लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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देश की दो बड़ी पार्टियां-कांग्रेस और भाजपा। दोनों पार्टियों के दो बड़े नेता मनमोहन सिंह और लालकृष्ण आडवाणी। दोनों को अपने बारे में फीलगुड है कि देश उन्हें पीएम देखना चाहता है। इस भावना को आप महत्वाकांक्षा नही कह सकते इसे तो फीलगुड का एक विकार माना जाना ही श्रेयस्कर है। क्योंकि इन दोनों को ये पता नही है कि इन्हें देश विदा कह चुका है, इनका नाच फीका हो चुका है और देश नही चाहता कि अब भी ये अपने आपको भारतीय राजनीति के शीर्ष पद के लिए उपयुक्त मानें।
इस सबके उपरांत भी दो बड़ी खबरें हैं कि मनमोहन ने स्वयं की तीसरी पारी के लिए तैयारी करनी आरंभ कर दी है और भाजपा पीएम पद का उम्मीदवार फिर से लालकृष्ण आडवाणी को ही बनाने जा रही है। कांग्रेस को जैसे ही अपने मनमोहन की फीलगुड की बीमारी की जानकारी हुई है उसने तुरंत अपने ‘बिना पंखों के सफेद कबूतर’ को उड़ान भरने के जोखिमों से सचेत कर दिया है। जबकि भाजपा की स्थिति दूसरी है। वास्तव में भाजपा की अंदरूनी खींचतान और कलह के कारण ही देश के सामने नेतृत्व का संकट छाया हुआ है और देश एक ऐसे नेता (मनमोहन सिंह) को नेता मान रहा है जो नेतृत्व के लिए ना तो पैदा हुआ और जिसने ना ही नेतृत्व के गुण विकसित किये। इतिहास उसे किस रूप में याद करेगा यह तो नही कहा जा सकता लेकिन इतिहास इस नेता के भाग्य पर ‘ईष्र्या’ अवश्य करेगा। जिसने मैदान की लड़ाई कभी नही लड़ी फिर भी मैदान उसके नाम रहा-यह थोड़ी बात नही है।
परिस्थितियां बड़ी तेजी से मोड़ ले रही हैं। मुलायम सिंह यादव भाजपा को मूर्ख बनाने में सफल हो गये। उन्होंने बड़ी चतुराई से आडवाणी की प्रशंसा की और उनकी प्रशंसा का परिणाम रहा कि ‘बूढ़ा और थका हुआ शेर’ फिर से मांद से बाहर आने लगा है। जिसकी ओर से देश मुंह फेर चुका था फिर से देश को उसकी ओर देखने के लिए विवश किया जा रहा है। मुलायम सिंह की आडवाणी की प्रशंसा कर किसी भी मुस्लिम संगठन ने कोई नकारात्मक टिप्पणी नही की है, जाहिर है कि ऐसा सोची समझी रणनीति और राजनीति के तहत नरेन्द्र मोदी को पीएम प्रत्याशी होने से दूर रखने के लिए आडवाणी को थपकी दी गयी है। इससे भाजपा ने यदि आडवाणी को ही पीएम पद का प्रत्याशी घोषित करने की गलती की तो निश्चित ही यह पार्टी आत्मविनाश का रास्ता तय करेगी। लेकिन मुलायम सिंह यादव तब भी सफल होंगे। क्योंकि भाजपा यदि आगामी चुनावों में अकेली सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी तो मुलायम सिंह सत्ता से दूर खड़ी दोनों पार्टियों से ‘सत्ता मेरे लिए और तुम मेरे पायदान’ वाली स्थिति पैदा कर सकते हैं। तब भाजपा को साम्प्रदायिकता के नाम पर सत्ता से दूर रखने के लिए सभी सैकुलर पार्टियां एक हो जाएंगी और सपा उस स्थिति का लाभ उठाएगी। भाजपा को उस स्थिति में अपने सिद्घांतों को ताक पर रखना पड़ेगा और मुस्लिम साम्प्रदायिकता के सामने घुटने टेकने पड़ेंगे। वह स्थिति भाजपा को कब्र में ले जाएगी। यदि भाजपा और कांग्रेस की स्थिति सीटों को लेकर लगभग एक जैसी रही और मुलायम सिंह यादव भाजपा के निकट गये तो कांग्रेस सपा की साइकिल को कमल से दूर करने के लिए किसी मुस्लिम को पीएम बनाने की घोषणा कर सकती है। क्योंकि कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व एक दम बचकाना है और उसमें राजनेता के सभी आवश्यक गुणों का नितांत अभाव है, वह राजनीतिज्ञ बनने की तैयारी कर रहे हैं। इसलिए देश को एक प्रयोगशाला मानकर चलने की सोच से ग्रसित हैं। अत: भाजपा कांग्रेस को अथवा उसकी पसंद के व्यक्ति को पीएम पद से दूर रखने के लिए मुलायम सिंह यादव को पीएम बनाकर बहुसंख्यकों से कह सकती है कि उसकी पसंद फिर भी एक हिंदू को पीएम बनाने की रही। जबकि कांग्रेस भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए मुस्लिमों से कह सकती है कि सत्ता पर भाजपा को कब्जा करने से रोकने के लिए और मुस्लिमों को उसके आतंक से बचाने के लिए एक अकेली वही पार्टी है जो देश को ही मुस्लिमों को देने को तैयार है। परंतु 2014 के आने से पूर्व कुछ और भी घटित हो सकता है। नरेन्द्र मोदी यद्यपि बड़ी सधी सधाई चाल से ‘कुर्सी’ की ओर बढ़ रहे हैं, उनके लिए गुजरात के मुख्यमंत्री की कुर्सी छोटी पड़ गयी है लेकिन वह इस बात का अहसास कतई भी नही करा रहे हैं कि ‘गुजरात की कुर्सी’ से उनका मन भर चुका है। इसके उपरांत भी प्रश्न यही है कि नरेन्द्र मोदी आखिर कब तक शांत रहेंगे? पारी जाती देख यदि वह कहीं असंतुलित हो गये तो भाजपा में मोदीत्व के दिन आ जाने में यकीन रखने वाले लोग पार्टी में विभाजन भी करा देंगे। हमारा मानना है कि यदि ऐसा हुआ तो पलड़ा नरेन्द्र मोदी का भारी रहेगा लेकिन आडवाणी के साथ फिर भी 30-40 प्रतिशत भाजपा होगी। जाहिर है कि ऐसी स्थिति में आडवाणी तो पाल से लग जाएंगे लेकिन कमजोर भाजपा के लिए 2014 फतह करना असंभव हो जाएगा। सत्ता के निकट जाकर भी वह सत्ता से दूर होगी, पर सत्ता में आने के लिए नरेन्द्र मोदी पार्टी को ऊर्जान्वित अवश्य कर सकते हैं। क्योंकि उनके पास समय है। सटीक सोच है और सिद्घांतों से समझौता न करने की स्पष्ट रणनीति भी है। वर्तमान परिस्थितियों में लग ये रहा है कि भाजपा जंग हारने की तैयारी में है जबकि कांग्रेस मनमोहन सिंह से पिण्ड छुड़ाने की तैयारी में है और इस स्थिति का लाभ उठाने के लिए मुलायम सिंह यादव, शरद यादव, नीतीश कुमार, शरद पवार, जैसे नेता प्रतीक्षा कर रहे हैं। वैसे स्पष्ट कर दें कि मुलायम सिंह यादव की गोटियां भी उत्तर प्रदेश के साथ देने पर ही अपने लक्ष्य पर फिट बैठ पाएंगी। उत्तर प्रदेश में अंकल मंत्रियों के बीच फंसे एक असहाय मुख्यमंत्री के राज में सपा की साईकिल की चाल धीमी पड़ चुकी है। बेनी के तरकश से आने वाले तीर बराबर चल रहे हैं, उनके पीछे कौन खड़ा है? और ‘हाथी’ क्या कर रहा है? मुलायम सिंह भाजपा के ‘कमल’ की ओर साईकिल से जा रहे हैं पर मैदान में हाथी ‘फीलगुड’ कर रहा है, इसलिए मुलायम सिंह यादव को भी सावधान रहना होगा। जंगी नीति में थोड़ा सा छिद्र रह जाने पर परिणाम उलटे भी आ जाते हैं।
वैसे इन सब स्थितियों-परिस्थितियों के बीच भाजपा के लिए यह संतोष की बात है कि उसका अध्यक्ष इस समय एक सुलझा हुआ राजनेता है, और राजनाथ सिंह ने बड़ी सावधानी से मोदी को साथ लेकर अपनी स्थिति मजबूत करते हुए देश को संकेत दे दिया है कि वह नरेन्द्र मोदी की बड़ी भूमिका के लिए तैयार रहे। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि लालकृष्ण आडवाणी की बासी कढ़ी में उफान आने के दिन अब लद चुके हैं, इसलिए आडवाणी को किसी गलत फहमी में नही रहना चाहिए। आडवाणी के साथ दुर्भाग्य यह रहा कि उन्होंने भाजपा को ऊंचाईयां तो दीं लेकिन उन ऊंचाईयों को वह कभी कैश नही कर पाए। उनका समय अटल बिहारी वाजपेयी जैसे कद्दावर नेता के समय में ही पूर्ण हो गया। इसलिए भाजपा में कभी आडवाणी युग नही आया। आज भी उन्होंने राजनाथ सिंह की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन के समय अपने लोगों को कार्यकारिणी में सम्मिलित कराने का भरसक प्रयास किया, लेकिन उन्हें सफलता नही मिली। इसलिए राजनाथ सिंह की समझदारी और होशियारी से आडवाणी की सारी चालें फेल हो गयीं हैं। पिछले सप्ताह बनने वाली बड़ी खबर कि आडवाणी भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार होंगे, को राजनाथ सिंह व नरेन्द्र मोदी ने मिलकर फुस्स कर दिया है। इन परिस्थितियों में स्पष्ट हो गया है, कि राजनाथ सिंह एक समझदार राजनीतिज्ञ हैं जो यह भली भांति जान रहे थे कि आडवाणी के नाम पर पार्टी में कोई भी चर्चा चलाना जहां पार्टी के लिए अहित कर सिद्घ होगा वहीं देश की जनता भी पार्टी के उस निर्णय पर अपनी मौहर नही लगाएगी। तब देश को जो परिस्थितियां झेलनी पडेंगी वो एकदम खतरनाक होंगी और उनकी जवाब देही से भाजपा का नेतृत्व बच नही पाएगा। राजनाथ सिंह ने कुशल खिलाड़ी और कुशल राजनेता की जो समझ दिखाई है उसके लिए वह बधाई के पात्र हैं।
मनमोहन सिंह, नरेन्द्र मोदी के सामने किसी भी दृष्टिकोण से टिक पाएंगे इसमें संदेह है जो संकेत और संदेश देश की जनता की ओर से मिल रहा है उससे स्पष्ट हो रहा है कि देश का जनमानस नरेन्द्र मोदी के साथ है। परंतु इसके बाद भी भाजपा को किसी गलतफहमी में नही रहना चाहिए, संघर्ष, सचेत अवस्था, सतर्क स्थिति और सुव्यवस्थित पार्टी संगठन आने वाली जंग को जीतने के लिए आवश्यक है। साथ ही पार्टी में नरेन्द्र मोदी के आगमन के बाद यह बात भी स्पष्ट होनी चाहिए कि पार्टी नरेन्द्र मोदी के साथ है और वह हिंदुत्व के किसी मुद्दे पर या पार्टी की पुरानी हिंदूवादी सोच के साथ समझौता करने के लिए तैयार नही हैं, जो गलतियां अतीत में हुईं हैं उन्हें पार्टी दोहराएगी नही। नरेन्द्र मोदी विकास के मॉडल को लेकर गुजरात से दिल्ली पहुंचे हैं, परंतु भारत को विकास केवल भौतिक क्षेत्र में ही नही चाहिए अपितु आध्यात्मिक क्षेत्र में भी चाहिए जिसे भारत का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद कहा जाता है। यह मानना पड़ेगा कि भाजपा ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को परिभाषित करते हुए अपने तरह की परिभाषा गढ़ी और देश के बहुसंख्यक समाज के साथ छल किया, लेकिन अब सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नयी बयार बहने के दिन आ गये हैं। जिस पर पार्टी को पुन: आत्ममंथन करना होगा तभी वह सत्ता में आकर अपने विकास के मॉडल को सही स्वरूप दे सकती है। पार्टी को मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार, यशवंत सिन्हा, जसवंत सिंह, सुषमा स्वराज, अरूण जेटली आदि सभी नेताओं की आवश्यकता है, इसलिए उनकी भूमिकाएं तय करके उन्हें भी पूरे सम्मान के साथ रखा जाए।  तभी पार्टी के लिए 2014 मिशन में सफलता मिलना संभव होगी।manmohan and adwani

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2 Comments on "मनमोहन और आडवाणी की ‘फीलगुड’ और मोदी की धमक"

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राकेश कुमार आर्य
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डा० ठाकुर महोदय बात मेरी भी सही हो सकती है और आपकी भी समुचित उत्तर के लिए समय की प्रतीक्षा करनी ही पड़ेगी इसलिए हमारी आपकी बहस का वर्तमान में कोई औचित्य नहीं है मैं आपके स्नेह को नमन करता हूँ।

dr dhanakar thakur
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भारतीय राजनीति के शीर्ष पद के लिए मोदी को ही उपयुक्त मानना एक पूर्वाग्रह मात्र है वैसे वह विपक्ष के नेता अच्छी होंगे यदि चुनाव लड़े तो॥ कर्नाटक जा नाही रहे, हिमाचल गए तो कुछ हौवा नाही- देश काँग्रेस से आहत है पर भाजपा अपनी करनी से वह स्थान लेल नाही जा रही है- मीडिया के आकलनों से लगता है भानकर परिवर्तन होने जा रहा है पर कोई यह नही बता रहा की भाजपा को सेटेन कहाँ बढ़ रही है? जब तक उत्तर प्रदेशमे 50 सीटें इसे नाही मिलती इसका बहुमत कल्पना मात्र है ॥ तो फिर क्या होगा? कोई… Read more »
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