लेखक परिचय

विनोद उपाध्याय

विनोद उपाध्याय

भगवान श्री राम की तपोभूमि और शेरशाह शूरी की कर्मभूमि ब्याघ्रसर यानी बक्सर (बिहार) के पास गंगा मैया की गोद में बसे गांव मझरिया की गलियों से निकलकर रोजगार की तलाश में जब मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल आया था तब मैंने सोचा भी नहीं था कि पत्रकारिता मेरी रणभूमि बनेगी। वर्ष 2002 में भोपाल में एक व्यवसायी जानकार की सिफारिश पर मैंने दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता जगत में प्रवेश किया। वर्ष 2005 में जब सांध्य अग्रिबाण भोपाल से शुरू हुआ तो मैं उससे जुड़ गया तब से आज भी वहीं जमा हुआ हूं।

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मध्यप्रदेश सरकार ने जिन परियोजनाओं के बलबुते वर्ष 2013 से प्रदेश में 24 घंटे विद्युत का प्रदाय की घोषणा की है उसमें से एक है 400 मेगावॉट की महेश्वर जल विद्युत (हाइडल पॉवर प्रोजेक्ट) परियोजना। यह परियोजना शुरू से ही विवादों में रही है और अभी भी इसका विवादों से पीछा नहीं छूटा है। इसके पीछे मुख्य वजह है इस परियोजना की निर्मात्री कंपनी एस कुमार्स की नीयत। उल्लेखनीय है कि खरगौन जिले में बन रही महेश्वर जल विद्युत परियोजना निजीकरण के तहत कपड़ा बनाने वाली कम्पनी एस. कुमार्स को दी गई है।

राहत और पुनर्वास में हो रही देरी के साथ-साथ वित्तीय अनियमितताओं से घिरी यह परियोजना समय पर पूरी हो जाएगी ऐसा लगता नहीं है। 1986 में केन्द्र एवं राज्य से मंजूर होने वाली महेश्वर परियोजना को शुरू में लाभकारी माना गया था और उसकी लागत महज 1673 करोड़ रुपए ही थी जो अब बढ़कर 2233 करोड़ हो गई है। सरकार ने बाद में 1992 में इस परियोजना को एस कुमार्स नामक व्यावसायिक घराने को सौंप दिया। उसी समय से यह कंपनी परियोजना से खिलवाड़ कर रही है। बावजूद इसके एस कुमार्स समूह पर राज्य सरकार फिदा है। मध्यप्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम के करोड़ों के कर्ज में डिफाल्टर होने के बावजूद सरकार ने महेश्वर हाइडल पॉवर प्रोजेक्ट के लिए पॉवर फाइनेंस कार्पोरेशन के पक्ष में कंपनी की ओर से सशर्त काउंटर गारंटी दी और बाद में इसे शिथिल करवा कर सरकार की गारंटी भी ले ली। उसने इंटर कारपोरेट डिपाजिट (आईसीडी) स्कीम का कर्ज भी नहीं चुकाया। यह मामला मप्र विधानसभा में भी उठ चुका है।

राज्य शासन ने एस कुमार गु्रप को इंटर कारपोरेट डिपाजिट के तहत दिए गए 84 करोड़ रूपए बकाया होने के बावजूद महेश्वर पॉवर प्रोजेक्ट के लिए 210 करोड़ रूपए की गारंटी क्यों दी? महेश्वर पॉवर कार्पोरेशन ने चार सौ करोड़ रूपए के ओएफसीडी बाण्ड्स जारी करने के लिए कंपनी के पक्ष में पीएफसी की डिफाल्ट गारंटी के लिए काउंटर गारंटी देने का अनुरोध सरकार से किया गया था। तीस जून 2005 को सरकार ने कंपनी के प्रस्ताव का सशर्त अनुमोदन कर दिया। इसमें शर्त यह थी कि गारंटी डीड का निष्पादन बकाया राशि के पूर्ण भुगतान का प्रमाण-पत्र प्राप्त होने के पश्चात ही किया जाए।

13 सितम्बर 2005 को इस शर्त को शिथिल करते हुए सरकार ने केवल समझौता आधार पर ही मान्य करने का अनुमोदन कर दिया। इस समझौता योजना के तहत एमपीएसआईडीसी ने 23 सितम्बर 2005 को सूचना दी कि समझौता होने से विवाद का निपटारा हो गया है। बस इसी आधार पर महेश्वर हाईड्रल पॉवर कारपोरेशन ने काउंटर गारंटी का निष्पादन कर दिया।

अनुमोदन के बाद एस कुमार्स की एक मुश्त समझौता नीति के अंतर्गत समझौते की शर्र्तो में संशोधन किया गया था, जिनका न पालन और न ही पूर्ण राशि का भुगतान किया गया। एकमुश्त समझौते के उल्लघंन के बाद अब एस कुमार्स ने दुबारा एकमुश्त समझौते के लिए आवेदन किया गया है। उल्लेखनीय है कि आईसीडी के 85 करोड़ के कर्ज के एकमुश्त समझौता योजना के तहत भुगतान के लिए 77 करोड़ 37 लाख रूपए एस कुमार्स को चुकाना थे। इसमें से कंपनी ने 22 करोड़ 9 लाख रुपए चुकाए है। शेष राशि के चेक बाउंस हो गए। इसके लिए न्यायालय में प्रकरण चल रहा है।

इस संबंध में प्रदेश सरकार द्वारा विधानसभा में जानकारी दी गई है कि एस कुमार्स के साथ एमपीएसआईडीसी के विवाद का निपटारा हो गया है जबकि अभी विवाद बरकरार है। विभागीय अधिकारी बताते हैं कि एमपीएसआईडीसी के साथ एस कुमार्स ने समझौता किया था, जिसके अनुरूप भुगतान नहीं हुआ। साठ करोड़ से अधिक की राशि की वसूली बाकी है। चेक बाउंस का मामला भी कोर्ट में है।

नर्मदा बचाओ आंदोलन के सदस्य आलोक अग्रवाल बताते हैं कि 2005 में हमने महेश्वर विद्युत परियोजना को फौरन रद्द करने की मांग की थी। हमने रिजर्व बैंक से कहा था कि वह महेश्वर परियोजना के हालात की जांच सीबीआई से कराए। आंदोलन ने राज्य सरकार द्वारा महेश्वर परियोजना को गारंटी देने और औद्योगिक विकास निगम की बकाया राशि की वसूली में छूट देने को गलत बताया है। आंदोलन का कहना है कि जिस संस्था पर धन बकाया होने की वजह से उसकी संपत्ति कुर्क हुई हो, उसको वसूली में छूट देना गैर कानूनी है।

अग्रवाल ने बताया कि राज्य सरकार ने परियोजना कर्ताओं को यह छूट दे दी है कि वे मय ब्याज 2009 तक पैसा वापस करें। परियोजना कर्ताओं द्वारा सार्वजनिक धन की बर्बादी के सबूतों के बाद भी सरकार का यह कदम राज्य को बर्बादी की ओर ढकेलने वाला है। सीएजी सहित कई संस्थाएं इस परियोजना से जुड़ी कम्पनी को कटघरे में खड़ा कर चुकी हैं।

आंदोलन का कहना है कि देश के बड़े उद्योगों द्वारा बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के 80 हजार करोड़ से भी अधिक की सार्वजनिक पूंजी डुबा दी गई है। भारतीय रिजर्व बैंक के आदेश के मुताबिक 25 लाख रुपये से अधिक के बकायेदार को कोई भी बैंक या वित्तीय संस्था और धन नहीं दे सकती है। बकाया राशि के एक करोड़ रुपये से अधिक होने पर रिजर्व बैंक इसकी सूचना सीबीआई को देती है और सीबीआई मामला दर्ज कर कार्रवाई करती है।

परियोजना कर्ता के साथ हुए राज्य शासन के समझौते के मुताबिक बिजली बने या न बने, बिके या न बिके लेकिन परियोजना कर्ता को हर साल 400-500 करोड़ रुपये 45 साल तक दिए जाते रहेंगे यानी इस समझौते के मुताबिक आम जनता के लगभग 15 हजार करोड़ रुपये का सौदा किया गया है। साथ ही परियोजना से प्रभावित होने वाले हजारों परिवारों को नीति अनुसार पुनर्वास की

आंदोलन ने भारतीय रिजर्व बैंक और केन्द्रीय वित्त मंत्रालय से भी मांग की है कि वे परियोजना से संबंधित गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के बारे में सीबीआई से जांच कराये। सार्वजनिक धन के साथ अनियमितताएं उजागर होने के बावजूद किसी संस्था द्वारा परियोजनाकर्ता के लाभ के लिये धन देना भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत दंडनीय होगा। नर्मदा बचाओ आंदोलन ने वर्ष 2002 में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा महेश्वर जल विद्युत परियोजना के लिए परियोजनाकार कंपनी एस. कुमार्स को 330 करोड़ रुपए की गारंटी दिए जाने के मामले में भारी भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए इस गारंटी को तत्काल वापस लेने की मांग की थी।

आंदोलन के कार्यकर्ता आलोक अग्रवाल के मुताबिक पहले से ही अनेक वित्तीय अनियमितताओं से घिरी इस परियोजना को यह गारंटी देना प्रदेश की जनता के हित को एक निजी कंपनी के हाथों गिरवी रखने के बराबर है। कंगाल सरकार जो अपने कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं दे पा रही है। इतना बड़ा फैसला किसके हित के लिए ले रही है क्योंकि यह सभी जानते हैं कि महेश्वर परियोजना जनता के हितों के खिलाफ है।

आंदोलन का आरोप है कि एस. कुमार्स कंपनी और महेश्वर परियोजना दोनों ही गंभीर आरोपों के घेरे में हैं। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने अपनी 1998 एवं 2000 की रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि परियोजनाकर्ता पर मध्यप्रदेश विद्युत मंडल एवं नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण का करोड़ों रुपया बकाया है। यह पैसा आज तक वापस नहीं किया गया है। यही नहीं मध्य प्रदेश औद्योगिक विकास निगम ने एस. कुमार्स की एक सहयोगी कंपनी को नियम विरुद्ध दिए गए करोड़ों रुपए के ऋण के लिए संपत्ति कुर्की की कार्रवाई की है।

निगम ने एस. कुमार्स की इन्दज इनरटेक लि. को 1997-98 में 8 करोड़ 2 लाख और 1999-2000 में 44 करोड़ 75 लाख रुपए दिए थे। लघु अवधि के होने के बावजूद भी इन ऋणों की अदायगी नहीं की गई। इसके अलावा यह भी स्पष्ट हो चुका है कि महेश्वर परियोजना के लिए मिले धन में से करीब 106 करोड़ 40 लाख रुपए इस कंपनी ने उन कंपनियों को दे दिए हैं , जिनका इस परियोजना से कोई लेना-देना नहीं था।

आंदोलन के मुताबिक भारतीय रिजर्व बैंक ने भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी कर चेतावनी दी है कि पैसा वापस न करने वाली कंपनियों एवं संस्थाओं को कोई भी नया ऋण नहीं दिया जाए। तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने भी यही राय जाहिर की थी। फिर भी मध्य प्रदेश सरकार द्वारा महेश्वर परियोजना के लिए 330 करोड़ की गारंटी देना कई सवाल खड़े करता है। आंदोलन ने सवाल उठाया है कि एक ओर सरकार का एक विभाग अपने रुपए वसूलने के लिए कुर्की का आदेश लिए घूम रहा है , वहीं दूसरी ओर सरकार स्वयं अरबों की गारंटी दे रही है। इस मामले की उच्च स्तरीय जांच की जानी चाहिए और यह तथ्य सार्वजनिक किया जाना चाहिए कि किन कारणों के चलते राज्य सरकार ने यह गारंटी दी है।

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