लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

निदेशक, विश्व संवाद केन्द्र सुदर्शन कुंज, सुमन नगर, धर्मपुर देहरादून - २४८००१

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इसे पढ़कर आप कोई गलतफहमी न पालें। मैं कोई मुफ्त चीज बांटने नहीं जा रहा हूं। इस कहावत का अर्थ है कि यदि कोई चीज मुफ्त में मिल रही हो, तो फिर उसके लिए हाथ, जेब और झोली के साथ ही दिल भी बेरहम हो जाता है। भले ही वो हमारे काम की हो या नहीं।

कहते हैं कि भारत में चाय का प्रचलन अंग्रेज कम्पनियों ने किया। वे बाजार में लोगों को मुफ्त चाय पिलाते थे; पर लोगों को लगता था कि इसमें जरूर कुछ खराब चीज है, जिसे पिलाकर ये हमारा धर्म खराब करना चाहते हैं। जैसे आजकल एक खास बिरादरी के कई मूर्ख लोग ये सोचकर अपने बच्चों को पोलियो की दवा नहीं पिलाते कि इससे बच्चे नपुंसक हो जाएंगे। वे सोचते हैं कि चूंकि हम सीधी तरह से सुधरने को तैयार नहीं हैं, इसलिए सरकार ने हमारी जनसंख्या घटाने का ये तरीका निकाला है। ऐसे बेअक्लों पर खुदा की लानत।

बस ऐसी ही धारणा उन दिनों चाय के प्रति थी; पर धीरे-धीरे मुफ्तखोरी की आदत ने जोर मारा और चाय चल पड़ी। अब किसी से मिलने जाएं, तो पानी से पहले ही चाय आ जाती है। पिछले साल मैंने एक मित्र को खाने पर बुलाया। अगले दिन उनकी पत्नी ने किसी से शिकायत करते हुए कहा कि खाना तो बहुत अच्छा था; पर भाई साहब एक कप चाय भी पिला देते, तो उनका क्या घट जाता ? तो जनाब, ये है चाय की महिमा।

खैर बात मुफ्तखोरी की हो रही थी। आजकल होली, दीवाली  जैसे पर्वों पर ये बीमारी खूब बढ़ती है। दो कमीज के साथ एक कटोरी या तीन पेंट के साथ एक प्लेट मुफ्त के विज्ञापनों से अखबार पटे रहते हैं। पिछले दिनों जी.एस.टी. लागू होने से पहले भी ऐसे विज्ञापन और सेलों की बाढ़ आ गयी थी। लाखों लोगों ने बिना जरूरत ही खरीदारी कर डाली। उन्होंने ये नहीं सोचा कि ये व्यापारी मूर्ख हैं क्या, जो अपना घर फूंक रहे हैं ? हद तो तब हुई, जब शमशान के पास वाली दुकान ने विज्ञापन में बताया कि दो कफन खरीदने पर एक बच्चे का कफन मुफ्त मिलेगा। इस पर कई लोग वहां भी पहुंच गये। ये हाल है मुफ्तखोरी का मेरे भारत महान में।

पर इन दिनों कुछ लोग मुफ्त में मिली चीजों से परेशान हैं। हमारे शर्मा जी भी उनमें से एक हैं। पिछले दिनों कुछ घरेलू कामों से उन्हें कई बार बाहर जाना पड़ा। एक दिन रेलगाड़ी में उन्होंने वेज बिरयानी मंगायी, तो उसमें छिपकली निकल आयी। यद्यपि वह भी काजू-किशमिश के साथ अच्छे से तली गयी थी, पर थी तो छिपकली ही। बस शर्मा जी का पारा चढ़ गया। उन्होंने उसका फोटो खींचकर रेलमंत्री सुरेश प्रभु को भेज दिया। अब प्रभु जी ठहरे अंतर्यामी। उन्होंने तुरंत ही खाना बनाने वाली उस एजेंसी का ठेका रद्द कर दिया।

पर कुछ दिन बाद फिर एक दुर्घटना हो गयी। इस बार उन्होंने पकौड़े लिये, तो उसमें एक कॉकरोच मिल गया। बस फिर क्या था ? शर्मा जी का गुस्सा बेकाबू हो गया। वे पकौड़े लाने वाले कर्मचारी को गाली बकने लगे। उसने बहुत समझाया कि ये पकौड़े पिछले स्टेशन से आये हैं; पर शर्मा जी का गुस्सा कम नहीं हुआ। उन्होंने पकौड़े उसके मुंह पर दे मारे।

इससे सब यात्री भी दो भागों में बंट गये। कुछ लोग शर्मा जी के पक्ष में थे, तो कुछ कर्मचारी के। शोर-शराबा होते देख टी.टी. भी आ गया; पर फिर भी शांति नहीं हुई। अगले स्टेशन पर जब गाड़ी रुकी, तो स्टेशन मास्टर को बुलाया गया। उसने शर्मा जी को समझाते हुए कहा कि छिपकली या कॉकरोच जैसी हाई प्रोटीनयुक्त चीजों को आप रेल विभाग की तरफ से मुफ्त उपहार समझें। वरिष्ठ नागरिक होने के नाते हम आपसे इनके पैसे नहीं लेंगे।

इस पर शर्मा जी की क्या हालत हुई होगी, आप समझ सकते हैं। तब से उन्होंने तय कर लिया है कि वे रेलगाड़ी में यात्रा ही नहीं करेंगे। और यदि कोई मजबूरी हुई, तो खानपान का पूरा सामान घर से ही लेकर चलेंगे।

कल जब शर्मा जी ने ये बताया, तो गुप्ता जी ने भी एक किस्सा सुना दिया। एक बार उनके चाचा जी डॉक्टर के पास दांत निकलवाने गये। डॉक्टर उस दिन अपना चश्मा घर भूल आया था। इस चक्कर में उसने चाचा जी के कई दांत उखाड़ लिये। जब चाचा जी ने शिकायत की, तो वह हंसते हुए बोला, “आप चिन्ता न करें। चाहे आपका पूरा जबड़ा उखड़ जाए, पर पैसे मैं एक दांत के ही लूंगा। बाकी सब काम को आप मुफ्त में हुआ समझें।”

ये सुनकर शर्मा जी ने अपना निर्णय बदला या नहीं, ये तो वही जानें; पर मैंने तो यात्रा के दौरान कुछ नहीं खाने का निश्चय कर लिया है। इससे बचत के साथ ही उपवास का लाभ मुफ्त में मिल जाएगा। आखिर मैं भी तो आपकी तरह ‘माले मुफ्त दिले बेरहम’ में विश्वास रखता हूं।

– विजय कुमार

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