लेखक परिचय

मृत्युंजय दीक्षित

मृत्युंजय दीक्षित

स्वतंत्र लेखक व् टिप्पणीकार लखनऊ,उप्र

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7 मार्च पर विशेष:-

mahashivratriमृत्युंजय दीक्षित

महाशिवरात्रि का पर्व फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की चतुदर्र्शी को  मनाया जाने वाला  एक महान पर्व है। इस पवित्र दिन लगभग पूरा भारत शिवभक्ति में तल्लीन हो जाता है और भगवान शिव के चरणों में अपने आप को अपिर्त कर पुण्य अर्पित करना चाहता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार प्रतिपदा आदि 16 तिथियों के अग्नि देवता स्वामी होते हैं अतः जिस तिथि का जो देवता स्वामी होता है उस देवता का उस तिथि में व्रत पूजन करने से विशेष लाभ की प्राप्ति होती है। ईशान संहिता के अनुसार ज्योर्तिलिंग का प्रादुर्भाव होने से यह पर्व महाशिवरात्रि के नाम से लोकप्रिय हुआ। इस व्रत को हिंदू धर्म को मानने वाला प्रत्येक नागरिक करता है चाहे वह स्त्री हो या पुरूष या फिर किसी भी जाति या वर्ग का।

शिवरात्रि व्रत व भगवान शिव की महिमा कावर्णपन शिव पुराण में मिलता है।जबकि भगवान शिव की महिमा वेदों में की गयी है। उपनिषदों में भी शिवजी की महिमा का वर्णन मिलता है। रूद्रहृदय, दक्षिणामूर्ति , नीलरूद्रोपनिषद आदि उपनिषदों में शिवजी की महिमा का वर्णन मिलता है । भगवान शिव ने अपने श्रीमुख से व्रत की महिमा वर्णन स्वयं ब्रहमा विष्णु और पार्वती जी को किया है। निष्काम तथा सकाम भाव से सभी व्यक्तियों के लिए यह महान व्रत परम हितकारक माना गया है।

शिव महिमा है कि जिनकी जिहवा के अग्रभाग पर भगवान शंकर का नाम शिव विराजमान रहता है वे धन्य तथा महात्मा पुरूष हैं। महादेवजी थोड़ा सा बेलपत्र पाकर भी संतुष्ट हो जाते हैं । वे सभी के कल्याणस्वरूप हैं। इसलिए सभी को शिवजी की पूजा करनी चाहिये। शिवजी सभी को सौभाग्य प्रदान करने वाले हैं भगवान शिव कार्य और करण से परे हैं। ये निर्गंुण, निराकार,निर्बाध, निर्विकल्प निरीह निरंजन निष्काम निराधार तथा सदा नित्यमुक्त हैं। भगवान शिव पंचाक्षर और षडाक्षर मंत्र हैं तथा केवल ऊँ नमः शिवाय कहने मात्र से ही वे प्रसन्न हो जाते हैं। भगवान शिव का पूजन करने के लिए शिवलिंग की प्रतिष्ठा करनी चाहिये।

जब से सृष्टि की रचना हुई हैं तब से भगवान शिव की आराधना वउनकी महिमा की गाथाओं से भण्डार भरे पड़े हैं।स्वयं भगवान श्रीराम व श्रीकृष्ण ने  भी अपने कार्यो। की बाधारहित सिद्धि के लिये उनकी साणना की और शिवजी के शरणागत हुए। भगवान श्रीराम ने लंकाविजय के पूर्व भगवान शिव की आराधना की। भगवान शिव के भक्तों व उनकी आराधना की कहानियां हमारे पुराणों व धर्मग्रथों में भरी पड़ी है।राक्षसराज हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद श्री विष्णु की पूजा में तत्पर रहता था। भगवान शंकर ने ही नृसिंह का अवतार लेकर भक्त प्रहलाद की रक्षा की थी। । जो भी व्यक्ति चाहे वह कैसा भी हो या फिर किसी भी दृष्टि से उसने भगवान शिव की आराधनाकी हो ागवान शिव ने आराधनासे प्रसन्न होकर सभी को आशीर्वाद दिया ।यदि उन्होनें भूलवश किसी को गलत आशीर्वाद दिया या फिर किसी ने उनके आशीर्वाद  का गलत उपयोग किया तो उन्होनें उसका उसी रूप  में निराकरण भी किया। सभी कहानियों का सार यही है कि भगवान शिव अपने भक्तों की आवाज अवश्य सुनते हैं। भगवान शिव ने देवराज इंद्र पर कृपादृष्टि डाली तो उन्होनें अग्निदेव, देवगुरू, बृहस्पति और मार्कण्डेय पर  पर भी कृपादृष्टि डाली। भगवान शिव की महिमा अर्वणनीय है।

हिंदी कवियों  ने भी भगवान शिव की स्तुति व महिमा का गुणगान किया है।हिंदी के आदिकवि चंदवरदाई ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ पृथ्वीराज रासो के प्रथम खंड आदिकथा में भगवान शिव की वंदना की है। महान कवि विद्यापति ने भी अपने पदों में भगवान शिव काही ध्यान रखा है। महान कवि सूरदास ने भी शिवभक्ति प्रकट की है। सिख धर्म के अंतिम गुरू गोविंद सिंह महाराज द्वारा लिखित दशम ग्रंथ साहिब में भी शिवोपासना का विशेष वर्णन मिलता है। भगवान शिव परम कल्याणकारी है।जगदगुरू हैं। वे सर्वोपरि तथा सम्पूर्ण सृष्टि के स्वामी हैें। उन्होनें इस समस्त संसार व सांसारिक घटनाओं कानिर्माण किया है। सांसारिक विषय भेागों से मनुष्य बंधा है तथा शिवकृपा से ही वह पाशमुक्त हो सकता है। भगवान शिव जब प्रसन्न होते हैं तो साधक को अपनी दिव्य शक्ति प्रदान करते हैं जिससे अविद्या के अंधकार का नाश हो जाता है और साधक को अपने इष्ट की प्राप्ति होती है।।इसका तात्पर्य यह है कि जब तक मनुष्य रिूाव जी को प्रसन्न करके उनकी कृपा का पात्र नहीं बन जाता तब तक उसे ईश्वरीय साक्षात्कार नहीं हो सकता।

भगवान शिव की महिमा का वर्णन गोस्वामी तुलसीदास ने भी किया है। अतः कहा जा सकता है कि अस्तु ज्ञान और भक्ति इन तीनों के परमार्थ तथा सभी विद्याओं, शास्त्रों, कलाओं और ज्ञान- विज्ञान के प्रवर्तक आशुतोष भगवान शिव की आराधना के बिना साधक अभिष्ट लाभ नहीं प्राप्त कर सकता। शिवोनपासना के द्वारा ही परम तत्व अथव शिवतत्व की प्राप्ति संभव है। भगवान शिव अपने भक्त की आराधना से भी प्रसन्न होकर उसका तत्क्षण परम कल्याणकर देते हैं इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को शिवपूजन और व्रत करना चाहिये। उनका व्रत करना चाहिये।

परात्पर सचिचदानंद परमेश्वर शिव एक है। वे विश्वातीत विश्वमय हैं। वे गुणातीत और गुणमय भी हैं। भगवान शिव में ही विश्व का विकास संभव है। भगवान शिव शुद्ध, सनातन, विज्ञानानन्दघन, परब्रम्ह हैं उनकी आराधना परम लाभ के लिए ही या उनका पुनीत प्रेम प्राप्त करने के लिए ही करनी चाहिये। सांसारिक हानि- लाभ प्रारब्धवश होते हैं इनके लिए चिंता करने की बात नहीं । शिव जी की शरण लेने से कर्म शुभ और निष्काम हो जायेंगे। अत: किसी भी प्रकार के कर्मों की पूर्णता के लिये न तो चिंता करनी चाहिये और  नहीं भगवान से उनके नाशार्थ प्रार्थना ही करनी चाहिये।

ऊँ नमः शिवाय या फिर अपनी जिहवा पर शिव मात्र का स्मरण करने से व्यक्ति सांसारिक चिंताओं से मुक्त हो सकता है। पूरे भारत वर्ष में भगवान शिव के मंदिर विराजमान है। जहां भगवान शिव व उनके दरबार का आशीर्वाद प्र्राप्त करने के लिए भक्तों की भारी भीड़ लगी रहती है। दक्षिण में रामेश्वरम, गुजरात में सोमनाथ मंदिर व काशी में मदिरों की अपनी ही महिमा है। जबकि झारखंड राज्य में बाबा बैद्यनाथ धाम को कौन नहीं जानता। जम्मू – काश्मीर में भगवान शिव के मंदिरांे का कहना ही क्या । एक ऐतिहासिक भव्य, गौरवशाली परम्परा व संस्कृति है भगवान शिव की आराधना। शहरों, जिलों व कस्बों में स्थित शिवालयों में भी भक्तगण अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिये जुटे रहते हैं। जब महाशिवरात्रि कापर्व नजदीक आ जाता है तब कांवड़ियों का रेला अलग दृश्य प्रस्तुत करता है।    अतः परम कल्याणकारी सृष्टिकर्ता व पूरे विश्व के नीति नियंतक भगवान शिव की आराधना पूरे तन, मन, धन व एकाग्रचित होकर करनी चाहिये क्योंकि वे ही हर प्रकार की दःुखों व चिंताओं का हरण करने में सक्षम है।

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1 Comment on "महाशिवरात्रि का पर्व और  भगवान शिव"

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gyanipandit
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महाशिवरात्रि की सभी को शुभकामनाये!!!!!!
शिव जी आप पर अपनी कृपा दृष्टी बनाये रखें.

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