लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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sangram singhसंग्राम सिंह की महानता
महाराणा संग्राम सिंह भारत के पराक्रम, साहस और वीरता का नाम है। यह उस देशभक्ति का नाम है जिसके सामने शत्रु के पसीने छूटते थे, और शत्रु जिसका नाम आने से ही पानी भरने लगता था। संग्राम सिंह भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक दिव्य दिवाकर है, जिसे आने वाली सदियां ही नही आने वाले युग भी नमन करते रहेंगे, क्योंकि इस महामानव ने परंपरागत अस्त्र, शस्त्रों का प्रयोग करते हुए बारूद और तोप का पर्याय बने बाबर की सेना और स्वयं बाबर को भी भयभीत कर दिया था। जो लोग यह मानते हैं कि बाबर के समय में हिंदू राजपूत शक्ति का पराभव हो गया था और उनके भीतर निराशा उत्पन्न हो गयी थी, वह भारी चूक करते हैं और भारत के वीरों का अपमान करते हैं।
एस.आर. शर्मा का कथन
इस प्रकार के अतार्किक कथनों से एस.आर. शर्मा का कथन एक बानगी के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है-‘‘एक ओर निराशा जनित साहस और वैज्ञानिक युद्घ प्रणाली के कुछ साधन थे दूसरी ओर मध्यकालीन ढंग से सैनिकों की भीड़ थी जो भाले और धनुष वाणों से सुसज्जित थी और मूर्खतापूर्ण तथा अव्यवस्थित ढंग से जमा हो गयी थी।’’
गोला-बारूद की हमें पहले से ही जानकारी थी
जब कोई लेखक या इतिहासकार भारतीयों के विषय में ऐसी बात कहता है या लिखता है तो बड़ा कष्ट होता है, क्योंकि इस प्रकार के लेखन से यह प्रतिध्वनित होता है कि भारतवासी युद्घ कला और युद्घ संचालन से अनभिज्ञ थे और विदेशियों ने ही उन्हें गोला बारूद के विषय में या सफल युद्घनीति के विषय में ज्ञान कराया है। जबकि रामायण काल से लेकर महाभारत काल तक भारत वासियों ने अपने युद्घ संचालन और युद्घनीति के जिन सोपानों का आविष्कार किया था, उनका परीक्षण और प्रदर्शन उन्होंने बाबर के आने तक भी कितनी ही बार किया था। यह संभव है कि भारतवासियों को कुछ अस्त्र-शस्त्र शत्रु सेना के हाथों में प्रहार क्षमता के दृष्टिकोण से युद्घभूमि में पहली बार दिखायी दिये हों, परंतु यह कभी संभव नही था कि उन अस्त्र शस्त्रों से भारतीय कभी परिचित ही ना रहे हों।
तोप और भुषुण्डी
तोप और भुषुण्डियों (बंदूकों) का प्रयोग भारत में हिंदू प्राचीन काल से करते आ रहे थे। ऐसे अनेक उदाहरण हैं और कदाचित यही कारण था कि बाबर के तोपखाने से हिंदू उतने भयभीत नही थे जितने कि बाबर के सैनिक भारतीयों के युद्घ प्रेम से और अतुलनीय देशभक्ति और अदम्य साहस से भयभीत थे। इसलिए विजयी बाबर और उसके सैनिक पानीपत के युद्घ में सफल होकर भी निराश थे। बाबर अपनी निराशा को छिपाकर अपने सैनिकों में उत्साह भरना चाह रहा था क्योंकि वह अपने सैनिकों का साथ चाहता था और भारतवर्ष को भोगना चाहता था।
राणा पहले भी कर चुका था अपने शौर्य का प्रदर्शन
राणा संग्राम ने अपने अदम्य शौर्य एवं साहस को अब से पूर्व कई बार प्रदर्शित कर चुका था, जिससे उसने स्वयं को एक महान पराक्रमी योद्घा के रूप में राष्ट्रपटल पर स्थापित कर दिखाया था। उसने चित्तौड़ के राज्य का विस्तार किया था, और कई शक्तियों को परास्त कर अपनी वीरता का लोहा मनवाया था। उसने दिल्ली की लोदी वंश की सत्ता को भी हिलाकर रख दिया था और लोदी सल्तनत के कई भागों पर अधिकार कर लिया था, जिनका उल्लेख हम पूर्व में कर चुके हैं। राणा संग्राम ने गोरौन के युद्घ क्षेत्र में गुजरात के मुजफ्फरशाह का सामना किया था और उसके साथ भयानक युद्घ करके उसे युद्घ क्षेत्र में परास्त किया था। राणा ने मुजफ्फरशाह को परास्त कर उसे गिरफ्तार भी कर लिया था।
मुजफ्फरशाह ने राणा की कैद में रहते हुए अपना आधा राज्य राणा को देकर उसके साथ संधि कर ली थी। फलस्वरूप राणा के मेवाड़ राज्य की सीमा बुंदेलखण्ड तक फैल गयी थी। उसका राज्य भोपाल, मालवा, छत्तीसगढ़ तक फैल गया था।
राणा अब भी ‘एक लक्ष्य’ के प्रति समर्पित था
ऐसे सफल विजय अभियानों का संचालन कर अपने राज्य की सीमाओं में अप्रत्याशित वृद्घि करने वाला राणा संग्राम सिंह बाबर के सैनिकों से पागलों की भांति आ भिड़ा हो, ऐसा भला कैसे कहा जा सकता है? राणा एक लक्ष्य के प्रति समर्पित था और वह अपने देश की पावन भूमि को म्लेच्छ विहीन कर देना चाहता था। यहां म्लेच्छ का अभिप्राय उन लोगों से है जो इस देश की भूमि को महाराणा के समय में अपनी ‘पुण्यभूमि और पितृभूमि’ मानने को तैयार नही थे। इसलिए राणा की सेना पर केवल भीड़ होने का आरोप लगा देना सर्वथा अन्याय परक और अतार्किक है।
बादशाह बाबर और महाराणा सांगा की तुलना
बादशाह बाबर और महाराणा सांगा की तुलना करते हुए इतिहासकार लिखता है-‘‘बादशाह बाबर और राणा सांगा दोनों समकालीन थे। दोनों शक्तियों का एक साथ विकास हुआ था और दोनों की बहुत सी बातें एक दूसरे से समता रखती थीं। दोनों ने युग के एक ही भाग में जन्म लिया था और दोनों ही प्रसिद्घ राजवंशज थे। जीवन के प्रारंभ में बाबर ने भयानक कठिनाईयों का सामना किया था और सांगा भी राज्य को छोडक़र मारा-मारा फिरा था। आरंभ से ही दोनों साहसी और शक्तिशाली थे। काबुल से निकलकर दिल्ली तक बाबर ने विजय प्राप्त की थी और सांगा ने भारत के शक्तिशाली राजाओं को पराजित किया था। दिल्ली के सिंहासन पर बैठकर बाबर ने समझा था कि भारत में मुझसे लडऩे वाला अब कोई राजा और बादशाह नही है और चित्तौड़ राज्य में अपनी ऊंची पताका फहराकर सांगा बाबर का उपहास कर रहा था। वास्तव में दोनों ही अपने समय के अदभुत साहसी और शक्तिशाली योद्घा थे। दोनों अद्वितीय थे एक ही देश में शांति और संतोष के साथ दोनों का रह सकना संभव न था। दोनों का युद्घ अनिवार्य था।’’
(संदर्भ : ‘भारत की प्रसिद्घ लड़ाईयां’ पृष्ठ 209)
जब मुस्लिमों ने दिखायी देशभक्ति
देशभक्ति तो देशभक्ति ही होती है। देश और भक्ति के मध्य कोई संप्रदाय नही, कोई भाषा नही कोई क्षेत्रवाद नही है। यदि देश और भक्ति के मध्य संप्रदाय, भाषा आदि आ जाते हैं तो निश्चित ही वह देशभक्ति कलंकित हो जाती है, और उसे उस समय लोग देश के प्रति ‘कृतघ्नता’ के नाम से संबोधित करते हैं।
कई अवसर ऐसे आये हैं कि जब मुस्लिमों ने भारत के प्रति देशभक्ति का परिचय दिया है या विदेशी आततायियों, म्लेच्छों, आक्रांताओं के समक्ष भारत-भूमि के प्रति अपने समर्पण भाव का प्रदर्शन किया है। कितनी ही बार यदि गद्दारी की गयी तो ऐसे अवसर भी आये कि जब माता के प्रति ‘कृतज्ञता’ भी ज्ञापित की गयी। इतिहास को कृतघ्नता का खण्डन (निंदा) करने का जितना अधिकार है, उतना ही कृतज्ञता के मण्डन (स्तुति) का भी अधिकार है जैसे देशभक्ति केवल देशभक्ति ही होती है, वैसे ही इतिहास भी केवल इतिहास ही होता है।
लोदी के वंशजों के विद्रोह
बाबर पानीपत के युद्घ में इब्राहीम लोदी को परास्त कर चुका था पर लोदी के पारिवारिक लोग और उसके शुभचिंतक अभी भी जीवित थे और वह वैसे ही अपने को पुन: स्थापित करने का प्रयास कर रहे थे जैसे पृथ्वीराज चौहान के वंशजों ने पीढिय़ों तक इधर उधर बिखरकर भी अपने आपको सिद्घ और स्थापित करने का प्रयत्न किया था। ये लोग भलीभांति जानते थे कि बाबर के साथ लगने का अभिप्राय होगा कि अपने अस्तित्व को सदा के लिए समाप्त कर लेना, और स्वयं को मुगलों के कथित अत्याचारों का शिकार बना लेना। भारत के हिंदुओं के साथ शत्रुता रखते-रखते भी उन्हें यह पता चल गया था कि इनकी शत्रुता से भी कुछ सीख मिलती है और बाबर की मित्रता भी शत्रुता जैसी हो सकती है। इसलिए उन्होंने भारत के सांस्कृतिक मूल्यों को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए उचित माना और उनकी सुरक्षा के लिए अपने आपको उनके प्रति समर्पित कर दिया।
इब्राहीम लोदी की मृत्यु के उपरांत अफगान सैनिकों ने बाहर खां लोहानी नामक अफगान सरदार के नेतृत्व में एकत्र होना आरंभ किया। ये लोग अपने खोये हुए सम्मान को प्राप्त करना चाहते थे, इसलिए बाबर को विदेशी आक्रांता मानकर उसे हिंदुस्थान से बाहर खदेड़ देना चाहते थे। बाहर खां ने अपना नाम परिवर्तित कर सुल्तान मौहम्मद खान कर लिया था। उसके भीतर विदेशी बाबर के विरूद्घ प्रतिरोध और प्रतिशोध का लावा धधक रहा था और वह अपने अफगान सरदारों और सैनिकों का सफलता पूर्वक मार्गदर्शन करने लगा। मौहम्मद खान ने हसन खां मेवाती को अपना सेनापति बनाया। हसन खां मेवाती उस क्षेत्र का निवासी और मूल नागरिक था जिसके हिंदू समाज की रक्षा में सदियों तक संघर्ष किया था, और जो स्वयं को श्रीकृष्ण के यदुवंश का वंशज होने पर गर्व करते थे। इसलिए हसन खां मेवाती जैसे मुसलमान विदेशी आक्रांता बाबर को अपना नेता अथवा शासक मानने की भूल कदापि नही कर सकते थे। हसन खां मेवाती ने इब्राहीम लोदी के भाई महमूद लोदी को दिल्ली का बादशाह घोषित करने की योजना पर कार्य करना आरंभ कर दिया। इब्राहीम लोदी के वंशजों और शुभचिंतकों की कार्ययोजना को बाबर भी सूक्ष्मता से समझने का प्रयास कर रहा था। इसलिए वह भी पूर्णत: सजग था। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि हसन खां मेवाती की योजना सिरे नही चढ़ सकी और उसके मूत्र्तरूप लेने से पहले ही अफगान सैनिकों और अधिकारियों में फूट पड़ गयी। कई अफगान सरदार बाबर के पास गये और उसे सारा भेद बता दिया। बाबर ने अपने पुत्र हुमायंू के माध्यम से सेना भेजकर विद्रोह के संभावित क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया।
दिल्ली की सत्ता की कुंजी थे राणा संग्राम सिंह
पर हसन खां मेवाती चुप बैठने वाला नही था। वह अपनी योजना पर कार्य करता रहा। तब उसका ध्यान मेवाड़ाधिपति महाराणा संग्रामी सिंह की ओर गया। हसन खां जानता था कि बाबर को भारतवर्ष पर शासन करने के लिए अभी राणा संग्राम सिंह की चुनौती का सामना करना शेष है। राणा संग्राम सिंह मानो दिल्ली के सत्ता रूपी दुर्ग की कुंजी थे। दिल्ली को हराने के उपरांत भी भारत के इस वीर पुत्र से सामना कर ‘सत्ता की चाबी’ प्राप्त करना बाबर के लिए अनिवार्य था। अत: युद्घ को अनिवार्य मानते हुए बाबर के विरूद्घ राणा संग्रामसिंह ने भी अपनी तैयारियां करनी आरंभ कर दीं। हसन खां मेवाती को यह भलीभांति ज्ञात था कि महाराणा संग्राम सिंह जैसा महायोद्घा भी युद्घ के लिए सन्नद्घ है और उसकी देशभक्ति और पराक्रम पूरे देश के लिए अनुकरणीय है। इसलिए मेवाती ने महाराणा संग्राम सिंह से मिलने की योजना बनाई। एक दिन उसने महमूद खां लोदी को अपने साथ लिया और महाराणा से मिलने जा पहुंचा। तब राणा संग्रामसिंह स्वयं भी बाबर के साथ संभावित युद्घ को लेकर विचारमग्न थे।
किया महाराणा ने यथोचित सम्मान
राणा ने मेवाती और लोदी के आने का प्रयोजन जब सुना समझा तो उन्हें भी बाबर के विरूद्घ मेवाती को अपना समर्थन और सहयोग देना उचित जान पड़ा। राणा को उस समय ऐसे सहयोग समर्थन की आवश्यकता भी थी, इसलिए उन्होंने उन दोनों का यथोचित स्वागत सत्कार कर उनके साथ बाबर के विरूद्घ गहन मंत्रणा की।
लोगों का भ्रामक प्रचार
जिन लोगों ने बाबर को भारत में बुलाने वालों में राणा संग्राम सिंह का नाम भी सम्मिलित किया है, या उनके सम्मिलित होने का दुष्प्रचार किया है उनके ऐसे दुष्प्रचार में कितना बल है यह इसी बात से स्पष्ट हो जाता है कि राणा संग्रामसिंह यदि बाबर को यहां बुलाते तो उससे हसन खां मेवाती और लोदी इस प्रकार मिलने नही जाते और यदि जाते भी तो राणा उनसे इस प्रकार बात नही करते।
बनाया बाबर के विरूद्घ मोर्चा
राणा हसन खां व लोदी ने मिलकर गहन मंत्रणा की और बाबर के विरूद्घ एक नीति पर सहमति बनायी कि उसके विरूद्घ तीनों मिलकर युद्घ करेंगे। इन तीनों महायोद्घाओं के मिलने में किसी भी इतिहासकार ने यह नही बताया है कि यदि युद्घ का परिणाम बाबर के विरूद्घ गया तो दिल्ली पर किसका शासन होगा? अर्थात दिल्ली लोदी वंश को मिलेगी या राणा को, इसके विपरीत इतिहासकारों का संकेत केवल इतना है कि तीनों ने गहन मंत्रणा की और बाबर के विरूद्घ संघर्ष में एक साथ रहने पर सहमति बनायी।
अत: स्पष्ट है कि हसनखां और लोदी ने राणा की सर्वोच्चता को स्वीकार किया और उसे युद्घ का परिणाम अनुकूल आने पर दिल्ली अधिपति भी स्वीकार किया। ये दोनों मुस्लिम योद्घा किसी भी प्रकार से बाबर मुक्त हिंदुस्थान चाहते थे। इसलिए उनका समर्थन और सहयोग देशभक्ति पूर्ण था। इस प्रकार उनका अपनी योजना पर कार्य आरंभ हुआ। वार्ता संपन्न हुई।
राणा चले बाबर से भिडऩे
इसी समय बाबर का ज्येष्ठ पुत्र हुमायूं अपनी सेना के साथ बढ़ता -बढ़ता पूरब के राज्यों में बहुत दूर तक अपना अधिकार स्थापित कर चुका था। तब बाबर दक्षिण की ओर अपनी सेना लेकर आगे बढ़ा। यह समाचार पाकर राणा सांगा अपनी सेना सहित उसी ओर आगे बढ़ा जिस ओर बाबर अपने सैन्य दल के साथ बढ़ता जा रहा था। राणा का मंतव्य स्पष्ट था कि विदेशी आक्रांता को घेरकर उसे भारतीय पराक्रम का परिचय दिया जाए।
मुस्लिम किलेदारों ने की गद्दारी
राणा की सेना ने बाबर की सेना को इस ओर बढऩे से रोकने का असफल प्रयास भी किया। बाबर ने धौलपुर बियाना और ग्वालियर के किलों को सहजता से अपने साथ मिला लिया क्योंकि इन किलों के किलेदार मुसलमान ही थे और उन्होंने सहजता से बाबर का साथ देना स्वीकार कर लिया। बाबर ने भी इन किलों के किलेदारों को जागीरें देकर उपकृत किया और उन्हें अपना स्थायी मित्र बना लिया।
राणा ने किया बियाना पर अधिकार
जब राणा को ज्ञात हुआ कि बियाना में किले की सुरक्षा के लिए तुर्क सेना छोड़ दी गयी है तो राणा की सेना ने बियाना पर आक्रमण किया और बाबर की सेना को बड़ी संख्या में मारकर बियाना पर अधिकार कर लिया।
बियाना की इस जीत को प्रचलित इतिहास में कोई स्थान नही दिया गया है, और इसे एक छोटी सी घटना मानकर या जानकर उपेक्षित कर दिया गया है।
जबकि यह घटना स्पष्ट करती है कि बाबर की सेना को परास्त करने के लिए या उससे खानवा का युद्घ करने से पूर्व किस प्रकार एक योजनाबद्घ ढंग से उसके विरूद्घ कार्य किया गया था। राणा की इस विजय ने बाबर को स्पष्ट कर दिया कि जितनी शीघ्रता हो सके उतनी शीघ्रता से राणा से निपट लिया जाए। इसलिए बाबर राणा से युद्घ की तैयारियां करने लगा। उसने एक विशाल सेना तैयार की और युद्घ के लिए प्रस्थान कर दिया।
बियाना में हुआ संघर्ष
भरतपुर राज्य के बियाना नामक स्थान पर राणा संग्राम सिंह की सेना से बाबर का युद्घ हुआ। बाबर के साथ काबुल की तुर्क सेना तो भी ही साथ ही दिल्ल की यह मुस्लिम सेना भी साथ थी उसे लोदी को हटाने के पश्चात मिली थी। इस प्रकार एक विशाल सैन्य दल का सामना राणा की सेना को करना पड़ रहा था।
राणा की सेना के पास अपना पराक्रम था जो उसको अपने देश के लिए मर मिटने की प्रेरणा दे रहा था, अपना शौर्य था जो उसे अपने देश के महातेजस्वी धर्म के स्वरूप की रक्षा के लिए आंदोलित कर रहा था, अपना तेज था जो अपने देश को रक्षित करने का संकल्प दिला रहा था, अपनी वीरता था जो उसकी धमनियों में देशभक्ति का रक्त संचार कर रही थी, अपना साहस था जो उसे अदभुत और विश्व के अप्रतिम रोमांच से भर रहा था और ऐसी दृढ़ संकल्प शक्ति थी जो उसे तोपों के सामने भी चट्टान की भांति टिके रहने के लिए अंतिम क्षणों तक प्रेरित करती रही।
इंच-इंच भूमि के लिए किया गया संघर्ष
अपने इन्हीं गुणों को और साधनों को अपना अस्त्र-शस्त्र बनाकर राणा संग्राम सिंह की सेना आगे बढ़ी। अपनी परंपरा के अनुसार हिंदू सेना ने अपने देश की इंच-इंच भूमि को मुक्त कराने के संकल्प के साथ हर-हर महादेव का गगनभेदी उद्घोष किया और युद्घ करने लगी। युद्घ के रोमांचकारी दृश्य देखने योग्य थे। राणा के सैनिक विशाल शत्रु सैन्य दल पर भूखे शेर की भांति टूट पड़े। उन्हें ज्ञात था कि यदि शत्रु को परास्त कर दिया गया तो दिल्ली ही नही संपूर्ण भारतवर्ष से विदेशी धर्म और विदेशी सत्ता का नामोनिशान मिट जाएगा। इसलिए युद्घ को पूर्णत: मां भारती के लिए समर्पित कर दिया गया उसकी रक्षा और उसकी स्वतंत्रता को अपने प्राणों का ध्यान किये बिना लक्ष्य बनाकर एक एक हिंदू ने युद्घ में अपना पराक्रम और शौर्य दिखाना आरंभ कर दिया। शत्रु सेना भी अपनी ओर से किसी प्रकार की कमी नही छोड़ रही थी उसे भी ज्ञात था कि यदि राणा को हटा दिया गया, तो संपूर्ण हिंदुस्थान को भोगने का सौभाग्य उसे मिलेगा।
बाबर की सेना भाग खड़ी हुई
घनघोर युद्घ में कुछ क्षण ऐसे भी आये कि जब यह अनुमान लगाना भी कठिन था कि अंतिम विजय किसकी होगी? पर शीघ्र ही राणा की सेना का पराक्रम हावी होने लगा। शत्रु सेना का मनोबल टूटने लगा और हिंदू वीरों की वीरता के समक्ष उसके पांव उखड़ गये, युद्घ क्षेत्र को छोडक़र बाबर की सेना भाग खड़ी हुई। बियाना की युद्घभूमि ने अपना निर्णय हिंदू हितों की रक्षक राणा की सेना और राणा के पराक्रम के पक्ष में दिया। राणा ने मां भारती के लिए शीश झुकाया और परमपिता परमात्मा का हृदय से आभार व्यक्त किया, जिसकी पुण्य प्रेरणा से वह इतना बड़ा कार्य करने में सफल रहे थे।
हो गयी राणा से चूक
यहां राणा से एक चूक भी हुई और यह छोटी-मोटी चूक नही थी, अपितु भारी चूक थी। जब बाबर की सेना युद्घ से भाग रही थी तो राणा ने उसका पीछा नही किया, और उसे भागने दिया। कहने का अभिप्राय है कि राणा ने सांप को चोटिल करके छोड़ दिया। यह ‘चोटिल सांप’ इसके पश्चात समाप्त नही हुआ, अपितु राणा को डसने की तैयारियों में जुट गया।
राणा यदि भागते हुए शत्रु की सेना को मिटाने के लिए थोड़ा और संघर्ष कर लेते तो उसका पूर्णत: सफाया निश्चित था, और उसके पश्चात किसी अगले युद्घ के लिए उसे तैयारियां करने का अवसर भी नही मिलता।
इसे ‘रणनीतिक भूल’ कहें या कूटनीतिक भूल या भारतीयों की अपनी परंपरागत ‘सदगुण विकृति’ कि भागते हुए शत्रु का पीछा नही करना है? कुछ भी हो, पर यह निश्चित है कि बियाना ने शत्रु को तो परास्त करा दिया पर महाराणा संग्राम सिंह के लिए दिल्ली का रास्ता नही खोला। जबकि महाराणा के पास दिल्ली का रास्ता उपलब्ध होने का उस समय विकल्प था, जिसे उन्होंने गंवा दिया। यह सत्य है कि-‘गुजरा हुआ जमाना आता नही दोबारा’।
इसलिए महाराणा के लिए दिल्ली अब भी दूर ही रह गयी। किसी शायर ने कितना सुंदर कहा है-‘लम्हों ने खता की थी
सदियों ने सजा पाई’।
शीघ्र ही महाराणा को दिल्ली को लेने के लिए पुन: एक युद्घ की आवश्यकता अनुभव होने लगी थी।
क्रमश:


UGTA BHARAT

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2 Comments on "बियाना के युद्घ का महान विजेता महाराणा संग्राम सिंह"

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आर.सिंह
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क्या भारत के इतिहास में बयाना की इस लड़ाई और बाबर कि हार का विवरण कहीं वर्णित है?

रघुवीर जैफ ,जयपुर
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रघुवीर जैफ ,जयपुर

राकेश जी , शुद्ध शब्द बयाना है जो आज भरतपुर जिले के अंतर्गत है तथा खानवा से थोड़ी ही दूर है ,बियाना नहीं है | ज्ञात सूत्रों के अनुसार हसन खान मेवाती इस क्षेत्र का मूल आदिवासी था जिसने धर्म परिवर्तन कर लिया था |इतिहास में महाराणा साँगा की सेना की हार का कारण बाबर द्वारा अंतिम वक्त में तोपखाने से आक्रमण करने से हुई थी |

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