग द्वारा लड़कियों को खरीदे जाने की जानकारी जुटाई जा रही है। माना जा रहा है कि पुलिस इस मसले को लेकर एक बड़ा अभियान चलाने की तैयारी कर रही है, जिससे पिछले सालों में खरीद-फरोख्त की गई लड़कियों को बरामद कर उनके घरवालों को सौंपा जा सके। मंदसौर के पुलिस अधीक्षक जीके पाठक के मुताबिक जिन सात लडकियों को बाछडा जाति के डेरे (बस्ती) से बरामद किया गया है, उनमें से सिर्फ दो लडकियां ही कुछ बताने की स्थिति में है, बाकी इतनी छोटी हैं कि वे कुछ बोल ही नहीं पाती है। डेरे से बरामद की गई लडकियों में से अधिकांश इंदौर व आसपास ही हैं। बताया गया है कि इस काम में एक पूरा गिरोह काम करता था, जिसमें कुछ लोगों पर अपहरण तो कुछ पर ग्राहक तलाशने की जिम्मेदारी होती थी। इन लड़कियों का सौदा कुछ हजार रुपये में ही हुआ है।

मंदसौर जिले की मल्हारगढ पुलिस द्वारा बाछडा समाज के जिस्मफरोशी के डेरों में की गई कार्यवाही के बाद अब तक 18 मासूम लड़किया बरामद की जा चुकी हैं। पुलिस द्वारा 3 जगह छापा मार कर इन लड़कियों को बरामद किया गया। जिसमें से 5 लड़किया तो दुधमुंही हैं। इन सभी लड़कियों की उम्र नौ माह से 9 साल तक हैं। मल्हारगढ़ पुलिस के लगातार चल रहे इस अभियान में कई सनसनीखेज खुलासे हुए हैं। आठ साल की उम्र की लड़कियों को जल्द जवान बनाने के लिए मोर का मास और स्टेरॉईड्स दिया जाता था। जिससे लड़किया जल्द जवान होकर जिस्मफरोशी के बाजार में ढकेली जा सकें। इनके सेवन से कम उम्र की लड़कियों का शरीर बड़ा दिखने लगता है । पुलिस जाच में ऐसी कई दवाईयों के नाम आए हैं जिनके इंजेक्शन इस इलाके में धड़ल्ले से लगाए जा रहे हैं। इन लड़कियों को खाने पीने की चीजों में नशे की गोलियां मिलाकर दी गई थीं और बेहोश होने के बाद उन्हे अगवाकर जिस्मफरोशी के डेरों पर बेच दिया गया था। इस मामले में पुलिस ने 24 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। डेरों पर अब भी कई मासूम लड़किया है जिनके बारे में जाच की जा रही है कि ये लड़किया इन्हीं डेरो वालों की है या खरीदी गई। इसके लिए पुलिस डीएनए जाच कराने की तैयारी कर रही है।

मल्हारगढ़ के सुठोद डेरों में जिस्मफरोशी का अड्डा चलाने वाली सीमा ने बताया कि उनके समाज में लड़कियों को जल्द जवान करने के लिए मोर का मास कई सालों से खिलाया जाता रहा है। अब बाजारों में इस तरह की कई दवाओं के आ जाने से मोर के मास के साथ दवा भी खिलाई जाती है। जिससे लड़किया वक्त से पहले जवान होकर अपने पुश्तैनी धंधे में हाथ बटाती हैं।

गौरतलब है कि इन डेरों पर जिन लड़कियों को चुराकर बेचा गया उसमें तीन कडिय़ों वाला एक रैकेट काम करता है। पहला गिरोह लड़कियों पर नजर रखकर उन्हें नशा देकर चुराता है। दूसरी कड़ी के बिचौलिये इन्हें बाछडा जाति के उन लोगों से मिलाकर सौदा कराते हैं जो इन्हे खरीदते हैं। और तीसरी कड़ी में खुद बाछड़ा जाति के वो लोग होते है जो इन्हे खरीदकर परवरिश करते हैं, और बड़ा होने पर उन्हे जिस्मफरोशी के धंधे में उतार देते हैं।

बाछड़ा जाति की औरतें पहले अपने ग्राहकों से पैदा हुई लड़कियों को पाल पोस कर उनसे धंधा कराती थी। मगर बच्चे होने के बाद जिस्मफरोशी के बाजार में इनकी कीमत कम होने की वजह से पिछले 10 सालों में तस्करी कर लाई गई बच्चियों को खरीदने का गोरखधंधा शुरु हो गया। आकड़ों की माने तो इन डेरों पर 842 लड़किया है। पुलिस को शक है कि ज्यादातर लड़किया इसी तरह खरीद कर लाई गई हैं। अब पुलिस इस मामले की पड़ताल में जुट गई है। इसके लिए पुलिस डीएनए टेस्ट की मदद लेने का भी मन बना रही है।

जयपुर-मुंबई हाई वे पर रतलाम, मंदसौर, नीमच से लेकर चित्तौड़ तक सडक किनारे बाछड़ा समाज के डेरे हैं। जहा हर रोज जिस्मफरोशी की मंडी सजती है और जहा इन लड़कियों की कीमत होती है महज 50 से लेकर 200 रुपये तक। यहा परंपरा के नाम पर यह गोरखधंधा सदियों से चला आ रहा है। पूरे मामले का खुलासा होने के बाद पुलिस हर दिन जिस्मफरोशी के अड्डों पर छापामार कार्रवाई कर चुरा कर खरीदी गई बच्चियों को आजाद करा रही है। डेरों से बरामद लड़कियों को बरसों से तलाश रहे उनके मा-बाप को सौंपा जा रहा है। 18 लड़कियों में से नौ लड़कियों को तो उनके माबाप पहचान कर ले जा चुके हैं। मगर नौ लड़किया ऐसीं हैं जिनके घरवाले अब तक उन्हें लेने नहीं आए हैं। ये सभी नौ लड़किया आठ साल से कम उम्र की हैं, जिसमें से तीन लड़कियों को तो अपने नाम तक नहीं पता। मामले की जाच कर रहे मल्हारगढ़ थाने के थाना प्रभारी अनिरुद्ध वाडिया ने बताया कि अपहरण कर लाई गई सभी लड़किया बेहद गरीब परिवारों से हैं। जहा-जहा से लड़कियों को लाया गया था उन-उन इलाकों के थाने में दर्ज गुमशुदगी की रिपोर्ट तलाश ली गई है। लेकिन इन लड़कियों की वहा गुमशुदगी दर्ज नहीं हुई है। इससे ये लगता है कि इनके माबाप ने या तो इनकी गुमशुदगी दर्ज नहीं करवाई है या फिर इनके मा बाप बाहर से इंदौर आए होंगे। पुलिस लगातार इनके घरवालों को ढूंढने की कोशिश कर रही है। वाडिया ने बताया कि बाछड़ा समाज के डेरों में रह रही 842 लड़कियों की सूची बनाई गई है। पुलिस यह पता करने में जुटी हैं कि ये लड़किया वाकई इनकी हैं या चुराकर लाई गई हैं। पुलिस डीएनए जाच द्वारा इस बात का पता लगाएगी।

जिस्मफरोशी के अड्डों पर नाबालिग मासूम लड़कियों का अपहरण कर बेचे जाने के मामले में मंदसौर पुलिस को हर दिन नए चौंकाने वाले तथ्य मिल रहे हैं। जिस जमीन पर बाछड़ा समाज के डेरे बने हैं, ये जमीनें सरकार ने पुनर्वास के नाम पर इन्हें दी हैं। पुलिस जाच में सामने आया है कि सैकड़ों लड़कियों के जन्म प्रमाणपत्र भी नहीं बने हैं, जिससे मानव तस्करी की आशका और गहरी हो गई है।

मंदसौर की मल्हारगढ़ पुलिस द्वारा मानव तस्करी के खुलासे के बाद बाछड़ा समाज के जिस्मफरोशी के अड्डों पर पुलिस की लगातार दबिश और छानबीन चल रही है। जाच में खास बात यह सामने आई है कि जिस जमीन पर बाछड़ों के जिस्मफरोशी के अड्डे बने हुए हैं, ये सरकारी जमीन थी जो पुनर्वास के लिए बाछड़ा समाज को पिछले 18 सालों में दी गई थी। 1993 से लेकर अब तक कई बार यहा की वैश्याओं को मुख्यधारा से जोडऩे के लिए आधा बीघा से लेकर 5 बीघा तक के पट्टे दिए गए। मगर जब-जब बाछड़ा समाज के लिए पुनर्वास योजना चलाई गई, उसके बाद से इनके धंधे में इजाफा हुआ है। पुनर्वास के लिए दिए गए पट्टों पर पक्के मकान बनाकर उसे एक नया अड्डा बना दिया गया। पिछले 18 सालों में रतलाम, नीमच, मंदसौर में सरकार द्वारा पुनर्वास के लिए दी गई लगभग 200 एकड जमीन पर नए डेरे बना दिए गए। अकेले मल्हारगढ के मुरली डेरे में 40 नये अड्डे पिछले 18 साल में बने हैं। मल्हारगढ पुलिस ने इस मामले से प्रशासन को अवगत कराया है।

मल्हारगढ पुलिस को बाछडा डेरों में जाच के दौरान 286 ऐसी बच्चियों की जानकारी हाथ लगी, जिनके जन्म के प्रमाण पत्र उनकी कथित मा के पास नहीं मिले। पुलिस को प्रारंभिक पूछताछ में जन्म प्रमाण पत्र न बनवाने की कोई उचित वजह ये औरतें नहीं बता पाईं। इससे पुलिस की शका और मजबूत हो गई है। इन डेरों में मिली 842 बच्चियों की डीएनए जाच के लिए मल्हारगढ़ पुलिस ने प्रशासन को पत्र लिखा है।

 

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