लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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मोदी के सामने होगा नीतीश चेहरा

 

संजय सक्सेना

लम्बे समय से दो गैर कोंग्रेसी नेता गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और बिहार के सीएम नीतिश कुमार प्रधानमंत्री बनने का तानाबाना बुन रहे थे। पीएम की कुर्सी की चाहत ने ही नीतिश कुमार को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(एनडीए) से जुदा कर दिया था। यह बात किसी से छिपी नहीं है। नीतिश की महत्वाकांक्षा के चलते ही बिहार में भाजपा-जदयू की संयुक्त सरकार में दरार पड़ गई। भाजपा ने नीतिश सरकार से समर्थन वापस लिया तो नीतिश ने अपने धुर विरोधी लालू यादव का दामन थाम लिया। बात नीतिश की महत्वाकांक्षा की किया जाये तो नीतिश चाहते थे कि एनडीए 2014 के लोकसभा चुनाव में उनको प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर चुनाव लड़े, जबकि बीजेपी ने नरेन्द्र मोदी पर दांव लगा रखा था। नतीजे आये तो मोदी का भाग्य खुल गया और नीतीश हाथ मलते रह गये। पूरे देश की बात तो दूर बिहार में भी नीतीश का जादू नहीं चला। नीतिश के मन-मस्तिक में हार की हताशा इतनी गहरी पैठ कर गई कि उन्होंने बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी तक से इस्तीफा दे दिया। उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में भी महागठबंधन अपनी ताकत दिखायेगा,इस बात के संकेत मिलने लगे हैं, लेकिन यहां उसके गठबंधन में संभवतया सपा-बसपा जैसे दल ने  दिखाई दें। सपा-बसपा की जगह अन्य छोटे-छोटे दलों को महागठबंधन के नेता अपने साथ जोड़ सकते हैं।बिना सपा-बसपा को साथ लिये महागठबंधन का उत्तर प्रदेश की चुनावी जंग में कूदना भाजपा के लिये कितनी बढ़ी चुनौती बन पायेगा यह देखने वाली बात होगी।राजनैतिक पंडित ऐसे किसी महागठबंधन(जिसमें सपा-बसपा न हो)को भाजपा से अधिक अन्य दलों के लिये खतरा मानते है।महागठबंधन ही नहीं ओवैसी की पार्टी भी विधान सभा चुनाव के लिये ताल ठोंक रही है।अगर ऐसा होता है तो गैर भाजपाई वोटों का बंटना तय है,जिसका निश्चित फायदा भाजपा को मिलेगा।

जदयू नेता केसी त्यागी का यह कहना कि 2017 और 2019 के लोकसभा चुनाव में महागठबंधन की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। कई संकेत देता है। जदयू नेताओं ने यूपी का दौरा भी करना शुरू कर दिया है।लालू प्रसाद यादव भले ही अभी तक बनारस नहीं पहुंचे हों लेकिन जनता दल युनाइटेड नेता और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पीएम मोदी को उनके ही गढ़ में घेरने की तैयारी शुरू कर दी है। हाल में ही बनारस में पटेल नवनिर्माण सेना के बैनर तले महत्वपूर्ण बैठक में जेडीयू के बड़े नेताओं की मौजूदगी ने इस बात के साफ संकेत दिए। तय हुआ कि दो महीने के अंदर बनारस में होने वाली किसान महापंचायत में मोदी विरोध का चेहरा बने सीएम नीतीश कुमार और गुजरात पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल हुंकार भरेंगे। सपा और बीएसपी को छोड़ उत्तर प्रदेश में अन्य दलों के साथ मिलकर बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन बनाने और पटेल आंदोलन को 2017 के यूपी चुनाव का मुद्दा बना महागठबंधन भाजपा की बढ़त रोकने की कोशिश करेगा।

गौरतलब हो,पटेल नवनिर्माण सेना का गठन तो हार्दिक पटेल की रिहाई आंदोलन को राष्ट्रव्यापी स्वरूप देने के लिए हुआ है,लेकिन हार्दिक की रिहाई के बाद सेना के सहारे बीजेपी की घेराबंदी की जा रही है।इनकी बैठक में बीजेपी विरोध का स्वर ही गूंजता रहता है।वाराणसी में भी यह देखने को मिला। इस बैठक में शामिल हुए जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव व सांसद सदस्य केसी त्यागी ने पीएम मोदी को कोसने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी ने कहा कि महागठबंधन की वर्ष 2017 और उसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका होगी। गुजरात में हार्दिक पटेल की रैली में उमड़ी भीड़ और काशी में पटेल बिरादरी तथा बिहारियों की खासी संख्या को देखते हुए पटेल नवनिर्माण सेना को उम्मीद कि वाराणसी में किसान महापंचायत में लाखों की भीड़ होगी।नवनिर्माण सेना ने तारीख व जगह का ऐलान तो नहीं किया पर कहा कि महापंचायत को पूरी दुनियां देखेगी।बताया यह भी जाता है कि महापंचायत के पहले दस दिनों तक हार्दिक बनारस में डेरा डाल गांव-गांव घूमेंगे। तैयारी के लिए हर पंचायत व ब्लाक स्तर पर समितियां गठित करने का काम जल्द पूरा हो जाएगा। बिहार विधानसभा चुनाव के अनुभव और आत्मविश्वास के बूते नीतीश यूपी चुनाव जीतने से अधिक इसमें अहम भूमिका निभाने की तैयारी कर रहे हैं ताकि वह राष्ट्रीय परिदृश्य में अपने रणनीतिक कौशल का लोहा सबको मनवा सकें।इतना ही नहीं इसी बहाने सपा प्रमुख मुलायम सिंह से बिहार चुनाव का हिसाब भी बराबर हो जाएगा।सपा प्रमुख मुलायम सिंह ने बिहार विधानसभा चुनाव के बीच न सिर्फ महागठबंधन तोड़ दिया था, बल्कि उसके खिलाफ प्रचार भी किया था। अब नीतीश कुमार की बारी है।नीतीश कुमार की सक्रियता फरवरी के बाद यूपी में बड़े पैमाने पर दिख सकती है।नीतीश फरवरी के आखिरी या मार्च के पहले हफ्ते में बनारस के एक कार्यक्रम में शामिल होंगे। इसी कार्यक्रम से जदयू अपने ‘मिशन यूपी’ का आगाज कर देगा। कोशिश होगी कि ऐसा महागठबंधन बनाया जाए जिसकी भाजपा और सपा से समान दूरी हो। कांग्रेस को तो इस महागठबंधन में आना ही है। इसके साथ कुछ ऐसे राजनीतिक दलों को भी जोड़ने की कोशिश चल रही है जिनके पास यूपी में चुनाव लड़ने का अनुभव है। इस कार्यक्रम में यूपी के कई सियासी दिग्गज भी शामिल होंगे।

उधर, भाजपा आलाकमान उत्तर प्रदेश में मिशन 2017 के लिए सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने में लगा गई है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चाहता है कि प्रदेश में पिछड़ा वर्ग के नेताओं की एक टीम तैयार की जाये जिसमें बुजुर्ग नेताओं का अनुभव दिखाई दे तो युवा जोश भी हो।वैसे संघ लम्बे समय से यू.पी में पिछड़ा वर्ग से नेतृत्व उभारने के पक्ष में है,कल्याण सिंह के बाद आज तक भाजपा में कोर्ठ सर्वमान्य पिछड़ा नेता नहीं उभर पाया है।आलाकमान पिछड़ा वोट बैंक पर दांव तो लगा रहा है इसके साथ-साथ अगड़े वर्ग का समर्थन भी बना रहे इसके लिये भी सजग है।पार्टी का एक बड़ा वर्ग तो मिशन 2017 को मजबूती प्रदान करने के लिये पिछड़े वर्ग से नया प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने के पक्ष में है।वहीं तमाम नेता ऐसे भी हैं जो  सपा व बसपा की काट के लिए एक बार फिर अगड़े वर्ग को अपने साथ जोड़े रखने के लिए अगड़े नेता पर दांव लगाने का दबाब बनाए हुए हैं।लक्ष्मीकांत वाजपेयी अभी प्रदेश अध्यक्ष हैं। प्रदेश के संघ व संगठन ने अपनी रिपोर्ट में राज्य में नेतृत्व में बदलाव करने को कहा है। उत्तर प्रदेश मोदी के साथ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के लिए भी बेहद अहम है। बीते लोकसभा चुनाव में प्रभारी महासचिव रहते हुए शाह ने उत्तर प्रदेश को बारीकी से जाना था और अब नए नेता के चयन में उनकी ही राय आखिरी होगी।

संघ ने राज्य की कमान गैर यादव प्रभावी पिछड़ा वर्ग के नेता को देने का सुझाव दिया है। इसमें तीन बार के विधायक धर्मपाल सिंह का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है। मौजूदा प्रदेश महासचिव स्वतंत्र देव सिंह भी मजबूत दावेदार हैं जो पिछड़ा वर्ग से आते हैं। अन्य दावेदारों में केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा, महेश शर्मा, रमाशंकर कठेरिया के साथ पार्टी उपाध्यक्ष दिनेश शर्मा शामिल हैं।

खैर एक तरफ पार्टी में पिछड़ा वर्ग का अध्यक्ष बनाये जाने की चर्चा हो रही है तो दूसरी तरफ नेतृत्व को डर है कि अगर वह पिछड़ा वर्ग के नेता पर दांव लगाती है तो ब्राह्मण व वैश्य वर्ग बसपा के साथ न चला जाए।2007 में इस बात का अहसास भाजपा को हो भी चुका है।

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