लेखक परिचय

डॉ. मनोज जैन

डॉ. मनोज जैन

लेखक जैन महाविद्यालय, भिण्ड में राजनीति विज्ञान के प्राध्यापक है;

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ड़ॉ. मनोज जैन

स्वामी विवेकानन्द के व्यक्तित्व के निमार्ण में मध्यप्रदेश का जो योगदान रहा है उसको आज स्मरण करने की आवश्यकता है। क्योंकि नई पीढ़ी को यह अवगत कराया जाना जरुरी है कि जिन स्वामी विवेकानन्द ने अपने तेज, ओज और ज्ञान से सारे विश्व को प्रभावित किया था उनके जीवन के कुछ महत्वपूर्ण वर्ष मध्यप्रदेश में व्यतीत हुये थे। परिव्राजक अवस्था में स्वामी जी ने खण्डवा, ओंकारेश्वर, इन्दौर तथा उज्जैन आदि स्थानों में भ्रमण करते हुये अपने जीवन की सर्वोत्कृष्ट स्मृतिंया संचित की थीं वह स्मृतिया विवेकानन्द साहित्य में यत्र-तत्र विखरी हुयीं हैं उन स्मृतियों की महक के आधार पर हमने यह जानने का प्रयास किया है कि स्वामी जी के जीवन में मध्यप्रदेश का क्या योगदान था।

समाधि का प्रथम अनुभव मध्यप्रदेश में –

स्वामी विवेकानंद के गुरुभाई स्वामी सारदानन्द ने श्री रामकृष्णलीलाप्रसंग के तृतीय खण्ड में स्वामी विवेकानन्द की रायपुर (वर्तमान छत्तीसगढ़) यात्रा का वर्णन किया है। उसके आधार पर यह प्रतीत होता है कि नरेन्द्र नाथ दत्त सन् 1877 ई. जब 14 साल के थे तब रायपुर आये थे। उनके पिता वकालात के सिलसिले में रायपुर आये थे जब उन्हें लगा कि उनको रायपुर में काफी समय लगेगा तो उन्हौने अपने परिवार को भी रायपुर बुला लिया। नरेन्द्र अपने छोटे भाई महेन्द्र, बहिन जोगेन्द्रवाला तथा माता भुवनेश्वरी देवी के साथ कलकत्ते से रायपुर आये थे। उन दिनों रायपुर कलकत्ता से रेलमार्ग से जुड़ा हुआ नहीं था। रेलगाड़ी कलकत्ता से इलाहाबाद, जबलपुर, भुसावल होते हुये बम्बई जाती थी। तथा भुसावल नागपुर से जुड़ा हुआ था। तब नागपुर से इटारसी होकर दिल्ली जाने वाली रेललाइन भी नहीं बनी थी। अत: बहुत संम्भव है, कि नरेन्द्र अपने परिवार के साथ जबलपुर उतर कर बैलगाड़ी से रायपुर गये हों। सत्येन्द्र नाथ मजूमदार सहित कई जीवनीकारों ने लिखा है कि नरेन्द्रनाथ नागपुर से बैलगाड़ी के द्वारा सपरिवार रायपुर गये थे, परन्तु इस यात्रा में नरेन्द्र को जो एक अलौकिक अनुभव हुआ था उससे यह सकेंत मिलता है कि वह लोग जबलपुर से ही बैलगाड़ी के द्वारा मण्डला, कवर्धा होकर रायपुर गये हों। स्वामी जी ने इस यात्रा का वर्णन करते हुये कहा है कि ” इस यात्रा में मुझे पन्द्रह दिनों से भी अधिक का समय लगा था। उस समय पथ की शोभा अत्यन्त मनोरम थी । रास्ते के दोनों किनारों पर पत्तों और फूलों से लदे हुये हरे-हरे सघन वनवृक्ष होते थे। इस यात्रा में कई कठिनाईया होते हुये भी यह अत्यन्त सुखकर थी। वनस्थली का अपूर्व सौन्दर्य देखकर यह क्लेश मुझे क्लेश ही नहीं प्रतीत होता था। अयाचित होकर भी जिन्हौनें पृथ्वी को इस अनुपम वेशभूषा से सजा रखा है, उनकी असीम शक्ति और अनन्त प्रेम का पहले-पहल साक्षात परिचय पाकर मेरा हृदय मुग्ध हो गया था। वनों के बीच से जाते हुये उस समय जो कुछ मैनें देखा या अनुभव किया, वह स्मृतिपटल पर सदैव के लिए दृढ़ रुप से अंकित हो गया है। विशेष रुप से एक दिन की बात उल्लेखनीय है। उस दिन हम उन्नत शिखर विन्ध्यपर्वत के निम्न भाग की राह से जा रहे थे। मार्ग के दोनों ओर बीहड़ पहाड़ की चोटियॉ आकाश को चूमतीं हुई खड़ी थीं। तरह-तरह की वृक्ष-लताएॅ, फल और फूलों के भार से लदी हुईं, पर्वतपृष्ठ को अपूर्व शोभा प्रदान कर रहीं थीं। अपनी मधुर कलरव से समस्त दिशाओं को गॅुंजाते हुये रंग-बिरंगे पक्षी कुंज-कुंज में घूम रहे थे, या फिर कभी-कभी आहार की खोज में भूमि पर उतर रहे थे। इन दृश्यों को देखते हुए मैं मन में अपूर्व शान्ति का अनुभव कर रहा था। धीर मन्थर गति से चलती हुई ये बैलगाड़ियां एक ऐसे स्थान पर आ पहुँचीं, जहां पहाड़ की दो चोटियां मानो प्रेमवश आकृष्ट हो आपस में स्पर्श कर रही हैं। उस समय उन श्रंगो का विशेष रुप से निरीक्षण करते हुए मैने देखा कि पासवाले एक पहाड़ में नीचे से लेकर चोटी तक एक बडा भारी सुराख है और उस रिक्त स्थान को पूर्ण कर मधुमक्खियों के युग-युगान्तर के परिश्रम के प्रमाणस्वरुप एक प्रकाण्ड मधुचक्र लटक रहा है। उस समय विस्मय में मग्न होकर उस मक्षिकाराज्य के आदि एवं अन्त की बातें सोचते सोचते मन तीनों जगत् के नियन्ता ईश्वर की अनन्त उपलब्धि में इस प्रकार डूब गया कि थोड़ी देर के लिये मेरा सम्पूर्ण बाह्य ज्ञान लुप्त हो गया। कितनी देर तक इस भाव में मग्न होकर मैं बैलगाड़ी में पड़ा रहा, याद नहीं। जब पुन: होश आया, तो देखा कि उस स्थान को छोड़ काफी दूर आगे बढ़ गया हॅूं। बैलगाड़ी में मैं अकेला ही था, इसलिये यह बात और कोई न जान सका।” नरेन्द्रनाथ को भाव समाधि का प्रथम अनुभव मध्यप्रदेश यात्रा में ही हुआ था जिसने आगे जाकर निर्विकल्प समाधि के प्रति उनकी पिपासा को और बढ़ा दिया।

नचिकेता भाव का प्रथम उदघोष मध्यप्रदेश में –

कठोपनिषद में बालक नचिकेता जिस भाव से आत्मश्रध्दा से उदघोषणा करता है, ” बहुत से लोगों में मैं प्रथम श्रेणी का हँ और बहुतों में मध्यम श्रेणी का पर मैं अधम कदापि नहीं हँ।” ऐसा ही उदघोषणा बालक नरेन्द्रनाथ ने रायपुर में अपने पिता के मित्रों के समक्ष किया था। नरेंन्द्र बालक होकर भी अपने आत्मसम्मान की रक्षा करना जानते थे। अगर कोई उनकी आयु को देखकर अवहेलना करना चाहता, तो वे सह नहीं सकते थे। बुध्दि की दृष्टि से वे जितने बड़े थे, वे स्वयं को उससे छोटा या बड़ा समझने का कोई कारण नहीं खोज पाते थे तथा दूसरों को इस प्रकार का कोई अवसर भी नहीं देना चाहते थे। एक बार जब उनके पिता के एक मित्र बिना कारण उनकी अवज्ञा करने लगे, तो नरेन्द्र सोचने लगे कि कैसा आश्चर्य है! मेरे पिता भी मुझे इतना तुच्छ नहीं समझते, और ये मुझे ऐसा कैसे समझते हैं।” अतएव आहत मणिधर के समान सीधा होकर उन्हौनें दृढ़ स्वरों में कहा, ”आपके समान ऐसे अनेक लोग हैं, जो यह सोचते हैं जो यह सोचते है कि लड़कों मे बुध्दि-विचार नहीं होता। किन्तु यह धारणा नितान्त गलत है।” जब उन सज्जन ने यह अनुभव किया नरेन्द्र अत्यन्त खिन्न हो उठे हैं और वे उनसे बात करने के लिये भी तैयार नहीं है, तब उन्हें अपनी त्रुटि स्वीकार करने के लिए बाध्य होना पड़ा। इस घटना से यह अनुभव होता है कि स्वामी विवेकानन्द में नचिकेता के समान आत्मश्रध्दा के भाव मध्यप्रदेश में ही प्रकट हुये थे। इसी आत्मश्रध्दा की शक्ति से उन्हौने शिकागो व्याख्यान के माध्यम से सम्पूण विश्व को झकझोर दिया था।

विद्वता की प्रथम झलक मध्यप्रदेश में –

रायपुर में अच्छा विद्यालय नही होने के कारण नरेन्द्र नाथ को उनके पिता ही पढ़ाया करते थे। विश्वनाथ दत्त ने नरेन्द्रनाथ को किताबी ज्ञान के अलावा व्यवहारिक तथा जीवनोपयोगी शिक्षा से अभिसिंचित किया था। पुत्र के बुध्दि विकाश के लिए वह अनेकों विषयों की चर्चा के अलावा तर्क भी करते थे। यहीं नहीं पुत्र से तर्क में हारने पर पिता की स्वाभाविक खुशी देखने लायक होती थी। उन दिनों विश्वनाथ बाबू के घर में अनेकों विद्वानों और बुध्दिमानों का समागम होता था। विविध सांस्कृतिक एंव साहित्यक विषयों पर चर्चाएॅ चला करती। नरेन्द्रनाथ बड़े ध्यान से चर्चा को सुनते और यथासमय अपना अभिमत भी व्यक्त करते थे। उनकी बुध्दिमत्ता तथा ज्ञान को देखकर बडे-बूढ़े भी चमत्कृत हो उठते थे। एक दिन चर्चा के दौरान नरेन्द्र ने बंगला के एक ख्यातनाम लेखक के गद्य-पद्य से अनेक उदाहरण देकर अपने पिता के एक विध्दान मित्र को इतना चमत्क्रृत कर दिया था कि उनके मुख से निकला ”बेटा, किसी न किसी दिन हम सब तुम्हारा नाम अवश्य सुनेगें।” स्वामी जी के जीवन में विद्वता की प्रथम झलक मध्यप्रदेश में ही दिखायी दी थी जिसने आगे जाकर दिगदिगन्त में स्वामी जी को प्रसिध्द कर दिया था।

कालान्तर में स्वामी जी जब परिव्राजक अवस्था में खण्ड़वा आये थे तो वहां सिविल जज बाबू माधवचन्द्र बन्द्योपाध्याय के निवास पर बाबू पियारीलाल गांगुली ने हरिदास बाबू से कहा था कि ” स्वामी जी को देखने से ही ऐसा लगता है कि भविष्य में यह एक विश्वप्रसिध्द व्यक्ति बनेंगें।” स्वामी विवेकानन्द के विश्वविजयी विवेकानन्द बनने की यह मध्यप्रदेश में दूसरी भविष्यवाणी थी।

पाकविद्या की प्रथम झलक मध्यप्रदेश में –

स्वामी गम्भीरानन्द ने अपनी पुस्तक ‘युगनायक विवेकानन्द’ में लिखा है कि यद्वपि नरेन्द्र को पाकविद्या में रुचि तो पहले से ही थी परन्तु रायपुर में सारा समय परिवार के ही साथ में रहने से उनकी पाकविद्या में अभिरुचि सही अर्थो में इन्ही दिनों में दिखाई देती है। इस प्रकार हम देखतें है कि स्वामी विवेकानन्द के जीवन का एक और पहलू मध्यप्रदेश में प्रकट होता दिखायी देता है।

विविध विधाओं का ज्ञान भी मध्यप्रदेश में ही –

नरेन्द्र नाथ ने शतरंज का ज्ञान भी रायपुर में रहते समय ही प्राप्त किया था। वह शतरंज में रायपुर के जाने माने खिलाड़ियों से होड़ लगा कर उन्हें पराजित कर देते थे। यही नहीं स्वामी विवेकानन्द को जिस मधुर संगीत के कारण रामकृष्ण परमहंस मिले थे उस मधुर संगीत का ज्ञान भी विश्वनाथ बाबू ने नरेन्द्रनाथ को रायपुर में ही दिया था। विश्वनाथबाबू स्वंय संगीत में पारंगत थे उन्हौनें नरेन की इस विषय में अभिरुचि को ताड़ लिया था और फिर स्वंय नरेन्द्र का कण्ठ बड़ा सुरीला था इस सबके मेल ने नरेन्द्रनाथ को एक सिध्दहस्त गायक बना दिया और उनके इस स्वरुप का विकास रायपुर में ही हुआ था।

पौरुष का प्रथम प्रकटीकरण भी मध्यप्रदेश में ही –

नरेन्द्रनाथ ने रायपुर में ही एक दिन अपने पिता से अचानक पूछा कि ”आपने मेरे लिये क्या किया है” तक्काल ही पिता बोले ”जाओ दर्पण में अपना चेहरा देखो!” पुत्र ने तत्क्षण ही पिता के कथन का मर्म समझ लिया, वह जान गया कि उसके पिता मनुष्यों में राजा हैं। यही नरेन्द्र ने पौरुष का प्रथम पाठ सीखा था।

समदर्शी का ज्ञान भी मध्यप्रदेश में ही –

एक अन्य अवसर पर नरेन्द्र ने अपने पिता से पूछा कि संसार में किस प्रकार रहना चाहिए, अच्छी वर्तनी का मापदण्ड क्या है? इस पर पिता ने उत्तर दिया था, ”कभी आश्चर्य व्यक्त मत करना!” आगे चल कर स्वामी जी के जीवन में जो समदर्शी का व्यक्तित्व दिखता है जिसने उनको राजाओं के राजप्रासादों में निर्धनों की कुटियाओं में समान गरिमा के साथ जाने के योग्य बनाया उसका सूत्रपात भी मध्यप्रदेश में ही दिखायी देता है।

परिव्राजक विवेकानन्द मध्यप्रदेश में –

कालान्तर में नरेन्द्रनाथ संन्यास लेकर परिव्राजक रुप में देशाटन करते हुये जून 1892 में खण्ड़वा आये थे। संभवत: वह ओंकारेश्वर और उज्जैन के दर्शनों को भी गये होगें। खण्डवा में वह प्रतिष्ठित वकील बाबू हरिदास चर्टजी के यहां ठहरे थे। यद्यपि स्वामी जी की महेश्वर यात्रा का उल्लेख कहीं नहीं मिलता है। पर ऐसा अनुमान है कि स्वामी जी ने महेश्वर के दर्शन अवश्य किये होगे क्यों कि स्वामी जी भारत की महानतम शासक होल्कर राजवशं की रानी अहिल्याबाई के बारे में अत्यन्त श्रध्दा से उल्लेख करते थे, और महेश्वर के घाट रानी अहिल्या बाई के द्वारा बनवाये गये थे। शैलेन्द्रनाथ धर अपनी पुस्तक ” ए काम्प्रिहेंसिव बायोग्राफी ऑफ स्वामी विवेकानन्द में लिखते हैं कि इन्ही दिनों स्वामी जी मण्ड़लेश्वर, उज्जैन आदि तीर्थों के दर्शन करके इन्दौर पहुचें होगें।

दरिद्रनारायण के लिये करुणा फूटी मध्यप्रदेश में –

इन्दौर से स्वामी जी पुन: खण्ड़वा आये थे इसी बीच में उन्हौने कुछ समय एक भंगी-परिवार में बिताया था। यह पहला अवसर था जब वे समाज में अति निम्न माने जाने वाले लोगों के साथ रहे थे। स्वामी जी ने उनकी दयनीय अवस्था में रह रहे उन लोगो के विराट हृदय के दर्शन किये। वह नीच कहे जाने वाले लोगों के सौजन्य को देखकर अभिभूत हो गये। ऊंचें कहे जाने वाले लोगों के शोषण और अत्याचार के फलस्वरुप मनुष्य को जानवरों का सा जीवन व्यतीव करते हुये देख कर स्वामी जी का हृदय चीत्कार कर उठा उनकी आखाें से अश्रुधारा फूट पड़ी। जब वह खण्ड़वा लौटे तो उनका हृदय समाज के इन तिरस्कृत लोगों के दु:ख से दु:खी था। स्वामी जी ने 22 अगस्त 1892 को जूनागढ़ के दीवान साहब को जो पत्र लिखा था उसमें उनकी गरीबों के लिये वेदना प्रकट होती है। कालान्तर में स्वामी जी ने जो निर्धनों के लिये सेवा कार्य प्रांरभ किये थे उनकी नीव मध्यप्रदेश में ही पड़ी थी।

शिकागो धर्म सम्मेलन का संकल्प मध्यप्रदेश में –

खण्ड़वा में ही स्वामी जी के मन में शिकागो में आयोजित होने वाले विश्व-धर्म-सम्मेलन में भाग लेने का संकल्प सुस्पष्ट हुआ था। हरिदास बाबू के धर्म महासभा मे जाने के प्रश्न पर उन्हौने कहा था कि यदि कोई उन्हें जाने का खर्चा दे तो मै चला जाऊंगा। इस सन्दर्भ में एक और घटना उल्लेखनीय है। जब स्वामी जी खण्डवा में थे तब उनसे मिलने अक्षय कुमार घोष नामक एक लडका आया था। वह नौकरी की तलाश में भटक रहा था। यह लडका स्वामी जी को बम्बई में फिर मिला था। वहां उन्होने उसे जूनागढ के दीवान साहब के नाम एक परिचयपत्र दे दिया । बाद में वह युवक लंदन चला गया और मिस हेनरीटा मूलर का कृपापात्र बन गया। मिस मूलर ने उसको गोद भी ले लिया। उसके माध्यम से मिस मूलर ने स्वामी विवेकानन्द की विध्दता के वारे में जाना, जो तब अमेरिका में थे। मिस मूलर की स्वामी जी में इतनी रुचि हो गयी कि उन्हौने स्वामी जी को इंगलैण्ड आने का और अपने निवास पर ठहरने का निमंत्रण भेजा। इस प्रकार स्वामी जी को इंगलैण्ड ले जाने का वह नियति के हाथों एक यंत्र बन गया था। और जिसका गवाह था मध्यप्रदेश।

मध्यप्रदेश और यहां के निवासियों ने विभिन्न प्रकार से स्वामी विवकानन्द के उपर अपना जो प्रभाव छोड़ा था उसकी झलक हम जीवन भर उनके व्यक्तित्व में देखते हैं।

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