लेखक परिचय

अशोक “प्रवृद्ध”

अशोक “प्रवृद्ध”

बाल्यकाल से ही अवकाश के समय अपने पितामह और उनके विद्वान मित्रों को वाल्मीकिय रामायण , महाभारत, पुराण, इतिहासादि ग्रन्थों को पढ़ कर सुनाने के क्रम में पुरातन धार्मिक-आध्यात्मिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक विषयों के अध्ययन- मनन के प्रति मन में लगी लगन वैदिक ग्रन्थों के अध्ययन-मनन-चिन्तन तक ले गई और इस लगन और ईच्छा की पूर्ति हेतु आज भी पुरातन ग्रन्थों, पुरातात्विक स्थलों का अध्ययन , अनुसन्धान व लेखन शौक और कार्य दोनों । शाश्वत्त सत्य अर्थात चिरन्तन सनातन सत्य के अध्ययन व अनुसंधान हेतु निरन्तर रत्त रहकर कई पत्र-पत्रिकाओं , इलेक्ट्रोनिक व अन्तर्जाल संचार माध्यमों के लिए संस्कृत, हिन्दी, नागपुरी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ में स्वतंत्र लेखन ।

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अशोक “प्रवृद्ध”

 

अपने भक्तों, साधको का उद्धार करने वाले सूर्यदेव समस्त संसार मे एक मात्र दर्शनीय प्रकाशक है तथा विस्तृत अंतरिक्ष को सभी ओर से प्रकाशित करते हैं। सूर्यदेव मरुद्गणो, देवगणो, मनुष्यो और स्वर्गलोक वासियों के सामने नियमित रूप से उदित होते हैं, ताकि तीन लोको के निवासी सूर्य को दर्शन कर सकें। समस्त विश्व को दृष्टि प्रदान करने के लिए सम्पूर्ण प्राणियो के ज्ञाता सूर्यदेव की ज्योतिर्मयी रश्मियाँ विशेष रूप से प्रकाशित होती हैं। सबको प्रकाश देने वाले सूर्यदेव के उदित होते ही रात्रि के साथ तारा मण्डल वैसे ही छिप जाते है, जैसे चोर छिप जाते हैं । प्रज्वलित हुई अग्नि की किरणों के समान सूर्यदेव की प्रकाश रश्मियाँ सम्पूर्ण जीव-जगत को प्रकाशित करती हैं।

दिन एवं रात में समय को विभाजित करते हुए अन्तरिक्ष एवं द्युलोक में सूर्य भ्रमण करते है, जिसमे सभी प्राणियों को लाभ प्राप्त होता है। इसीलिए भक्तजन तमिस्त्रा से दूर श्रेष्ठतम ज्योति को देखते हुए ज्योति स्वरूप और देवो मे उत्कृष्ठतम ज्योति (सूर्य) को प्रार्थना करते हुए कहते है कि मित्रों के मित्र सूर्यदेव उदित होकर आकाश मे उठते हुए हृदयरोग, शरीर की कान्ति का हरण करने वाले रोगों को नष्ट करें । हम अपने हरिमाण (शरीर को क्षीण करने वाले रोग) को शुको (तोतों), रोपणाका (वृक्षों) एवं हरिद्रवो (हरी वनस्पतियों) में  स्थापित करते हैं। हे सूर्यदेव अपने सम्पूर्ण तेजों से उदित होकर हमारे सभी रोगो को वशवर्ती करें। हम उन रोगो के वश मे कभी न आयें।

 

वेद, उपनिषदादि ग्रन्थों के अनुसार महर्षि कश्यप के (अवरस) पुत्र,जो अदिति के गर्भ से उत्पन्न हुए, भगवान् सूर्य के स्वरुप, प्राकट्य-कथा, आयुध, शक्ति, महिमा एवं उपासना प्रक्रिया का विशद विवरण भविष्य पुराण, मत्स्यपुराण, पद्मपुराण, ब्रह्मपुराण, मार्कण्डेय पुराण, साम्ब पुराणादि ग्रन्थों में अंकित है।सूर्य से सम्बंधित स्वतंत्र सूर्य पुराण, सौर पुराणादि अनेक ग्रन्थ प्राप्य हैं । पौराणिक आख्यानों के अनुसार ब्रह्मा ने देवताओं को यज्ञ भाग का भोक्ता एवं त्रिभुवन का स्वामी बनाया था, किन्तु कालान्तर में देवताओं के सौतेले भाई दैत्यों, दानवों और राक्षसों ने मिलकर देवताओं के विरुद्ध में मोर्चा खोल दिया । अन्त में इस सम्मिलित सेना ने देवताओं को पराजित कर उनके पदों एवं अधिकारों को छीन लिया । अपने पुत्रों की ऐसे दुर्गति देख देवताओं की माता अदिति उद्वग्नि हो गई और दैत्यों, दानवों और राक्षसों की भयंकर क्रूरतम कारर्वाईयों से त्राण दिलाने (पाने) के लिए अदिति निराहार रहकर भगवन सूर्य की उपासना करने लगी । माता अदिति की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्य ने उन्हें वरदान दिया कि अपने सहस्त्रों अंशों के साथ तुम्हारे गर्भ से अवतीर्ण होकर मैं तुम्हारी मनोकामना पूर्ण करूँगा । सूर्यदेव ने शीघ्र ही अपने वरदान को पूर्ण किया तथा अपनी क्रूर दृष्टि से देखकर आततायी दैत्य, दानव एवं राक्षस रुपी शत्रुओं का नाश कर वेदमार्ग को पुनः स्थापित किया और देवताओं को उनके अपने पद और अधिकार पुनः वापस दिलाये । भगवान् सूर्य अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य कहलाये । इस पौराणिक आख्यान ‘अदितेरपत्यं पुमान् आदित्यः ‘ के अर्थ में कतिपय विद्वान् वेदों में आये आदित्य (ऋग्वेद १/५०/१३), तथा आदितेय (ऋग्वेद १०/८८/११) को देखकर इस सन्दर्भ का सम्बन्ध वेदों से जोड़ते हैं लेकिन सत्य बात यह है कि वेदों में मानव इतिहास नहीं है ।

पुराणादि ग्रन्थों के अनुसार सूर्य का रंग लाल है । आदित्यलोक में भगवान् सूर्यनारायण का साकार विग्रह है । रक्तकमल पर विराजमान उनका वर्ण हिरण्यमय तथा उनकी चार भुजाएं हैं । उनके दो भुजाओं में पद्म एवं दो हाथ अभय एवं वरमुद्रा से सुशोभित हैं । वे सप्ताश्वयुक्त रथ में स्थित हैं । मत्स्यपुराण ९४/१ में सूर्य का ध्यान के सन्दर्भ में अंकित है कि सूर्यदेव की दो भुजाएं हैं, वे कमल के आसन पर विराजमान रहते हैं, उनके दोनों हाथों में कमल सुशोभित रहते हैं ।उनकी कान्ति कमल के भीतरी भाग की सी है और वे सात घोड़े तथा सात रस्सियों से जुड़े रथ पर विराजमान रहते हैं । श्रीमद्भागवत पुराण ५/२१/१३ के अनुसार सूर्य का वाहन रथ कहलाता है । वेदस्वरूप भगवान् सूर्य की भान्ति ही उनका रथ भी वेदस्वरूप है ।इनके रथ में उपस्थित एक चक्र संवत्सर कहा जाता है । संवत्सर की भान्ति ही रथ में मासरूप बारह अरे, ऋतुरूप छः नेमियाँ और तीन नाभियाँ हैं । इसी अध्याय के ५/२१/१५ एवं ऋग्वेद १/१/५/३ के अनुसार सूर्य के रथ में अरुण नामक सारथि ने गायत्री आदि छंदों के सात घोड़े जोत रखे हैं । पुराणों के अनुसार सारथि का मुख भगवान् सूर्य की ओर रहता है । इनके साथ साठ हजार बालखिल्य स्वस्तिवाचन एवं स्तुतिगान करते हुए चलते हैं । ऋषि,मुनि, गन्धर्व, अप्सरा, नाग, यक्ष, राक्षस एवं देवता आत्मरूप सूर्यनारायण की उपासना करते हुए साथ चलते हैं । सर्वद्रष्टा सूर्यदेव तेजस्वी ज्वालाओ से युक्त दिव्यता को धारण करते हुए सप्तवर्णी किरणों रूपी अश्वो के रथ मे सुशोभित होते हैं। पवित्रता प्रदान करने वाले ज्ञान सम्पन्न ऊधर्वगामी सूर्यदेव अपने सप्तवर्णी अश्वों से (किरणों से) सुशोभित रथ में शोभायमान होते हैं।

 

भगवान् सूर्य की दो पत्नियाँ – संज्ञा एवं भिक्षुया (निक्षुभा) हैं । पुराणों में संज्ञा के सुरेणु, राज्ञी, द्यौ, त्वाष्ट्री एवं प्रभादि अनेक नाम प्राप्त होते हैं तथा निक्षुभा का अन्य नाम छाया है । विश्वकर्मा तवष्टा की पुत्री संज्ञा से सूर्य को वैवस्वत, मनु, यम, यमी (यमुना) , अश्विनीकुमार द्वय एवं रैवन्त और छाया से शनि, तपती, विष्टि एवं सावर्णीमनु ये दस सन्तान प्राप्त हुईं । सूर्यमंडल में सूर्य की दाहिनी ओर राज्ञी (संज्ञा) एवं बायीं ओर छाया रहती है । इनके साथ में पिंगल नामक लेखक, दण्डनायक नामक द्वारपाल तथा कल्माष नाम के दो पक्षी द्वार पर खड़े रहते हैं । दिण्डी नामक उनके मुख्य सेवक उनके सामने खड़े रहते हैं । अग्निपुराण ५१/८-९ में अंकित है कि भगवान् सूर्य की बारह शक्तियाँ-  इडा, सुषुम्ना, विश्वार्चि , इन्दु, प्रमर्दिनी, प्रहर्षिणी, महाकाली, कपिला, प्रबोधिनी, नीलाम्बरा, धनान्तः स्था और अमृता हैं । श्रीतत्वनिधि के अनुसार सूर्य के प्रधान आयुध चक्र, शक्ति, पाश एवं अंकुश हैं । सूर्य के अधिदेवता शिव (ईश्वर) एवं प्रत्यधिदेवता अग्नि हैं ।  सूर्य के अनेक नाम अष्टोतरशतनामादि प्रचलित हैं ।

सूर्य की आराधना अतिप्राचीन काल से प्रचलित है । सूर्योपासना के व्रत- षष्ठी, सप्तमी आदि तिथियों, सभी द्वादश संक्रान्तियों एवं रविवार से सम्बद्ध हैं । षष्ठी व्रतों में कार्तिक शुक्ल षष्ठी व मार्गशीर्ष शक्ल षष्ठी, जिसे उतर भारत में छठ पूजा कहा जाता है, और भाद्रशुक्ल की सूर्यषष्ठी अर्थात लोलार्क षष्ठी, सप्तमी व्रतों में आषाढ़ शुक्ल की बैवस्वत सप्तमी, मार्गशीर्ष शुक्ल की मित्र-सप्तमी, पौषशुक्ल की मार्तण्ड सप्तमी, माघ कृष्ण की सर्वाप्ति सप्तमी और शुक्लपक्ष की रथसप्तमी (अचला सप्तमी, सूर्यजयन्ती या महाजयन्ती) तथा संक्रान्ति व्रतों में रूप संक्रान्ति, सौभाग्य-संक्रान्ति, धन-संक्रान्ति, आज्ञा-संक्रान्ति, ताम्बूल-संक्रान्ति, विशोक-संक्रान्ति और मनोरथ संक्रान्ति प्रसिद्ध हैं । सूर्य के स्तोत्रों में महाभारत वनपर्व ३/१६-१९, ब्रह्मपुराण ३३/३३-४५, स्कन्दपुराण, हरिवंशपुराण विष्णुपर्व में प्राप्त स्तोत्र प्रसिद्ध हैं । रविवार के साथ ही सप्तमी, संक्रान्ति आदि नैमितिक पर्वों के अवसर पर यथा शक्ति तथा श्रद्धा भक्ति के साथ सूर्य की पूजा, आराधना, नाम-जप-स्मरण से आयु, आरोग्य, धन-धान्य,क्षेत्र, पुत्र, मित्र, कालाव, तेज, वीर्य, यश, कान्ति, विद्या, वैभव और सौभाग्य प्राप्ति के साथ ही सूर्यलोक की प्राप्ति होती है । प्राणियों को धारण-पोषण करने वाले जिस दृष्टि अर्थात प्रकाश से सूर्यदेव इस लोक को प्रकाशित करते हैं, उस प्रकाश की भक्त जन स्तुति करतें हैं।

 

ज्योतिष शास्त्र दो अयन मानता है – उत्तरायण और दक्षिणायन ।  ये अयन सूर्य के वार्षिक चाल पर निर्भर होकर विभक्त किये गये हैं । सूर्य का उत्तरायण बसन्त सम्पात से प्रारम्भ होता है । उत्तरायण में सूर्य पृथ्वी के मनुष्यों को और वनस्पतियों के के रस को सुखाता है । भारत गर्म देश है । इसलिए ग्रीष्म के सूर्य की सीधी किरणें पड़ती हैं । इसी से ग्रीष्म ऋतु में भारत के मनुष्यों का बल क्षीण और पाचन शक्ति कम हो जाती है, परन्तु शरद ऋतु आने पर चन्द्रमा अमृत की वर्षा करता है तब वनस्पतियों में नया रस आता है और मनुष्यों में नये पराक्रम की वृद्धि होती है । सूर्य के उत्तरायण होने को मकर संक्रान्ति कहते हैं । मकर संक्रान्ति सूर्य पूजा का पर्व है । यह ऋतु परिवर्तन का द्योत्तक अर्थात संदेशवाहक पर्व है । तमिलनाडु का पोंगल, पंजाब का लोंहड़ी, असम का माघ बिहू आदि सूर्यपूजा का ही पर्व है । मकर संक्रान्ति के अवसर पर उत्तर भारत के गंगा, यमुना आदि पवित्र नदियों का तट सहित देश के अन्य नदी, तालाबों, आहर व अन्यान्य जलस्रोतों पर स्नान कर तिल, गुड़, खिचड़ी आदि खाने व दान देने की परम्परा है । झारखण्ड प्रदेश के गुमला जिले के सर्वाधिक प्राचीन ग्राम मुरूनगुर अर्थात मुरगु में तो मकर संक्रान्ति के दिन दक्षिणी कोयल नदी के तट पर मकरध्वज भगवान् की रथयात्रा निकाली जाती है । इसके पूर्व कोयल नदी के अम्बाघाघ जलप्रपात के उपरी नदी घाटों पर नदी स्नान कर भक्तजन सूर्य को अर्ध्य देते हैं और फिर नदी तट पर अवस्थित मकरध्वज भगवान के मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं तथा तिल – गुड़ एवं दही आदि का सेवन करते और दान देते हैं ।

 

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