लेखक परिचय

शैलेन्द्र चौहान

शैलेन्द्र चौहान

कविता, कहानी, आलोचना के साथ पत्रकारिता भी। तीन कविता संग्रह ; 'नौ रुपये बीस पैसे के लिए'(1983), श्वेतपत्र (2002) एवं, 'ईश्वर की चौखट पर '(2004) में प्रकाशित। एक कहानी संग्रह; नहीं यह कोई कहानी नहीं (1996) तथा एक संस्मरणात्मक उपन्यास पाँव जमीन पर (2010) में प्रकाशित। धरती' नामक अनियतकालिक पत्रिका का संपादन। मूलतः इंजीनियर। फिलहाल जयपुर में स्थायी निवास एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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savitribai phule
शैलेन्द्र चौहान
महाराष्ट्र के लोकसमाज में सावित्रीबाई फुले का जीवन स्त्रियों के लिए सदैव प्रेरणास्पद रहा है। उनका जीवन एक ऐसी अद्वितीय मशाल है, जिसने स्वयं प्रज्वलित होकर भारतीय नारी को पहली बार सम्मान के साथ जीना सिखाया। सावित्रीबाई ने समय के उस कठिनतम दौर में काम शुरू किया था जब धार्मिक अंधविश्वास, रूढ़िवाद, अस्पृश्यता, दलितों और स्त्रियों पर मानसिक तथा शारीरिक अत्याचार अपने चरम पर थे। बाल-विवाह, सती प्रथा, बेटियों को जन्मते ही मार देना, विधवा स्त्रियों के साथ तरह-तरह के अमानुषिक व्यवहार, अनमेल विवाह, बहुपत्नी विवाह आदि प्रथाएं समाज में पूरी शक्ति से काबिज़ थीं। समाज में ब्राह्णणवाद और जातिवाद का बोलबाला था। सावित्रीबाई फुले का विवाह 1840 में ज्योतिबा फुले से हुआ था। दोनों ने मिलकर ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की। ज्योतिराव जो बाद में ज्योतिबा के नाम से जाने गए सावित्रीबाई के संरक्षक, गुरु और समर्थक थे। 1 जनवरी 1848 से लेकर 15 मार्च 1852 के दौरान सावित्रीबाई ने ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर लगातार एक के बाद एक बिना किसी आर्थिक मदद और सहारे के लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोलकर, सामाजिक क्रांति का बिगुल बजा दिया था। इस तरह का सामाजिक, क्रांतिकारी और परिवर्तनकामी काम इस देश में सावित्री-ज्योतिबा से पहले किसी ने नहीं किया था। समाज में बदलाव के इतने महत्वपूर्ण योगदान के बाबजूद इस देश के तत्कालीन सवर्ण समाज ने शतीपर्यंत सावित्रीबाई फुले के शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन के क्षेत्र में किए इस योगदान को कोई महत्त्व ही नहीं स्वीकार किया। लेकिन प्रसन्नता की बात यह है कि आज स्वयं दलित, पिछडा, वंचित और शोषित समाज उनके अतुलनीय योगदान की महागाथा को सबके सामने उजागर कर रहा है। उनको और उनके निस्वार्थ मिशन को आदर्श मानकर उनसे प्रेरणा लेकर उनके नाम पर स्कूल, कालेज खोलकर दलित आदिवासी व वंचित समाज के छात्र-छात्राओं की आर्थिक, सामाजिक और भावनात्मक मदद कर रहा है। महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में 3 जनवरी 1831 को जन्मी महान शिक्षिका सावित्रीबाई फुले ने मात्र 18 वर्ष की छोटी उम्र में ही, भारत में स्त्री शिक्षा की बंजर जमीन पर शिक्षा का नन्हा सा पौधा रोपकर उसे एक अकल्पनीय विशाल छतनार वृक्ष में तब्दील कर दिया। भारत में सायास सदियों से शिक्षा से वंचित किए गए शोषित वंचित, दलित-आदिवासी, और स्त्री समाज को सावित्रीबाई फुले ने अपने निस्वार्थ प्रेम, सामाजिक प्रतिबद्धता, सरलता तथा अपने अनथक सार्थक प्रयासों से शिक्षा पाने का अधिकार दिलवाया। सावित्रीबाई फुले ने शिक्षा पर एकाधिकार जमाए बैठी ऊंची जातियों का दर्प एक ही झटके में तोड़ दिया। सावित्रीबाई फुले तमाम विरोध और बाधाओं के बावजूद अपने संघर्ष में डटे रहने के धैर्य और आत्मविश्वास ने भारतीय समाज में स्त्रियों की शिक्षा की अलख जगाने की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। जिस देश में एकलव्य का अंगूठा गुरुदक्षिणा में मांगने वाले के नाम पर पुरस्कार दिए जाते हों, जिस देश में शम्बूक जैसे विद्वान के वध की परंपरा हो, जिस देश में यहां के धर्मग्रंथों में शूद्रों-अतिशूद्रों और स्त्रियों को शिक्षा ग्रहण करने के प्रयत्न पर उनके कान में पिघला शीशा डालने का प्रावधान किया गया हो। जिस देश के ब्राह्मणवादी समाज के तथाकथित पंडितों द्वारा यहां की दलित शोषित-वंचित जनता को गुलामों से भी निम्नतर मानने का निरंतर एक आपराधिक कुचक्र रचा हो। ऐसे देश में किसी शूद्र समाज की स्त्री द्वारा इन सारे अपमानों, बाधाओं, सड़े-गले धार्मिक अंधविश्वासों व रूढ़ियों को तोड़कर सम्पूर्ण स्त्री व दलित समाज के लिए शिक्षा की क्रांति ज्योति जला देना अपने आप में विश्व के आठवें आश्चर्य से कम नही था। परंतु गहरा अफसोस तो इस बात का है कि इस “जाति ना पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान” वाले देश में जाति के आघार पर ही ज्ञान की पूछ होती रही है। प्रतिभाओं का सम्मान होता रहा है। हमेशा जाति की तथाकथित श्रेष्ठता के आधार पर पुरस्कार, सम्मान और अच्छे अवसर ऊंची जाति के लोगों को मिलते रहे हैं। दलित समाज मानता है कि यदि ऐसा न होता तो भारत में “शिक्षक दिवस” सावित्रीबाई फुले के नाम पर मनाया जाता न कि डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णऩ के नाम पर। जबकि सावित्रीबाई फुले द्वारा स्त्री शिक्षा के क्षेत्र में देश को दिया गया योगदान भारत के इतिहास में न केवल बेहद महत्वपूर्ण है बल्कि अतुलनीय है। यह बात गलत भी नहीं कही जा सकती। महान शिक्षिका सावित्रीबाई फुले न केवल भारत की पहली महिला अध्यापिका और पहली प्रधानाचार्या थीं अपितु वे सम्पूर्ण समाज के लिए एक आदर्श प्रेरणा स्त्रोत एवं भारत के स्त्री आंदोलन की अगुआ भी थीं। एक प्रख्यात समाज सुधारक, जागरूक और प्रतिबद्ध कवयित्री एवं विचारशील चितंक थीं। वे पहले किसान स्कूल की संस्थापक भी थीं। सावित्रीबाई ने हजारों साल से शिक्षा से वंचित कर दिए गए शूद्र, अतिशूद्र समाज और स्त्रियों के लिए बंद कर दिए गए दरवाजों को एक ही धक्के में खोल दिया। इन बंद दरवाजों के खुलने की आवाज इतनी ऊंची और तल्ख़ थी कि उसकी आवाज से पुणे के सनातनियों के कान के पर्दे फट गए। वे अचकचाकर अपनी मदमस्त सामंती नींद से जाग उठे और तुरत सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले पर घातक और प्राणलेवा प्रहार करने लगे। सावित्री और ज्योतिबा द्वारा दी जा रही शिक्षा की ज्योति बुझ जाये इसके लिए उन्होंने ज्योतिबा के पिता गोविंदराव को भड़काकर ज्योतिबा और सावित्री को घर से निकलवा दिया। घर से निकाले जाने के बाद भी सावित्री और ज्योतिबा ने अपना कार्य जारी रखा। जब सावित्रीबाई फुले घर से बाहर लड़कियों को पढ़ाने निकलती थीं तो उन पर इन सनातनियों द्वारा गोबर-पत्थर आदि कूड़ाकरकट फेंका जाता था। उन्हें रास्ते में रोक कर सवर्ण दबंगों द्वारा भद्दी-भद्दी गालियां दी जाती थीं। जान से मारने की लगातार धमकियां दी जातीं थीं। लड़िकयों के लिये चलाए जा रहे स्कूल बंद कराने के अनेक प्रयास किये जाते। सावित्री बाई डरकर शायद घर बैठ जाऐं इसलिए ये सनातनी उन्हें विविध तरीकों से तंग करने लगे। एक बदमाश हर रोज सावित्रीबाई फुले का पीछा कर ता। एक दिन वह अचानक उनका रास्ता रोककर खड़ा हो गया और फिर उनपर शारीरिक हमला कर दिया। सावित्रीबाई ने बहादुरी से उस बदमाश का मुकाबला करते हुए बड़ी निडरता से उसे दो-तीन थप्पड़ कसकर जड़ दिए। सावित्रीबाई से थप्पड़ खाकर वह बदमाश इतना शर्मशार हो गया कि फिर कभी उनके रास्ते में नहीं आया।
सावित्रीबाई फुले ने पहला स्कूल पुणे, महाराष्ट्र में खोला और अठारहवां स्कूल भी पूना में ही खोला । पूना में उस वक्त अस्पृश्यता का सबसे क्रूर और अमानवीय रूप मौजूद था। इसलिए वहां दलित-वंचित और स्त्री समाज के लिए लगातार स्कूल खोलना भी इस बात का इंगित था कि अब ब्राह्मणवाद की चूलें हिलने में अधिक समय नही रहा। पूना के भिडेवाडा में 1848 में खुले पहले स्कूल में छह छात्राओं ने दाखिला लिया। जिनकी आयु चार से छह के बीच थी। जिनके नाम अन्नपूर्णा जोशी, सुमती मोकाशी, दुर्गा देशमुख, माधवी थत्ते, सोनू पवार और जानी करडिले थी। इन छह छात्राओं की कक्षा के बाद सावित्रीबाई द्वारा घर घर जाकर अपनी बच्चियों को पढ़ाने का आह्वान करने का परिणाम यह निकला कि पहले स्कूल में ही इतनी छात्राएं हो गई कि एक और अध्यापक नियुक्त करने की नौबत आ गई। ऐसे समय विष्णुपंत थत्ते ने मानवता के नाते मुफ्त में पढ़ाना स्वीकार कर विद्यालय की प्रगति में अपना योगदान दिया। सावित्रीबाई फुले ने 1849 में पूना में ही उस्मान शेख के यहॉं मुस्लिम स्त्रियों व बच्चों के लिए प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र खोला। 1849 मे ही पूना, सतारा व अहमद नगर जिले में पाठशालाऐं खोलीं। महान शिक्षिका सावित्रीबाई फुले ने न केवल शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व काम किया अपितु अबाध शोषण का शिकार रहीं भारतीय स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए 1852 में ”महिला मंडल“ का गठन कर वह प्रथम भारतीय महिला आंदोलन की अगुआ बन गईं। इस महिला मंडल ने बाल विवाह, विधवा होने के कारण स्त्रियों पर किए जा रहे जुल्मों के खिलाफ स्त्रियों को तथा अन्य समाज को मोर्चाबन्द कर समाजिक बदलाव के लिए संघर्ष किया। हिन्दू स्त्री के विधवा होने पर उसका सिर मूंड दिया जाता था। विधवाओं के सर मूंडने जैसी कुरीतियों के खिलाफ लड़ने के लिए सावित्री बाई फुले ने नाईयों से विधवाओं के ”बाल न काटने“ का अनुरोध करते हुए आन्दोलन चलाया। जिसमें काफी संख्या में नाईयों ने भाग लिया तथा विधवा स्त्रियों के बाल न काटने की प्रतिज्ञा ली। इतिहास गवाह है कि भारत ही नहीं पूरे विश्व में ऐसा सशक्त आन्दोलन नहीं दिखता जिसमें स्त्रियों के ऊपर होने वाले शारीरिक और मानसिक अत्याचारों के खिलाफ कोई पुरूष जाति प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हो। बाद में नाइयों के कई संगठन सावित्रीबाई फुले द्वारा गठित महिला मण्डल के साथ जुड़े। सावित्री बाई फुले और उनके ”महिला मंडल“ के साथियों ने ऐसे अनेक आन्दोलन कई वर्षों तक चलाये व उनमें अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। अपने एक निबंध ‘क़र्ज़’ में सावित्री बाई लिखती हैं की त्योहारों और कर्मकाण्डो को मनाने के लिए क़र्ज़ लेना सबसे बड़ी बेवकूफी हैं क्योंकि इससे तथाकथित परलोक तो नहीं सुधरने वाला बल्कि क़र्ज़ में डूबने से ज़िन्दगी ही बर्बाद होगी। वे कहा करती थीं “कड़ी मेहनत करो, अच्छे से पढाई करो और अच्छा काम करो”। गौरतलब है कि हिन्दू राज्य में जहाँ दलितों को सार्वजनिक स्थानों पर चलने तक का अधिकार नहीं था वहीँ भारत में अंग्रेजी राज स्थापित होने के बाद दलितों को शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के नए अवसर मिलने लगे थे। भारत का इतिहास, धर्मग्रंथ और उनके विरोध में किये गए सामाजिक सुधार आंदोलन इस बात के प्रत्यक्ष गवाह हैं कि हमारे समाज में स्त्रियों का महत्त्व एक जानवर से भी कम आंका जाता रहा। स्त्री के विधवा होने पर उसके परिवार के ही पुरुष सदस्य, देवर, जेठ, ससुर व अन्य सम्बन्धियों द्वारा उसका दैहिक शोषण किया जाता था। जिसके कारण वह कई बार गर्भ धारण कर लेती थी। बदनामी से बचने के लिए विधवा या तो आत्महत्या कर लेती थी, या फिर अपने अवैध बच्चे को मार डालती थी। अपने अवैध बच्चे के कारण वह खुद आत्महत्या न करें तथा अपने अजन्मे बच्चे को भी न मारें, इस उद्देश्य से सावित्रीबाई फुले ने भारत का पहला ”बाल हत्या प्रतिबंधक गृह“ खोला तथा निराश्रित व असहाय महिलाओं के लिए अनाथाश्रम खोला। स्वयं सावित्रीबाई फुले ने एक आदर्श सामाजिक कार्यकर्ता का जीवन अपनाया। आत्महत्या करने जा रही एक विधवा ब्राह्मण स्त्री काशीबाई, जो कि विधवा होने के बावजूद माँ बनने वाली थी, उसको आत्महत्या करने से रोककर एवं अपने घर में ही उसकी प्रसूति करा कर उसके बच्चे यशंवत को अपने दत्तक पुत्र के रुप में गोद लिया। दत्तक पुत्र यशवंत राव को पाल-पोसकर डॉक्टर यशवंत बनाया। इतना ही नही उसके बड़े होने पर उसका अंतर्जातीय विवाह किया। महाराष्ट्र का यह पहला अंतर्जातीय विवाह था। सावित्रीबाई फुले और ज्योतिबा फुले ने सामाजिक परिवर्तन के कार्य अपने घर से ही शुरू कर समाज के सामने एक बृहत् आदर्श प्रस्तुत किया। सावित्रीबाई फुले जीवन पर्यन्त अन्तर्जातीय विवाह आयोजित व सम्पन्न कर जाति व वर्ग विहीन समाज की स्थापना के लिए प्रयासरत रहीं। सावित्रीबाई पूरे देश की महानायिका हैं। हर बिरादरी और धर्म के लिये उन्होंने काम किया। सावित्री बाई फुले ने लगभग 48 वर्षा तक दलित, शोषित, पीड़ित स्त्रियों को सम्मान से रहने तथा उन्हें स्वाभिमान और गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए प्रेरित किया। भारत की पहली अध्यापिका तथा सामाजिक क्रांति की अग्रदूत सावित्रीबाई फुले एक प्रसिद्ध कवयित्री भी थी। उनकी एक बहुत ही प्रसिद्ध कविता है जिसमें वह सबको पढ़ने लिखने की प्रेरणा देकर जाति तोड़ने और ब्राह्मण ग्रंथों को फेंकने की बात करती हैं…
“जाओ जाकर पढ़ो-लिखो / बनो आत्मनिर्भर, बनो मेहनती / काम करो-ज्ञान और धन इकट्ठा करो / ज्ञान के बिना सब खो जाता है / ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते है / इसलिए, खाली ना बैठो,जाओ, जाकर शिक्षा लो / दमितों और त्याग दिए गयों के दुखों का अंत करो / तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है / इसलिए सीखो और जाति के बंधन तोड़ दो / ब्राह्मणों के ग्रंथ जल्दी से जल्दी फेंक दो /”
एक चिंतक के तौर पर सावित्रीबाई का मानना था कि ऊंच-नीच ईश्वर ने नहीं बनाए हैं बल्कि इसको बनाने में तो स्वार्थी इंसानों के एक वर्ग का ही हाथ है। उसी ने अपनी स्वयं की परवर्ती पीढियों का भविष्य सुरक्षित करने और पूरे ऐशोआराम से अपना जीवन बिताने के लिए जातियां बनाई हैं। अंतर्जातीय विवाह का समर्थन करने पर जब सावित्रीबाई फुले के भाई ने उसे भला बुरा कहते हुए लिखा- तुम और तुम्हारा पति बहिष्कृत हो गए हो। अतिशूद्रों के लिए तुम जो काम करते हो वह कुल भ्रष्ट करने वाला है। इसलिए कहता हूं कि जाति रूढ़ि के अनुसार भट्ट जो कहे तुम्हें उसी प्रकार आचरण करना चाहिए। भाई की पुरातनपंथी बातों का जबाब देते हुए सावित्रीबाई फुले ने कहा कि- ‘भाई तुम्हारी बुद्धि कम है और भट्ट लोगों की शिक्षा से ही वह अधिक दुर्बल बनी हुई है।’ 1877 मे पड़ने वाले अकाल के कठिन समय में सावित्रीबाई और ज्योतिबा फुले ने न केवल अन्न वितरण सत्र चलाए बल्कि अकाल पीड़ितों को अनाज देने के लिए समाज के सभी समृद्ध लोगों से अपील भी की। एक अन्य पत्र में 1877 मे पड़ने वाले अकाल की भीषणता का जिस मार्मिकता से वर्णन किया है वह अन्यत्र दुर्लभ है। 1890 में ज्योतिबा फुले के निर्वाण के बाद सावित्रीबाई फुले पूरे सात साल समाज में यथावत सक्रिय कार्य करती रहीं। 1897 में महाराष्ट्र में भयंकर रुप से प्लेग फैल गया था परंतु सावित्रीबाई फुले बिना किसी भय के प्लेग-पीडितों की मदद करती रहीं। एक प्लेग पीडित दलित बच्चे को बचाते हुए स्वयं भी प्लेग पीडित हो गईं। अतंतः अपने पुत्र यशवंत के अस्पताल में 10 मार्च 1897 को सावित्रीबाई फुले का शरीरांत हो गया लेकिन वे आज भी स्त्री एवं दलित अधिकारों के प्रति संघर्षरत लोगों के लिए प्रेरणास्रोत हैं।

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