लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

                      लोकतंत्र में चुनाव सबसे बड़ा पर्व होता है । यह वास्तव में लोक कुम्भ कहा जा सकता है । इस कुम्भ में लोक स्नान से लोकतंत्र को ऊर्जा प्राप्त होती है और उसकी नींव मज़बूत होती है । भारत में यह पर्व पुनः आया है । लोकतंत्र की सफलता इस बात पर ही निर्भर करती है कि कितने प्रतिशत मतदाता मतदान करते हैं । मतदान में भाग लेना प्रत्येक मतदाता का नैतिक दायित्व है । लेकिन दुर्भाग्य से अनेक मतदाता मतदान करने को बहुत ज्यादामहत्व नहीं देते । वे मतदान करने के लिये मतदान केन्द्रपर जाकर लाईन में खड़े होने को अपमान जनक समझते हैं । अनेक मतदाता यह सोचते हैं कि उनके एक वोट से क्या फ़र्क़ पड़ने वाला है । लोकतंत्र की सफलता के लिये यही एक वोट सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है । मतदान करना प्रत्येक मतदाता का धर्म है । यह लोकतंत्र-धर्म है । लोकतंत्र-धर्म की रक्षा के लिये प्रथम साधना मतदान करना है और द्वितीय साधना सही विचारधारा के वाहक दल अथवा व्यक्ति को वोट देना है । 
                           इस बार के चुनाव की ख़ासियत ही कहीं जायेगी कि यह उन मुद्दों पर लड़ा जा रहा है जो इस देश के शासक दल की वैचारिक आधारशिला रहे हैं । देश की गृह नीति से लेकर विदेश नीति तक , अर्थ नीति से लेकर सांस्कृतिक नीति तक सब कटघरे में खड़ी हैं । 1947 से लेकर आज तक मोटे तौर इसे दो राजनैतिक दलों ने ही विकसित किया है । नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्रित्व काल तक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने और पिछले दस साल से उसी विरासत की निरन्तरता में सोनिया गान्धी की पार्टी ने । भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और सोनिया गान्धी की पार्टी की इन वैचारिक नीतियों के फलस्वरूप भारतीय समाज में खंडन की प्रक्रिया तेज़ हुई है । भारतीय समाज की समग्र पहचान धुँधली हुई है । उसे अल्पसंख्यक बहुसंख्यक के दायरों में बाँटने के सुनियोजित प्रयास ही नहीं हुये बल्कि यह प्रयास भी किया गया कि इन तथाकथित अलग समाजों के हित भी परस्पर विरोधी हैं । षड्यंत्र की हद तो तब हो गई जब सोनिया गान्धी के बेटे राहुल गान्धी से मिल कर कुछ तत्वों ने जैन समाज को भी अल्पसंख्यक घोषित करवा लिया । कुछ सुविधाओं का टुकड़ा फेंक कर सोनिया कांग्रेस ने विभिन्न जातियों में संघर्ष करवा कर उसी पुरानी यूरोपीय मनोवृत्ति का परिचय दिया जिसका प्रयोग अंग्रेज़ इस देश में दो सौ साल से करते आ रहे थे । 
                             अंग्रेज़ों के चले जाने के बाद , शायद यह पहली बार है कि जनता ने सामूहिक रुप से एकत्रित होकर ,भारत में अभी भी विद्यमान ब्रिटिश साम्राज्य की आर्थिक, सामाजिक, भाषायी और सांस्कृतिक नीतियों को इस चुनाव के माध्यम से चुनौती दी है । यह ध्यान में रखा जाना चाहिये की सत्ता हस्तांतरण के छह दशक बीत जाने के बाद भी इस देश में उनकी नीतियों और व्यवस्था को केवल जारी ही नहीं रखा गया बल्कि पंथ निरपेक्षता के नाम पर उसे ही देश की मूल धारा और पहचान बताने का षड्यंत्रकारी प्रयास किया गया । महात्मा गान्धी ने इसे बदलने का प्रयास किया था । उनकी कोशिश थी कि नये शासन की रीति नीति भारतीय आत्मा से जुड़े । परन्तु पंडित नेहरु ने उस मोड़ पर गान्धी चिन्तन में अपनी अनास्था की सार्वजनिक रुप से घोषणा कर दी । गान्धी जी अपने इस अभियान को चला पाते , उससे पहले ही उनकी दुर्भाग्यपूर्ण हत्या हो गई । अब नये दस्तावेज़ों से पता चल रहा है कि गान्धी के हत्या के लिये उत्तेजक वातावरण बनाने में नेहरु के सबसे नज़दीक़ी लार्ड माऊंटबेटन का भी हाथ था । 
                             देश की सांस्कृतिक नीति को देश की मिट्टी से जोड़ने का एक प्रयास पिछली शताब्दी के आठवें दशक में जय प्रकाश नारायण ने भी सम्पूर्ण क्रान्ति के नाम से किया था । इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारत की जनता ने , उस वक़्त के सत्ताधारियों के सभी अमानुषिक अत्याचारों का सामना करते हुये भी जय प्रकाश नारायण का साथ दिया था । इसे देश का दुर्भाग्य ही कहना होगा कि जय प्रकाश नारायण के इस अभिनव क्रान्तिकारी प्रयोग को पलीता लगाने का काम रास्ते में उनके अनुयायियों ने ही कर दिया । 
                              उसी दिशा में अब वही प्रयोग नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एक बार फिर शुरु हुआ है । नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश की जनता एक बार फिर भारत माता के मंदिर में भारत माँ को स्थापित करने का प्रयास कर रही है । अभी तक दिल्ली में ब्रिटिश सरकार की विरासत संभाल कर बैठे सत्ताधारी भारत माता के नाम पर उस मूर्ति को घुमा रहे थे , जिसे विदेशी सत्ताधारी निर्मित कर गये थे । वे भारत माता के मंदिर में एक कुरुप और अपरुप शक्ल बिठा गये थे और अब दिल्ली के नये सत्ताधारी धमका रहे थे कि इसी को भारत माँ मान लिया जाये । लेकिन लगता है जनता एक बार फिर घरों से निकल रही है । लोकसभा के ये चुनाव इस ऐतिहासिक परिवर्तन के साक्षी बनने जा रहे हैं । यह लड़ाई इस देश में विदेशी जीवन मूल्यों  और भारतीय जीवन मूल्यों के बीच की है । यदि भारत को सचमुच विश्व की राजनीति में अपना गौरवशाली स्थान प्राप्त करना है , तो वह किसी की नक़ल से नहीं बल्कि अपनी मौलिकता से ही कर सकता है । यदि उसे विदेशी संस्कृति , विदेशी भाषा और विदेशी जीवन मूल्यों की नक़ल से ही आगे बढ़ना है तो वह भारत न रह कर पश्चिम की बदशक्ल अनुकृति बन जायेगा । 
                             इस बार के चुनावों में इन्हीं मौलिक प्रश्नों पर महाभारत हो रहा है । जो लोग भारत की मौलिकता और उसकी आत्मा को समाप्त करके उसे पश्चिम की नक़ल बनाना चाहते हैं , उनकी सेनाएँ भी धीरे धीरे कुरुक्षेत्र के मैदान में सजने लगीं हैं । उनका नेतृत्व इटली की सोनिया गान्धी , जिसने भारत की नागरिकता भी ले रखी है , कर रही है । इन सेनाओं के नज़दीक़ ही एक और जमावड़ा भी हो रहा है । वहाँ चीन से प्रेरणा लेने वाले वामपंथी अपनी लाल पताकाएँ सजाने लगे हैं । इन दोनों को कुमुक पहुँचाने के लिये अरविन्द केजरीवाल के पीछे एक और सेना सज रही है । उसमें माओवादी , नक्सलवादी सो लेकर अमेरिका के फोर्डवादी तक झाड़ू लेकर घूम रहे हैं । जिस प्रकार आतंकवादी , लोगों को धोखा देने के लिये अनेकबार पुलिस की वर्दी पहन कर भ्रम पैदा करते हैं , उसी प्रकार केजरीवाल के पीछे जुड़ रही इन चरमपंथियों की सेना लोगों को धोखा देने के लिये गान्धी टोपीनुमा टोपियाँ पहन कर घूम रही है । 
                           दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत की जनता एकत्रित होने लगी है । ये वे लोग हैं जो भारत माता के मंदिर में भारत माता को ही प्रतिष्ठापित करना चाहते हैं । इस तैयारी में जो उत्साह आम जनता में देखा जा रहा है , वह भारत के गौरवशाली भविष्य को लेकर आश्वस्त करता है । कश्मीर से कन्याकुमारी तक बेशुमार भीड़ मोदी को सुनने के लिये एकत्रित हो रही है । अंग्रेज़ी की एक पत्रिका के अनुसार , यह भीड़ ऐसी नहीं है जिसे राजनैतिक दलों की रैलियों के लिये ढो ढोकर लाया जाता है । यह तो ऐसी भीड़ है जो मोदी की बीन पर अपने आप खिंची चली आ रही है । शुरु में कुछ देशी विदेशी शक्तियों ने प्रचार किया था कि मोदी की लहर विन्ध्याचल के पर्वतों से टकराकर रुक जायेगी । लेकिन मोदी की जैसी अभूतपूर्व रैलियाँ केरल , तमिलनाडु और आन्ध्र प्रदेश में हुईं , उस ने सभी के मुँह बन्द कर दिये । नरेन्द्र मोदी अरुणाचल प्रदेश में तिब्बत की सीमा तक जाकर चीन को ललकार आये तो वहाँ उत्साह का ऐसा जन ज्वार उमड़ा , जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी । असम में मोदी को सुनने के लिये प्रदेश के कोने कोने से लोग एकत्रित हुये थे । एक ही चर्चा थी कि बांग्लादेशियों को मोदी ही निकाल पायेंगे । नरेन्द्र मोदी तो अब प्रतीक बन गये हैं । यह लड़ाई उस भारत के बीच जो भारतियों का भारत है और उस इंडिया के बीच जो इटली का है या इंग्लैंड का है या अमेरिका का है । कुरुक्षेत्र सज गया है । परिणाम की प्रतीक्षा करनी होगी । लेकिन इतिहास गवाह है अंतिम जीत जनता की ही होती है । मोदी उस जनता का नेतृत्व कर रहे हैं ।

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