लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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NHRCप्रमोद भार्गव

मध्यप्रदेश सरकार और मानवाधिकार आयोग के बीच शराबबंदी को लेकर टकराव चरम पर है। वैसे तो सरकार आयोग की ज्यादातर सिफारिशों को नजरअंदाज कर रही है, लेकिन खासतौर से गरीब बसितयों और गुजरात सीमा पर शराब के बढ़ते कारोबार के सिलसिले में आयोग बेहद चिंितंत है। उसने इन दुकानों को बंद करने की सिफारिश की थी, लेकिन सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया। सरकार के इस गैर जिम्मेदाराना रुख को लेकर नाराज आयोग उच्च न्यायालय के दरवाजे पर दस्तक देने की तैयारी में है। दरअसल सरकार की राजस्व का मुख्य स्त्रोत शराब है। इसी से वह सरकारी ढांचे को बढ़ाये वेतन-भत्ते दे रही है। मंत्री और विधायकों के बेहिसाब खर्च की पूर्ति का आधार भी यही राजस्व है। प्रदेश के मुखिया तहसील दर तहसील जाकर चौबीस घंटे बिजली देने के अटल ज्योति अभियान को अंजाम दे रहे हैं, यह बिजली भी 1700 करोड़ रुपये खर्च करके शराब से प्राप्त धन से खरीदी जा रही है। अब चुनावी साल में शिवराज सिंह चौहान शराब की दुकानों को बंद करें तो भी कैसे ?

मध्यप्रदेश के मानवाधिकार आयोगाध्यक्ष को इस बात के लिए दाद देनी होगी कि वह ग्रामीण और आर्थिक रुप से कमजोर तबके को बर्बाद कर रही शराब के मुददे को लेकर सरकार से टकराने जा रहे हैं। यह टकराव बेवजह की बयानबाजी के रुप में सतह पर नहीं आया है, बलिक हार्इकोर्ट में चुनौती देकर एक विधि-सम्मत रुप में शिव आ रहा है, जो उल्लेखनीय है। सरकार और राज्य आयोग के बीच बने इस टकराव का नोटिस राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी लिया है। आयोग का कहना है कि प्रदेश सरकार को राज्य आयोग की सिफारिशों को गंभीरता से लेने की जरुरत है, जिससे न्यायालय में दस्तक देने की जरुरत न पड़े। क्योंकि यदि ऐसा होता है तो देश में यह पहली मर्तबा होगा कि जब किसी प्रदेश का मानवाधिकार आयोग राज्य सरकार के खिलाफ अदालत में जाकर अपनी सिफारिशों को अमल में लाने का दबाव बनाएगा।

दरअसल आयोग ने 27 सितंबर 2011 को राज्य सरकार से सिफारिश की थी कि वह ऐसे सभी स्थलों पर चल रहीं शराब की दुकानें बंद करें, जहां घनी आबादी है, पाठशालाएं हैं, पूजा-अर्चना के स्थल हैं और संकीर्ण रास्तों से लोगों की आवाजाही है। ऐसे मार्गो से गुजरने पर महिलाओं को तनाव से गुजरना होता है। शराबी उन पर छींटकशी करते हैं। द्विअर्थी अश्लील संवाद बोलते हैं और लड़खड़ाकर टकराने की कोशिश भी करते हैं। ऐसे माहौल में बच्चों के संस्कार भी प्रभावित होते हैं। उन्हें शराब पीना सिखाने व सीखने के आसान अवसल उपलब्ध होते हैं, जो बचपन के साथ क्रूर खिलवाड़ है।

आयोग  के कार्यवाहक अध्यक्ष न्यायाधीश एके सक्सेना ने सरकार को उसकी ओर से 7 जून 2011 को जारी अधिसूचना के स्थान पर नर्इ अधिसूचना जारी करने का निर्देश दिया था। साथ ही रिहायशी बसितयों और उनके व्यावसायिक परिसरों से शराब की दुकानें तत्काल हटाने को कहा था। इन सिफारिशों पर अमल दो माह के भीतर कर आयोग को सूचित करना था। लेकिन सात माह बीत जाने के बावजूद इस दिशा में रत्तीभर भी पहल नहीं की गर्इ। सरकार की कथनी और करनी में इतना भेद है कि इसी शिवराज सिंह सरकार ने एक समय कहा था कि गरीब परिवारों की आर्थिक बर्बादी और महिलाओं व बच्चों को होने वाली परेशानियों से छुटकारे के लिए कोर्इ नर्इ शराब की दुकान नहीं खोलने का ऐतिहासिक व अनुकरणीय फैसला लिया था, लेकिन सरकार इस फैसले पर अटल नहीं रही। यही कारण रहा कि आज देशी-विदेशी शराब की लगभग चार हजार गांव-गावं दुकानें खुल गर्इं हैं। शराब की बिक्री में बेतहाशा वृद्धि हुर्इ है। सरकार को शराब से करीब नौ हजार करोड़ राजस्व-धन की प्राप्ती हो रही है। मध्यप्रदेश के ग्रामों का आज यह हाल है कि पानी मिले न मिले शराब की उपलब्धता चौबीसों घंटे है।

दरअसल राज्य आयोग को कुछ बस्ती वालों ने शिकायत की थी कि यहां अंग्रेजी शराब के साथ-साथ देशी शराब भी बेची जा रही है और दुकानों में ही शराब पीने के लिए अहाते खोल दिए गए हैं। जिनमें दिन भर मचे रहने वाले हुड़दंग के कारण आस-पड़ोस के परिवार बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। इस शिकायत की सुनवार्इ करते हुए आयोग ने इन दुकानों को तुरंत हटाने के आदेश दिए ताकि मानव अधिकारों के मूल्यों को पुर्नस्थापित किया जा सके। इस बाबत आबकारी विभाग द्वारा दी गर्इ दलील दिलचस्प है। कहा गया कि दुकानों को हटाया गया तो सरकार को मिलने वाले करोड़ों रुपए के राजस्व की हानि होगी। इसे खारिज करते हुए आयोग ने अपने आदेश में दो टूक लिखा कि शराब की दुकानों का लायसेंस देते समय शासन का दायित्व राजस्व जुटाने की बजाय समाज को चारित्रिक दृष्टि से मजबूत बनाने का होना चाहिए, जिससे नैतिकता और सुशासन की कायमी हो।

मध्यप्रदेश में शराब की बिक्री को ज्यादा से ज्यादा बढ़ावा देने के लिए सरकार उस हर अनैतिक वैध-अवैध उपाय का सहारा ले रही है, जो शराब की बिक्री को प्रोत्साहित करें। इस नजरिये से सरकार आयोग की उस सिफारिश को भी नजरअंदाज कर रही है, जिसके मुताबिक सार्वजनिक स्थलों पर शराब की दुकान की दूरी 50 मीटर से बढ़ाकर 300 मीटर करने की सिफारिश की गर्इ है। इसी तरह प्रदेश से गुजरने वाले सभी राष्ट्रीय राजमार्गों से दुकाने हटाने के आदेश दिए गए हैं। नियमों के मुताबिक आदिवासी और मजदूरों की बस्ती में शराब की दुकानें नहीं होनी चाहिए, लेकिन नैतिकता की दुहार्इ देने वाली और राम नाम का डंका पीटने वाली भाजपा की शिवराज सरकार के कार्यकाल सबसे ज्यादा न केवल दुकाने खोली गर्इं, बलिक शराब पीने के लिए अहाते खोलने की छूट भी दी गर्इ। यदि शराब की दुकानें निम्न तबकों की बस्ती में खोला जाना जरुरी है तो फिर इन्हें, सरकारी बसितयों में क्यों नहीं खोला जाता ? इसलिए क्योंकि इनका पारिवारिक जीवन दुविधा में आ जाएगा। इनके बच्चों के आचरण से शराब जुड़ जाएगा ?़

सरकार की संवेदनशीलता इस हद तक मर गर्इ है कि वह गुजरात की सीमा पर शराब की अवैध बिक्री को बढ़ावा देने में लगी है। गांधी के इस प्रदेश में शराब की बिक्री पर रोक है। प्रदेश सरकार इसे लाभ का धंधा मानकर चल रही है। गुजरात सीमा से सटे छोटे-छोटे गांवों में देशी व अंग्रेजी शराब के ठेके करोड़ों में जा रहे है। शराब बिक्री का इन क्षेत्रों का औसत निकाला जाए तो इस क्षेत्र के सभी लोग पानी की जगह शराब ही पिएं, तब भी इतनी शराब की खपत नहीं हो सकती ? जाहिर है, यहां से शराब की गुजरात में तस्करी को प्रोत्साहित किया जा रहा है। यहां तेज-तर्रार और भ्रष्ट पुलिस व आबकारी विभाग के अधिकारियों की तैनाती की जाती है, जिससे वे अपनी चालाक बुद्धि का इस्तेमाल इस गोरखधंधे को बेरोक-टोक चलने में करें। बहरहाल एक बड़े सामाजिक सरोकार को लेकर आयोग हार्इकोर्ट का दरवाजा खटखटा रहा है तो उसके इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए ।

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1 Comment on "मध्यप्रदेश सरकार और मानवाधिकार आयोग में शराबबंदी को लेकर टकराव"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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He bhgvaan bhajpa srkaar को सद्बुद्धि दे वरना इनका अंजाम कांग्रेस से भी khrabhoga. कर्नाटक का नतीजा ताज़ा hai.

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