लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

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बस्तर के इन भावी इंजीनियरों को सलाम…

गिरीश पंकज

यह एक खुश कर देने वाली खबर है कि बस्तर के कक्षा बारहवीं के 251 में से 222 बच्चों ने इस वर्ष अखिल भारतीय इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा दी और इनमें से 148 बच्चों ने अप्रत्याशित सफलता प्राप्त की। नक्सलवाद से जूझ रहे बस्तर के बच्चे अगर भारी तनाव के बीच भी अगर ऐसी सफलता प्राप्त कर लेते हैं तो सबसे पहले उनके हौसले का सलाम ही किया जाना चाहिए। आज बस्तर का अधिकांश इलाका नक्सलवाद की चपेट में हैं। आए दिन खून-खराबा, विस्फोट और अपहरण से लोगों का जीवन दूभर हो गया है। अनेक शांतिप्रिय लोग बस्तर छोड़ कर रायपुर या अन्य शहरों में जा कर बस गए हैं। बस्तर में नक्सली आतंक से प्रभावित परिवारों के बच्चों ने रायपुर में शरण ली और अपने जीवन को नये सिरे से जीने की कोशिश की। प्रयास नामक एनजीओ ने इन बच्चों को पढ़ाना-लिखाना शुरू किया। इस संस्था को सरकारी मदद भी मिली। नतीजा सामने हैं। बस्तर के बच्चों ने वो चमत्कार कर दिखाया जो अनेक शहरी बच्चे बेहतर सुविधाओं के बीच भी नहीं कर पाते। इसका पूरा श्रेय मैं बच्चों को ही दूँगा। उन्होंने तमाम परेशानियों के बीच अपने भविष्य के लिए नई इबारत लिखी, और दुनिया को दिखा दिया कि अगर आदमी हिम्मत न हारे, लगन से बढ़ता रहे तो एक न एक दिन सफलता उसके कदम चूमती ही है। अब बस्तर के ये बच्चे इंजीनियर बनेंगे और उम्मीद है कि अपने बस्तर को ही संवारने की कोशिश करेंगे। जब विकास का रथ आगे बढ़ेगा तो विनाश के कीड़े-मकोड़े अपने आप कुचल कर मर जाएँगे। अब नक्सलियों को भी आत्ममंथन करना होगा(अगर उनके पास आत्मा हो तो)कि उनके कारण बेघर हुए बस्तर के माटी पुत्र आज सफलता का इतिहास रच रहे हैं। इसलिए हमें विनाश के रास्ते पर चलने के बजाय अब विकास के पथ पर कदम बढ़ाना चाहिए।

जिस बस्तर के शोषण की बात करते हुए वे बस्तर को अपने आतंक और आर्थिक उगाही का केंद्र बना चुके हैं, उसी बस्तर में अब वे विकास के सहयात्री बन जाएँ और युवा पीढ़ी को आतंक और हिंसा का पाठ पढ़ाने की बजाय बेहतर भविष्य का रास्ता दिखाएँ। नक्सलियों के पास जितना पैसा जमा हो गया है, उसके सहारे वे युवा पीढ़ी को उन्नति के शिखर तक पहुँचा सकते हैं। हिंसा का रास्ता छोड़ कर नक्सली अहिंसा का मार्ग अपनाएँ और नई पीढ़ी को दिशा देते हुए बस्तर को धरती का स्वर्ग बना दें। ये काम नक्सली कर सकते हैं। क्योंकि वे विचारधारा के साथ चलने का दम भरते हैं वे सामाजिक परिवर्तन की बात करते हैं। परिवर्तन बंदूकों के जरिए नहीं आता। परिवर्तन नव जागरण से आता है। लोक मानस के परिष्कार से आता है। बस्तर के जो बच्चों आज परीक्षा दे कर सफल हुए हैं, उने पीछे प्रयास जैसी संस्थाओं की ताकत थी। अगर ऐसी और संस्थाएँ सामने आ जाएं तो बस्तर का नक्शा ही बदल जाए।

बस्तर के नौजवान पीढ़ी के पास बल है, उत्साह है। हौसला है। उनके अपने सपने हैं। इन बच्चों में हम तलाशें तो कितने ही खिलाड़ी मिल जाएंगे। फुटबाल , हॉकी, तैराकी, कुश्ती आदि अनेक खेलों के लिए प्रतिभाएँ तलाशी जा सकती हैं। और उन्हें समुचित कोंचिंग देकर उन्हें सफल खिलाड़ी बनाया जा सकता है। बस्तर का संगीत, बस्तर की दीगर ललित कलाएँ अभी दुनिया ने देखी कहाँ है। बस्तर के वाद्ययंत्रों को लेकर कलाकर्मी अनूपरंजन पांडेय ने बस्तर बैंड बनाया है जिसे सुनने का अपना रोमांचक अनुभव होता है। बस्तर की विविध प्रतिभाएँ दुनिया में भारत का नाम रौशन कर सकती हैं। दुनिया के अनेक देशों में ऐेसे प्रयोग हो रहे हैं। जहाँ गाँव के आदिवासीबहुल इलाके की प्रतिभाओं को खोज कर उन्हें तराशा जाता है। अपने देश में अभी यह काम मन से नहीं किया जा रहा। जबकि असली प्रतिभाएँ तो गाँव या वनांचलों में ही हैं। उन्हें निकालने की जरूरत है।

बस्तर में रामकृष्ण मिशन और रुकमणि संस्थान जैसी संस्थाएँ कार्यरत हैं। ये बस्तर के बच्चों को समुचित व्यवस्था दे कर शिक्षित करने के काम में लगी हुई हैं। मैं समझ नहीं पाता कि नक्सली ऐसा कोई काम हाथ में क्यों नहीं लेते? वे बच्चों या युवक-युवतियों के हाथों में बंदूकें ही क्यों थमाना चाहते हैं? वे खून-खराबे की ओर क्यों आकर्षित हैं? वे विकास को अपना केंद्र बिंदु क्यों नहीं बनाते? कोई भी सभ्य समाज हिंसा को पसंद नहीं करता। इसीलिए सलवाजुडूम (शांति अभियान) का जन्म हुआ था। नक्सलियों से त्रस्त आदिवासियों ने एक अभियान सुरू किया था जिसे सलवा जुडूम का नाम दिया गया। ये और बात है कि बाद में अतिउत्साह में सरकार ने इस अभियान को गोद में लेने की कोशिश की और मामला गड़बड़ाने लगा। लेकिन सलवाजुडूम ने यह साबित कर दिया था कि लोग नक्सलियों की कारगुजारियों से खुश नहीं है। आदिवासियों की ही जानें ले लेना कहाँ का इंसाफ है। जिन आदिवासियों के लिए लड़ाई का दम भरा जा रहा है, उसी आदिवासी की निर्मम हत्या किसी भी कोण से उचित नहीं। लेकिन हत्याओं को ही अपनी रणनीति का हिस्सा समझने वाले नक्सलियों के सामने इस मुद्दे को उठाने का कोई मतलब नहीं। जब तक उनके अंतर्मन में मानवीय गुणों का विकास नहीं हो, जब तक वे इस सत्य को नहीं समझेंगे कि खूनी खेल खेलने से परिवर्तन नहीं होगा, तब तक विकास के नए सोपान नहीं रचे जा सकते।

बस्तर के बच्चों ने इंजीनियर बनने की परीक्षा सफलता के साथ उत्तीर्ण की है। अब उन्हें भिड़ कर आगे की तैयारी करनी चाहिए। प्रयास जैसी अन्य संस्थाएँ भी आगे आएँ और इन बच्चों को समुचित सुविधाएँ मुहैया करा के अपना फर्ज निभाएँ। इस काम में कल कारखाने चलाने वाले धनपतियों का भी फर्ज बनता है कि जिस छत्तीसगढ़ को उन्होंने अपना चरागाह बना रखा है, उस छत्तीसगढ़ के लिए अपना कुछ फर्ज समझें और इन बच्चों को गोद ले कर उनकी पढ़ाई पूरी कराएँ। आखिर अब प्लेसमेंट होता ही है। इन बच्चों का अभी से प्लेसमेंट कर लिया जाए और अनेक कंपनियाँ बच्चों का अभी से अपनी कंपनी में नौकरी दे दें। जब बच्चे इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर लेंगे तो उन्हें अपनी कंपनी में रख कर उनसे काम लें। इस दिशा में कंपनियों को सोचना चाहिए। सरकार को भी दबाव बनाना होगा। यह शर्त रखनी होगी कि बस्तर में खुलने वाली हर कंपनी में बस्तर के ही इंजीनियर लिए जाएँगे।

बहरहाल, बस्तर के बच्चों की इस सफलता पर पूरे देश में संभावना एवं आशा की किरण जगी है। लोगों को लगने लगा है कि अब बस्तर के विनाश पर आमादा लोगों के विरुद्ध ये भावी इंजीनियर ही रचनात्मक प्रतिकार करेंगे। नक्सलियों को भी अब विचार करना चाहिए कि वे कहाँ खड़े हैं। उनके तमाम आतंकों के बावजूद बस्तर हारा नहीं है, टूटा नहीं है। बच्चे हताश नहीं हुए हैं। उन्होंने इतिहास रच कर भावी पीढ़ी के लिए भी पथ प्रशस्त कर दिया है।

मेरा कवि मन इन बच्चों के लिए कुछ पंक्तियाँ समर्पित कर रहा है-

चल पड़े हैं जब चरण तो अब नहीं रुक पाएंगे

आंधियां तुम ये न समझो हम कभी झुक जाएंगे.

हो मुसीबत लाख लेकिन हम कभी हारे नहीं

शातिरों से मुक्ति के हम गीत हरदम गाएंगे

हम खड़े हैं दूर लेकिन वक्त आया है अभी

हम भी अपना एक परचम विश्व में लहराएंगे

ओ ‘अँधेरे’ तुम हमें कब तक डराओगे यहाँ

अब तो हम सूरज बनेंगे, रौशनी फैलाएंगे

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