लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

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डॉ. दीपक आचार्य

गहरा रिश्ता है मनु-हरित कुल का

परंपरागत प्रजातियों का संरक्षण जरूरी

प्रकृति और मनुष्य के बीच सनातन रिश्ता सदियों पुराना और गहरा है। यों कहा जाए कि दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं तब भी कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जैसी प्रकृति होगी, जिस तरह का परिवेश होगा, उसी प्रकार की स्थानीय सृष्टि का स्वरूप और स्वभाव निर्धारित होगा। चाहे वह मनुष्य या जानवर हों या पेड़-पौधे।

हर स्थान विशेष की जलवायवीय अनुकूलताओं, स्थानीय मृत्तिका की किस्म और आबोहवा के हिसाब से पूरा परिवेश स्वतः ढलता चला जाता है। दुनिया के कोने-कोने में प्रकृति, परिवेश और मानवी सृष्टि का यह संबंध निरन्तर शाश्वत है जिसके अनुरूप प्रत्येक भौगोलिक क्षेत्र की अपनी विशिष्ट खासियतें प्रकट हुई हैं।

मानव कुल और हरित कुल का यह संबंध युगों-युगों से रहा है। जीव और जगत का यह सृष्टि क्रम न्यूनाधिक रूप से परिवर्तनों का संसार भी रचता रहा है। हर क्षेत्र की मानवी सृष्टि और परिवेशीय हरितिमा तथा पेड़-पौधों और भौमिक आभामण्डल अलग-अलग रंगों, स्वरूपों और आकारों में ढला हुआ होता है।

हर क्षेत्र में उसी प्रकार की भौगोलिक स्थितियों, आबोहवा और वहाँ के स्थानीय निवासियों के जीवन निर्वाह के लिए उपयोगी पेड़-पौधे, फल-फलादि आदि होते हैं।

इन भिन्न-भिन्न प्रकार की वानस्पतिक समृद्धि युक्त क्षेत्रों में स्थानीय परंपरागत प्रजातियों के पेड़-पौधे, औषधीय वनस्पतियां होती हैं जो उसी क्षेत्र के लिए ज्यादा प्रभावी असर दिखाती हैं। हर क्षेत्र के लिए वहाँ की जलवायु और प्रकृति के अनुरूप पेड़-पौधों का सघन अस्तित्व रहता आया है।

हाल के वर्षों में सभी क्षेत्रों में वैश्वीकरण और विदेशी ज्ञान विस्फोट के व्यापीकरण की वजह से प्रकृति के दोहन-शोषण के साथ कई नवीन प्रयोग अपनाए जाने लगे हैं जिनकी वजह से हर क्षेत्र में वानस्पतिक प्रदूषण जैसी स्थितियाँ पैदा हो गई हैं और संकर किस्मों का बाहुल्य होता जा रहा है।

जब हर क्षेत्र में अत्याधुनिक प्रयोग होने लगे हैं फिर वनस्पतियां और पेड़-पौधे भी इनसे वंचित क्यों रहें? लेकिन इन नवीन प्रयोगों के अंधाधुंध इस्तेमाल के साथ ही परंपरागत स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण को पर्याप्त महत्त्व नहीं मिल पाया, इस कारण विभिन्न क्षेत्रों की वनस्पतियों का जो हश्र हो रहा है वह हास्यास्पद तो है ही, उन लोगों के लिए दयनीय है जो इस क्षेत्र में आमूलचूल बदलाव के झण्डाबरदार हैं।

अब स्थितियां ये होती जा रही हैं कि असली गायब होते जा रहे हैं और नकली प्रतिस्थापित होते जा रहे हैं। ये नकली भी पूरी तरह नकली नहीं हैं बल्कि आधे-अधूरे ही हैं। हमारे देश की परंपरागत वन सम्पदा और विलक्षण वनस्पतियों की महान व्यापक परंपरा पर चौतरफा हमले हो रहे हैं।

इन सबके पीछे विदेशियों की विकृत मानसिकता और हमारे यहां के विदेशी सोच वाले उन महान लोगों की अहम् भूमिका रही है जो अपनी प्रतिष्ठा और नाम के लिए देश के साथ नए-नए प्रयोग करते हुए अपना कार्यकाल सुनहरा बनाने के लिए नित नूतन हथकण्डों को अपनाने के आदी हो चले हैं।

वह जमाना भी करीब-करीब गुजर ही गया है जब स्थानीय फल-फलादि, बीजों, जड़ी-बूटियों आदि वानस्पतिक उत्पादों की वजह से स्थानीय मानवी सृष्टि और पशु-पक्षियों का संसार अपने जीवन निर्वाह लायक सभी प्रकार की मांग को आसानी से पूरी कर लिया करता था और उसे अपना पेट भरने के लिए या आजीविका के लिए पराये लोगों की कृपा दृष्टि पर निर्भर रहने की विवशता नहीं हुआ करती थी।

धीरे-धीरे यह वानस्पतिक संपदा उत्तरोत्तर परिवर्तन की भेंट चढ़ती गई और आज हमारी स्थिति यह है कि वनों के खात्मे के साथ ही वनोपज की उपलब्धि नगण्य हो गई है और इसका जो सीधा व नकारात्मक आज के परिवेश पर पड़ रहा है वह हम सभी को भलीभांति ज्ञात है ही।

देश भर में विभिन्न फलों, बीजों, छालों, पत्तों, जड़ी-बूटियों और विशिष्ट वानस्पतिक उत्पादों के लिए कई क्षेत्र प्रसिद्ध रहे हैं लेकिन अब इनमें से कुछ को छोड़ कर शेष में वानस्पतिक क्षरण का जो माहौल बना है उसने स्थानीयों की आर्थिक और सामाजिक स्थितियों को विषमताजनक हालातों में ला खड़ा दिया है।

परंपरागत पेड़-पौधों और विलक्षण वानस्पतिक परंपराओं से भरे-पूरे क्षेत्रों में अब विलायती बबूल, बेशरमी, कांग्रेस घास, ऎरे जैसी उन वनस्पतियों की भरमार है जिन्हें विदेशों की देन माना जा सकता है।

विदेशियों ने परंपरागत भारतीय वानस्पतिक समृद्धि को तहस-नहस करने का जो बीज वर्षों पूर्व बोया था वह हमारे धुरंधर लोगों की नासमझी और वानस्पतिक क्षेत्रों के विकास में जुटे महारथियों की नादानी कहें या लापरवाही से इतना पसर चुका है कि अब हर कहीं जहरीली और आत्मघाती वनस्पति का साग्राज्य है।

हरियाली से भरे-पूरे क्षेत्रों में मरुथल का विस्तार हो रहा है, हरित भूमि बंजर होने लगी है और परंपरागत वनस्पति की जगह ऎसी खरपतवारें हावी हैं जिनका कोई उपयोग न मनुष्यों के लिए है, न मवेशियों के लिए। बल्कि इन आयातित जहरीली वनस्पतियों की वजह से कई समस्याएं फैल रही हैं और अब बहुत बड़ी समस्या यह हो गई है कि इनका सफाया कैसे करे ?

अब भी समय है जब हमें लौटना होगा पुराने जमाने में और करना होगा परंपरागत प्रजातियों से प्रेम। स्थान विशेष की आबोहवा के अनुकूल और परंपरा से चली आ रही वनस्पति के संरक्षण और संवद्र्धन के बगैर आर्थिक एवं सामाजिक स्थितियों में बदलाव की भूमिका रचना दिवास्वप्न के सिवा कुछ नहीं है।

एक बार फिर हमें अच्छी तरह मानना होगा कि हमारी अपनी वनस्पति और पेड़-पौधे ही हैं जो हमारे लिए ही नहीं बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों और सदियों के लिए उपयोगी हो सकते हैं और सामाजिक परिवर्तन के लिए महाक्रांति यदि कोई ला सकती है तो यही हमारी वानस्पतिक संपदा, जिसे हम भुला बैठे हैं।

उन सभी लोगों को जो कहीं न कहीं मुख्य भूमिका में हैं या परिक्रमा और मिथ्या जयगान में रमे हुए हैं, सोचना चाहिए कि उनके लिए पद-प्रतिष्ठा और पैसे से कहीं ज्यादा मूल्यवान है मातृभूमि की सेवा। जब मातृभूमि की सेवा का भाव जग जाएगा तब ये सारी विषमताएं अपने आप समाप्त हो जाएंगी और तब वही सोचा जाएगा जो समाज, क्षेत्र या देश के हित में होगा।

इन सभी बड़े लोगों को समझना चाहिए कि कितने ही आए और कितने ही चले गए, कितने ही ऎसे हैं जिनकी मौत के कई वर्षों बाद भी लोेग उनका नाम ले-लेकर रो रहे हैं और जी भर कर गालियाँ बकते हुए देश को रसातल में ले जाने में उनकी अहम् भूमिका की चर्चा करते नहीं अघाते।

हमारे पास अवसर है। हम आज भी नहीं चेते तो लोग हमें अच्छे कर्मोें की वजह से भले याद न करें, लेकिन दूसरे रूप में तो हमें लोग याद कर करके कोसते रहेेंगे। तब हो सकता है हम जिस पशु योनि में रहें या नर्क में, हमारी वेदनाओं का ग्राफ ही हमें बता पाएगा हमारे कुकर्मों को।

हम सोचें कि ऎसा कोई काम करें ही क्यों कि माँ का दूध लजा जाए और मातृभूमि भी हमारे जन्म को कोसती रहे। वैसे हम आज भी यह सोचने के लिए स्वतंत्र हैं कि मातृभूमि की सेवा में हमने अब तक ऎसा किया ही क्या है जिसका हमें संतोष हो।

 

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