लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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Malnutrition 846825137 कुपोषित अमीरीमशहूर शायर अदम गौढ़ ने ठीक ही कहा हैं, कि ”कोठियों से मुल्क की मैयार को मत आंकियें, असली हिन्दुस्तान तो फुटपात पर आबाद है” आज के संदर्भ में ये बात और स्पष्ट होती हैं जब देखते हैं कि भारत में हर वर्ष 31 लाख बच्चें की मृत्यु पांच वर्ष से कम उम्र में ही हो जाती हैं। और देश में सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे मध्यप्रदेश में है। इन मरने वाले बच्चों में सबसे ज्यादा बच्चें आदिवासी व दलित समुदाय के होते है। देश-प्रदेश में कुपोषण के ऐसे दर्दनाक दृश्य उन नुमांईदों को शर्मसार करने के लिये काफी है, जो कोठियों से आर्थिक विकास की तस्वीर दिखाने की कोशिश करते है। तेज आर्थिक विकास के दावों के बीच भूख और कुपोषण से मौते हमारी चिंता का सबब है। एक तरह से यह शर्म का विषय है कि आजादी के छ: दशक बाद भी हमारे नौनिहाल भूख और कुपोषण से दम तोड़ रहे है। और वह भी उन इलाकों में जहां हाशिये का समाज रहता है।

इस बात को और खुलासा किया है मई 2008 में आई सिविल सोसायटी ऑरगनाईजेशन (सीएसओ) द्वारा मध्यप्रदेश के चार जिलों में एक षोध किया गया। इस शोध प्रक्रिया के दौरान 230 कुपोषण से मौतें दर्ज की गई। इन चार जिलों में सतना में 72, खण्डवा में 62, श्योपुर में 64 और षिवपुरी में 32 कुपोषित बच्चों की संख्या देखी गई। लेकिन सरकार के आला अफसर इन मौते का कारण निमोनिया, माता और झाड़फूक बताकर वास्तविकता पर पर्दा डाल रहे हैं। प्रदेश के कर्ताधर्ता को शायद ही इस बात का एहसास होगा कि देश के सबसे ज्यादा कुपोषित 5 जिले इसी प्रदेश में है। यहां स्थिति यह हैं कि प्रदेश में हर पांच मिनट में एक षिषू की मौत होती है जो कि देश में सबसे ज्यादा है। मध्यप्रदेश में 12.6 प्रतिशत बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं, जबकि भारत में 6.4 प्रतिशत हैं। प्रदेश में कुपोषण का ग्राफ दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है। एनएफएचएस-3 की रिपोर्ट इस तथ्य को साबित करने में काफी है की प्रदेश में 3 साल तक के बच्चों की संख्या 1998-99 में 53.5 फीसदी थी जो की 2005-06 में बढ़कर 60.3 फीसदी हो गई हैं। ये वे बच्चे हैं जिन्हें बचाया जा सकता था। प्रदेश में कुपोषण से हुई मौतों में अधिकांश आदिवासी व दलित समुदाय के बच्चें हैं। प्रमुख तौर से कोल, मावाली, सहरिया, कोरकू, बैगा आदि जाति के शामिल हैं।

आखिर इतनी भयानक कुपोषण व भुखमरी आदिवासी इलाकों में ही देखने को क्यों मिलती है? आज यह एक चिन्ता का विषय हैं! आदिवासी आदिकाल से जंगलों में रहते रहे है, यहीं उनकी संस्कृति, परम्परा हैं और उनकी जिन्दगी का आर्थिक आधार है। यहीं लोग जंगल व अन्य प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुये अपनी आजीविका भी चलाते हैं। लेकिन सरकार, उनके कानून व वनविभाग ने धीरे-धीरे करके इन आदिवासियों के मुँह से निवाला भी छीन लिया हैं। जंगलों में सरकार के तैनात सिपाहियों ने यहां से इन्हें मिलने वाली लद्युवनोपज लेने से रोक लगाने पर इनकी थाली सूनी हो गई है। दूसरा विकास के नाम पर तमाम बड़ी-बडी परियोजनाऐं आदिवासी इलाकों में ही स्थापित की जाती रही है, जिन क्षेत्रों में इन परियोजनाओं को लाया जाता है वहां से इन आदिवासियों को खदेड़ कर भगा दिया जाता हैं। ना ही इनके पुर्नवास की कोई व्यावस्था की जाती है, और इन्हें शहर-कस्बों और जंगलों से दूर रहने पर विवश कर दिया जाता है। वहां यह लोग भूख में तड़ते हुये तमाम बीमारियों की चपेट में आने से मौत की आगोश में समा जाते है। इन भगाये गये आदिवासियों की यह स्थिति हैं तो इनके बच्चों का कुपोषित होना लाजमी है। प्रदेश में देखें तो 41.1 प्रतिशत आदिवासी परिवार के पास निवास स्थान के अलावा कोई अन्य भूमि नहीं है (एनएसएस)। इनके पास अन्य कृषि योग्य जमीन ना होने तथा वन से भोजन की व्यवस्था पर जबरन रोक लगने की वजह से इन लोगों को पेट भरना बमुष्किल हो रहा है। मजबूरन इन्हें कुछ दिनों के लिये मौसमी व कुछ परिवार को स्थाई रूप से पलायन करना पड़ता हैं। ऐसी स्थिति में भी इन्हें सालभर काम ना मिलना तथा वहां पर इनका शोषण होने की वजह से पूरे 365 दिन अपने व बच्चों का पेट की आग बुझाने के लिये काफी नहीं है। इस सिलसिले के चलते बच्चें कुपोषण के कारण मौत के षिकार हो रहे हैं।

6 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले इस प्रदेश में तकरीबन 20 प्रतिशत आबादी आदिवासियों की हैं। जो दूर-दराज जंगल, पहाड़ों व गांवों में रहते हैं। ये क्षेत्र ऐसे हैं जहां चिकित्सा, षिक्षा सुविधाओं का अभाव है, और कुपोषण की स्थिति ज्यादा भयाभय है। जाहिर हैं कि कुपोशण के हालात में बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहद कमजोर हो जाती है और ठीक हो जाने वाली आम बीमारी की चपेट में आ जाने पर भी उनकी मौत की संभावना बढ़ जाती है। दूसरा इन आदिवासी इलाकों में इनके लिये जननी सुरक्षा योजना, बाल संजीवनी अभियान, मुस्कान प्रोजेक्ट, शक्तिमान परियोजना, आंगनवाड़ी केन्द्र जैसी कई योजनाऐं कुपोषण के सामने दम तोड़ती ही नजर आती है। भुखमरी को मिटाने के बडे-बड़े वादों के साथ नरेगा को लाया गया परन्तु प्रदेश में नरेगा की जर्जर स्थितियां उसके उद्देश्यों, वादों नजर से कोसों दूर है। बचपन बीमार! पर बजट जाता हैं बेकार? जी हॉ एक मामला यह भी है कि सरकार द्वारा जितना बजट इन बच्चों के लिये तय किया जाता है उतना इनके लिये खर्च भी नहीं करते हैं और कुछ करते भी हैं तो भ्रष्टाचार की बलि चढ़ जाता है। पोषण आहार के बजट से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

वर्ष आंवटित(करोड़ में) खर्च
2004-05 102.93 84.59
2005-06 110.81 85.60
2006-07 144 141.7
2007-08 160 100.17

दूwसरी एक मजेदार बात यह हैं कि कुपोषण की स्थिति और आंकड़ों में हमारे परम्परागत पित्सत्तात्मक सोच का असर भी नजर आता है। होषंगाबाद जिला के इटारसी में चल रही बाल संजीवनी अभियान की रिपोर्ट  बताती हैं कि इसमें ग्रेड 3 और ग्रेड 4 के कुल 69 बच्चे अतिकुपोषित पाए गये। इसमें से लड़कों की संख्या 28 और लड़कियों की संख्या 41 थी। यह लिंगभेद की वह तस्वीर बयां करती है कि घर में बेटियों को खाने में भेदभाव किया जाता है। दूसरा जब माँ (मातृत्व) को ही भर पेट भोजन नहीं मिलेगा तब बच्चें तो कुपोषित ही होगें।

बाजारवाद का असर इन आदिवासियों की थालियों पर जोर अजमाईस कर चुका हैं। वहीं इनके द्वारा परम्परागत रूप से बोई जाने वाली फसलों से रिष्ता तोड़ना इनकी मजबूरी बन गई है। 70 के दशक के पहले तक यह लोग कोदो, कुटकी, सांवलिया, भादली जैसी फसलों को उगाते थे जो कईयों वर्षो तक भी खराब नहीं होती थी। जो इनकी जमीन में बिना खाद पानी के पैदा भी हो जाती थी। इन मोटे अनाजों में अधिकतम पोषक तत्व होते थे। बाद के दौर में गेहूँ के साथ-साथ सोयाबीन और कपास जैसी नकदी फसलों ने अपने पैर जमायें षुरू कर दिये हैं। जिससे आदिवासी किसानों का अपनी परम्परागत फसलें से धीरे धीरे नाता टूट गया है। इन लोगों के पास जो असिंचित जमीन है उनमें नगद फसल पैदा ही बहुत कम होती है। नगद फसलों के साथ रसायनिक खाद व कीटनाशक के इस्तेमाल होने से जमीन की उर्वरता व उपज की पोषिटकता खत्म हो गई। परम्परागत फसलें विलुप्त होने से खाद्य संकट पैदा हो गया है। कुपोषण को बढ़ाने में भी एक बड़ी भूमिका इसकी भी है।

वहीं जहां एक और भूख से तड़पती जिन्दगी दम तोड़ रही हैं। वहीं दूसरी और खाद्य संकट के मौजूदा दौर में फसल और खाद्यान्नों की बर्बादी का किस्सा यह है कि एक साल में करीब एक लाख 45 हजार करोड़ रूपये की फसल बर्बाद हो जाती हैं। इसी तरह गोदामों में रख-रखाब के अभाव में प्रत्येक वर्ष लगभग 3 से 4 लाख टन चावल, करीब सवा लाख टन गेहूँ चूहें, कीड़े खा जाते है, या दीमक के हवाले हो जाते है। फसलों व खाद्यान्नों की बर्बादी पर अंतराष्ट्रीय खाद्य संगठन की एक रिपार्ट के अनुसार भारत में प्रतिवर्ष जितनी फसल बेकार हो जाती है। अगर सिर्फ एफ.सी.आई व सरकारी गोदामों में खाद्यान्नों का रख-रखाब ही अच्छा कर दिया जाए, तो लगभग तीन लाख लोगों का पेट भरा जा सकता हैं। भारतीय खाद्य निगम ने वर्ष 2006-07 में यह स्वीकार किया था कि रख-रखाब व उचित भंडारण के अभाव में प्रतिवर्ष 13 करोड़ रूपये के चावल और करीब 90 लाख रूपये का गेहूँ बर्बाद हो गया है। मंदी और भुखमरी से न सिर्फ गांव या आदिवासी बल्कि शहरी गरीब भी दम तोड़ रहे हैं। आश्चर्य है कि इतनी भयानक स्थिति के बाद भी पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जार्जबुस कहते हैं कि हिन्दुस्तान में लोग ज्यादा खाने लगे हैं इस वजह से खाद्य संकट खड़ा हो गया हैं। इस बात पर भारत की महानभूतियों ने ताली बजाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। देश में भूखमरी व कुपोषण का प्रमुख कारण व्यवस्था का कुपोषित होना है, इसे सुधारने की ज्यादा जरूरत हैं।

अशोक मालवीय


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