लेखक परिचय

संजय द्विवेदी

संजय द्विवेदी

लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। संपर्कः अध्यक्ष, जनसंचार विभाग, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल (मप्र) मोबाइलः 098935-98888

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महात्मा गांधी जिस गांव को समर्थ बनाना चाहते थे वह आज भी वहीं खड़ा है। ग्राम स्वराज्य की जिस कल्पना की बात गांधी करते हैं वह सपना आज का पंचायती राज पूरा नहीं करता। तमाम प्रयासों के बावजूद पंचायत राज की खामियां, उसकी खूबियों पर भारी हैं। जाहिर तौर पर हमें अपने पंचायती राज को ज्यादा प्रभावी, ज्यादा समर्थ और कारगर बनाने की जरूरत है। ग्राम स्वराज एक भारतीय कल्पना है जिसमें गांव अपने निजी साधनों पर खड़े होते हैं और समर्थ बनते हैं। स्वालम्बन इसका मंत्र है और लोकतंत्र इसकी प्राणवायु। महात्मा गांधी भारतीयता के इस तत्व को समझते थे इसीलिए वे इस मंत्र का इतना उपयोगी इस्तेमाल कर पाए।

गांवों में जनशक्ति का समुचित उपयोग और सामुदायिक साधनों का सही इस्तेमाल यही ग्रामस्वराज्य का मूलमंत्र है। सदियों से हमारे गांव इसी मंत्र पर काम करते आ रहे हैं। अंग्रेजी राज ने गांवों के इसी स्वालंबन को तोड़ने का काम किया। गांधी,गांव की इसी ताकत को जगाना चाहते थे। विकास से पश्चिमी माडल से अलग भारतीय गांवों के अलग विकास का सपना देखा गया और उस दिशा में चलने की इच्छाएं जतायी गयीं। अफसोस सरकारें उस दिशा में चल नहीं पायी। सरकारी तंत्र और गांव अलग-अलग सांस ले रहे थे। इस दिशा भारतीय संविधान का अनुच्छेद -40 राज्यों को पंचायत गठन का निर्देश देता है। आजाद भारत का यह पहला कदम था जिससे पंचायती राज ने अपनी यात्रा शुरू की। पंचायत राज को लेकर बलवंतराय मेहता समिति (1957), अशोक मेहता समिति(1977), डा. पीवीके राव समिति ( 1985) और एलएम सिंघवी समिति (1986) ने समय- समय पर महत्वपूर्ण सिफारिशें की थीं। इससे पंचायती राज को एक संवैधानिक मान्यता और स्वायत्तता भी मिली। इस रास्ते में नौकरशाही की अड़चनें और भ्रष्टाचार का संकट एक विकराल रूप में सामने है पर इसने लोकतंत्र का अहसास आम आदमी को भी करवाया है। अब जबकि पंचायत में महिला आरक्षण पचास प्रतिशत हो रहा है तो इसे एक नयी उम्मीद और नई नजर से देखा जा रहा है।

1993 में संविधान के 73 वें और 74 वें संशोधन के तहत पंचायत राज संस्था को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गयी। इस व्यवस्था के तहत महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गयी जो अब पचास प्रतिशत कर दी गयी है। इसी तरह केंद्रीय स्तर पर 27 मई, 2004 की तारीख एक महत्वपूर्ण दिन साबित हुआ जब पंचायत राज मंत्रालय अस्तित्व में आया। इस मंत्रालय का गठन सही मायने में एक बड़ा फैसला था। इसने भारतीय राजनीति और प्रशासन के एजेंडे पर पंचायती राज को ला दिया। इतिहास का यह वह क्षण था जहां से पंचायती राज को आगे ही जाना था और इसने एक भावभूमि तैयार की जिससे अब इस मुद्दे पर नए नजरिए से सोचा जा रहा है। इस समय देश में कुल पंचायतों में निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या करीब 28.10 लाख है, जिसमें 36.87 प्रतिशत महिलाएं। पंचायत राज का यह चेहरा आश्वस्त करने वाला है। भारत सरकार ने 27 अगस्त, 2009 को पंचायती राज में महिलाओं का कोटा 33 से बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने का जो फैसला लिया वह भी ऐतिहासिक है। इस प्रस्ताव को प्रभावी बनाने के लिए अनुच्छेद 243( डी) में संशोधन करना पड़ेगा।

जाहिर तौर पर सरकारें अब पंचायती राज के महत्व को स्वीकार कर एक सही दिशा में पहल कर रही हैं। चिंता की बात सिर्फ यह है कि यह सारा बदलाव भी भ्रष्टाचार की जड़ों पर चोट नहीं कर पा रहा है। सरकारें जनकल्याण और आम आदमी के कल्याण की बात तो करती हैं पर सही मायने में सरकार की विकास योजनाओं का लाभ लोगों तक नहीं पहुंच रहा है। हम महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज्य की बात करें तो वे गांवों को खाद्यान्न के मामले आत्मनिर्भर बनाना, यातायात के लिए सड़क व्यवस्था करना, पेयजल व्यवस्था, खेल मैदानों का विकास, रंगशाला, अपनी सुरक्षा की व्यवस्था करना शामिल था। आज का पंचायती राज विकास के धन की बंदरबाट से आगे नहीं बढ़ पा रहा है। कुछ प्रतिनिधि जरूर बेहतर प्रयोग कर रहे हैं तो कहीं महिलाओं ने भी अपने सार्थक शासन की छाप छोड़ी है किंतु यह प्रयोग कम ही दिखे हैं। इस परिमाण को आगे बढ़ाने की जरूरत है। छत्तीसगढ़, मप्र, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, बिहार, केरल जैसे राज्यों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए राज्य सरकारें खुद आगे आयीं,यह एक बहुत ही सकारात्मक संकेत है। अब आवश्यक्ता इस बात की है कि इन सभी महिला-पुरूष प्रतिनिधियों का गुणात्मक और कार्यात्मक विकास किया जाए। क्योंकि जानकारी के अभाव में कोई भी प्रतिनिधि अपने समाज या गांव के लिए कारगर साबित नहीं हो सकता। जनप्रतिनिधियों के नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम और गांव के प्रतिनिधियों के प्रति प्रशासनिक अधिकारियों की संवेदनात्मक दृष्टि का विकास बहुत जरूरी है। सरकार ने जब एक अच्छी नियति से पंचायती राज को स्वीकार किया है तब यह भी जरूरी है कि वह अपने संसाधनों के सही इस्तेमाल के लिए प्रतिनिधियों को प्रेरित भी करे। तभी सही मायनों में हम पंचायती राज के स्वप्न को हकीकत में बदलता देख पाएंगें।

-संजय द्विवेदी

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