लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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rateप्रमोद भार्गव

बनारस हिंदू विश्व विद्यालय के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय के आमंत्रण पर १९१६ में महात्मा गांधी ने विवि के समारोह में भागीदारी की थी। समारोह के मुख्य अतिथि वाइसराय थे। वाइसराय के उद्बोधन के बाद महात्मा गांधी को बोलना था। वे बोले, ‘जिस देश की ज्यादातर आबादी की तीन पैसा भी रोजाना आमदनी नहीं है,किंतु वहीं देश के वाइसराय पर रोजाना तीन हजार रूपए खर्च होते हैं। मैं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि समाज में ऐसे लोगों का जिवित रहना बोझ है।‘ अगार आज गांधी जी होते और जनता के धन से भोजन का स्वाद चख रहे सांसदों की उन्हें आरटीआई से सामने आई जानकारी मिलती तो क्या सांसदों को गांधी यही श्राप नहीं देते ? एक तरफ देश के जन प्रतिनिधियों पर रोजाना करोड़ों रूपए खर्च हो रहे हैं,उन्हें अनेक प्रकार की अन्य सुविधाएं निशुल्क दी जा रही हैं,बावजूद जनप्रतिनिधि हैं कि खुद तो सब्सिडी का भोजन उड़ा रहे हैं,परंतु जो वास्तव में गरीब हैं,भूख की गिरफ्त में हैं,उनकी न तो गरीबी रेखा तय की जा रही है और न ही खाद्य सुरक्षा ? नरेंद्र मोदी सरकार ने तो लोक कल्याणकारी योजना-मदो में सब्सिडी की कटौती करके गरीब के मुंह से निवाला छिनने का काम भी किया है। लेकिन यही सरकार संसद की रसोई से परोसी जाने वाली थाली में दी जाने वाली सब्सिडी खत्म करने को आमादा दिखाई नहीं देती ?

सूचना के अधिकार कानून के तहत मांगी गई जानकारी सामने आने पर पता चला है कि हमारे माननीय सांसद गरीब के हिस्से का भोजन करके डकार लेने को भी तैयार नहीं हैं। यही वजह है कि उन्हें न तो आहारजन्य विसंगतियों का आभास होता है और न ही अनाज के उत्पादक किसान की आत्महत्या से पीड़ा होती है ? क्योंकि उन्हें तो सब्सिडी के भोजन से पेट भरने की छूट मिली हुई है। वह भी गुणवत्तायुक्त स्वादिष्ट भोजन की। बावजूद खाद्य मामलों की समिति के अध्यक्ष व टीआरएस सांसद जितेंद्र रेड्डी का कहना है कि ‘यह सब्सिडी बंद की गई तो किसी के पेट पर लात मारने जैसी घटना होगी। ‘वहीं केद्रीय मंत्री वैंकया नायडू इस सब्सिडी को मानवीय पहलू से जोड़कर बंद नहीं करने की दलील दे रहे हैं।

सांसदों और संसद में काम करने वाले अधिकारी व कर्मचारियों को बेहद सस्ती दरों पर भोजन दिया जा रहा है। रोजाना करीब चार हजार लोग छूट आधारित शाकाहारी व मांसाहारी भोजन का लुत्फ उठाते हैं। संसद की कैंटीन में तड़का मछली २५ रूपए में,मटन कटलेट १८ रूपए में,सब्जियां ५ रूपए में,मटन करी २० रूपए और मसाला डोसा ६ रूपए में मिलता है। सांसदों को ये खाद्य सामग्रियां इतनी सस्ती इसलिए मिलती है,क्योंकि इनके वास्तविक लागत मूल्य पर क्रमश: ६३ फीसदी,६५ फीसदी,८३ फीसदी,६७ फिसदी और ७५ फिसदी सब्सिडी सरकारी खजाने से दी जाती है। पूड़ी-सब्जी पर तो यह सब्सिडी ८८ प्रतिषत है। हम सब अच्छी तरह से जानते है कि अधिकतम गुणवत्ता के मानकों का पालन करके तैयार होने वाला यह आहार इतनी सस्ती दरों पर मामूली से मामूली ढाबे पर भी मिलना मुश्किल है ?

स्वंय सरकार द्वारा ही दी गई जानकारी से पता चला है कि मांसाहारी व्यंजनों के लिए कच्ची खाद्य वस्तुएं ९९.०५ रूपए में खरीदते हैं,और माननीय सांसदों को ३३ रूपए में परोसते हैं। पापड़ की दर पर भी छूट दी जाती है। बाजार से पापड़ १.९८ रूपए प्रति नग की दर से खरीदा जाता है और एक रूपए में संसद में बेचा जाता है। यानी ९८ प्रतिषत सब्सिडी पापड़ के प्रति नग पर दी जा रही है। कैंटीन में रोटी एकमात्र ऐसा व्यंजन है,जो लाभ जोड़कर बेची जाती है। प्रति रोटी लगत खर्च ७७ पैसे आता है,जबकि इसे एक रूपए प्रति नग की दर से बेचा जाता है। हालांकि सस्ते से सस्ते ढाबे पर भी रोटी की कीमत २ रूपए से लेकर ५ रूपए तक है। संसद की रसोई की ये दरें खाद्य समिति ने २० दिसंबर २०१० को लागू की थीं,तब से लेकर अब तक इन दरों में कोई बढ़ोत्तरी नहीं कि गई। जबकि सांसदों के वेतन-भत्ते बढ़ती महंगाई के अनुपात में निरंतर बढ़ते रहे हैं। वर्तमान में सांसद को प्रतिमाह लगभग एक लाख,४० हजार रूपए मिलते हैं। इसलिए सांसद और संसद के अधिकारी व कर्मचारियों को सब्सिडी आधारित भोजन की व्यवस्था बंद करने की जरूरत है। लेकिन माननीयों के मुंह से निवाला छीनने की हिम्मत कौन जुटाए ?

बीते पांच सालों में सांसद ६० करोड़ ६० लाख सब्सिडी आधारित भोजन का आनंद ले चुके हैं। २००९-१० में यह छूट १०.०४ करोड़ रूपए थी,तो २०१०-११ में ११.०७ करोड़ रूपए थी और २०१३-१४ में बढ़कर १४ करोड़ हो गई। यह छूट ७६ प्रकार के व्यंजनों पर दी जाती है। इस छूट का प्रतिषत ६३ से लेकर १५० प्रतिषत तक है।

देश चलाने वाली संसद का यह कितना अमानवीय पहलू है कि लोकसभा व राज्यसभा सांसदों समेत कर्मचारियों का अमला तो छूट आधारित आहार से गुलछर्रे उड़ा रहा है,लेकिन उसे उस गरीब व वंचित आबादी की चिंता नहीं है जिसे वास्तव में खाद्य सुरक्षा की जरूरत है। यही वजह है कि अभी तक गरीबी-रेखा,आंकड़ो की कलाबाजी में उलझी है। देश में कई दशकों से ग्रामीण और षहरी गरीब व्यक्ति की प्रतिदिन की आमदनी तय करने की खींचतान चल रही है,लेकिन रेखा अभी तक किसी एक बिंदु पर जाकर टिक ही नहीं पाई है। गरीबी रेखा के जिस तरह से संदेहास्पद और विरोधाभासी आंकड़ें सामने लाए जाते हैं,उससे यह रहस्य गहराता है कि गरीबी का स्पष्ट खुलासा करने की बजाय,सरकारें उसे छिपाने के उपाय बड़े स्तर पर करती रही हैं,जिससे खाद्य सुरक्षा अटकी रहे। यही वजह है कि मौजूदा हालातों में भारत दुनिया के ऐसे देशों की पांत में दर्ज है,जहां भूखों की सबसे बड़ी आबादी है और करीब ४७ प्रतिषत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। तय है देश के शाकाहारी और मांसाहारी दोनों ही प्रकृति के सांसदों ने अपने तो भोजन प्रबंध पुख्ता कर लिया,लेकिन गरीब के भोजन की परवाह उन्हें नहीं है।

इन सांसदों को यह भी सोचने की जरूरत है कि बकरे,मुर्गे और मछली का जो चटखारे वाला मांस वे कमोवेश मुफ्त में खा रहे हैं,उसे तैयार करने में कितना अनाज खर्च हो रहा है ? जानकारों की मानें तो १०० कैलोरी की उच्च गुणवत्ता का मांस तैयार करने के लिए ७०० कैलोरी अनाज बकरे और मुर्गों को खिलाना पड़ता हैं। यही वजह है कि देश में आर्थिक उदारवाद की नीतियां लागू होने के बाद से भूखों की संख्या लगातार बढ़ रही है। करीब २५ करोड़ लोगों को पेट भर भोजन नहीं मिल रहा है और २२ करोड़ से भी ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं। इस भूख का सबसे ज्यादा दंश महिलाओं को झेलना होता है,क्योंकि उन्हें स्वंय की क्षुधा-पूर्ति से कहीं ज्यादा प्रकृतिजन्य कारणों व जन्मजात संस्कारों के चलते संतान की भूख मिटाने की चिंता होती है। लिहाजा भूख के शिकार लोगों की संख्या में ६० प्रतिषत महिलाएं होती हैं। महिलाओं की भूख की इस पीड़ा की फिक्र देश की महिला सांसदों को भी नहीं है,क्योंकि उनके मुख से इस पीड़ा से जुड़े सवाल संसद में सुनाई नहीं देते ? बहरहाल,आरटीआई के माध्यम से सामने आई इस जानकारी से केंद्र को सबक लेने की जरूरत है कि आमजन की आजीविका और रोजगार से जुड़ी सब्सिडी में कटौती की जो तत्परता दिखाई जा रही है,उसी तत्पारता से संसद के अमले को भोजन में दी जा रही सब्सिडी को समाप्त किया जाए ?

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1 Comment on "भरे पेट माननीयों को सब्सिडी"

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mahendra gupta
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हैरतंगेज यह भी है कि इसके बाद वे अपने वेतन भत्ते व सुविधाएँ 75 प्रतिशत तक बढ़ाने की सिफारिश कर रहे हैं वह तो सरकार जनता के मूड को भांप कर अपनी असहमति व्यक्त कर रही है लेकिन देर सबेर यह बढ़ा ही लेंगे जनता के कष्ट से इन् बेशर्मों को कोई लेना देना नहीं। जनसेवा के नाम पर चुनकर आने वाले , झूठे टसुए बहाने वाले यह नेता किसी भी दल के क्यों न हो इस विषय पर एक हैं ,तब ये न सदन में हंगामा करेंगे न बहस करेंगे न सदन को स्थगित करने की नौबत आएगी
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