लेखक परिचय

अशोक “प्रवृद्ध”

अशोक “प्रवृद्ध”

बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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-अशोक “प्रवृद्ध”

shivaji

गौ-ब्राह्मण प्रतिपालक, यवन-परपीडक, राजाधिराज, महाराज, योगीराज, श्री छत्रपति शिवाजी महाराज पश्चिमी भारत के मराठा साम्राज्य अर्थात हिन्दू राज्य के संस्थापक थे। छत्रपति शिवाजी राजे भोसले ने कई वर्ष औरंगज़ेब के मुगल साम्राज्य से संघर्ष किया और 1674 में पश्चिम भारत में मराठा साम्राज्य की स्थापना की । रायगढ़ में ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी तदनुसार 6 जून 1674 को काशी के विद्वान महापंडित तथा वेद-पुराण-उपनिषदों के ज्ञाता पंडित गंगा भट्ट द्वारा छत्रपति शिवाजी महाराज का राज्याभिषेक भारतीय अर्थात हिन्दू इतिहास की सबसे गौरवशाली गाथाओं में से एक है। इतिहासज्ञों के अनुसार सैकड़ों वर्ष विदेशियों की परतन्त्रता में रहने के पश्चात हिन्दुओं को संभवतः महान विजयनगर साम्राज्य के बाद पहली बार अपना राज्य मिला था। शिवाजी महाराज द्वारा स्वतंत्र राज्य की स्थापना तथा संप्रभु शासक के रूप में उनके राज्याभिषेक ने मुगलों तथा अन्य बर्बर विधर्मी शासको द्वारा शताब्दियों से पीड़ित, शोषित, अपमानित प्रत्येक हिन्दू का ह्रदय गर्व से भर दिया।  यह दिन भारत के इतिहास में अमर है क्योंकि यह हमारे चिरस्थायी गौरव, संप्रभुता और अतुलनीय शौर्य की संस्कृति का स्मरण कराता है । 6 जून 1674 को रायगढ़ के किले में राजतिलक के मुख्य समारोह का आयोजन किया गया। उनके सिंहासन के दोनों ओर रत्न जडित तख्तों पर राजसी वैभव तथा हिंदू शौर्य के प्रतीक स्वरुप स्वर्णमंडित हाथी तथा घोड़े रखे हुए थे। बायीं ओर न्यायदेवी की सुन्दर मूर्ति विराजमान थी।उपस्थित संतों-महंतों और महान विभूतियों के मध्य शिवाजी महाराज की जय के नारों से गुंजायमान वातावरण में मधुर संगीत की लहरियों तथा कई तोपों की सलामी के साथ पंडित गंगा भट्ट के द्वारा शिवाजी के सिंहासन के ऊपर रत्न-माणिक्य जड़ित छत्र लगा कर उन्हें राजा शिव छत्रपति की उपाधि से सुशोभित किया गया । 6 जून 1674 को शिवाजी महाराज का रायगढ़ में राज्याभिषेक हुआ और तभी से शिवराज्याभिषेक शक शुरू किया और शिवराई ये मुद्रा आई ।उन्होंने स्वयं की अर्थात अपने नाम की राजमुद्रा तैयार करवाई । यह राजमुद्रा संस्कृत भाषा में थी । जिस पर संस्कृत  भाषा में  यह लेख ‘प्रतिपच्चंद्रलेखेव वर्धिष्णुर्विश्ववंदिता शाहसुनोः शिवस्यैषा मुद्रा भद्राय राजते’ खुदा हुआ था ।छत्रपति की उपाधि के पश्चात वे अपनी प्रजा के हितरक्षक के रूप में अधिक सक्षम हो गये तथा उनके द्वारा किये गये सभी समझौते तथा संधियाँ भी अब पूर्व की तुलना मैं अधिक विश्वसनीय और संप्रभुता संपन्न थे। एक सेनानायक के रूप में शिवाजी की महानता निर्विवाद रही है। हिन्दू राज्य के संस्थापक शिवाजी ने अनेक किलों का निर्माण और पुनरुद्धार करवाया। उनके निर्देशानुसार सन 1679 ई में अन्नाजी दत्तों ने एक विस्तृत भू-सर्वेक्षण करवाया, जिसके परिणामस्वरूप एक नया राजस्व निर्धारण हुआ।

 

भोंसले वंशीय शाहजी भोंसले की पत्नी जीजाबाई (राजमाता जिजाऊ) की कोख से शिवाजी महाराज का जन्म 19 फ़रवरी 1630 में महाराष्ट्र के पूना (पुणे) से उत्तर की ओर जुन्नर नगर के पास स्थित शिवनेरी दुर्ग में हुआ था । इनके पिताजी शाहजी भोंसले ने शिवाजी को जन्म के उपरान्त ही अपनी पत्नी जीजाबाई को प्रायः त्याग दिया था। अतः शिवाजी का बचपन बहुत उपेक्षित रहा और वे सौतेली माँ के कारण बहुत दिनों तक पिता के संरक्षण से वंचित रहे। उनके पिता शूरवीर थे और अपनी दूसरी पत्नी तुकाबाई मोहिते पर आकर्षित थे। जीजाबाई उच्च जाधव कुल में उत्पन्न प्रतिभाशाली होते हुए भी तिरस्कृत जीवन जी रही थीं। उनका बचपन उनकी माता जिजाऊ के मार्गदर्शन में बीता। वह सभी कलाओ में माहिर थे, उन्होंने बचपन में राजनीति एवं युद्ध कौशल की शिक्षा प्राप्त की थी। शिवाजी महाराज के चरित्र पर माता-पिता का बहुत प्रभाव पड़ा। बालक शिवाजी का लालन-पालन उनके स्थानीय संरक्षक दादाजी कोणदेव तथा जीजाबाई के समर्थ गुरु रामदास की देख-रेख में हुआ। माता जीजाबाई तथा गुरु रामदास ने सिर्फ पुस्तकीय ज्ञान के प्रशिक्षण पर अधिक बल न देकर शिवाजी के मनो मष्तिष्क में यह भावना भरने का प्रयास किया कि देश, समाज, गौ तथा ब्राह्मणों को मुसलमानों के उत्पीड़न से मुक्त करना उनका ही परम कर्तव्य है। बचपन से ही वे उस युग के वातावरण और घटनाओं  को भली प्रकार समझने लगे थे। शासक वर्ग की करतूतों पर वे झल्ला उठते थे और बेचैन हो जाते थे। उनके बाल-हृदय में ही स्वराज व स्वाधीनता की अग्नि प्रज्ज्वलित हो उठी थी। शिवाजी स्थानीय लोगों के बीच रहकर शीघ्र ही उनमें अत्यधिक सर्वप्रिय हो गये, और उन्होंने कुछ स्वामिभक्त साथियों का संगठन किया। उनके साथ आस-पास के क्षेत्रों में भ्रमण करने से उनको स्थानीय दुर्गों और दर्रों की भली प्रकार व्यक्तिगत जानकारी प्राप्त हो गयी। बड़े होने के साथ विदेशी शासन की बेड़ियाँ तोड़ फेंकने का उनका संकल्प प्रबल से प्रबलतर होता गया। छत्रपति शिवाजी महाराज का विवाह सन् 14 मई 1640 में सइबाई निम्बालकर के साथ लाल महल, पुना में हुआ था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार शिवाजी का विवाह साइबाईं निम्बालकर के साथ सन् 1641 में बंगलौर में हुआ था। उनके पुत्र का नाम सम्भाजी था ।शिवाजी के गुरु और संरक्षक कोणदेव की 1647 में मृत्यु हो गई।

 

शिवाजी की पैतृक सम्पदा बीजापुर के सुल्तान द्वारा शासित दक्कन में थी। उन्होंने मुसलमानों द्वारा किए जा रहे दमन और धार्मिक उत्पीड़न को प्रत्यक्ष देखा और अनुभव किया था और सोलह वर्ष की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते उन्हें ऐसा विश्वास हो गया कि हिन्दुओं की मुक्ति के लिए ही ईश्वर ने उन्हें इस धरती पर भेजा है। विधवा माता के द्वारा अपने पुत्र को जन्म काल से दी जा रही यही शिक्षा और विश्वास जीवन भर उनका मार्गदर्शन करता रहा कि दबे-कुचले हिंदुओं के अधिकारों के लिए लड़ने और मुस्लिम शासकों को उखाड़ फेंकना ही उनका उद्देश्य है । अपने अनुयायियों के संगठित दल से उन्होंने 1655 में बीजापुर की कमज़ोर सीमा चौकियों पर कब्ज़ा करना शुरू किया। इसी दौर में उन्होंने सुल्तानों से मिले हुए स्वधर्मियों को भी समाप्त कर दिया। इस तरह उनके साहस व सैन्य निपुणता तथा हिन्दुओं को सताने वालों के प्रति कड़े रूख ने उन्हें आम लोगों के बीच लोकप्रिय बना दिया। अपने स्वामिभक्त लोगों के दल के द्वारा उन्होंने उन्नीस वर्ष की आयु में पूना के निकट तीरण के दुर्ग पर अधिकार करके अपना जीवन-क्रम आरम्भ किया। मुग़लों, बीजापुर के सुल्तान, गोवा के पुर्तग़ालियों और जंजीरा स्थित अबीसिनिया के समुद्री डाकुओं के प्रबल प्रतिरोध के बावजूद शिवाजी ने दक्षिण में एक स्वतंत्र हिन्दू राज्य की स्थापना की। धार्मिक आक्रामकता के काल में वह अकेले ही धार्मिक सहिष्णुता के समर्थक बने रहे। उनका राज्य बेलगांव से लेकर तुंगभद्रा नदी के तट तक समस्त पश्चिमी कर्नाटक में विस्तृत था। इस प्रकार शिवाजी एक साधारण जागीरदार के उपेक्षित पुत्र की स्थिति से अपने पुरुषार्थ द्वारा ऎसे स्वाधीन राज्य के शासक बन गये , जिसका निर्माण स्वयं उन्होंने ही किया था। एक सुगठित शासन-प्रणाली एवं सैन्य-संगठन द्वारा राज्य को सुदृढ़ करके उन्होंने जन साधारण का भी विश्वास प्राप्त किया। जिस स्वतंत्रता की भावना से वे स्वयं प्रेरित हुए थे, उसे उन्होंने अपने देशवासियों के हृदय में भी इस प्रकार प्रज्वलित कर दिया कि उनके मरणोंपरान्त औरंगज़ेब द्वारा उनके पुत्र का वध कर देने, पौत्र को कारागार में डाल देने तथा समस्त देश को अपनी सैन्य शक्ति द्वारा रौंद डालने पर भी वे अपनी स्वतंत्रता बनाये रखने में समर्थ हो सके। उसी से भविष्य में विशाल मराठा साम्राज्य की स्थापना हुई। शिवाजी यथार्थ में एक व्यावहारिक आदर्शवादी थे। विजयनगर के पतन के बाद दक्षिण में यह पहला हिन्दू साम्राज्य था। एक स्वतंत्र शासक की तरह उन्होंने अपने नाम का सिक्का चलवाया। इसके बाद बीजापुर के सुल्तान ने कोंकण विजय के लिए अपने दो सेनाधीशों को शिवाजी के विरुद्ध भेजा पर वे असफल रहे।सन् 1677-78 में शिवाजी का ध्यान कर्नाटक की ओर गया। बम्बई के दक्षिण मे कोंकण, तुंगभद्रा नदी के पश्चिम में बेलगाँव तथा धारवाड़ का क्षेत्र, मैसूर, वैलारी, त्रिचूर तथा जिंजी पर अधिकार करने के बाद लॉर्ड मैकाले द्वारा शिवाजी महान कहे जाने वाले शिवाजी की 1680 में कुछ समय बीमार रहने के बाद अपनी राजधानी पहाड़ी दुर्ग राजगढ़ में 3 अप्रैल को मृत्यु हो गई।

 

 

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