लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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मनमोहन कुमार आर्य

मनुष्य किसे कहते हैं? इसका उत्तर है कि मननशील व्यक्ति को मनुष्य कहते हैं। मननशाल क्यों होना है, इसलिये कि हम सत्य को जान सके। सत्य को जानकर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि हमें जो दुःख प्राप्त होता है वह दूसरों के हमारे प्रति अनुचित व्यवहार के कारण ही प्रायः होता है। दुःख कोई भी मननशील व्यक्ति तो क्या कोई भी मनुष्य वा प्राणी पसन्द नहीं करते। अतः दुःखों की निवृत्ति के लिए मनुष्य को दूसरों के प्रति वह व्यवहार नहीं करना है जिस व्यवहार को दूसरे जब उसके प्रति करते हैं तो उसे दुःख होता है। इसका अर्थ मनुष्य को वही व्यवहार दूसरों के प्रति करना चाहिये जिस व्यवहार की वह दूसरों से अपने प्रति अपेक्षा करता है। ऐसा करके वह सभी मनुष्यों के सम्मुख यथायोग्य व्यवहार का उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है और इससे दुःखों की मात्रा कम व समाप्त होकर सुख की मात्रा में वृद्धि हो सकती है। संसार में अच्छे व बुरे दो प्रकार के मनुष्य होते हैं। अच्छे मनुष्यों की श्रेणी में धर्मात्मा आते हैं और दूसरी बुरे श्रेणी के मनुष्यों में ऐसे व्यक्ति जो धर्म का पालन न कर उसका हनन करते हैं। यदि समाज में धर्मात्मा अधिक होंगे तो सामूहिक सुख अधिक होगा। इसके लिए यह आवश्यक है कि मननशील मनुष्य धर्मात्माओं की अपनी पूरी सामथ्र्य से रक्षा, उनकी उन्नति तथा उनके प्रति प्रिय आचरण करें, चाहे वह धर्मात्मा लोग अनाथ, निर्बल और गुणरहित ही क्यों न हों। इसके साथ ही अधर्मात्माओं के प्रति उस मननशील मनुष्य का आचरण भी यथायोग्य होना चाहिये। इसके अन्तर्गत अधर्मात्माओं का नाश, उनकी अवनति और उनके प्रति अप्रिय आचरण करना उचित व धर्मसम्मत कार्य है। अधर्मात्माओं के प्रति अपना आचरण व व्यवहार करते समय इस बात की उपेक्षा कर देनी चाहिये कि वह चक्रवर्ती सम्राट है, सनाथ है, महाबलवान् और गुणवान भी है। जहां तक हो सके मननशील मनुष्यों को अन्यायकारियों के बल की हानि करनी चाहिये और न्यायकारियों के बल की उन्नति सर्वथा करनी चाहिये। मननशील मनुष्य को इस धर्मसम्मत कार्य करने में चाहे कितना ही दारुण दुःख प्राप्त हो, चाहे उसके प्राण भी भले ही जावें, परन्तु इस मनुष्यपनरूप धर्म से पृथक् कभी न होना चाहिये। मनुष्य का ऐसा आदर्श स्वरूप महर्षि दयानन्द ने अपनी मान्यताओं के लघुग्रन्थ ‘स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश’ में प्रस्तुत किया है। इस मनुष्य के स्वभाव व स्वरूप का आधार वेदों के ज्ञान का निष्कर्ष है और यह मनुष्य की सर्वांगीण उन्नति में स्वीकार्य परिभाषा है। मनुष्यों द्वारा इस परिभाषा के अनुसार व्यवहार न करने के कारण ही संसार में आज अनेकानेक जटिल समस्याओं का भण्डार लग गया है।

 

मनुष्य इस स्वरूप को कब प्राप्त होता है? इसके लिए मनुष्य का सद्ज्ञान से युक्त होना भी आवश्यक है। सद्ज्ञान के लिए वेदों का ज्ञान अपरिहार्य है। वेदों के ज्ञान से ही मनुष्य को ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति का स्वरूप एवं अपने कर्तव्यों व अकर्तव्यों का बोध होता है। वेदाध्ययन करने पर मनुष्य के सम्मुख ईश्वर का जो स्वरूप उपस्थित होता है उसके अनुसार ईश्वर सच्चिदानन्दादि लक्षणयुक्त है। ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं। वह सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, अनन्त, सर्वशक्तिमान, दयालु, न्यायकारी, सब सृष्टि का कर्ता, धर्ता, हर्ता, सब जीवों को कर्मानुसार सत्य न्याय से फलदाता आदि लक्षणों से युक्त है। इस सत्ता को ही ईश्वर वा परमेश्वर कहते हैं। हम मनुष्य ‘जीवात्मा’ है। हमारा जीवात्मा हमारे प्रकृतिजन्य शरीर से पृथक है। शरीर नाशवान है और जीवात्मा अविनाशी। हमारा यह जीवात्मा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख और ज्ञानादि गुणयुक्त, अल्पज्ञ तथा नित्य है। यह जन्म-जन्मान्तरों में जो शुभ व अशुभ कर्म करता है, उनके फलों के भोग के लिए इसका मनुष्य व अन्य अनेक योनियों में कर्मानुसार जन्म होता है। कर्मानुसार ही इसके अगले जन्म की योनि वा जाति, आयु व सुख-दुःख परमात्मा निर्धारित करता है। प्रकृति अति सूक्ष्म जड़़ व ज्ञानशून्य पदार्थ है जो मूल व कारण अवस्था में सत्व, रज व तम गुणों की साम्यावस्था होती है। इस परमाणुरूप रूप प्रकृति से ही ईश्वर इस सृष्टि अर्थात् पृथिवी, चन्द्र, सूर्य व समस्त लोक-लोकान्तरों का निर्माण करता है। ईश्वर, जीव व प्रकृति का सत्य ज्ञान प्राप्त कर व ईश्वर की वैदिक विधि से स्तुति, प्रार्थना व उपासना कर मनुष्य विवेक को प्राप्त होता है। यह विवेक व ज्ञान ही मनुष्य को वास्तविक मनुष्य बनाता है अन्यथा यह सामान्य मनुष्य या दुष्ट, राक्षस, अनार्य व मनुष्यता का शत्रु बन जाता है। अतः अच्छे व आदर्श मनुष्य के निर्माण में वैदिक संस्कारों की आवश्यकता अपरिहार्य है।

 

वेदों के अध्ययन अथवा महर्षि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश आदि ग्रन्थों का अध्ययन कर मनुष्य सद्ज्ञान व विवेक को प्राप्त हो सकता है जो कर्तव्य-अकर्तव्यों के बोध व निर्धारण में परम सहायक है। ऐसा मनुष्य योगाभ्यास की रीति से ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना करेगा, यज्ञ-अग्निहोत्र करेगा, माता-पिता-आचार्यों आदि की सेवा करेगा, परोपकार व दान आदि करते हुए अपने जीवन को अहिंसक मार्ग पर चलायेगा और ऐसा करके जीवन के चार पुरुषार्थों व लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त हो सकता है। मनुष्यों के कर्तव्यों का उल्लेख आरम्भ में ही मनुष्य की परिभाषा पर विचार करते हुए कर दिया है। मनुष्य के कर्तव्यों में ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना आदि उसके अनेक कर्तव्य सम्मिलित हैं। देश-प्रेम, देशभक्ति, समाजोत्थान व देशोन्नति के कार्य व सबके प्रति सम्मानजनक यथायोग्य व्यवहार भी मनुष्य के कर्तव्यों में सम्मिलित है। जो लोग ऐसा व्यवहार नहीं करते वह मनुष्य कहलाने के अधिकारी नहीं हैं और न ही वह धार्मिक कहे जा सकते हैं। मनुष्य के लिए कुछ जानने योग्य प्रमुख बातें व नियमों को लिखकर इस लेख को विराम देंगे।

 

मनुष्यों को यह जानना चाहिये कि सब सत्य विद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं उन सब का आदि मूल परमेश्वर है। ईश्वर सच्चिदानन्द-स्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी की उपासना करनी योग्य है। वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़़ना-पढा़ना और सुनाना-सुनना सभी श्रेष्ठ गुण वाले मनुष्यों का परम धर्म है। सत्य के ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने में सभी मनुष्यों को सर्वदा उद्यत रहना चाहिये। सभी मनुष्यों को अपने सब काम धर्मानुससार अर्थात् सत्य और असत्य का विचार करके करने चाहियें। सब मनुष्यों को अपनी शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति के प्रति जागरूक रहना चाहिये और इस कार्य के लिए महर्षि दयानन्द के ग्रन्थों का अध्ययन कर सहायता लेनी चाहिये। सबसे प्रीतिपूर्वक धर्मानुसार यथायोग्य व्यवहार करना चाहिये। अवद्यिा का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये। प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से सन्तुष्ट न रहना चाहिये, किन्तु सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये। सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम पालन करने में सब स्वतन्त्र रहें। यह भी कहना उचित है वेदों से ही मनुष्यों के समस्त कर्तव्यों का निश्चय होता है। अतः सभी मनुष्यों को प्रतिदिन वेदों का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिये इससे उनका जीवन आदर्श, उत्कृष्ट सफल होगा और वह सच्चे मनुष्य बन सकेंगे।

 

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