लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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सेवा

सेवा

आज शेरगढ़ में न कोई दुकान खुली थी और न स्कूल। चूंकि आज ‘निरंजन बाबा’ के अस्थिकलश को भूसमाधि दी जाने वाली थी। पूरा गांव वहीं एकत्र था। सबको लग रहा था कि ‘बाबा’ नहीं, उनका कोई सगा-सम्बन्धी ही चला गया है। सचमुच ‘बाबा’ का व्यक्तित्व था ही ऐसा।

निरंजन बाबा के पिताजी उस इलाके के बड़े सेठ थे। हजारों एकड़ जमीन उनके पास थी। सुख-दुख में वे लोगों को कर्ज देते थे। गरीब लोग गहने या जमीन आदि गिरवी रखकर कर्ज लेते थे। समय पर कर्ज चुकाने वालों की चीज वापस हो जाती थी। बाकी की सेठ जी पर ही रह जाती थी। कम से कम दस प्रतिशत लोग तो इसी तरह फंस जाते थे। अतः सेठ जी के पास प्रायः हर गांव में जमीनें थीं। गहनों का भी बड़ा भंडार उनकी गुप्त तिजोरी में रखा था।

उन दिनों हर घर में दो-तीन बेटे होना आम बात थी; पर सेठ जी चार बहिनों के अकेले भाई थे। अगली पीढ़ी में इसमें और कटौती हो गयी, चूंकि निरंजन के बाद फिर उस घर में किसी बच्चे का आगमन नहीं हुआ। कई तरह के इलाज हुए। पत्नी के कहने पर सेठ जी ने एक भव्य शिव मंदिर भी बनवाया; पर कुछ लाभ नहीं हुआ।

एकमात्र संतान होने के कारण निरंजन की हर इच्छा पूरी की जाती थी। स्कूल जाते समय वह कभी मां से, तो कभी सेठ जी से लेकर एक-दो रुपये जेब में डाल लेता था। उन दिनों एक रुपये में आठ-दस लोगों वाले परिवार का दिन भर का राशन आ जाता था। सेठ जी और उनके पुरखों ने भरपूर धन कमाया था। उसे खर्च करने वाला निरंजन के अलावा था ही कौन ? लेकिन अत्यधिक लाड़ और दुलार का प्रायः दुष्परिणाम ही होता है। निरंजन के साथ हर समय आवारा लड़के घूमने लगे। चाट हो या कुल्फी, फिल्म हो या मेला-तमाशा; निरंजन के साथ वे सब भी मुफ्त का माल उड़ाते थे। क्रमशः यह आदत बीड़ी, सिगरेट तक पहुंच गयी। कभी-कभी वह शराब का भी सेवन कर लेता था। माता-पिता उसे बहुत समझाते थे; पर सब व्यर्थ।

सेठ जी द्वारा निर्मित शिव मंदिर की प्रसिद्धि सुनकर अनेक साधु-संत और कथावाचक वहां आने लगे। जिन दिनों निरंजन सत्रहवें वर्ष में था, उन्हीं दिनों श्रीरामकथा के लिए नैमिषारण्य से पंडित रामशरण जी पधारे। निरंजन की कथा में कोई रुचि नहीं थी। फिर भी परिवार का सदस्य होने के नाते उसे कथा में बैठना पड़ा। पंडित जी के साथ आये संगीतकारों की धुनों से कथा में चार चांद लग गये।

निरंजन की आवाज भी ठीकठाक थी। एक दिन उसने हिम्मत करके उनकी ताल से ताल मिलाकर एक भजन गाया। इसे उन संगीतकारों ने ही नहीं, पंडित जी और वहां उपस्थित श्रोताओं ने भी पंसद किया। इससे निरंजन की हिम्मत बढ़ी। अब वह हर दिन भजन गाने लगा। धीरे-धीरे उसे कथा में भी रस आने लगा। अब वह दिन में भी पंडित जी के पास जाकर बैठ जाता था। पंडित जी ने भारत के कई तीर्थों की यात्रा की थी। वहां की बातें सुनकर निरंजन का मुंह आश्चर्य से खुला रह जाता था।

एक दिन पंडित जी ने निरंजन के होठों पर जमी पपड़ी देखकर पूछा, ‘‘क्यों बेटा, तुम सिगरेट पीते हो ?’’

निरंजन ने सिर झुकाकर कहा – जी पंडित जी।

– दिन में कितनी ?

– जी दो डिब्बी तो पी ही लेता हूं।

– दो डिब्बी यानि बीस सिगरेट ?

– जी हां; पर पंडित जी मैं इसे छोड़ना चाहता हूं।

– सच में छोड़ना चाहते हो या मुंह देखी कह रहे हो ?

– जी सच कह रहा हूं। कई बार कोशिश की; पर छोड़ नहीं पाया। आपके पास कोई दवा हो तो बताइये।

– दवा तो है; पर इसके लिए पहले तुम्हें अपना मन पक्का करना होगा।

– जी मन तो पक्का है।

– नहीं, मैं तुम्हें एक सप्ताह का समय देता हूं। तब तक अच्छी तरह सोच लो। मेरी तरफ से कोई जबरदस्ती नहीं है। कथा समाप्ति तक यदि तुम्हारा मन पक्का हो जाए, तो बताना। मैं दवा दे दूंगा।

पंडित जी की बात से निरंजन बहुत प्रभावित हुआ। उसने मन पक्का किया और अगले दिन सिगरेट की सभी डिब्बियां पंडित जी के सामने ही आग में डाल दीं। कथा समाप्ति के बाद पंडित जी कुछ दिन और रुक गये। एक दिन उन्होंने निरंजन से पांच किलो बंूदी मंगायी। फिर वे बोले, ‘‘बेटा निरंजन, यदि सिगरेट छोड़ने का तेरा निश्चय पक्का है, तो हनुमान जी से यह बात बोलकर प्रसाद चढ़ा दे।’’

निरंजन ने ऐसा ही किया। अब पंडित जी उसे लेकर बाजार चल दिये। वे पहली दुकान पर गये और निरंजन से सबको प्रसाद देने को कहा। फिर पंडित जी बोले, ‘‘जानते हो ये प्रसाद क्यों बांट रहा है ? क्योंकि आज से इसने सिगरेट पीना छोड़ दिया है।’’

निरंजन को काटो तो खून नहीं; पर अब क्या हो सकता था ? निश्चय तो उसी ने किया था, और वो भी हनुमान जी के सामने। पंडित जी ने उसे हिम्मत दिलायी और पूरे बाजार में घुमाया। शुरू में तो वे ही उसके सिगरेट छोड़ने की बात कहते थे, फिर उन्होंने निरंजन से कहा कि वह स्वयं सबको यह बात कहे। मरता क्या न करता ? अब प्रसाद के साथ निरंजन खुद सबको यह बताने लगा।

अगले दिन पंडित जी वापस नैमिष चले गये। उसके बाद निरंजन ने सिगरेट को नहीं छुआ। सिगरेट छूटी, तो बाकी सब ऐब भी छूटते चले गये। सेठ जी और सेठानी जी की खुशी का ठिकाना नहीं था। उनके लिए तो पंडित जी मानो प्रत्यक्ष भगवान बनकर ही आये थे। निरंजन साल में एक-दो बार उनसे मिलने नैमिष जाने लगा। एक बार पंडित जी ने दो महीने के लिए तीर्थयात्रा पर गये, तो निरंजन भी उनके साथ चला गया। वहां से लौटकर वह दिन भर पूजा-पाठ में ही व्यस्त रहने लगा।

जब निरंजन 20 साल का हुआ, तो सेठ जी ने चाहा कि अब उसका विवाह कर दिया जाए और वह कारोबार भी संभाल ले; पर निरंजन की न कारोबार में रुचि थी और न विवाह में। उसने साफ कह दिया कि उसकी रुचि तो गरीबों की सेवा में है। उसके पूर्वजों ने गरीबों का शोषण करके जो धन कमाया है, वह सब उनकी सेवा में ही लगा देगा।

यह सुनकर सेठ जी के सारे अरमान धूल में मिल गये। अंततः उन्होंने पंडित रामशरण जी के पास नैमिष जाने का निश्चय किया। चूंकि निरंजन के जीवन मे ंपरिवर्तन उन्हीं के कारण आया था। वहां जाकर उन्होंने पंडित जी के पांव पकड़ लिये। सेठ जी ने कहा कि निरंजन गरीबों की सेवा में जितना चाहे खर्च करे। मुझे कोई एतराज नहीं है। वह पैसे के लेन-देन को अच्छा नहीं मानता, तो कोई और काम कर ले; पर विवाह तो करे। अन्यथा मेरा तो वंश ही समाप्त हो जाएगा।

पूरी बात सुनकर पंडित रामशरण जी बोले कि निरंजन पूर्व जन्म का कोई संत है। वह गरीबों की सेवा के लिए ही जन्मा है। उसे कुछ दिन के लिए मेरे पास भेज दो। मैं उसे समझाने का प्रयत्न करूंगा; पर यदि आप अधिक जिद करेंगे, तो वह संन्यासी होकर घर से ही चला जाएगा। इसलिए धैर्य से काम लें।

सेठ जी बैरंग वापस लौट आये। उनके कहने पर निरंजन नैमिष चला गया। पंडित रामशरण जी ने उसे समझाया कि यदि गरीबों की सेवा ही करनी है, तब भी कुछ आय तो होनी ही चाहिए। वरना एक दिन सारे काम पैसे के अभाव में बंद हो जाएंगे। पुरखों द्वारा संचित भंडार कितना भी हो; पर एक दिन तो वह भी समाप्त हो ही जाएगा। इसलिए किसी को धोखा मत दो। किसी का शोषण मत करो। ईमानदारी से काम करते हुए यह मानकर पैसा कमाओ कि यह सब ईश्वर की सेवा के लिए ही हो रहा है। याद रखो ‘‘नर सेवा ही नारायण की वास्तविक सेवा’’ है।

निरंजन की समझ में यह बात आ गयी। वहां से आकर उसने खेती में तो रुचि ली; पर पैसे के लेन-देन को हाथ नहीं लगाया। सेठ जी को इसी से कुछ संतोष हुआ। उन्हें लगा कि धीरे-धीरे वह बाकी काम भी देखने लगेगा। ऐसे ही दस साल बीत गये। सेठ जी के शब्दों में कहें, तो निरंजन को सद्बुद्धि नहीं आयी। उन्हें लगा कि यदि इस पैसे को भोगने वाला कोई नहीं है, तो फिर वे सुबह से शाम तक मेहनत क्यों करें ? अतः उन्होंने हरिद्वार में एक धर्मशाला बनवायी और फिर एक दिन सारे बही-खाते और तिजोरियां निरंजन को सौंप कर सेठानी के साथ वहीं चले गये।

हरिद्वार में नित्य गंगास्नान, एक समय भोजन, शाम को हर की पैड़ी पर गंगा आरती और दान-पुण्य करते हुए उन्होंने कई साल निकाल दिये। एक दिन गंगास्नान करते समय अचानक सेठानी का पैर फिसल गया। उन्हें पकड़ने के लिए सेठ जी ने हाथ बढ़ाया, तो वे भी संतुलन नहीं बना सके और देखते ही देखते दोनों गंगा जी की विशाल लहरों में समा गये। वहां स्नान कर रहे लोगों ने शोर मचाया; पर उससे क्या होना था ? काफी खोजबीन के बाद अगले दिन उनके शव मिल सकेे। दोनों ने एक-दूसरे का हाथ तब भी पकड़ा हुआ था। पता लगते ही निरंजन भी आ गया। उसने पूरे विधि-विधान से उनकी अंतिम क्रियाएं कीं। लोग सेठ जी और सेठानी जी के भाग्य को सराह रहे थे। दोनों ने जीवन भर साथ निभाने का जो संकल्प लिया था, वह मरते दम तक निभाया।

अब निरंजन भी 40 साल का हो चुका था। माता-पिता के जाने के बाद उसके जीवन में भी पूर्ण विरक्ति आ गयी। उनके वार्षिक श्राद्ध वाले दिन उसने वे सब बहियां फाड़कर गंगाजी में डाल दीं, जिन पर उसके पुरखों ने लेन-देन का हिसाब लिखा था। उसने घोषणा कर दी कि जिसने हमारे यहां से कोई पैसा लिया है, उसे अब लौटाने की जरूरत नहीं है। जिन लोगों के खेत या मकान उनके पास गिरवी रखे थे, वे सब भी उसने उनके वारिसों को सौंप दिये। उसके जीवन में हुआ यह परिवर्तन देखकर सब उसे ‘निरंजन बाबा’ कहने लगे।

इसके बाद ‘बाबा’ ने अपना जीवन गांव की सेवा में ही समर्पित कर दिया। गिरवी रखी जमीनें लौटाने के बाद भी उनके पास सैकड़ों एकड़ जमीन बाकी थी। काफी जमीन ऐसी थी, जिसका कोई वारिस ही नहीं था। उसका क्या हो ? ‘बाबा’ ने गांव के बुजुर्गों और वकीलों से सलाह कर अपनी दादी के नाम पर ‘गंगादेई सेवा न्यास’ बनाया और सारी सम्पत्ति न्यास को समर्पित कर दी। फिर उन्होंने अपने पुरखों के नाम पर कई विद्यालय, अस्पताल, कुष्ठाश्रम, विधवाश्रम, वृद्धाश्रम आदि बनवाये। कई कुएं भी खुदवाये।

इस तरह जनसेवा करते हुए ‘बाबा’ 75 साल के हो गये। गांव में उनके द्वारा स्थापित सभी काम ठीक से चल रहे थे। उन्हें पैसे का अभाव न हो, इसकी व्यवस्था भी कर दी थी। अब वे अपना समय हरिद्वार वाली धर्मशाला में गुजारने लगे। जीवन में गुरु का क्या महत्व है, वे इसके प्रत्यक्ष प्रमाण थे। वे कहते थे कि यदि मुझे पंडित रामशरण जी न मिलते, तो मैं गरीबों का खून चूसने वाला जमींदार होता या अपराधी; पर पंडित जी ने ‘नर सेवा नारायण सेवा’ का मंत्र देकर मेरा जीवन बदल दिया।

और एक दिन ‘बाबा’ ने भी शरीर छोड़ दिया। उनकी शवयात्रा में हजारों लोग शामिल हुए। ‘राम-नाम सत्य के सत्य है, सत्य बोलो मुक्ति है’ के साथ ही लोग ‘नर सेवा नारायण सेवा’ का भी उद्घोष कर रहे थे। अंतिम संस्कार में गांव के सैकड़ों लोग भी शामिल हुए। ‘बाबा’ की इच्छानुसार उनकी अस्थियों को तेरहवीं वाले दिन गांव के मंदिर परिसर में ही भूसमाधि दे दी गयी।

आप कभी शेरगढ़ जाएं, तो निरंजन बाबा की समाधि के दर्शन अवश्य करें। लोग कहते हैं कि यदि कोई श्रद्धापूर्वक सिर झुकाकर वहां अपने कान लगाए, तो समाधि से आज भी ‘नर सेवा नारायण सेवा’ की आवाज आती रहती है।

 

– विजय कुमार

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