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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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अक्षय उर्जा का अजस्र स्रोत – सूर्य। समस्त सृष्टि का कारक – सूर्य। दिवा और निशि का हेतु सूर्य। इसकी वंदना और अभ्यर्थना मानव कब से करता आ रहा है, यह स्वयंसिद्ध है। यदि कहा जाय कि मानव सभ्यता के विकास का इतिहास ही सूर्य-उपासना एवं अभ्यर्थना का इतिहास है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। वैदिक वाङमय सूर्य के प्रशस्ति गान से भरा पड़ा है।

कार्तिक शुक्ल पक्ष एवं चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला पर्व छठ मूल रूप से सूर्य के प्रति कृतज्ञताज्ञापन का ही त्योहार है। शास्त्रों में कहा गया है – ‘आदित्यात जायते वृष्टि’ अर्थात सूर्य वृष्टि अथवा वर्षा का कारक है। यह श्लोकांश भारतीय मौसम विज्ञान विभाग का सूत्रवाक्य भी है। विस्तारित अर्थ में सूर्य के कारण ही वर्षा होती है, वर्षा के कारण कृषि और

कृषि से अन्न उपजता है और अन्न से जीवन की रक्षा होती है। जीवन की रक्षा सबसे बड़ा धर्म है और जीवन की रक्षा जिन चीजों से होती है वह स्वतः कालांतर में धर्म एवं उत्सव का रूप ले लेता है, चाहे वह होली हो, दिवाली हो, मकर हो या फिर लोंहड़ी। इस पर्व में विभिन्न प्रकार के कंद-मूल, फूल-फल, अन्न और अन्न से बने मिष्टान्न, पकवान सूर्य को प्रसाद के रूप में अर्पित किए जाते हैं। यह सारी प्रसाद

सामग्री कृषि से ही प्राप्त होती है और कृषि करने वाले होते हैं कृषक। तब बहुत संभावना है कि कृषकों के द्वारा ही इस त्योहार की शुरूआत की गई होगी। यह सर्वविदित भी है कि छठ पर्व की शुरूआत की भूमि गंगा-दोआब की उपजाऊ भूमि ही रही है। इस दोआब में रहने वाले किसानों में से कुछ विचारवान किसानों के मन में कभी सूर्य के प्रति अनायास ही कृतज्ञता भाव जागृत हुआ होगा और अपने द्वारा उपजाए गए

फल-मूल एवं अन्न को बांस के बने सूप में भरकर किसी विशिष्ट तिथि को पूरी शुद्धता, श्रद्धा एवं निष्ठा के साथ सूर्य को अर्पित किया होगा और उसके मुँह से स्वतः ही यह अभ्यर्थना के शब्द फूट पड़े होंगे – हे सूर्यदेव, तुम्हारी ही कृपा से हमने इतने सारे कंद मूल, फल सारे उपजाए हैं। हम तुम्हारे प्रति कृतज्ञ हैं और आज हम तुम्हें ये सारी वस्तुएँ अर्पित करते हैं और तुम्हारा कृतज्ञता

ज्ञापन करते हैं। बाद में वेद -शास्त्रों का आधार पाकर षष्ठी जैसी विशिष्ट तिथि को छठ पर्व मनाने का विचार चल पड़ा होगा। कालांतर में कृषि कर्म से जुड़े लोगों के इस त्योहार में कृषि कर्म से इतर समुदाय के लोग भी इस पर्व के साथ जुड़ते चले गए और कृषि-सभ्यता के इस त्योहार ने आज महापर्व रूप ले लिया है।

अस्तु, इस पर्व से जुड़े विधि-विधान, क्रिया-कलाप, श्रद्धा, शुद्धता निष्ठा और प्रसाद स्वरूप फल-मूल अन्न तथा बांस की बनी सामग्री, बहंगी, सूप, दौरा, टोकरी आदि कुछ विशिष्ट अर्थ छोड़ जाते हैं। प्रथम तो यह कि हर व्यक्ति या परिवार को कुछ न कुछ फल, मूल, कंद उपजाना चाहिए चाहे वह कितनी ही सीमित दायरे में क्यों न हो। वह घर का पिछवाड़ा हो सकता है, छत का उपरी हिस्सा हो सकता है। दूसरे शब्दों

में आज जो किचन गार्डेन की बात होती है, इसके पीछे भी यही दृष्टि है। कितना अच्छा होता अगर छठ व्रती बाजार से न खरीदकर प्रसाद सामग्री के रूप में अपने द्वारा उपजाए फल-मूल एवं अन्न को ही सूर्यदेव को अर्पित करते। दूसरी बात हम छठ के अवसरों पर जलाशयों, नदी-तालाब का उपयोग करते हैं और इस अवसर पर उसकी सफाई भी करते हैं इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि सिर्फ छठ के दिन ही जलाशयों की सफाई की

जाय। वरन् इसका अर्थ है कि हमें हमेशा जलाशयों को स्वच्छ रखना चाहिए क्योंकि जल ही जीवन का आधार है। पर शायद हमने इतने वर्षों तक छठ करने के बाद भी कुछ नहीं सीखा। आज प्रदूषित जलाशय हर त्योहार का समाहार बन चुका है क्योंकि चाहे वह मूर्ति विसर्जन हो, पर्व त्योहार में प्रयुक्त फल-फूल आदि का विसर्जन हो, हम सारी चीजों को जलाशयों में विसर्जित करते हैं। परिणामस्वरूप आज की तारीख में

हमारे जलस्रोत, गंगा से लेकर छोटे-छोटे जलाशय तक पूरी तरह प्रदूषित हो चुके हैं। तीसरी बात अपने खान-पान, परिवेश की स्वच्छता भी इसके साथ जुड़ी है। हम छठ के अवसर पर ही यथा संभव गली-मुहल्लों को साफ-सूथरा एवं स्वच्छ रखने का सिर्फ औपचारिता निभाते हैं और घर से साष्टांग दण्डवत करते हुए जलाशयों तक जाते हैं। इसका निहितार्थ है कि हम एक दिन ही क्यों, पूरे वर्ष भर अपने गली मुहल्लों एवं

परिवेश को स्वच्छ क्यों नही रखे। परिवेश की स्वच्छता और मंगल-पुत वातावरण ही तो मन की निर्मलता का कारक है। हमें अपने भोजन सामग्री की तैयारी में भी निहायत ही स्वच्छता, शुद्धता बरतनी चाहिए, इसकी सीख भी हमें स्वेर्ग व्रत से ही मिलती है।

अन्त में, यदि हम छठ महापर्व के उपर्युक्त संकेतों को समझें और अपने जीवन में उतारें तो शायद और कुछ करने की जरूरत नहीं रह जाएगी। तो आइए, आज हम इस छठ महापर्व के अवसर पर उसके संकेतों को अपने जीवन में अंगीकृत करने का संकल्प लेते हैं।

 

बी0एन0 ओहदार

 

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